सबद
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सबद पुस्तिका : 4 : चन्दन पाण्डेय की नई कहानी


रिवॉल्वर
(दोस्ती का पर्दा है बेगानगी – ग़ालिब)



यह नीलू की किस्मत का और मेरा मिला जुला फैसला था कि उसकी दुहरी हत्या होनी चाहिये. नीलू की शारीरिक हत्या का दिन होने का नेक मौका मैने रविवार को दिया था पर उस रविवार की सुबह मेरी नींद ऐसे खुली जैसे किसी फांसी की सजा पाये मुजरिम की खुलती है. एकदम अचानक और डरे हुए इंसान की तरह. नीलू की हत्या का साहस ना तो बाकी जीवन जीने की उत्कट इच्छा से मिली और ना ही उस ईर्ष्या से जिसके बीज नीलू ने मेरे भीतर बड़े सलीके से रोपा था; उसे मारने का साहस मुझे नीलू के अटूट प्रेम से मिला. वैसे भी अब मैं वह इंसान नहीं रह गया था जो इस जले प्रेम को निभाने से पहले था.

अब जब प्रेम और जीवन नष्ट हो चुका है तब लगता है, नीलू नर्क की छत से फिसल कर मेरे जीवन में आ गिरी थी. नीलू, जिसने मेरा टूटना और टूटकर बिखरना नहीं देखा. फूल के बिखरने को लोग अक्सर कम देखते हैं पर नीलू ‘लोग’ नहीं थी. वही नीलू, जिसके मन मष्तिस्क में अब मैं, समय बीतने के साथ लगातार क्षरित होते हुए, याद और धुन्ध की तरह बचा था. नीलू का दर्जा इतना ऊंचा था कि मैं चाह कर भी उसकी हत्या कर नहीं पाता. जिस लड़की के रक्त के बहाव तक को मैने सुना था उसकी हत्या तभी सम्भव थी जब मैं उसके वजूद को मार सकूँ.

उसकी चारित्रिक हत्या में कुल सात दिन लगे थे. इस कर्म में मुझे कल्पना की मदद लेनी पड़ी. वो भी कोरी कल्पना नहीं. बस दो विपरीत धाराओं या दो अलग अलग महसूसियत को अपनी नायिका की चोटी की तरह पर गूँथ दिया. इसी कल्पना तत्व ने मुझे वह तर्क और साहस दिया जिससे मैं उसकी हत्या का फैसला कर सका.



डाउनलोड करके पूरी कहानी पढ़ने के लिए इस ई-बुक पर राइट क्लिक करके लिंक या टारगेट को सेव करें.


28 comments:

I'll look forward to read that Story......I am getting goose bumps.....


I thought It will be a enjoy to read a story on my week-off but sorry to say, I am feeling troubled & tormented. How can a character be like this?


चन्दन जी को फिर से एक बेहतरीन कहानी के लिए बधाई. बहुत अच्छी कहानी लिखी है आपने. और तमाम गजब के पेंटिंग्स ने इसमें और निखार ला दिया है


कहानी की प्रस्तुति बहुत बढ़िया है. लम्बी कहानी के वजह से पूरा तो नहीं पढ़ पाई पर जितना पढ़ा उसमे कथाकार ने प्रभावित किया. कहानी पूरा पढ़ने की बेचैनी है.,


नीलू नामक पात्र हमे सोचने पर मजबूर करता है. चन्दन जी को धन्यवाद की इतनी बेहतरीन कहानी के साथ आये. बहुत बढ़िया कहानी. चन्दन जी के स्तर की. एक बार फिर से बधाई.


Alfred hithcock was asked at an airport about his work in the security check,he said he is a 'producer' .The officer asked what does he produce?he said-'goose bumps'.

last comment made me remember this.


अनुराग
रात में तुम्‍हारी पोस्‍ट देखकर कहानी डाउनलोड की और पढ़ ली। लंबी कहानी थी लेकिन एक बार शुरू की तो पढ़कर ही दम लिया। मैंने चंदन की कहानी पहली बार पढ़ी है.

