Monday, August 23, 2010

प्रेम पर कुछ छोटी कविताएं : पंकज राग


{ पंकज राग की इन ताज़ा कविताओं में अनुभूतियों का विपर्यय है. यह विपर्यय सिर्फ़ प्रेम के परिचित कथोपकथन से दूरी बरत कर प्राप्त
नहीं किया जा सकता. इसके लिए ठंडी वस्तुपरकता और मितकथन दरकार है, क्योंकि इन घटकों से मिलकर ही कविता गैररूमानी अभिधात्मक प्रतिफलन से आगे जाने का सामर्थ्य पाती है. कविताओं के साथ दी गई तस्वीर हेनरी मतीस की है. }


(एक)
प्यार को सूफ़ियाना मत बनाओ
प्रेम यूं भी एक अतिशयोक्ति है
बेहद की कल्पना कर रहे मेरे सज्जादानशीनों
वहाँ भी मिलेंगी चारदीवारियाँ - वहाँ भी खुलेगा मन्नतों का नया सिलसिला
तुम्हारे पाले हुए दरगाहों की तरह

(दो)
यूं वह खाली मैदान था जहाँ हम और तुम बैठे थे
और घास गीली भी नहीं थी
फिर भी हम बेचैन हो कर थोड़ी ही देर में उठ खड़े हुए
प्यार एक बाज़ी की शकल लेने लगा था
और हम दोनों पहले से ही परास्त थे

(तीन)
मुझे किताबों में सूखे हुए फूल कभी नहीं मिले
एक कम पढ़ी लिखी अनुभूति की तरह मैंने प्यार को हमेशा सरपरस्त किया
उसकी तरक्की पर अपनी पीठ भी थपथपाई
और उसे दिखाने के लिए कुछ और किताबें खरीद लाया
मैं सुबह सवेरे बगीचे में टहलने नहीं गया
न ही शाम में बाल्कनी पर खड़े हो कर आकाश की रंगीन रेखाएँ देखीं
मैंने अपनी दिनचर्या कायम रखी
और उसके अतिक्रमण की एक-एक कोशिश नाकाम की

इस तरह बड़े सलीके से
एक अदबी तरीके से
मैंने भी प्यार किया

(चार)

मैंने कहा मुझे सीधी रेखा अच्छी लगती है
उसने कहा मैं इस रेखा के दोनों ओर
परछाइयाँ बनाना चाहती हूँ

मैंने कहा कि साफ़-साफ़ देखना अच्छा होता है
उसने अंतर्मन का हवाला दिया और बोलने लगी
कि उसे ऐसी आवाज़े सुनाई देती है जिन्हें
वह पहचानती नहीं

मेरे हाथ में बँधी-बँधाई एक किताब थी
उसके हाथों में उलझती बिखरती छायाओं की एक तस्वीर
शायद मुझे किसी खास रंगत का पूर्वाग्रह था
शायद उसे धुँधले की आदत पड़ चुकी थी
मैं शायद चल रहा था
और वह शायद कुहनियों के बल लेटी थी

हम फिर भी प्रेम कर सकते थे
पर किया नहीं

(पाँच)
कमबख्त यह भी एक उम्र है
जब रोशनी की हर पगडंडी
झीने कपड़ों में लिपटी हुई सी लगने लगे
धूप छाँव से बढ़ कर लगे हल्की धूपों का यह खेल
उसके बारे में सोच-सोच कर ही थक जाए आदमी
झीने कपड़ों की सरसराहट कानों को चिढ़ाए
पर हाथ उठने से इंकार कर दें
अब इस उम्र में तुम भी तो हल्की सी ही नज़र आओगी
कितनी भी रोशन हो तुम्हारी याद
अब तुम्हारे साथ भी खेल फीका ही रहता है
फिर भी खेलते हैं कभी-कभी
बराबरी पर तो नहीं छूटते हम दोनों
पर न कोई जीतता है न ही कोई हारता है

उम्र के इस पड़ाव पर
ऐसे किसी खेल को भी
प्रेम ही कहते हैं
****

17 comments:

शायदा said...

achhi kavitayein.
vaise prem par kuchh bhee likha gaya chhota kaise ho sakta hai?

अरुण देव said...

प्रेम पर अप्रेम.
ठंडी वस्तुपरकता का सौंदर्य.

Farhan Khan said...

sab hee kavitayen bahut achee hain...bahut hee achaa....thanks for sharing these beautiful poems.....

शिरीष कुमार मौर्य said...

