Wednesday, September 29, 2010

अम्न का राग


{
शमशेर की यह कविता करीब साठ साल पुरानी है, लेकिन कतिपय आंकड़ों को छोड़ दें तो ह्रदय की सच्ची सुख-शांति का यह बहुत आदिम बहुत अभिनव राग है. इसे सुनना उन सब कार्रवाइयों का स्थगन है, जिससे इंसानी आत्मा लहूलुहान होती है. हम शमशेर का जन्म-शताब्दी वर्ष जीते हुए यह अनुभव कर रहे हैं कि हमारे लिए 'शांति की चाहना' पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है, क्योंकि युद्ध सरदारों ने मोर्चे खोलने में कोई कसर नहीं उठा रखी है. ऐसे मौकों पर ''अम्न का राग'' गाना चाहे जितना अनुत्तेजक जान पड़े, ज़रूरी यही लगता रहा है.}


सच्चाइयाँ
जो गंगा के गोमुख से मोती की तरह बिखरती रहती हैं
हिमालय की बर्फ़ीली चोटी पर चाँदी के उन्मुक्त नाचते
परों में झिलमिलाती रहती हैं
जो एक हज़ार रंगों के मोतियों का खिलखिलाता समंदर है
उमंगों से भरी फूलों की जवान कश्तियाँ
कि बसंत के नए प्रभात सागर में छोड़ दी गई हैं।

ये पूरब-पश्चिम मेरी आत्मा के ताने-बाने हैं
मैंने एशिया की सतरंगी किरनों को अपनी दिशाओं के गिर्द
लपेट लिया
और मैं यूरोप और अमरीका की नर्म आँच की धूप-छाँव पर
बहुत हौले-हौले से नाच रहा हूँ
सब संस्कृतियाँ मेरे संगम में विभोर हैं
क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख-शांति का राग हूँ
बहुत आदिम, बहुत अभिनव।

हम एक साथ उषा के मधुर अधर बन उठे
सुलग उठे हैं
सब एक साथ ढाई अरब धड़कनों में बज उठे हैं
सिम्फोनिक आनंद की तरह
यह हमारी गाती हुई एकता
संसार के पंच परमेश्वर का मुकुट पहन
अमरता के सिंहासन पर आज हमारा अखिल लोकप्रेसिडेंट
बन उठी है

देखो न हक़ीक़त हमारे समय की जिसमें
होमर एक
हिंदी कवि सरदार जाफ़री को
इशारे से अपने क़रीब बुला रहा है
कि जिसमें
फ़ैयाज़ खाँ बिटाफ़ेन के कान में कुछ कह रहा है
मैंने समझा कि संगीत की कोई अमर लता हिल उठी
मैं शेक्सपियर का ऊँचा माथा उज्जैन की घाटियों में
झलकता हुआ देख रहा हूँ
और कालिदास को वैमर कुंजों में विहार करते
और आज तो मेरा टैगोर मेरा हाफ़िज़ मेरा तुलसी मेरा
ग़ालिब
एक-एक मेरे दिल के जगमग पावर हाउस का
कुशल आपरेटर है।

आज सब तुम्हारे ही लिए शांति का युग चाहते हैं
मेरी कुटुबुटु
तुम्हारे ही लिए मेरे प्रतिभाशाली भाई तेजबहादुर
मेरे गुलाब की कलियों से हँसते-खेलते बच्चों
तुम्हारे ही लिए, तुम्हारे ही लिए
मेरे दोस्तों, जिनमें ज़िन्दगी में मानी पैदा होते हैं
और उस निश्छल प्रेम के लिए
जो माँ की मूर्ति है
और उस अमर परमशक्ति के लिए जो पिता का रूप है।

हर घर में सुख
शांति का युग
हर छोटा-बड़ा हर नया पुराना आज-कल-परसों के
आगे और पीछे का युग
शांति की स्निग्ध कला में डूबा हुआ
क्योंकि इसी कला का नाम भरी-पूरी गति है।

मुझे अमरीका का लिबर्टी स्टैचू उतना ही प्यारा है
जितना मास्को का लाल तारा
और मेरे दिल में पीकिंग का स्वर्गीय महल
मक्का-मदीना से कम पवित्र नहीं
मैं काशी में उन आर्यों का शंख-नाद सुनता हूँ
जो वोल्गा से आए
मेरी देहली में प्रह्लाद की तपस्याएँ दोनों दुनियाओं की
चौखट पर
युद्ध के हिरण्यकश्य को चीर रही हैं।

