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बही-खाता : १० : हृषीकेश सुलभ



{ इस स्तंभ का उद्देश्य कथा लेखकों का सहचर होना रहा है और इस बार हिंदी के वरिष्ठ कथाकार, नाटककार और नाट्य-समीक्षक हृषीकेश सुलभ हमें अपनी उस रचना-भूमि की यात्रा पर साथ लिए चल रहे हैं, जिसकी उदास लेकिन उर्वर मिट्टी ने उन्हें गढ़ा है. सुलभजी को उनकी कथा-कृति 'वसंत के हत्यारे' के लिए हाल ही में कथा-यूके सम्मान प्रदान किया गया है. सबद पर उनका लेखन पहले भी रंगायन शीर्षक स्तंभ में प्रकाशित होता रहा है. यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा. } 


प्रेम की दुर्गमता मुझे आकर्षित करती है

दादी और अम्मा जब तक जीवित रहीं एक घटना का ज़िक्र करती रहीं। बचपन से सुनते-सुनते मैंने इस घटना को लेकर मन ही मन कुछ दृश्य रचे और वे दृश्य लगातार उभरते रहते हैं। सन् 1942 की अगस्त क्रांति के तत्काल बाद का समय। इस अफ़रा-तफ़री भरे समय में मेरी बहन का जन्म हुआ। गर्भवती अम्मा जैसे-तैसे एक सम्बन्धी के घर पटना पहुँच गई थीं। पिता अपनी धुन में थे, आज़ादी की धुन में। यह संयोग ही था कि पिता पटना में मिल गए। बहन के जन्म के सप्ताह भर बाद वे नवजात शिशु और सद्यःप्रसूता पत्नी को साथ लेकर जैसे-तैसे सीवान, जो अब मेरा गृह जनपद है, पहुँचे। पत्नी और नवजात बेटी को एक बैलगाड़ी पर बिठाया। गाड़ीवान को पता बताया और फ़रार हो गए।

दिन भर की यात्रा के बाद जब बैलगाड़ी गाँव पहुँची, मेरी विधवा दादी दरवाज़े पर खड़ी थीं और पुलिस घर की तलाशी ले रही थी, पिता के बारे में पूछताछ कर रही थी। पिता आज़ादी मिलने तक फरार रहे। और सालों बाद फिर बेटी को देखा। आज़ादी का संघर्ष और इसराज (अब दुर्लभ हो चला एक वाद्य यंत्र) बजाना, यही दो काम करते रहे। सन् 1947 के बाद होमियोपैथ चिकित्सक बने। किसानी और गाँव-गाँव घूमकर मुफ़्त चिकित्सा का सिलसिला सन् 1968 के आरम्भ तक चलता रहा। और एक दिन मुझे लेकर पटना आ गए। वे मुझे बेहतर शिक्षा देना चाहते थे। गाँव छूटा। न सही पूरी तरह, पर पिता-पुत्र दोनों उखड़ तो गए ही थे अपनी माटी से। वे विस्थापन की पीड़ा झेलते हुए मरे और मैं अपनी छाती में विस्थापन का हाहाकार सँजोए हुए जी रहा हूँ। यह विस्थापन का हाहाकार ही मेरी रचनात्मकता का उत्स है।

मेरे गाँव में एक नीलही कोठी हुआ करती थी। नील का व्यापार करनेवाले प्रभुओं की कोठी का भग्नावषेष। नाफ़रमानी के अपराध में असमय काल का ग्रास बननेवालों और प्रभुओं की वासना की लपटों में धू-धू जलनेवाली स्त्रियों की आत्माओं के वास के लिए यह कोठी कुख्यात थी। मेरे बचपन और किशोर उम्र के गहन, उदास और निर्भय एकांत की कई दोपहरें इसी कोठी में बीती हैं। मैंने इस कोठी की काई लगी दीवारों पर ढ़ेरों आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींची है। गर्मी की निचाट दोपहरी में नीलही कोठी मेरी शरण्यस्थली रही है। यह कोठी मेरी आरम्भिक पाठशाला रही है। इसके एकांत की निविड़ता में छिपे भय, आतंक, बर्बरता और आर्तनादों को मैंने छोटी-सी उम्र में अपने लिए आविष्कृत किया था। मेरी जिज्ञासाओं के उत्तर में पिता पूर्वजों के अपमान की जो अनगिन कथाएँ सुनाते, मैं उन्हें नीलही कोठी के भीतर जाकर अपने लिए फिर-फिर रचता।

उस समय मेरे लिए यह समझ पाना कठिन था कि मेरे भीतर क्या घट रहा है, पर आज लगता है कि दुःख, बेचैनी और अवसाद की जो गठरी मैंने उन दिनों बाँधी, उसे ही अपनी पीठ पर लिए भटक रहा हूँ। आज नीलही कोठी का नाम-ओ-निशान मिट चुका है। उसकी ईंटें लोगों की मोरियों में लग गईं। नई पीढ़ी को मालूम भी नहीं कि कभी यहाँ कोई नीलही कोठी हुआ करती थी। पर यह कोठी मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह मेरा पीछा कर रही है।