मेरा ऑब्‍जर्वेशन इस तरह रहा....
1 कहानी का शीर्षक पसंद नहीं आया। देखते ही लगा जैसे पुराने जमाने की कहानियों में रहस्‍य और रोमांच हुआ करता था कुछ वैसा माहौल क्रिएट करने याक म से कम टाइटल से ऐसा इंगित किया जा रहा है।
2 ये कहानी ऐसी थी जिसमें से कहीं से कुछ पन्‍ने कम कर दो लेखक को बिना बताए और जरा सा रफू कर दो तो रीडर को जरा भी फर्क नहीं पड़ने वाला कि कुछ छूट गया।
3 कैरेक्‍टर जो भी इसमें हैं वे बहुत ज्‍यादा अपने आप में घुस गए हैं, उनकी त्‍वचा से लेकर नसों तक के बीच जाते हुए भी हम उनके बाहरी काया और दुनिया के साथ ठीक से जुड़ नहीं पा रहे हैं। जैसे गौतम एक डॉक्‍टर है लेकिन उसे अगर डॉक्‍टर की बजाय ट्रैफिक पुलिस बता दिया जो उसके व्‍यवहार और चरित्र में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। हम कैसे एक चरित्र की आंतों का विश्‍लेषण सही तरह पचा सकेंगे जबकि उसके बाहरी स्‍वरूप को बहुत ज्‍यादा देख तक नहीं पा रहे हैं। कम से कम 71 पन्‍नों की कहानी में तो ऐसी अपेक्षा की जा सकती है न।
4 कहानी की थीम मुझे बहुत अच्‍छी लगी। दोहरी हत्‍या का आइडिया बहुत कुछ ऐसा है जो शायद मैं अपने अंदर लंबे समय तक महसूस करती रही थी। इसमें बहुत सारे द्रश्‍य बड़े सच्‍चे हैं। एक औरत जब झूठ बोलती है तो किस तरह व्‍यवहार करती है, और पुरुष जब उसे जानकर भी अनजान बनता है तो क्‍या चल रहा होता है उसके भीतर ये सब बहुत अच्‍छे से पिरोया गया है। सीधे तौर पर कहानी अच्‍छी लगी।
5 पैराग्राफ छोटे हैं इसलिए पढ़ना मुश्किल नहीं लगा और एक सीख भी मिली की लंबी बात को भी किस तरह तोड़ा जा सकता है।
6 कुछ जगहों पर बहुत सच कह गया लेखक जैसे उसका अपना या‍ किसी बहुत परिचित का भोगा हुआ हो।
7 एक और चीज जो अखर रही है वो है इतनी सुंदर पेंटिंग्‍स को उसमें एम्‍बैड करना। रीडर का ध्‍यान भटकता है, कम से कम ऐसे रीडर का जो उन पेंटिंग्‍स को पसंद कर रहा हो। ये कुछ ऐसा है जैसे एक थाली में तुमने मुझे मेरी पसंद की 50 चीजें दे दीं। मैं क्‍या खाऊं समझ नहीं पा रही।

बाकी सब खैरियत,
शुभकामनाएं
शायदा


Chandan, I read your so loooooong story in three shifts. but was a good reading. Here in seoul, u can find more number of cases of break-ups, lies and worst of all, murder for girls. It is a real account which is softening our hearts for those who are exused of murder but having generous cause.I dont know what made u to write this but atlast it is a very good story.Hope rest is fine at ur end.

Shalini Mishra,
AUT College,
Seoul


पहला पन्ना पढ़कर ऐसा नहीं लगता के कन्फेशन पढ़ रहा हूँ....भाषा की रवानगी बेहद खूबसूरत है ........दूसरा पन्ना कमजोर है.......लगता है सिटिंग में लिखी गयी है ....पहला जिस फ्लो में है.दूसरा कही कही रुकता है ..उसके आगे रवानगी फिर अपनी ले में है......माहोल रचने के सिलसिले से लेकर कई फिलोस्फिकाना पञ्च मसलन .....
"मै प्रेम में ओर वो भी इस अभागे प्रेम में ऐसा डूबा हुआ था के दुनिया के आये बदलावों से परिचित नहीं था "
नीलू की चारित्रिक हत्या
कल्पना का प्रसव
तयशुदा आना
प्रेम का सार्वभौमिक सिद्दांत -प्रेम किसी से नहीं
फोन करना एक जंग लगी आदत
आदि इत्यादि......
पहले पहल ....जेम्स हेडली चेज के कई थ्रिलर सा थ्रिल देता है ......ओर सुरेंदर मोहन पाठक सा भी.....पर मुझे ये एक्सपेरिमेंट बहुत अच्छा लगा .......अलबत्ता शायदा जी एक बात से इत्तेफाकी जरूर है के इतनी खूबसूरत पेंटिंग बीच में काहे रखी भाई....