यह कौन मेरी धरती की शांति की आत्मा पर कुरबान हो
गया है
अभी सत्य की खोज तो बाकी ही थी
यह एक विशाल अनुभव की चीनी दीवार
उठती ही बढ़ती आ रही है
उसकी ईंटें धड़कते हुए सुर्ख दिल हैं
यह सच्चाइयाँ बहुत गहरी नींवों में जाग रही हैं
वह इतिहास की अनुभूतियाँ हैं
मैंने सोवियत यूसुफ़ के सीने पर कान रखकर सुना है।

आज मैंने गोर्की को होरी के आँगन में देखा
और ताज के साए में राजर्षि कुंग को पाया
लिंकन के हाथ में हाथ दिए हुए
और ताल्स्ताय मेरे देहाती यूपियन होंठों से बोल उठा
और अरागों की आँखों में नया इतिहास
मेरे दिल की कहानी की सुर्खी बन गया
मैं जोश की वह मस्ती हूँ जो नेरूदा की भवों से
जाम की तरह टकराती है
वह मेरा नेरुदा जो दुनिया के शांति पोस्ट आफ़िस का
प्यारा और सच्चा क़ासिद
वह मेरा जोश कि दुनिया का मस्त आशिक़
मैं पंत के कुमार छायावादी सावन-भादों की चोट हूँ
हिलोर लेते वर्ष पर
मैं निराला के राम का एक आँसू
जो तीसरे महायुद्ध के कठिन लौह पर्दों को
एटमी सुई-सा पार कर गया पाताल तक
और वहीं उसको रोक दिया
मैं सिर्फ एक महान विजय का इंदीवर जनता की आँख में
जो शांति की पवित्रतम आत्मा है।

पश्चिम मे काले और सफ़ेद फूल हैं और पूरब में पीले
और लाल
उत्तर में नीले कई रंग के और हमारे यहाँ चम्पई-साँवले
औऱ दुनिया में हरियाली कहाँ नहीं
जहाँ भी आसमान बादलों से ज़रा भी पोंछे जाते हों
और आज गुलदस्तों मे रंग-रंग के फूल सजे हुए हैं
और आसमान इन खुशियों का आईना है।

आज न्यूयार्क के स्काईस्क्रेपरों पर
शांति से 'डवों' और उसके राजहंसों ने
एक मीठे उजले सुख का हल्का-सा अंधेरा
और शोर पैदा कर दिया है।
और अब वो अर्जेन्टीना की सिम्त अतलांतिक को पार कर
रहे हैं
पाल राब्सन ने नई दिल्ली से नए अमरीका की
एक विशाल सिम्फ़नी ब्राडकास्ट की है
औऱ उदयशंकर ने दक्षिणी अफ़्रीका में नई अजंता को
स्टेज पर उतारा है
यह महान नृत्य वह महान स्वर कला और संगीत
मेरा है यानी हर अदना से अदना इंसान का
बिल्कुल अपना निजी।

युद्ध के नक़्शों की कैंची से काटकर कोरियाई बच्चों ने
झिलमिली फूलपत्तों की रौशन फ़ानूसें बना ली हैं
और हथियारों का स्टील और लोहा हज़ारों
देशों को एक-दूसरे से मिलानेवाली रेलों के जाल में बिछ
गया है
और ये बच्चे उन पर दौड़ती हुई रेलों के डिब्बों की
खिड़कियों से
हमारी ओर झाँक रहे हैं
वह फ़ौलाद और लोहा खिलौनों मिठाइयों और किताबों
से लदे स्टीमरों के रूप में
नदियों की सार्थक सजावट बन गया है
या विशाल ट्रैक्टर-कंबाइन और फ़ैक्टरी-मशीनों के हृदय में
नवीन छंद और लय का प्रयोग कह रहा है।

यह सुख का भविष्य शांति की आँखों में ही वर्तमान है
इन आँखों से हम सब अपनी उम्मीदों की आँखें सेंक
रहे हैं
ये आँखें हमारे दिल में रौशन और हमारी पूजा का
फूल हैं
ये आँखें हमारे कानून का सही चमकता हुआ मतलब
और हमारे अधिकारों की ज्योति से भरी शक्ति हैं
ये आँखें हमारे माता-पिता की आत्मा और हमारे बच्चों
का दिल है
ये आँखें हमारे इतिहास की वाणी
और हमारी कला का सच्चा सपना हैं
ये आँखें हमारा अपना नूर और पवित्रता हैं
ये आँखें ही अमर सपनों की हक़ीक़त और
हक़ीक़त का अमर सपना हैं
इनको देख पाना ही अपने आपको देख पाना है, समझ
पाना है।

