Monday, August 30, 2010

सिद्धान्त मोहन तिवारी की कविताएं



{ कविता में तीक्ष्ण-बुद्धि कैसे लिजलिजी भावुकता को फटकार लगाती है, सिद्धान्त ने इसका पता अपनी इन शुरूआती कविताओं में ही दे दिया है. जो भाव और बुद्धि की कॉकटेल से कविता संभव करने को निर्णायक मान बैठे हैं, उनके लिए ये कविताएं दिक्कत पेश करेंगी. उन्हें अपने मन से इन कविताओं के मर्म को कहीं कुछ पंक्तियों में पाने की दुर्बल इच्छा भी निकाल देनी चाहिए. यह असल में स्फीति को एक काव्य-गुण के रूप में प्रतिष्ठित करनेवाली कविताएं हैं. सिद्धान्त की कविताओं का किसी भी माध्यम में प्रकाशन का यह प्रथम अवसर है. }


मेरा "मैं" होना

मैं यहीं हूँ
अपने पूरे वजूद में अपने शरीर और अपनी बुद्धि के साथ.
लेकिन मेरा "मैं" होना कम ज़रूरी है,
क्योंकि मैं हमेशा से सिर्फ़ "मैं" नहीं रहना चाहता हूँ.

मैं अभी बिरजू हूँ,राधा का बेटा बिरजू,
रामू को अपना भाई कहने से डरता हूँ
क्योंकि वो घबरालू है.
मैं, लाला के खून का प्यासा.

मैं लगान का भुवन नहीं हूँ
क्योंकि भुवन जल्द समझौते कर लेता है
और उन्हें लड़ाई का नाम देता है.

मैं मंगल पांडे हूँ,
क्योंकि छाती पर गोली ठोंकने का माद्दा रखता हूँ बे.

कभी कभी दिल्ली विश्वविद्यालय का दलजीत यानि डी.जे.
होने की सोचता हूँ
लेकिन वो प्रोवोग के कपड़े पहन
क्रांतिकारी सोच कैसे रख सकता है.

मैं केसू फिरंगी या लंगडा त्यागी भी हूँ.
लेकिन ओमकारा शुक्ला तो कतई नहीं,
जिसका प्रेम खोखला है.

मैं फैशन की कंगना रनौत हूँ.

मैं तीन मूर्खों में से कोई भी एक नहीं हूँ.
मैं वो खड़ूस प्रोफ़ेसर शायद हो सकता हूँ.

मैं महिला हॉकी टीम का कबीर खान हूँ.
और शायद नहीं भी हूँ.

अरे हाँ, मैं देव हूँ,
कोलकाता वाला नहीं
दिल्ली या पंजाब वाला देव.

मैं राजपूताना का रनसा हूँ
या बन्ना हूँ.

फिलहाल मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूँ,
जो मैं नहीं होना चाहता हूँ.
****

जैव विकास

तुम एक अजीब से विकास का अंग हो,
जहां तुम्हारे ईष्ट तुम्हारे ही रूप में पाए जाते हैं.

कम से कम मैं तो नहीं ही जानता हूँ कि
त्रेता, द्वापद या सतयुग का समय विभाजन क्या है
और साथ ही मेरे पास कोई भी ऐसा अभिलेख नहीं है
जिससे पता चलता हो कि
क्या राम, लक्ष्मण, विष्णु और शिव लगते होंगे
आज के ही आदमियों के माफ़िक.
या उनके भी कूबड़ उभरे, जबड़े आगे और कपाल गुहिका का आयतन कम होगा
हमारे पूर्वजों की ही तरह.

क्या ये तुम ठीक ठीक बता सकते हो कि
हमारे हज़ारों वर्ष आगे की पीढ़ी
अपने देवताओं को रोबोट की शक्ल में नहीं ढालेगी.

हम पूजते हैं देवों को
होमो सैपियन्स मानकर
तो क्या वो अपने सही-सही समय में
होमो हैबिलिस याक्रो मैग्नान नहीं रहे होंगे.

मुझे तो इस पर भी शक़ है
कि क्या वे इतने आभूषणों के धारक रहे होंगे
या क्या वे पकाया भोजन करते होंगे
क्या वे सभ्यताओं में सम्मिलित रहे होंगे,
क्या वे कपड़े पूरे पहनते होंगे
क्या वे अपने महल/ गुफा की दीवारों पर चित्र नहीं बनाते होंगे,
क्या वे रहे होंगे.

मैं क्षमा मांगता हूँ
उन सभी से जो तुलसी, वाल्मीकि या वेदव्यास को
बहुत विशिष्ट रचनाकार मानते होंगे,
लेकिन मुझे इन पर भी संदेह है,
या इनकी ईमानदारी पर.