अनुराग मैं थोड़ा असहमत हूँ...मेरे लिए प्रेम ठंडी वस्तुपरकता का विषय नहीं....यह ठंडापन तो शायद प्रेम का पश्चात है ....और अभी कम से कम मेरे जीवन में प्रेम का कोई पश्चात नहीं....और देखो न....पश्चात् से ही पश्चाताप बनता है....इस नाते मैं बेहद अच्छी पर ठंडी इन कविताओं से कोई तादात्म्य नहीं बना पा रहा....कविता में और जीवन में ऐसा न कर पाने की असफलता ही शायद मेरी "सीमा" है....

anurag vats said...

'इन बेहद अच्छी' कविताओं पर आपकी असहमति का पता चलना अच्छा है, किंतु उसके आशय में न तो मुझे कवि की पश्चात-बुद्धि दिखाई पड़ती है, न ही खींच कर उसे 'पश्चाताप' समझ लेने की हड़बड़ी ही मुझमें है. आपके निकट 'अनुभूतियों का विपर्यय' और 'परिचित कथोकथन' के विपरीत जाने वाले नुक्ते से अगर यह ज़ाहिर नहीं हो रहा कि बतौर युक्ति ठंडी वस्तुपरकता अंतर्वस्तु ( प्रेम) को सिर्फ़ एक नई रोशनी में दीप्त करता है, तो आपकी असहमति का सम्मान करना मेरा दायित्व है.

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रेम के पाँच विषयों की सुघड़ व्याख्या।

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

"प्यार को सूफ़ियाना मत बनाओ
प्रेम यूं भी एक अतिशयोक्ति है
बेहद की कल्पना कर रहे मेरे सज्जादानशीनों
वहाँ भी मिलेंगी चारदीवारियाँ - वहाँ भी खुलेगा मन्नतों का नया सिलसिला
तुम्हारे पाले हुए दरगाहों की तरह"

क्या बात पंकज जी , प्रेम का विस्तार व समेट दोनों एक साथ ! वाह !

Meenu Khare said...

बेहद संजीदा प्रेम कविताएँ . बारिश का मौसम और ऐसी कविताएँ . मन भीगा सा लगता है. शायद आज कुछ लिख पाऊँ .

सुरेश यादव said...

'प्यार' की सार्थकताको व्यक्त करती आप की कवितायेँ सशक्त हैं ,सुन्दर हैं ,बधाई.

डा सुभाष राय said...

यह अदबी तरीके से प्यार करना सुनियोजित लगता है. इन्हें प्रेम पर नही अप्रेम पर कवितायें कहना ज्यादा ठीक लगेगा. पर क्या अप्रेम घटित हो सकता है? मुझे लगता है कि अप्रेम जब भी घटित होगा, सहज नहीं होगा, बनावटी होगा. इन कविताओं में अभ्यास से या शब्द कौशल से निर्मित यही बनावट दिखायी पड़्ती है. यह भी हो सकता है कि यह बनावट स्वभाव में आ गयी हो, बुनावट में बदल गयी हो. जैसा हो वैसा व्यक्त होने में कम से कम कोई पाखंड तो नहीं रहता. इस नाते कवि को बधाई.

kahana hai kuch aur said...

bahut sundar, taral aur sahaj...pyari, bahut achi kavitaye

वर्षा said...

मुझे सारी कविताएं अच्छी लगीं, इनमें अपनी ही तरह का प्रेम झलकता है

dimple said...

प्रेम कविताये तो है पर अजीब सा अलग सा अनूठा सा पर अच्छा लगने वाला भाव लिए है...खासकर ये-यूं वह खाली मैदान था जहाँ हम और तुम बैठे थे
और घास गीली भी नहीं थी
फिर भी हम बेचैन हो कर थोड़ी ही देर में उठ खड़े हुए
प्यार एक बाज़ी की शकल लेने लगा था
और हम दोनों पहले से ही परास्त थे

डॉ .अनुराग said...

तीसरी कविता अच्छी लगी...जैसे समय के साथ प्रेम के दायित्व के प्रति अवलेहना को भी प्रकट कर रही हो ....

प्रदीप जिलवाने said...

नये स्‍वाद की कविताएं.

Ram Krishna Gautam said...

Har Shabd Apne Aap Me Ek Azab Anubhuti Hai!!



"RAM"
http://dhentenden.blogspot.com

shankarsonane said...

पंकज जी
प्रेम का विस्तार अनन्त है फिर भी आपने उसे समेटने की कोशिश की । बड़ा अच्छा लगा । प्रेम समेटना आसान नहीं है किन्तु जब वज स्वयं की सिमट जाए तो उसकी अपनी अलग ही अनुभूति होती है। यह तो आप भलिभांति जानते है। कविताएं हृदय को स्पर्श करती हुई है। बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें ।

कृष्णशंकर सोनाने