हम मनाते हैं कि हमारे नेता इनको देख रहे हों।
****

(शमशेर की इस कविता का रचना काल नामवर सिंह द्वारा सम्पादित उनकी प्रतिनिधि कविताओं के संकलन में १९४५ बताया गया है, जो कविता में ''यह कौन मेरी धरती की शांति की आत्मा पर कुरबान हो गया है/ अभी सत्य की खोज तो बाकी ही थी'' जैसी पंक्तियों के आने से ग़लत जान पड़ता है. ''कुछ और कविताएं'' शीर्षक संकलन में, जहां से यह कविता ली गई है, वहां इसका रचना-काल १९५२ दिया गया है, यही सही रचना काल है. कविता के साथ दी गई चित्र-कृति मधुमिता दस के कैमरे से. )

Tuesday, September 21, 2010

बही-खाता : ११ : मनीषा कुलश्रेष्ठ





एकल उड़ान

खुद को औरों से अधिक बुद्धिमान दिखाने की इच्छा, चर्चित होने और मरने के बाद याद रखे जाने की चाह जैसी बहुत - सी वजहें होती हैं लिखने के पीछे. शब्दों से ही समाज बदल डालने और लोगों की जिन्दगियों पर असर डालने जैसे कई - कई मुगालते होते हैं लिखने वालों को. मैं इन सारे मुगालतों से थोडा - थोडा ग्रस्त जरूर हूं पर मुझे पता है कि ये गंभीर वजहें नहीं हैं मेरे लिखने की.

अपनी अनवरत, अंतहीन यायावरी के दौरान, जगह – जगह से बटोरे गए सूखे तनों-जड़ों की ही तरह जो भी अनुभव भीतर- बाहर सहेजा, उसी की अस्तव्यस्त पोटली में से हर बार कुछ नया निकाल कर, उन पर ‘प्राईमर’/‘टचवुड’ लगा कर नई कलाकृति में ढालने की प्रवृत्ति ही प्रमुख रही है.

ज़्यादातर लोग अपने आप से बाहर नहीं निकल पाते, केवल अपनी कहानियां लिखना अकसर लोगों को मज़ा देता है. मुझे वह आसान लगता है. खुद को तरह - तरह के आकर्षक रंग पोत कर, निर्दोष बना कर कहानी में बिठा देना आसान कवायद है. वहाँ चुनौती नहीं, असली चुनौती है, दूसरों के भीतर बैठकर लिखना. खास तौर पर दूसरे जेण्डर या बिलकुल दूसरे तबके या दूसरे समाज के व्यक्ति के भीतर घुस कर लिखना.

गफूरिया, सुगना ढोलण, कुरजाँ डाकण, ‘खरपतवार’ की अनाथ, आवारा गोअन लड़की, ‘ऎडोनिस का रक्त और लिली के फूल’ में युवा लेफ्टीनेंट के भीतर सेंध लगाना आसान कवायद नहीं था मगर बहुत रोमांचक था. ओह! वही मुझे आनन्द देता है. इन चुनौतियों को जीने का विशुद्ध आनन्द ही मुझसे लिखवाता है. निसंदेह इस तरह काया बदल कर लिखना, किसी छोटे जहाज की एक एकल उड़ान की तरह है, उसमें आपके भीतर का सजग पाठक ही नेवीगेटर की तरह का काम करता है. मैं लेखक कैसी भी होऊं, मुझे पता है मैं एक शानदार पाठक रही हूं. इसलिए इस एकल उड़ान की चुनौती मुझे हमेशा उत्साह से भर देती है.

हर बार की एकल उड़ान के बाद भी हर नई कहानी लिखने से पहले तो आत्मविश्वास डोला ही हुआ होता है. कभी जब बहुत कुछ तय करके लिखने बैठ जाऊँ तो कोरे काग़ज़, कोरी स्क्रीन...के सामने आते ही किसी भोंदू छात्र की तरह किंकर्त्व्यविमूढ़ हो जाती हूँ...और डूडलिंग करके पन्ना बन्द. और कभी लिखास जब हावी होती है तो लिपपेन्सिल से ही पेपर नैपकिन पर लिखना पड़ जाता है. या अन्धेरे में बिना किसी को जगाए, टेलीफोन पैड पर लिख तो देती हूँ जिसे सुबह पढने में मुझे ही मुश्किल होती है, मन करता है कैमिस्ट से पढ़वा लाऊँ. यह सच है कि हर नई कहानी के साथ स्वयं को सीखने वालों की कतार में ही पाती हूँ, भाषा, शिल्प और कहन व अभिव्यक्ति की क्षमता हर बार कम पड ज़ाती है.