मैंने बहुत कम कहानियाँ लिखी हैं। मेरे लिए लिखना मरणांतक पीड़ा से गुज़रने की तरह है। जैसे कोई हलक में हाथ डालकर कलेजा निकाल ले। पर यह मेरे जीने की आवष्यक शर्त है। मैं एक कहानी को महीनों ही नहीं, सालों-साल मन ही मन लिखता रहता हूँ। मेरे लिए कहानी में प्रवेश के रास्ते अनंत हैं। कभी कोई पात्र,.....कभी कोई घटना या स्थिति,......कभी कोई विचार.....तो कभी कुछ भी।

अपनी हर कहानी को आरम्भ करते हुए मैं थरथर काँपता हूँ। किसी स्कूली बच्चे की तरह न लिखने के अनगिन बहाने बनाता हूँ। कभी उदास चुप्पी तानकर घंटों सोता, तो कभी प्रसन्न होकर पैदल अपने शहर की सड़कें नापता हूँ। मैं नहीं जानता कि जर्मन कवि राइनेर मारिया रिल्के की सलाहों को युवा कवि काप्पुस ने कितना स्वीकार किया था! पर मैं उसकी सलाह पर बार-बार अपने खोल में बंद होता हूँ और अंडे से बाहर निकलते पंछी की तरह आँखें मिच-मिचाकर इस जगत को निहारता हूँ, और अपने से हर क्षण सवाल करता हूँ कि ‘मैं जो लिखने जा रहा हूँ, क्या उसे लिखे बिना मैं चैन से जी सकता हूँ?’ अगर हाँ, तो लिखने से मुक्ति मिल जाती है। फिर आवारगी और यायावरी।

रिल्के की तरह मुझे भी सबसे दुर्गम प्रेम लगता है और इसकी दुर्गमता मुझे आकर्षित करती है। सचमुच हमने प्रेम की विराटता को, प्रेम के विस्तार को संकुचित किया है और प्रेम को पाने की उत्कंठा और खो देने की निराशा दोनों को रूढ़ियों से भर दिया है। मैं इन रूढ़ियों से मुक्ति के लिए न जाने कबसे सिर पटक रहा हूँ। हर बार जीवन नई छवियों के साथ प्रकट हो जाता है। मैं जो सच ढूँढ़कर लाता हूँ, अगले ही क्षण उसकी आभा बदल जाती है। कभी कोई कोना दीप्त हो उठता है, तो कभी कोई कोना अँधेरे से आच्छादित हो जाता है। रेतकणों को मुटठी में भर लेने या पलकों से ओसकणों को चुनने की तरह है प्रेम को जान लेना और इसे अपने भीतर बचाए रखना। मैं इसे हर हाल में बचाए रखना चाहता हूँ।

युद्ध, हिंसा, घृणा यानी गहन संकट-काल में प्रेम ही है, जो जीवन के काम आता है,...मनुष्य के काम आता है,...चर-अचर सबके काम आता है। यह हमें क्षण भर में संवत्सरों के पार ले जा सकता है। यह हमें हमारी नैसर्गिक विराटता सौंपता है। यह हमें पछोरकर अंधसंशय, अहं और संकीर्णता से मुक्त करता है। अपनी कहानियों में प्रेम के दुर्गम गह्वरों में उतरना और प्रेम के दुर्गम राहों पर भटकना मेरी साध रही है। मैं नहीं जानता कि यह हो पाया है या नहीं, पर अपनी रचनाओं में प्रेम की सनातन आवृत्ति की अनुगूँज रचना चाहता हूँ। अपनी रचनाओं के मुखर बहिरंग के अंतरंग में निर्व्याज और निष्कलुष प्रेम की संवेदनाओं का झिरझिर प्रवाह मेरा अभीष्ट रहा है।

कथा-लेखन के साथ-साथ नाट्यालेखन और रंगकर्म मेरी रचनात्मक सक्रियता का अविभाज्य हिस्सा रहे हैं। कहानी और नाटक के बीच आवाजाही चलती रहती है। आवाजाही के इस कौतुक में मुझे बहुत मज़ा आता है। इस आवाजाही का कई बार मैं रचनात्मक मौन के रूप में उपयोग करता हूँ। रंगकर्म एक सामूहिक कला है।.....कई कलाओं का सम्मुचय है रंगमंच। इसने मुझे कला की दूसरी विधाओं से जोड़ा है और शुद्धतावाद के ख़तरों से परिचित कराया है। रंगमंच ने मुझे युवाओं के एक बड़े वर्ग से निरन्तरता में जुड़े रहने का अवसर दिया है। उनकी रचनात्मकता का नवाचार मुझे माँजता है और उनकी आभा के स्पर्श से मैं स्वयं को दीपित करने का प्रयास करता हूँ। मेरे गाँव का रंगमंच बहुत समृद्ध था। मैंने नौ साल की उम्र में ‘सत्य हरिश्चंद्र’ में रोहिताश्व की भूमिका से अपनी रंगयात्रा आरम्भ की थी।