हमसे तो मुसलमान अच्छे
जो किसी मज़ार को ही अपना पैगम्बर मानते हैं.
उन झंझटों से दूर रहते हुए,
जहां ईश्वर को मानने को
सत्यापित कर पाना कठिन है.
****

पत्थर में लिपटा गुलाब

जुलाई का वो अजीब सा दिन,
जिसकी दोपहर को एक प्रेम का आगाज़ हुआ.
जब इज़हार-ए-मोहब्बत के लिए
उस छोटी जात के लड़के ने किसी ब्राह्मण लड़की को
भेजा था पत्थर में लिपटा वो गुलाबी कागज़.

कागज़ तो केवल प्रेम पत्रों के लिए ही बना था,
और वो पत्थर
नदी के किनारे पर पड़ा मिला था,
घिस कर सुन्दर और गोल हो चुका था.

उस लड़के और लड़की ने अपने प्रेम की नियति को पा लिया था,
जब एक बड़े जातीय संघर्ष के बाद दोनों की शादी हुई
और उन्होंने सम्भोग कर लिया.

लेकिन घर के कहीं किसी दरदराते कोने में
पड़ा था वो पत्थर
और साथ में थोड़ी दूर पर था
वो गुलाबी कागज़,
दरअसल, प्रेम पनपा इनके बीच
जिस दिन से दिया गया इन्हें एक प्रक्षेप्य का रूप
उसी दिन से पत्थर व्याकुल हो उठा था,
उसकी गुलाबी भी उसे रिझाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी.

बिना किसी सामाजिक सरोकार के,
किसी आदर्श प्रेम कहानी की तर्ज़ पर
वे दोनों साथ ही अपनी नश्वरता को
जीने के वायदे कर रहे थे.

किसी दिन खँडहर हो चुके घर में,
करीब २०० साल बाद
पत्थर ने ज़ाहिर किया कि
थोड़ा प्यार करोगी.

उसकी गुलाबी ने ज़रा भी देर नहीं की
उस २०० सालों के फासले को घटाया पत्थर ने
और जा बैठा गुलाबी के कटि-प्रदेश पर
काफ़ी कोशिशों के बाद
कोई भी
कैसी भी
उत्तेजना शांत नहीं हुई.
तो गुलाबी की तरफ़ से हुई पहल
बोली - हमें अपने रिश्ते की शुरुआत में जाना चाहिए.

एक बार फिर से
उस गुलाबी कागज़ नें भर लिया पत्थर को
अपने भीतर
चपका लिया अपने उभारों से शायद
और फ़िर से दोनों ने रूप अख्तियार किया
प्रेम प्रक्षेप्य का
और चले गये दरदरा चुके कोनों के और भीतर
जहां शायद वो सफल रहे होंगे
अपनी नश्वरता को जी पाने में.
****

स्कूटी पर लड़की

तुम या तो पेट्रोल या बिजली से चलने वाली
दुपहिया चलाती हो, ज्यादातर लाल और गुलाबी रंग का.
सारे बाल और आँखों के नीचे का चेहरा
एक दुपट्टे से ढका रहता है,
और वो दुपट्टा अधिकतर कॉटन का ही पाया जाता है,
शायद कई बार वो बाकी कपडों से मेल नहीं खाता है.
कई बार लाल.

इसके बाद भी तुम्हारा कलेजा नहीं पसीजता है,
तुम अपनी केहुनी तक दस्ताने चढ़ा लेती हो,
क्रीम या सफ़ेद रंग का.
ठीक विपरीत रंग का चश्मा (भूरा या काला) आँखों पर रहता है.

हम सभी ये चाहते हैं कि
हम देख सकें अपने मनपसंद हिस्सों को,
पर यार तुम कपडे भी ठीक से क्यों पहनती हो?

हमें बहुत मज़ा आता है जब तुम जींस और टॉप पहनती हो,
कोशिश ये रहती है कि तुमसे ये कह दें
कि कोशिश करो थोडा और टाइट टॉप पहनने की.

ये सब तभी हो सकता है जब तुम किसी गली के नुक्कड़ पर
स्कूटी पर चढ़े हुए और सामने देखते हुए
और मेरी तरफ नहीं देखते हुए
उस गली में से निकलने वाली अपने ही जैसी
अपनी दोस्त का इंतज़ार कर रही हो,
यानी जब तुम स्कूटी तेज़ नहीं चला रही होती हो.

उस समय हम अपने पहनावे के बारे में
शायद ही सोचते हैं.
हाँ, घर पहुँच कर कभी-कभार
शीशे में ज़रूर देखते हैं.

शरीर ज़रूर चाहता है कि
तुम्हारे शरीर के कपड़े कुछ कम होने चाहिए थे
लेकिन मन कपड़ों की आंखमिचौली में
इसलिए खुश रहता है क्योंकि
मन अपने मन ही मन में शरीर की ज़रूरतों को
अजीब से रोमांच के साथ पूरा करता रहता है.