कभी विस्तार से कहूँगा .
फिलहाल इस लंबी कहानी के लिए दो शब्द हैं मेरे पास -- उम्दा और अलहदा.


सबसे पहले तो अनुराग जी आपको बधाई इतने अच्छे प्रस्तुतीकरण के लिए | चन्दन, आप की ये नई कहानी मुझे बहुत पसंद आई | गौतम और नीलू जैसे चरित्रों की बढ़ती संख्या और ऐसी हत्याएं हमारे समय का सच हैं, इससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता | ऐसी कहानी युवा पीढ़ी का कोई लेखक ही लिख सकता था, आपको बधाई | प्रेम जैसे नाजुक विषय पर इतना सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने की चुनौती हिंदी में पुरानी पीढ़ी के किसी लेखक ने स्वीकार की हो, मुझे याद नहीं |

गजब की पठनीयता है इस कहानी में | बहुत गहरे उतरे हैं आप गौतम के दिमाग में | नीलू के धोखे को समझते हुए भी अनजान बने रहना, संबंधों के सहज हो जाने की झूठी उम्मीद, अन्दर-अन्दर कुढ़ते रहने के बावजूद फोन करने की रस्म को निभाना, अपने धोखे का जिक्र किए जाने पर नीलू का और आक्रामक हो जाना या अपने लिए कम से कमतर होती जाती जगह के चलते गौतम की कुंठा और उसमें हत्या जैसा निर्णय लेना इन सब स्थितियों को आपने बहुत सफलतापूर्वक उभारा है | ये भी अच्छा लगा कि कहानी में प्रेम के साथ शरीर बहुत सहज तरीके से शामिल है |

मनोज पटेल


This comment has been removed by the author.

i read this story at one go yesterday. i found this story very realistic in its approch specially how girls talk when they r lying and they dont give u any room either to go or to stay in their life if they have similar character as of nilu.


