Thursday, August 19, 2010

निर्मल : साहित्य-शिक्षक के रूप में




हमें उन चीज़ों के बारे में लिखने से अपने को रोकना चाहिए, जो हमें बहुत उद्वेलित करती हैं, जैसे - बादलों में बहता हुआ चाँद, हवा की रात और हवा, अँधेरे में झूमते हुए पेड़, पहाड़ों पर चाँदनी का आलोक, स्वयं पहाड़ और उनकी निस्तब्धता- इन सबको अभिव्यक्त करना ज़रूरी नहीं है, न ही इन्हें नाम देने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि वे अपनी भावमुद्रा में बहुत रहस्यमय और 'इल्यूसिव' हैं. किंतु जब हम लिख रहे हों तब इन सब चीज़ों के 'इम्प्रेशन' हमारे भीतर मौजूद रहने चाहिए- एक तरह का ठोस आलोक-मंडल- जो चीज़ों की गहराई और पार्थिकता को बरकरार रखता है और उन्हें स्वतः शब्दों में बदल देता है.

हर छोटा लेखक मौलिक होने की चेष्टा करता है, जहां वह अपने पूर्ववर्ती लेखकों से अलग कुछ लिख सके ...किंतु जो सही अर्थों में 'मौलिक' होता है, वह हमेशा अपने प्रिय, महान लेखकों की नक़ल करना चाहता है- किंतु लिखने की घड़ी में - वे महान लेखक विनयशील, शालीन मित्रों की तरह उससे विदा ले लेते हैं और उसे अकेले कमरे में छोड़ देते हैं - जो उसका नरक है - और मौलिकता का उद्गम स्रोत भी.

हर कहानी किसी संकल्प के भीतर कलपती है, आधे से उठकर सम्पूर्ण की और जाती हुई; उसके कितने कटे-फटे हिस्से बाहर निकले रहते हैं, शीशे के कोनों की तरह, जिन्हें बाँधनेवाला फ्रेम वह ज़िन्दगी है, जिसे क़तर-ब्योंत करने पर ही 'कहानी' बनती है. हर कहानी में ज़िन्दगी के खून भरे हाथ चिपके रहते हैं, एक कहानी की उतरी हुई थिगलियाँ जो दूसरी कहानी के लिए पैबन्द का काम करती हैं.

जो आदमी कीचड़ से बचकर निकालना चाहता है, कविता उसके पास नहीं आती, क्योंकि कविता अपने भीतर के नाटक और दु:स्वप्नों से उत्पन्न होती है, उदासीनता से नहीं. उदासीनता मृत्यु है. एक दिन ऐसा आएगा कि हम अपने को बचाते-बचाते अचानक देखेंगे कि बचाने की कोशिश में सब कुछ गँवा दिया है. यह ज़िन्दगी का हमारे लिखने से सही प्रतिशोध होगा- न कम न ज़्यादा. सही.

ऐसे मौके आते हैं, जब प्रकृति हमसे भाषा छीन लेती है, तब शायद असली मौन उत्पन्न होता है- वह मौन नहीं जो हमारे बाहर है, बल्कि जो हमें जन्म से मिला है, हमारे भीतर, जो बहुत बाद के वर्षों में- अगर हम सौभाग्यवान हुए- हम अपनी कविता, संगीत, कहानी के भीतर पुनः उगता हुआ देखते हैं, और अपने दुर्भाग्य के दिनों में खो देते हैं.

यदि कोई मुझसे पूछे कि मैं लिखने से क्या कहना चाह रहा हूँ तो मैं कहूँगा, कि मैं अपनी निजी, प्राइवेट अनुभूति को एक ऐसे चरम बिंदु तक खींच ले जाना चाहता हूँ, जहां वह 'सार्वजनिक कर्म' बने बिना भी, दुनिया की सतह पर एक प्रेत-छाया की तरह प्रकट होती रहे, कुछ-कुछ उन दिवास्वप्नों-सी, जिन्हें लोग सड़क पार करते हुए, बस की प्रतीक्षा करते हुए या सिर्फ़ अकेले में बैठे हुए देखते रहते हैं...
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(
निर्मल जी की डायरी '' धुंध से उठती धुन'' से यह तीसरा चयन है. चयन का शीर्षक उनके नबोकोव पर लिखे निबंध से प्रेरित है. तस्वीर: गगन गिल के सौजन्य से. )

17 comments:

डॉ .अनुराग said...

कभी कभी मुझे लगता है लेखक अपनी डायरी में अपनी कहनियो से ज्यादा अच्छा लिखता है ....

प्रमोद रंजन said...

निर्मल जी के इस लेख का स्‍मरण कराने के लिए आ
भार स्‍वीकारें।

सौरभ द्विवेदी said...