ओफ़! तुम्हारा रिक्शे वाला संस्करण इतना रोमांचकारी नहीं होता है
शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि रिक्शे पर
जींस टी-शर्ट कम पाया जाता है
वहाँ पर सलवार-सूट होता है
और उसे ढकने के लिए बड़ी चुन्नी.
****

12 comments:

राजेश उत्‍साही said...

सिद्धांत की कविताएं नए बिम्‍ब लेकर आ रही हैं। उन्‍होंने जो महसूस किया वह बिलकुल सहजता से अपनी कविता में ढाल दिया। ताजापन तो उनमें है ही देर तक रहने वाली भा
षा की खुशबू भी। बधाई और शुभकामनाएं।

डा.सुभाष राय said...

Anurag jee, naheen lagata ki kuchh jyaadaa kah gaye aap. Sidhnant men beshak badee sambhaavanayen dikhatee hain par abhee ve apane kavi kee talaash men hee hain. unkaa bauddhik vyakti bhee kai baar usee lijlijepan me gota lagaataa huaa dikhata hai, jise aap asweekar karate hain. khaskar aakhiri kavita men dekhiye, sanket kidhar hai.

समर्थ वाशिष्ठ / Samartha Vashishtha said...

बढ़िया कविताएं! लिखते रहें, सिद्धांत।

Parul said...

umda sankalan!

सचिन .......... said...

सिद्धांत की कविताएं कुछ कह देने की बेचैनी से भरी हैं। यह बेचैनी अपनी धार के साथ कविता के धुंधलके को साफ करेगी और जीवन की निजी लय बरकरार रखेगी। सिद्धांत अपने कवि कर्म को आपधापी के बीच हुनरमंदी के साथ संभाले रखेंगे। ऐसा मुझे लगता है, उम्मीद है आपको भी लगेगा।

प्रवीण पाण्डेय said...

मेरा मैं होना बस मुझे ही ज्ञात है। मैं क्या हूँ और क्या हो सकता हूँ, मुझे भी नहीं ज्ञात। बहुत सुन्दर।

nilm said...

sharp arrows of satire.....one can not suppress ones smile which wd come floating on lips while reading these poems....

शिरीष कुमार मौर्य said...

अनुराग ये कविताएँ वाकई में हिंदी में नया कुछ लेकर आ रही हैं. सबद पर समर्थ के बाद सिद्धांत एक सार्थक समास बना रहे हैं. सिद्धांत की एक पंक्ति "हमसे तो मुसलमान अच्छे" को मैंने अपने पाठ में "हमसे तो 'वे' मुसलमान अच्छे" कर लिया है.....क्यूंकि मज़ारों को पैग़म्बर मानना......यानी अनकहनी भी कुछ कहनी है....वैसे उन्हें हिन्दू भी पूजते हैं....अच्छा लगा कि एक नौजवान तुलसी, वाल्मीकि या वेदव्यास के बरअक्स हमें प्रेम में रचे बसे सूफ़ियों की याद दिला रहा है....उसका संदेह लाजवाब है....और ज़रूरी....मुझे तुरत अपनी कक्षा याद आ गई जिसमें मैं बच्चों से कहता हूँ- मेरे या किसी अध्यापक के कहे पर संदेह करो..उसे अपनी समझ से जांचों परखो.....ज़रूरी संवाद करो....तब आगे बढ़ो....

इस पोस्ट ने दिल ख़ुश कर दिया. सिद्धांत को बधाई...और उसे पहली बार प्रकाश में लाने के लिए तुम्हें भी....

ये बनारस भी एक अजब जगह है यार.....

अरुण देव said...

सिद्धांत की कविताएँ मुझे प्रथम दृष्टया अच्छी लगी,और कविता की यह जरूरी विशेषता है.
इस तरह के शिल्प के कुछ अपने खतरे भी हैं.शुष्क और वक्र भाषा पहले पाठ में ही चुक जाती है---गनीमत है सिद्धांत की कविताएँ इससे बची हुई हैं-------और इनके भीतर जो अन्वेषक है उसका तो कहना ही क्या...उगने और पनपने के लिए ....एक उम्मीद.

Meenu Khare said...

बहुत ही अच्छी कविताएँ सिद्धांत . एकदम नए बिम्ब, एकदम अलग कथ्य. बधाई. सबद ब्लॉग को भी इतनी अच्छी रचनाएँ पढवाने की बधाई.

चन्दन पाण्डेय said...

युवा कवि सिद्धांत को उनकी कविताओं के प्रथम प्रकाशन पर उन्हे तिलक लगाया जाये. कवितायें अच्छी हैं. सिद्धांत को चाहिये कि लगातार लिखें. उन्हे बधाई. (इतने फीके कमेंट के लिये माफी सिद्धांत क्योंकि तुम्हे लिखते-बढ़ते देख कितनी खुशी है, उसे तुम्हे क्या बताऊँ!!)

Shyam Bihari Shyamal said...

ताज़गी से भरी कविताएं। संभावनाओं से भरा नया रचनाकार... कवि को बधाई... उपलब्‍ध कराने के लिए आपका आभार...