“पल-पल प्रेम की गहराई में डूबता हुआ और तिल-तिल प्रेम की आग में झुलसता हुआ एक प्रेमी की दास्तान है रिवॉल्वर... एक लड़की की बेवफाई से उपजे अपराध का तहकिकात है रिवॉल्वर… सिस्टम की साँचे में गोली दागता है यह रिवॉल्वर... बेबसी और बेखुदी को अपने में समेटे कतरा-कतरा तड़पती और अपने प्रेमी के सवाल से छिलती एक लड़की की “हाँ” है जो अपने प्रेमी के शेष जीवन के सुख चैन के लिए अपनी हत्या पर फिदा हो जाती है...”
कुलमिलाकर इतना ही नहीं है रिवॉल्वर... यह तो बस मोटे तौर पे देखने का अलसाया सा या फिर शुतरमुर्गी नजरिया है... बात बात की है लेकिन बात की बात बाद में या फिर किसी और से या कभी और कहेंगे... अभी कहानी की बात.. लेकिन कहानी की बात ही कैसे कह पाएंगे...? अब तक पढ़ी हुई सारी प्रेम कहानियाँ घूमने लगी है... हॉलिवुड से बॉलिवुड तक फिल्मों को फैल्सेज आ रहे है... समझ में नहीं आ रहा है किस सिरा को पकड़ के बात करे...
एकहतर पेज की कहानी मगर हजारो कविताओं कि पंक्तियों से सजी यह कहानी अपनी भाषाई जादू में जितना खींचती है उतना ही किस्सागोई अपनी पकड़ से बाँधे चलता है... अंत में प्रेमिका को बाँध कर सवाल करने का दृश्य अपनी भाषा में कहूँ तो... “साला क्या लिखा है... फाड़ डाला है यार...” बेबसी, बिडंबना के ऐसे भयानक दृश्य के देखने के बाद बर्गमैन के फिल्में याद आने लगती है...
यह सवाल – “नीलू क्या मैं अपने शेष जीवन के सुख-चैन के लिए तुम्हारी हत्या कर सकता हूँ”... और जबाब “हाँ”... सवाल और हाँ कहने के बीच जो शिल्प साधा है क्या बेहतरीन है... जैसे गुरूदत प्यासा के आखिरी दृश्य में अपने जाने की बात कहते है तो वहिदा रहमान कहती है “बस यही कहने के लिए आए थे” तब गुरूदत कहते है... “तुम भी चलोगी” मतलब दृश्य के सबसे आखिरी सॉट में आह निकाल देना अपने आप में बड़ी बात है...
इस कहानी को पढ़ते हुए अपनी ताकत से रौंदता हुआ आदमी की जगह औरत खड़ी नजर आती है... इस लिहाज से यह कहानी पुरूष शोषण के नए यथार्थ को सामने रख रही है... यह नया यथार्थ एक नए विमर्श की माँग कर रहा है... अशा है छिनाल शब्द सुन के बहुतेरे ने जो अपनी धार पजा के रखी है इस विमर्श में काम आएगी...
आखिर में एक बड़ी और वाकई में नई(एक रेखा खींचती हुई) ...जेनुइन कहानी पर ठीक से बात न रखने के लिए क्षमा और चंदन सहित ‘‘अनुराग को ढेरो बधाइयाँ....


Finally I read the Story "Rivolver", that to at 1 go..... I am starting my comment with this coz many people like me will think before reading "oh so many pages"....I started at 11:30 pm & when i saw the pages, i thought of continuing till next 2 days but as i was reading that, i didn't felt like waiting for next day.....I completed it by 2.... Wonderful Story!!!! I felt like moving with the Story....While reading the story i felt like entering the vicious circle of life, which we can observe in our day to day life.....

Many readers can't accept the story just because of its anti-woman stuff but I won't call it anti-woman but its anti-infedelity.. I have seen people who can easily fit at Neelu's Character.....

Story moves at a very good pace, with impressive use of words & sentences....Even the intimacy, jealous & possesiveness are expressed with a good language, which could have turned into the abusive 1 but it was nvr like that....

Its my believe that Pen is a very wonderful way of expression & Writers when right a Story, they have to be in every character equally.... Thanks Chandan for letting us read one more compilation of characters of your mind.....

All the best & Congratulations......

I would like to Thank the person who worked at pictures, perfectly placed..... Congratulations to you too..... I am sorry i don't know the name who has done that, but wishes to him/her too......


कहानी का फलक इतना वृहत है की एक बैठक में अपनी बेचैनी को समूचे में कह पाना असंभव है. पर इतना कहूँगा कहानी 'गजब' है. पुरुष विमर्श, प्रेम विमर्श और साथ ही साथ स्त्री विमर्श सब कुछ अपने में समेटे हुए है. मजे की बात है की सबसे सशक्त विमर्श, एकदम महीन तरीको से कही गयी है. 'रिवोल्वर' और 'कितनी दफा फायर कर सकते हो'.. उस फायर से कौन मर रहा है ! और रिवाल्वर कितनी तरह का होता है, कितने सवाल खड़े कर दिए एक साथ. सोचने पर मजबूर कर दिया. पर एक शिकायत है की लेखक ने कहानी को छोटा क्यों कर दिया! कहानी की पठनीयता कहती है की यह नोवेल का रूप ले सकता था. और वैसे भी चन्दन पाण्डेय का नोवेल सबको अपेक्षित है. सोचता हूँ की बाकी का कमेन्ट कल लिखूं, सांस लेने के बाद. और एक बात, कहानी को प्रस्तुत करने वाले ने बड़े शौक और बारीकियों से कहानी को सजाया है .


