Saturday, September 18, 2010

समर्थ वाशिष्ठ की नई कविताएं




पिता का घर

सच ये है कि

अब भी मिल जाती है

मुझे इस घर में

अप्रैल के बाद पूरी कोरी

एकाध डायरी

जिसमें बचे होते हैं

भविष्य की कविताओं के लिए

सैंकड़ों पृष्ठ


मां है तो

इसी घर में है

बहन भी सांय-सांय चलती है

इन दीवारों के बीच

किसी घुमड़ते तूफ़ान सी

मैं ही बन गया हूं मंद बयार

चाहूं जितना भी

चलता नहीं इस घर का कुछ भी

मेरे साथ

फिर भी पूरा ही रहता है पास


तुनकता रहता हूं हरदम

इस घर में

कि गिनी जाएं

मेरी लगाई ईंटें भी कुछ

भूकंपों और दीमकों के ख़िलाफ़


छोटा है लेकिन

जितनी खर्च हुई हमारी ज़िंदगियां

इसे बनाने में

शायद ही बची हों

किसी और मकान के लिए।


मैं लौट आऊंगा यहां!

****

पते

मैं जहां गया

मां ने दर्ज किए

मेरे पते


उसकी फटी जिल्द-वाली

भूरी डायरी में देखा मैंने

B के बाद E वाला

बैंगलूर के एक होटल का अपना पता

चला जाऊं कल मिस्सिसिप्पी

तो मिलेगा वो भी

उसकी ईजाद की हुई वर्तनी में लिखा

साफ़-साफ़

नॉस्टेलजिया से अलग भी हैं

इसके फ़ायदे

ढूंढ़ सकता हूं मैं

कि फ़लां रेल की फ़लां बोगी से

कब किया मैंने सफ़र

और मिल जाती है अचानक

किसी कविता लिखने की असल तारीख


कभी नहीं बदला मां का पता


अपने हरी बेलों

और रूफ़-गार्डन वाले घर में

व्यस्त रही वो

और आश्वस्त

कि मालूम था उसे मेरा पता


भरोसा रहा मुझे भी हमेशा

कि उस फटी जिल्द-वाली

सन् 96 की डायरी में

मिल ही जाएगा मुझे मेरा पता।

****

कुटिल तर्क

सपने में गटकता हूं

दो घूंट पानी

बार-बार

सूखा ही रहता है तालू

उठकर देखता हूं कि अरे!

सपने में पिया पानी


सपने में घुड़सवार हूं मैं

दुश्मनों से घिरा

रेगिस्तान के बीचों-बीच

बिल्कुल नहीं घबराता


सपने में मूछें हैं

ताव भी

वैसा जैसा

कभी नहीं स्वीकार्य होगा

मुझे

सपने के दफ़्तर में

काँफ़्रेंस-कक्ष का लांघता हूं दरवाज़ा

तो पुरखों के मकान की

बैठक में पहुंच जाता हूं अचानक

जहां अब भी बैठे हैं दादाजी

श्वेत-श्याम टीवी पर देखते ख़बरें


कई रंगों में दिखते हैं अब

मुझे सपने

बरसों चलती इस वैज्ञानिक बहस के बावजूद

कि क्या रंगीन होते हैं सपने


मुझे इंतज़ार है कि एक दिन

सपने में बदल जाएगी

मेरे लिए ये दुनिया

दूसरे रंगों से ज़्यादा

रह जाएगी नीली, धूसर और हरी

जैसा होना चाहिए उसे यकीनन


और जब खोलूंगा मैं आंखे

एक लम्बी नींद के बाद

बचा रहेगा कुछ मेरा सपना

मेरे साथ।

****

{ समर्थ की कविताएं इससे पहले सबद पर कवि की संगत कविता के साथ शीर्षक स्तंभ में प्रकाशित हो चुकी हैं. तस्वीर मधुमिता दास के कैमरे से. }

8 comments:

पारूल said...

गुनगुनी कविताएँ ..चित्र की धूप जैसी ...आभार

ssiddhant said...

बहुत अच्छी कविताएं लेकिन मैं "कुटिल तर्क" को तीनों में सबसे ऊपर रखता हूँ क्योंकि यहाँ ठीक-ठीक उन्हीं चीज़ों का एकदम सही ज़िक्र मिलता है जिनका ज़िक्र करना काफ़ी मुश्किल है. मसलन, सपनों में मुंह का सूख जाना, जिसमें हम बार-बार सपनों में ही प्यास बुझा कर संतुष्ट होते रहते हैं. एक पज़ल्ड फिनामिनन को खोलने की बहुत ही सफल कोशिश. पहली कविता तो एक नौस्टेल्जिया की तरह सामने आती है, जहां दीमकों के ख़िलाफ़ "मेरी" लगाईं इंटों को गिनने की ज़्यादा ज़रुरत है....वाह... धन्यवाद अनुराग जी.

प्रवीण पाण्डेय said...

सपनों के रंग में,
अपनो के संग में,
मिल गये कुछ एक पल,
कविता के छंद में।

अनुपमा पाठक said...

sundar sarita si bahti hui abhivyakti!
subhkamnayen...

Dinesh said...

Some one told me of these postings.

The poem addressed to the home
and the addresses in diaries moved me to tears.

डॉ .अनुराग said...

पहली दो कविताएं बेमिसाल .......तीसरी कविता का ये

मेरे लिए ये दुनिया

दूसरे रंगों से ज़्यादा

रह जाएगी नीली, धूसर और हरी

जैसा होना चाहिए उसे यकीनन


और जब खोलूंगा मैं आंखे

एक लम्बी नींद के बाद

बचा रहेगा कुछ मेरा सपना
मेरे साथ।


ओर हाँ ब्लॉग का टेम्पलेट इतना खूबसूरत है चुराने का मन करता है

Farhan Khan said...

sundar kavitayen hain! mujhe ye kavitaa bahut pasand aaye (PATe) ismen angrezee ke shabdon ko sundartaa ke saath sajaayaa gayaa jo isko aur charming baaate hain!!! Thanks Bhayea for sharing the mesmerizing poetry...

shailendra shail said...

liked all the poems particularly the first one.congrats.keep writing in hindi