निर्मल मेरे लिए ये शब्द एक अफसोस से शुरू होता है और एक उम्मीद पर खत्म। अफसोस बड़े दुनियावी किस्म का है, कि जिस शख्स की भाषा ने मुझे सांप की आंख की तरह अपने सम्मोहन में बांध लिया, उससे कभी मिल नहीं सका, उम्मीद इस बात की कि जब भी उनके लिखे से मिलता हूं, उनसे मिलता हूं और ये मिलना किसी सार्वजनिक शोर की तरह नहीं, आत्म से उपजे मौन में घटता है, तमाम मुलाकातों के बीच एक मुलाकात सबद के जरिए हुई, शुक्रिया अनुराग जी

प्रदीप जिलवाने said...

'धुंध से उठती धुन' का अच्‍छा स्‍मरण आपने कराया, अगले माह इंदौर में राष्‍ट्रीय पुस्‍तक मेला है, इसे भी खरीदूंगा.

fisaddi said...

lovly

Prasanna said...

शुक्रिया अनुरागजी ! सबद के माध्यम से आपकी बेहतरीन प्रस्तुतियोँ के क्रम मेँ एक और उम्दा कड़ी । निर्मल वर्मा के इस वक्तव्य के बाद रचना , रचयिता और रचना - प्रक्रिया के बारे मेँ कहने को क्या रह जाता है । एक बार फिर आपको बधाई ।

आशुतोष पार्थेश्वर said...

निर्मल जी को स्मरण !आपका आभार !

manisha said...

Kya bat hai.kitna kuchh sikha diya nirmal ji ne kuchh hi vakyon me.

Geet Chaturvedi said...

कई बार ऐसा लगता है कि लेखक अपनी डायरियों में, या ऐसी दूसरी जगहों पर उन सारी चीज़ों को छू पाते हैं, जहां वे अपनी रचनाओं में नहीं पहुंच पाते. रचनाओं में वह होता है, जो वे कर चुके होते हैं, डायरियों (या ऐसी जगहों पर) वह सब होता है, जो वे कर चुके होते हैं, करना चाहते है, पर कर नहीं पाते और वह सब भी जो वे करना चाहते हैं और एक दिन कर भी जाते हैं. डायरी या ऐसी चीज़ें इसीलिए महत्‍वपूर्ण हो जाती हैं कि वे रचना की सीमाओं को, बहुत सारी जगहों पर, लांघ जाती हैं.

Subhash Rai said...

Nirmal jee ko jitanee baar padhiye, ve taja aur naye lagate hain. har bar kuchh n kuchh naya hota hai. jo keechad se bachata chalata hai, kaavita usse door khadee ho jaatee hai. kavita, kahanee kee kai parten khuleen. achhee prastuti.
Anurag jee ko aabhar.

राजेश उत्‍साही said...

सचमुच निर्मल जी यहां एक साहित्‍य शिक्षक के रूप में ही नजर आ रहे हैं। यहां उनकी ये छोटी छोटी टिप्‍पणियां लेखन के विषय में कितना कुछ कह रही हैं।

Farhan Khan said...

मुझे खुशी है के इस महान लेख पड़ने का अवसर मिला और मैं भी कभी कभी लिखने की कोशिश करता हूँ इस लिये मुझे इस लेख से बहुत कुछ सीखने को मिलता...मुझे ये पंक्तियाँ बहुत प्रभावित करती हैं "जो आदमी कीचड़ से बचकर निकालना चाहता है, कविता उसके पास नहीं आती"

बहुत बहुत आभार स्‍वीकारें!
Thank u Bhayea...

अनिल कान्त : said...

आपका बहुत-बहुत शुक्रिया मेरे प्रिय निर्मल जी का लिखा हुआ बाँटने के लिए .....

नवीन रांगियाल said...

सब कुछ निर्मल है

कमरे में छाई धुंध
जो निर्मल वर्मा
प्राग से समेटकर लाये थे

रायना की अंतहीन रहस्यमयता को
अपनी कोख में बसाकर
बेहताश नशे में
भटकती रहती है वे दिन

कमरे में

टेबल पर एक चिथड़ा सुख है

सुख...!

ना घटता है ना बढ़ता है
दिन और रात
असामान्य तरीके से समान है

धुंध से उठती धून
हर वक़्त - हमेशा
बिस्तर पर
मेरे सिरहाने रखी रहती है
मै जानबूझकर उसे वहाँ से उठाता नहीं

मै नींद मै भी देख सकूँ
चलती हुई दुनिया

पीछे छुटता हुआ कल

शब्द और स्मृति
हिस्सा है
जीवन और मृत्यु का
जीवन और मृत्यु की तरह

सब कुछ निर्मल है

सुशीला पुरी said...

निर्मल वर्मा को पढ़ना पानी पर चलने और बादल सा उड़ने जैसा है !!!!!

Hitendra Patel said...

yah bahut hi sundar aur upyogi samagri hai. meri kai bar ki padhi. phir bhi ek bar aur padhna achha laga. kuchh comments bhi bahut sundar hain.

Anonymous said...

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