सुबह पढ़नी शुरू की थी कहानी और चार शिफ्ट में संपन्न कर पाया। चंदनी जी की कहानियां पढ़ते रहता हूं यत्र-तत्र पत्रिकाओं में....

शिल्प ने बाँधे रखा अंत तक और कथ्य हर पैरा, हर पृष्ठ के बाद उत्कंठा को तनिक और बढ़ाता गया।

गौतम और नीलू के चरित्र को इतनी खूबसूरती से उभारा है लेखक ने कि दोनों जीवंत होकर आस-पास दिखने लगे।

चंदन जी के नायब जुमले और अनूठे बिम्ब हैरान करते हैं और एक जलन भी पैदा करते हैं। फिलहाल ये मिस्रा लिये जा रहा हूँ अपने संग "निजता, चूमने की याद की तरह प्रेम का अनिवार्य हिस्सा है" ।


कमाल की कहानी है चन्दन !!! इसमें वो बात है जिसके लिए आप जाने जायेंगे और बहुत आशा है आपसे की आप और लिखेंगे इसी दुनिया के बारे में जो सामने तो है मगर हमे डर लगता है बात करने में और स्वीकार करने में.
जहा तक नाम की बात है तो बहुत अच्छा नाम है. जानबूझ कर कठिन नाम रखने वालो को भी पढ़ा है मैंने और उनकी कहानी में कुछ कहने को ही नहीं था. अगर समीक्षकों के लिए नाम रखना है तो इस कहानी का नाम बहुत अजीबोगरीब रखा जा सकता है लेकिन फिर आम पाठक नहीं पढ़ेगा और वंचित रह जायेगा इस खुबसूरत कहानी से. इस कहानी की खास बात ही यही है की ये हर इंसान के लिए है और ये बहुत ही महत्वपूर्ण बात है किसी भी लेखक के लिए. जो आयाम हासिल किये है इस कहानी ने उसमे बहुत बड़ा हाथ है इसके शीर्षक का.
मुझे भी लगा की लम्बी कहानी है लेकिन नहीं. गजब तरीके से बांध के रखा इस कहानी ने और अगर २०० पन्ने भी होते तो पता नहीं चलता. इस कहानी में और भी बहुत कहानिया है जो आपको कहनी पड़ेगी चन्दन और ये एक जिम्मेदारी है आपके ऊपर. नीलू के अन्दर बहुत सारी लडकिया है और उन सबको देखा है मैंने इसी समाज में इसलिए कोई आश्चर्य नहीं हुआ की कोई इतना बुरा कैसे हो सकता है. हाँ ये बात जरुर दिलचस्प होगी की आखिर उसके पास क्या क्या तर्क होंगे अपने इस व्यवहार के ?
बहुत भयंकार पीड़ा है गौतम के अन्दर और इसे लिखते हुए कही जादा पीड़ा हुई होगी आपको. मानसिक अवस्था का जो सटीक वर्णन किया है आपने वो अदभुत है. नीलू को थोड़ी और जगह मिलनी चाहिए थी उसकी अपनी कहानी के लिए लेकिन उसके लिए एक अलग कहानी की अपेक्षा है आपसे.
चित्रों के साथ प्रयोग बहुत नया है और इसे और बेहतर किया जा सकता है..इसमें सम्भावनाये है इसलिए कोशिश होनी चाहिए !!
आपने उन बहुत से लोगो की कहानी कही है जो अपनी कहानी नहीं कह पाए और आपने तकलीफ सही.....इसके लिए बहुत बहुत बधाई.
आप हर तरह के पाठक के पसंदीदा लेखक होंगे !!!!