हर लेखक की तरह मैं भी चाहती हूँ मेरे लेखन का सिग्नेचर स्टायल हो. मगर मैं जानती हूँ कि कहानी का और लेखक का, दोनों का ही विकास सीधी लकीर में या किन्हीं सिद्धान्तों के आधार पर नहीं होता. साहित्य ही कौन सा सिद्धान्तों पर चलता है, वह चलता है, अपनी अलमस्त कलात्मक चाल. पीछे छूटे निशानों पर लोग मील - पत्थर बनाते जाते हैं, सिद्धान्तों - वादों - धाराओं के रूप में. इसलिए हर लेखक का विकास भी अलग - अलग अनुभवों और अलग - अलग किस्म की समस्याओं से जूझ कर होता है, और अन्तत: वह जिस तरह से विकसित होता है, उसे दूसरों से नितान्त भिन्न होना ही चाहिए.

मैं जब लेखन की दुनिया में आई थी तब मेरे पास अपनी सुसंस्कृत भाषा तो थी, कुछ अलग किस्म का अनुभव संसार भी था, मगर दर्शन, इतिहास और राजनीति, वैचारिकता और संस्कृति के अथाह समन्दरों में गोते मैंने नहीं लगाए थे. लेकिन मैं यह जानती थी कि अनुभव छोटा या बड़ा नहीं होता उसकी अभिव्यक्ति और कलात्मकता छोटी - बड़ी होती है. क्योंकि एक ओर 13 वर्ष की छोटी - सी जिन्दगी एक तहखाने में गुजार कर, डायरी लिख कर, एन फ्रेंक अमर हो गयी दूसरी ओर दर्शन, इतिहास और संस्कृति के अथाह समन्दरों में गोते लगा कर, लम्बी उम्र जिए कई लेखक उसके जितनी प्रसिद्धी न पा सके.

कथा लेखन की मेरी इस छोटी सी यात्रा में, मेरे स्थूल अनुभव तो वैसे ही रहे, जैसे सभी के होते हैं मसलन ढेर सारे बने - बनाए ढांचे, विमर्शों के रेडीमेड खांचे. पीछे एक लम्बा कथा - संसार और आगे भविष्य की कहानी की चुनौती. शिल्प और कथ्य को लेकर नवीन प्रयोग की चुनौती देता आज की कहानी का विस्तृत संसार और वहीं प्रयोगों की असहज कृत्रिमता के प्रति मेरा एक व्यक्तिगत आन्तरिक विरोध. कहानी लिखते हुए कथ्य और शिल्प के प्रयोग के लिए, मैंने कोई प्रयोगशाला नहीं जमाई, परखनली, बने बनाए रासायनिक मिश्रणों, स्प्रिट लेम्प का सहारा नहीं लिया. मगर फिर भी कहानी एक पूरी लम्बी प्रक्रिया के बाद मुझमें पूरी सघनता और संश्लिष्टता के साथ अवक्षेपित यानि प्रेसिपिटेट होती रही है. मेरे सूक्ष्म अनुभव बहुत गहरे और उलझाने वाले रहे हैं. 'कहानी से तटस्थ रहने की' बड़ों की नसीहत के बावजूद कहानी हमेशा मेरे वजूद पर चढ क़र बोलती है, कहानी मुझमें हदें पार कर जाती है.

वर्षों तक मैं कहानियों की एक अच्छी समझ वाली पाठक रही हूँ, तब भी अच्छी कहानी मुझ पर प्रेत की तरह डोलती थी. सोते - जागते, उठते - बैठते. अब लेखक के तौर पर भी मैं कहानी को खुद पर हावी होने से रोक नहीं पाती, जैसा कि कुरज़ां के अन्त में कहानी का नायक अपने मृत्यु के पहले लिखे नोट में कहता है _''स्मृति द्वारा वापस लाकर अतीत की चीज़ों को मोटे तौर पर देखना और बात करना तो आसान है, डॉक्टर पर बारीक कहानी बुनना, अतीत की आवारा रूह को अपनी देह पर बुलाने जैसा होता है. मैं बहुत पस्त मगर मुक्त महसूस कर रहा हूँ.''

इस अनुभव से अन्तत: मैंने यही जाना है कि कहानी चाहे दूसरों के अनुभव पर लिखी गई हो या स्वानुभूत हो, लिखते समय हर कहानी के भीतर होकर खुद गुजरने के अलावा लेखक के पास कोई चारा नहीं होता, शुरु से लेकर आखिर तक यह रास्ता तय करना ही होता है _ कदम - दर -कदम. फिर चाहे वह कहानी अच्छी साबित हो या बुरी.