कुमार
गंधर्व के गाये निर्गुन मेरे एकांत के साथी हैं और गहन संकट काल में हज़ार-हज़ार स्त्रियों के कंठ से फूटे असंख्य लोकगीतों की पंक्तियाँ-ध्वनियाँ मेरे मन-प्राण को सहारा देती हैं और प्रसन्नता के क्षणों में मेरी आत्मा को उल्लास का मदवा पिलाती हैं। मेरे लोक का विस्तार होता है। मेरा लोक अँग्रेज़ी के फ़ोक से अलग है। लोक की अदम्य जिजीविषा मुझे अनुप्राणित करती है। मेरा लोक मुझे पवित्र करता है। यही बजाता है अभय की तुरही मेरे भीतर। लोक की धवलता मुझे रंजित करती है। इस लोक में विन्यस्त हैं - धूल-धक्कड़ भरी आँधियाँ, दहला देनेवाले आर्त्तनाद, टीसनेवाले करुण विलाप, चंदनलेप जैसी शीतलता वाला नेह-छोह, लहराती हुई हज़ारों जामुनी भुजाओं का विश्वास, सोहर के पद, फगुआ और पूरबी के बोल आदि।
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10 comments:

'वसंत के हत्यारे' के रचनाकार को इन्दु शर्मा कथा सम्मान मिलने की हार्दिक बधाई ।


"मैंने बहुत कम कहानियाँ लिखी हैं। मेरे लिए लिखना मरणांतक पीड़ा से गुज़रने की तरह है। जैसे कोई हलक में हाथ डालकर कलेजा निकाल ले। पर यह मेरे जीने की आवष्यक शर्त है। मैं एक कहानी को महीनों ही नहीं, सालों-साल मन ही मन लिखता रहता हूँ..."

सुलभ जी की रचना-यंत्रणा ही उनके जेनुइन लेखन का आधार है.आज जब बाज़ार और विशेषांको के लिए लोग लिखने के लिए मरे जा रहे हैं,उनका यह सयंम और स्वाभिमान सलाम का हकदार है.


सुलभ जी का गद्य बड़ा आत्मीय लगता है. उसके एक नए रूप से परिचय करवाने का आभार.


बहुत सुन्दर । इस स्तंभ के लिए अनुरागजी को बधाई और इस अंतरंग , आत्मीय एवं प्रेरणास्पद प्रस्तुति के लिए सुलभजी को मेरा प्रणाम ।


रचनात्मकता से भरा है यह गद्य।एक निष्कलुष आत्मा की बेचैनी है यह।लगा अपनी ही आवाज हो ।


हार्दिक बधाई इंदु शर्मा कथा सम्मान के लिए.


सुलभ जी को यों जानना,कुछ अलग जानना है।

भीतर के अनगिन पलों और अनुभवों की भावात्मक सरस परिणति ही विविध साहित्यिक, कलात्मक रूपाकार पाती है।
रचनाप्रक्रिया की यह कालान्तक पीड़ा सम्भवत: प्रत्येक सर्जक की भावभूमि है, बशर्ते इसे पोसते रखा जाए....।

लन्दन में अबकी यकायक मिल लिए, अच्छा हुआ। कुछ बतियाना भी इस बहाने हो गया।

बधाई!


आदरणीय हृषिकेश जी, आपने प्रेम और लोक को अपने लेखन का उत्स माना है, मुझे यह प्रभावित भी करता है और एक तरह से आपसे भी जोड़ता है. मैं प्रेम को कला के लिए केन्द्रीय अनुभूति मानता हूँ.
इस आलेख में आपकी भषा हमेशा की भांति बरबस बंधे रखती है. अपने इन अनुभवों को साझा करने के लिए धन्यवाद. नए लेखकों को इसे पढ़ना चाहिए.


sulabh ji... aapka lekh padhkar aanandit ho gaya...

aapki rachnaye padhne ka mauka to bahut kam mila hai par kahaniyo ke srijan ke peechhe ke aapke uddehsya ko jaankar kaafi achcha laga...

kahi padhi hui kuchh panktiyaan yaad aa rahi hai..."iss marylok me jahan sab kuchh nashvaan hai,prem akela aisa hai jo mrityu ke paar jaane ki kshamta rakhta hai...prem alaukik hai...divya hai...
iss amartya prem ki saadhna me sab kuchh daav par lag jaaye to bhi malal nahi..."

aapka lekh mujhe isi deewangi ki yaad dilata hai...

subhkaamnao ke saath

Prashant Kumar.


Mrityunjay Prabhakar

bahut hi sundar lekhan..
Sulabh Da, apko salam


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