सबसे पहले एक शानदार प्रस्तुतीकरण के लिए अनुराग भाई को बधाई। कहानी पूरी पढ़ गया हूँ। हो सकता है कि बहुत से लोग मुझसे असहमत हों, मगर मुझे लगता है कि यदि इस कहानी को संपादित करके कुछ छोटा बनाया जाता तो उसका प्रभाव ज्यादा गहरा होता। यह शायद गौतम की आत्मस्वीकृति के रूप में कहानी लिखने के चलते हुआ है कि इसमें नीलू का पक्ष कहीं नहीं आ पाया है...मगर हर सिक्के का दूसरा पहलू तो होता ही है...उम्मीद है चंदन इसके पार्ट टू को नीलू की आत्मस्वीकृति के साथ लिखेंगे। कहानी में जगह-जगह प्रयोग किये गये जुमले शानदार हैं...उनमें चंदन की प्रतिभा उभरकर दिखती है। मुझे पूरी कहानी में सबसे ज्यादा मार्मिक और प्रभावी उसका अंत लगा। एक प्रश्न और उसका उत्तर। यद्यपि चंदन ने उसके बीच भी बहुत कुछ डाल दिया है.....और उत्तर पढ़ने के बाद मुझे लौटकर फिर प्रश्न पढ़ना पढ़ा.....मगर वह छोटी-सी हाँ पूरी कहानी के विस्तार पर भारी है।


haan story thodee lambee to thee lekin mujhe achee lageee bahut hee bhavuk kar dene waalee...thank u bhayea for sharing the story because i love to read such sort of stories. Thank you
Farhan


कुछ बिम्ब बहुत बढ़िया हैं, कुछ टुकड़े लाजवाब लेकिन कहानी देर तक एक जगह ठहरी रहती है. छोटी होती तो बेहतर बनती शायद. गौतम जो सोचता है, उसका बार-बार दोहराव भी है. जो उसकी दुविधाएं और सवाल हैं, वे हूबहू कई बार हैं. यह बिल्कुल ईमानदार कहानी है लेकिन कुछ ऐसा हो गया है जैसे सबसे ईमानदार कविताएं उतनी अच्छी कविता नहीं रह पातीं. तर्क कितने भी हों, हत्या गैरज़रूरी लगती है और गौतम के लिए कभी भी ज्यादा सहानुभूति नहीं पनपती. इस दौर से हम बहुत से लोग गुजरे हैं, लेकिन साथ ही क्या यह भी साफ नहीं है कि उस दौर में हम ऐसे व्यक्ति के साथ खुद को जोड़ रहे होते हैं जो जुड़ना नहीं चाहता, हमें साफ दिखता है कि वह फरेबी है. लेकिन यदि हम अपने आप को उस फरेब में जानबूझकर उस सीमा तक ले जाते हैं जब जीने का कोई रास्ता नहीं बचता (हां, यह वास्तविक है कि हम कई बार ले जाते हैं)तो यह हमारी भी गलती है. कहानी पढ़कर मुझे लगा कि गौतम बाद के एक दो सालों में लगातार अपने आपको नीलू पर थोप रहा है और वह हफ्ते महीने में एक दो मिनट बस प्यार से बात करती है. नीलू उसी तरह जियेगी ना, जैसे वह चाहेगी. वह बुरी है, धोखेबाज है और एक समय में कई लड़कों से प्रेम कर सकती है लेकिन जब गौतम को इसका अंदाजा बहुत पहले से है, जब वह राहुल से पहली मर्तबा मिला होगा या उससे भी पहले से, तब वह रिश्ते को खींच क्यूं रहा है? यह ज़िद है और मैंने इन ज़िदों के ऐसे उदाहरण भी देखे हैं जहां लड़की का जीना बेवजह हराम कर दिया जाता है.
मैं फिर से वहीं आता हूं कि छोटी कहानी होती तो हत्या की जिद उतनी अतार्किक न रह जाती. आपकी भाषा तो अनूठी है लेकिन तर्क और कथ्य नहीं. बाकी उम्मीदें तो आपसे कुछ ज्यादा हैं ही, थोड़ी कमियां इस वज़ह से भी दिखी होंगी.


mujhe to aapke lekhan pravaah ne baandh liya..


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चन्दन, सबसे पहले बधाई स्वीकारें. यह हिन्दी की अविस्मरणीय कहानी है. आप गैर-जरूरी विवादों में न पड़े होते तो आज इस कहानी की सर्वत्र चर्चा हो रही होती. कहानी को सम्पादित भी करना होगा.