कहानी क्या है? महज कुछ संवाद, कुछ गुफ्तगू, कुछ आवाजें, या फिर अमल या हरकतें. लेखक की हजारों नजरों से देखी गई,यह नई - सी लगती कहानी की दुनिया , वही अपनी पुरानी दुनिया है! मेरी समझ से, जिस कहानी को महसूस करने में और लिखने में लेखक की पांच इंद्रिया कम पडती हों और उस कहानी को महसूस करने के लिए पाठक की भी पांचों अनुभूतियां काम जाएं बल्कि दो चार अनुभूतियां उसे जगानी पड ज़ाएं तो वही सच्ची कहानी है.

अनुभव जगत का अपार विस्तार हो, सटीक अभिव्यक्ति का वरदान हो और भाषा उंगलियों पर नाचती हो तो घने नम जंगलों से लेकर रेगिस्तानी धोरों में तरह-तरह के सांपों की तलाश में भटकता गुनगुनाता, मौलिक लोकगीत रचता कालबेलिया भी कथाकार हो जाता है.

यायावरी और अनुभव जगत में लगातार होते विस्तार ने, मन को एक किस्से - कहानियों से लबालब पात्र बना दिया था जिसे एक न एक दिन छलकना ही था. अब छलका है तो रीतने तक लिखना ही होगा. कथा लेखन वैसे तो सृजन की सुखद अनुभूति है. मगर कथानक के डिंबस्थ होने से लेकर कहानी के जन्म लेने तक पीडा और सुख दोनों साथ चलते हैं.

****
{चर्चित युवा कथाकार . तीन कहानी-संग्रह और एक उपन्यास प्रकाशित.
चित्र-कृति शिव कुमार गाँधी की. इस स्तंभ के अन्य लेखक यहाँ. }

Saturday, September 18, 2010

समर्थ वाशिष्ठ की नई कविताएं




पिता का घर

सच ये है कि

अब भी मिल जाती है

मुझे इस घर में

अप्रैल के बाद पूरी कोरी

एकाध डायरी

जिसमें बचे होते हैं

भविष्य की कविताओं के लिए

सैंकड़ों पृष्ठ


मां है तो

इसी घर में है

बहन भी सांय-सांय चलती है

इन दीवारों के बीच

किसी घुमड़ते तूफ़ान सी

मैं ही बन गया हूं मंद बयार

चाहूं जितना भी

चलता नहीं इस घर का कुछ भी

मेरे साथ

फिर भी पूरा ही रहता है पास


तुनकता रहता हूं हरदम

इस घर में

कि गिनी जाएं

मेरी लगाई ईंटें भी कुछ

भूकंपों और दीमकों के ख़िलाफ़


छोटा है लेकिन

जितनी खर्च हुई हमारी ज़िंदगियां

इसे बनाने में

शायद ही बची हों

किसी और मकान के लिए।


मैं लौट आऊंगा यहां!

****

पते

मैं जहां गया

मां ने दर्ज किए

मेरे पते


उसकी फटी जिल्द-वाली

भूरी डायरी में देखा मैंने

B के बाद E वाला

बैंगलूर के एक होटल का अपना पता

चला जाऊं कल मिस्सिसिप्पी

तो मिलेगा वो भी

उसकी ईजाद की हुई वर्तनी में लिखा

साफ़-साफ़

नॉस्टेलजिया से अलग भी हैं

इसके फ़ायदे

ढूंढ़ सकता हूं मैं

कि फ़लां रेल की फ़लां बोगी से

कब किया मैंने सफ़र

और मिल जाती है अचानक

किसी कविता लिखने की असल तारीख


कभी नहीं बदला मां का पता


अपने हरी बेलों

और रूफ़-गार्डन वाले घर में

व्यस्त रही वो

और आश्वस्त

कि मालूम था उसे मेरा पता


भरोसा रहा मुझे भी हमेशा

कि उस फटी जिल्द-वाली

सन् 96 की डायरी में

मिल ही जाएगा मुझे मेरा पता।

****

कुटिल तर्क

सपने में गटकता हूं

दो घूंट पानी

बार-बार

सूखा ही रहता है तालू

उठकर देखता हूं कि अरे!

सपने में पिया पानी


सपने में घुड़सवार हूं मैं

दुश्मनों से घिरा

रेगिस्तान के बीचों-बीच

बिल्कुल नहीं घबराता


सपने में मूछें हैं

ताव भी

वैसा जैसा

कभी नहीं स्वीकार्य होगा

मुझे

सपने के दफ़्तर में

काँफ़्रेंस-कक्ष का लांघता हूं दरवाज़ा

तो पुरखों के मकान की

बैठक में पहुंच जाता हूं अचानक

जहां अब भी बैठे हैं दादाजी

श्वेत-श्याम टीवी पर देखते ख़बरें


कई रंगों में दिखते हैं अब

मुझे सपने

बरसों चलती इस वैज्ञानिक बहस के बावजूद

कि क्या रंगीन होते हैं सपने


मुझे इंतज़ार है कि एक दिन

सपने में बदल जाएगी

मेरे लिए ये दुनिया

दूसरे रंगों से ज़्यादा

रह जाएगी नीली, धूसर और हरी

जैसा होना चाहिए उसे यकीनन


और जब खोलूंगा मैं आंखे

एक लम्बी नींद के बाद

बचा रहेगा कुछ मेरा सपना

मेरे साथ।

****

{ समर्थ की कविताएं इससे पहले सबद पर कवि की संगत कविता के साथ शीर्षक स्तंभ में प्रकाशित हो चुकी हैं. तस्वीर मधुमिता दास के कैमरे से. }

Sunday, September 12, 2010

कवि की संगत कविता के साथ : ९ : अरुण देव


आत्मकथ्य


कवि अपनी सीमाओं के लिए नहीं जाने जाते हैं


कभी
-कभी एक शब्द की चोट से खुल जाता है कंठ. शब्द ही लौ है– बुझे दीए जल उठते हैं. कविता आलोक है ध्वनि का. अपने काव्य-सिद्धांत के ग्रन्थ का नाम 'ध्वन्यालोक', आचार्य आनंदवर्धन ने ठीक ही रखा है. मैथ्यु अर्नोल्ड कहा करते थे कि एक समय आएगा जब कविताएँ धर्म का स्थान ले लेंगी क्योकि सभी धार्मिक किताबें कविता की ही किताबें थीं.

आखिर
कविता में क्या है वह रहस्यमय? हमारी आत्मा की कौन सी पुकार वहां प्रतिध्वनित होती है? जीवन के किस लय से टकराता है उसका कौन सा तुक? काव्य के बिना शायद ही हमारे जीवन का कोई दिन गुजरता हो. वह किसी न किस रूप में हमारे साथ रहता ही है. चाहे वह पवित्र पोथिओं और फिर उनकी दुर्व्याख्याओं के रूप में ही हमारे साथ क्यों न हो. कविता का सोता अंदर से फूटता है इसलिए वहां अभी भी सबसे कम प्रदूषण हैं मनुष्य की मूल प्रवृतिओं का आदिम स्वाद अभी भी वहां शेष है.
अक्षरों की लौ में अभी भी वहाँ मनुष्यता की कालिमा पहचान ली जाती है. पतन पर कविता रुदाली बन जाती है, मानवता का सामूहिक रुदन. पूरब से उठते उम्मीद की ओर कविता के अनुरक्त नेत्रों से बेहतर कुछ भी नहीं।

कई बार सोचता हूँ - कहाँ रहती है कविता? - भाषा में,शब्दों में,वाक्यों के बीच के अवकाश में, अंतर्निहित लय में- कहाँ ? आलोक कहाँ रहता है- दीए में, बाती में,स्नेह में, माचिस की तीली में ? इन सबके संयोजन में आलोक है. ठीक वैसे ही कविता इन सबके संतुलित संयोजन से आलोकित होती है।

बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन की मानें तो शब्द अर्थ का स्पर्श तक नहीं करते. उत्तर आधुनिक भी यही दुहराते है कि जब भी शब्दों से अर्थ को कहा जाता है, उसे निर्मित किया जाता है. वह कविता ही तो है- अपने अर्थ के निकटतर.

वैसे भी कवि अपनी सीमाओं के लिए नहीं जाने जाते हैं.
****

कविताएं

उसका आना

वह मिलने कैसे आती
बारिश हो रही थी
कीचड़ फैला था
घर और बाहर के कीचड़ में
कब से धंसी थी वह

बहुत दिनों से उमड़ –घुमड़ रहे थे बादल
रात भर बरसा था मेघ
रात भर भीगता रहा उसका मन

भीग कर फैल गयी थी स्याही उस इबारत की
जो खनकती थी जंजीरों की तरह
रात का पैरहन स्याह और भारी हो गया था

चौखट के उस पार गिरी थी बिजली
शायद उस पर

गहरी नदी
उफनता पानी
उस पार मुन्तजिर वह भीगता हुआ उसकी चाह में

डरती है अपने कदमों के निशान से
निशान तो निशान हैं
बार बार उभर आते हैं
हर गली, हर नगर में
समय-कुसमय

इन पैरों पर पैर रखती चली आती है क्रूरता अपनों की.
****
लालटेन

अभी भी वह बची है
इसी धरती पर

अँधेरे के पास विनम्र बैठी
बतिया रही हो धीरे–धीरे

सयंम की आग में जैसे कोई युवा भिक्षुणी

कांच के पीछे उसकी लौ मुस्काती
बाहर हँसता रहता उसका प्रकाश
जरूरत भर की नैतिकता से बंधा

ओस की बूंदों में जैसे चमक रहा हो
नक्षत्रों से झरता आलोक

अक्सर अँधेरे को अँधेरे के बाहर कहा गया
अँधेरे का सम्मान कोई लालटेन से सीखे
अगर मंद न कर दिया जाए उसे थोड़ी देर में
वह ढक लेती खुद को अपनी ही राख से

सिर्फ चाहने भर से वह रौशन न होती
थोड़ी तैयारी है उसकी
शाम से ही संवरती
भौंए तराशी जातीं
धुल-पुछ कर साफ होना होता है
कि तन में मन भी चमके

और जब तक दोनों में एका न हो
उजाला हँसता नहीं
कुछ घुटता है और चिनक जाता है कहीं
भभक कर बुझ जाती है लौ

वह अलंकार नहीं थी कभी भी
न अहंकार, न ऐठ, न अति
कि चुकानी पड़े कीमत और फिर जाए मति

उसे तो रहना ही है.
****
गोंद

सबसे अधिक आती है उसकी याद
जब चिट्ठी पर चिपक न रहें हों डाक-टिकट
किसी अर्जी से बार-बार गिर जा रहा हो अपना ही चेहरा
संदेश को पहुंचना हो अपने घर बिना मुहं खोले

फिर तो चिट्टी दिखती है
डाक टिकट दिखता है
चेहरा और संदेश

गोंद नहीं दिखता

अपनी गुरुता में डूबा
अपने गाढ़ेपन में गंभीर

गोंद तो पिन भी नहीं है कि कभी चुभ जाए

कुछ चीजें इसी तरह अदृश्य रहकर
अपना काम करती हैं.
****
कपास

कपास
का सर्दियों से पुराना नाता है
जब हवा बदलती है अपना रास्ता और
पहाड झुक जाते हैं थोड़े से

दो पत्तों के बीच वह धीरे से मुस्करा देती है
जैसे पहाडों की सफेदी पिघलकर उसमें समा गयी हो

सर्दियो के आने से पहले आ जाते हैं कपास के उड़ते हुए सन्देश
और आने लगती हैं धुनक की आवाजें

धुनक के तारों से खिलती है कपास
गाती हुई सर्दिओं के गीत
एक ऐसा गीत जो गर्म और नर्म है
दोस्ताना हाथ की तरह.
****
किताबें

कुछ किताबें अन्धेरे में चमकती हैं रास्ता देती हुई
तो कुछ कड़ी धूप में कर देती हैं छाँह

कुछ एकांत की उदासी को भर देती हैं
दोस्ती की उजास से

तो कुछ जगा देती हैं आँख खुली नींद से
जिसमें नहीं सुनाई पड़ता अपना ही रुदन

कुछ शोभा होती हैं ड्राइंग रुम की
हर कोई एक नज़र उन्हें देखता है
ऊपर-ही-ऊपर
पर मौन रह जाता है उनका अन्तर्मन

कुछ नीरस होती हैं सूचनाओं सें भरी हुईं
जो न हँसती हैं न मुस्काती हैं
बस यों ही खड़ी रहती हैं चुपचाप

हँसती हुई किताबों का लेखक
जरूरी नहीं है कि हमेशा खिलखिलाता हो
अक्सर गंभीर लोगों ने गहरे व्यंग्य किए हैं
ऐसी किताबें पकड़ लेती हैं बीच रस्ते में ही
और मुश्किल से गला छोड़ती हैं

गमगीन कर देने वाली किताबों का तो अजब हाल है
उसके पाठक तो बस उसी की तलाश में रहते हैं
डूब जाते हैं दु:ख की नदी में
जैसे वह उनकी ही आँख का पानी हो

कुछ तो इतनी सजी संवरी होती हैं कि बस ललचा जाता है जी
पर पुस्तक पकी आँखों से जब गुजरना होता है
शर्मिंदा होकर छुपा लेती हैं अपने पन्ने

कुछ किताबें गुजार देती हैं अपनी जिन्दगी
कुतुबख़ाने के किसी अन्धेरे में
उन तक पहुंचता है कभी-कभी कोई अन्वेषी
थक हार कर खोजते हुए उसी को जैसे

कुछ की कलई एक बार पढ़ते ही उतर जाती है
कुछ को बार-बार पढ़ो तो भी छूट जाता है बहुत कुछ

कुछ किताबें काल को जीत लेती हैं
जन्म लेती रहती हैं उनसे नई किताबें

कुछ किताबें अकाल होती हैं
कब गईं पता भी नहीं चलता

कुछ विनम्रता से खुलती हैं और देर तक पढ़ी जाती हैं
कुछ घमंड़ से ऐठी रहती हैं
कि घुटने लगता है दम

किताबों में कुछ लोग भर देते हैं ज़हर
काले पड़ जाते हैं उनके पन्ने
डरावनी हो जाती है अक्षरों की शक्ल

ऐसी किताबें चाहती हैं बन्द रहना
कोई कभी पढ़ लेता हैं इन्हें
नीली पड़ जाती है उनकी आत्मा

कुछ किताबों में आ बैठती हैं तितलियाँ
परागकण की तरह महकते अक्षरों पर
पर अन्त तक पहुंचते-पहुंचते सूख जाती है सुगन्ध
पन्नों में दबी मिलती है वही तितलियाँ

वे किताबें बहुत बदनसीब होती हैं
जिन्हें लोग बस रट लेते हैं
किताबें नहीं चाहतीं कि उन्हें माना जाए अन्तिम सत्य
अपने हाशिए पर लिखी टिप्पणियाँ उन्हें अच्छी लगती हैं

वे नहीं चाहती बस अगला संस्करण
वे तो चाहती हैं संवर्धित, संशोधित, संस्करण।
****

{ हिंदी के युवा कवि अरुण देव का ''क्या तो समय'' नाम से एक चर्चित कविता-पुस्तक प्रकाशित है. इस स्तंभ के अन्य कवियों को
यहां पढ़ा जा सकता है. }

Saturday, September 04, 2010

सबद पुस्तिका : 4 : चन्दन पाण्डेय की नई कहानी


रिवॉल्वर
(दोस्ती का पर्दा है बेगानगी – ग़ालिब)



यह नीलू की किस्मत का और मेरा मिला जुला फैसला था कि उसकी दुहरी हत्या होनी चाहिये. नीलू की शारीरिक हत्या का दिन होने का नेक मौका मैने रविवार को दिया था पर उस रविवार की सुबह मेरी नींद ऐसे खुली जैसे किसी फांसी की सजा पाये मुजरिम की खुलती है. एकदम अचानक और डरे हुए इंसान की तरह. नीलू की हत्या का साहस ना तो बाकी जीवन जीने की उत्कट इच्छा से मिली और ना ही उस ईर्ष्या से जिसके बीज नीलू ने मेरे भीतर बड़े सलीके से रोपा था; उसे मारने का साहस मुझे नीलू के अटूट प्रेम से मिला. वैसे भी अब मैं वह इंसान नहीं रह गया था जो इस जले प्रेम को निभाने से पहले था.

अब जब प्रेम और जीवन नष्ट हो चुका है तब लगता है, नीलू नर्क की छत से फिसल कर मेरे जीवन में आ गिरी थी. नीलू, जिसने मेरा टूटना और टूटकर बिखरना नहीं देखा. फूल के बिखरने को लोग अक्सर कम देखते हैं पर नीलू ‘लोग’ नहीं थी. वही नीलू, जिसके मन मष्तिस्क में अब मैं, समय बीतने के साथ लगातार क्षरित होते हुए, याद और धुन्ध की तरह बचा था. नीलू का दर्जा इतना ऊंचा था कि मैं चाह कर भी उसकी हत्या कर नहीं पाता. जिस लड़की के रक्त के बहाव तक को मैने सुना था उसकी हत्या तभी सम्भव थी जब मैं उसके वजूद को मार सकूँ.

उसकी चारित्रिक हत्या में कुल सात दिन लगे थे. इस कर्म में मुझे कल्पना की मदद लेनी पड़ी. वो भी कोरी कल्पना नहीं. बस दो विपरीत धाराओं या दो अलग अलग महसूसियत को अपनी नायिका की चोटी की तरह पर गूँथ दिया. इसी कल्पना तत्व ने मुझे वह तर्क और साहस दिया जिससे मैं उसकी हत्या का फैसला कर सका.



डाउनलोड करके पूरी कहानी पढ़ने के लिए इस ई-बुक पर राइट क्लिक करके लिंक या टारगेट को सेव करें.