यह कहानी नीलू के लिये याद रखी जायेगी. यह कहानी कई सवाल भी खड़े करती है. कथा की नीलू कोई ऐसा कार्य नहीं कर रही है जो हमारे समाज के पुरुष नहीं कर रहे किंतु पुरुष समाज की बौखलाहट इस कहानी में दृष्टव्य है. पुरुषों द्वारा नीलू की हत्या का चुनाव ही कुंठा की चरम परिणिति है. चरित्रहनन एक कथायुक्ति की तरह इस्तेमाल हुआ है परन्तु इसका प्रभाव इस कदर पुरुषोचित एवम मारक है कि पाठक उसे ही मूल कथा मान कर पढ़ रहे हैं. यह भी प्रश्न है कि प्रेम कहानियों में क्या लिखा जाना चाहिये और क्या नहीं? विशेष कर हिन्दी में कोमल प्रेमकथाओं की परम्परा है. स्वयं चन्दन ने जो कहानियाँ लिखी उसमें इंसान कभी नकारात्मक हुआ ही नहीं, परिस्थितियाँ जरूर बिगड़ जाती थी. शहर की खुदाई में क्या कुछ मिलेगा ऐसी ही बेजोड़ कोमल प्रेमकथा है किंतु जो समाज की नकारात्मक सच्चाईयाँ हैं उन्हे कौन दर्ज करेगा? कहानियों को वक्तव्य की तरह रखें तो चन्दन का अनुभव संसार कभी मृदु और कभी भयावह जान पड़ता है. एक ही रचनाकार परिन्दगी है कि नाकमयाबी है जैसी क्रूर कहानी लिखता है और वही रचनाकार सिटी पब्लिक स्कूल की अतिकोमल कथा भी लिखता है. शहर की खुदाई ..और रिवॉल्वर ..ये दोनो कहानियाँ किसी एक रचनाकार के अनुभव संसार से जुड़ सकती है यह विचार भी डरावना है. जिस रिवॉल्वर को पढ़ते हुए दिमाग के तंतु झनझना जाते हैं उसे लिखना कैसा अनुभव रहा होगा यह चन्दन को बताना चाहिये? मै यह नहीं मानती कि नीलूके चरित्र के साथ न्याय नहीं हुआ है. नीलू ने जरिये चन्दन ने आज के समय की दुविधा को जिन्दा कर दिया है. पर सबकी तरह एक माँग यह भी है कि नीलू की कथा भी चन्दन को लिखनी होगी.

चन्दन को बधाई. उन्होने अपने समकालीनों से अच्छी बढ़त बना ली है. उसे बरकरार रखें.


चन्दन की कहानी पढना मुझे हमेशा अच्छा लगता है. कहानी अच्छी थी, कथायुक्तियों का जवाब नहीं. रोचकता भी थी, मगर कई जगह दोहरावों ने बोर किया.
लगता है चन्दन दूसरा ड्राफ्ट लिखने का समय नहीं निकाल पाए और कहानी ओवरसाईज़्ड पुलोवर की तरह गरमाहट तो देती रही पर उलझन भी होती रही कि बार - बार वही बात क्यों ...पाठक पर भरोसा क्यों नहीं कर पा रहे चन्दन कि एक बार कहने से भी सत्य - कथ्य संप्रेषित हो रहा है. फिर भी चन्दन अचूक हैं...सटीक हैं. अनूठे हैं. कहानी में रस तो था ही. कथा की भीतरी परतें भी थीं जो चन्दन के अच्छे कहानीकार होने की पहचान है. manisha Kulshreshtha


कहानी चतुराई से लिखी गई है. अच्छी कहानी है पर चन्दन पांडे जैसे लेखक जब स्त्री विरोधी कहनियाँ लिखने लगे तो अफसोस होता है. इनकी अब तक की कहानियों पर नजर डाले तो यह पत करना सरल है कि इनके पास स्त्री पात्र बहुत हैं और उनके प्रति चन्दन का रवैया भी सहज है. कहीं कोई बनावटीपन नहीं है. इस कहानी ने मुझे परेशान कर रखा है. चन्दन क्या कहना चाहते हैं इस कहानी से?


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

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लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

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मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी