Tuesday, August 03, 2010

दृश्यांकन




 चुंगकिंग एक्सप्रेस

लड़का २५ की उम्र में एक बदहवास रात अपनी उन दोस्तों को फोन करता है जिनके साथ उसने प्राथमिक कक्षाएं पढ़ी थीं और अब जिनसे बरसों बरस बात तक नहीं हो पाती... अभी उनमें से अधिकतर पति के लिए डिनर बना रही हैं, कुछ बच्चों को सुला रही हैं, कुछेक गहरी नींद में हैं और कुछ कहीं और किसी की हो रही हैं...वह सबको अपनी याद दिलाता है...प्रायः सबने अपनी यादाश्त पर जोर डालकर उसे एक खलल की तरह ही दर्ज किया है...अगली सुबह वह तेज़ दौड़ लगा रहा है...स्ट्रेस बस्टर : ख़ुद को इतना थका दो कि न दिमाग़ और न तुम्हारी देह ही किसी की याद में कहीं भटक सके...

रिकॉर्ड से ''कैलिफोर्निया ड्रीमिंग'' की धुन उठ रही है...यह उसके लिए सांत्वना का संगीत है...वह इसे उस लड़की की पसंद का संगीत भर नहीं मानता जो उसके पीछे उसका ख़याल रख रही है...
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डेज़ ऑफ़ बीइंग वाइल्ड

लड़के
ने जब उसे पहली बार देखा तो उसका हाथ पकड़ उसे दीवार से टिका दिया...और ख्वाहिश : सिर्फ़ एक मिनट के लिए यों ही रहो ...अगले एक मिनट तक सिर्फ़ वह और वह हैं...दीवार पर टंगी घड़ी में साठ सेकंड पूरे होने हैं, किसी दिन का कोई एक मिनट पूरा होना है, किसी एक वर्ष की नन्ही इकाई ...समय के ज्ञात इतिहास में वे दोनों इस एक मिनट में एक-दूसरे के लिए थे...लड़की की हैरत अपने तरह की थी और लड़के की अपने तरह की...

बहुत बाद में एक चलती ट्रेन में भोर की उजास में, जब बहुत सारा जीवन शुरू हो रहा है, अपनी मौत से ठीक पहले लड़का क्या याद कर रहा है?...प्रेम, मैत्री, धोखे या चालाकियां?...उसके लिए बीच का जीवन छूटते स्टेशन हो गए हैं...वह एक मिनट सबसे ज़्यादा अर्थवान....और वही उसकी बची हुई साँसों को याद रह गया है...सुन्दर इस संसार से चंद लम्हों में यह छोटा वक्फा भी उसके साथ बिला जाएगा...दामने ख़याले यार जीतेजी कहां छूटता है?...

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इन द मूड फॉर लव

औरत की तकलीफ़ अलग है...वह लैम्पपोस्ट के नीचे भीगते खड़े उदास और चुप्पा आदमी की बांह पकड़ कर रोने लगती है...इस बार कहती कुछ नहीं...बारिश उसकी स्वरलिपि है...

आदमी को रोना ही नहीं आता...अभागा...वह अपनी तकलीफ़ किसी से नहीं कह पाता...उन दोनों का पड़ोस अब अलग है...आदमी के पड़ोस में एक पेड़ है और पेड़ में एक खोह...आदमी पेड़ से लगकर उस खोह में अपना दिल रख आता है...लौटते हुए दुःख उसके चेहरे पर एक उदास गरिमा में झलफला रहा है...ठूँठ जैसी खोह हरे पत्ते जन रही है...
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@...

इसी मेज़ से लगकर चिट्ठियां लिखी गई थीं उसे
अनगिनत 
वे @ के पहले उसका उल्टा नाम और पीछे 
जीमेल जोड़ देने भर से उस तक पहुंच जाती थीं.

बैठना यहाँ अब भी होता है
मज़मून लिखे और रद्द भी किये जाते हैं
लेकिन कोई चिट्ठी उस तक नहीं पहुँचती

चिट्ठियां अपना पता अब खुद हैं जिनमें
याद को लिखा जाता है, लिखे हुए से याद किया जाता है.
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चट्टान रह रह कर धुल जाती है

समय
की शिला पर क्या सब धुल जाता है? क्या वह स्पर्श भी? पत्थरों को कुछ याद नहीं रहता?

( एक काली चट्टान है/ जिस पर बेतहाशा धारा/ अपना सर पटकती है/ लेकिन हिला नहीं पाती/ सिर्फ़ चट्टान रह रह कर/ धुल जाती है / और उसके भीगे कलेवर से/ हज़ार सूरज चमकते हैं/ तुम उससे कतरा कर/ निकल नहीं सकोगे/ बार बार मुड़कर देखोगे/ और कोई न कोई चकाचौंध सूरज/ तुम्हें पीछा करता जान पड़ेगा...)
--''सामने, आस-पास,पीछे'' शीर्षक कविता से साही.
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( तस्वीर कुमार अव्यय के कैमरे से )

25 comments:

Farhan Khan said...

wah bahut hee achaa likhaa hai!

डेज़ ऑफ़ बीइंग वाइल्ड ye mujhe bahut achee lagee aur dil ko chotee hai...

himanshu said...

bahoot khoob anurag bhaee.
kya bat hai, kya bat hai.
I am amazed.
wah....

Madhurima Maiti said...

Anurag, this was really nice .... each of your pieces that i have read till now have something unique... thanks for sharing.

Parag Mandle said...

बहुत सुंदर अनुराग भाई। सचमुच मीलों लम्बी ज़िन्दगी में बस कुछ मोड़ ऐसे होते हैं जो अपनी अर्थवत्ता के कारण पूरे जीवन की अर्थहीन दौड़ को सार्थक कर देते हैं। उन पलों को जीने से बेहतर कुछ और हो नहीं सकता। शब्द बहुत कम कह पाते हैं और बहुत ज्यादा कहने में असमर्थ होते हैं। फिर भी एक इशारा तो करते ही हैं उसका। वह नहीं उसकी तस्वीर ही सही। लेकिन यह तस्वीर भी बहुत सुंदर और आकर्षक बन पड़ी है। बधाई और धन्यवाद।

neelima sukhija arora said...

बहुत सुंदर लिखा है आपने, .........खासतौर पर ये एक मिनट तो गजब है


ख्वाहिश : सिर्फ़ एक मिनट के लिए यों ही रहो ...अगले एक मिनट तक सिर्फ़ वह और वह हैं...दीवार पर टंगी घड़ी में साठ सेकंड पूरे होने हैं, किसी दिन का कोई एक मिनट पूरा होना है, किसी एक वर्ष की नन्ही इकाई ...समय के ज्ञात इतिहास में वे दोनों इस एक मिनट में एक-दूसरे के लिए थे...

अपनी मौत से ठीक पहले लड़का क्या याद कर रहा है?...प्रेम, मैत्री, धोखे या चालाकियां?...उसके लिए बीच का जीवन छूटते स्टेशन हो गए हैं...वह एक मिनट सबसे ज़्यादा अर्थवान....और वही उसकी बची हुई साँसों को याद रह गया है..

मनीषा कुलश्रेष्ठ said...

अनुराग, नॉस्टेल्जिया संक्रामक होता है. देखो मेरे रोंगटे खड़े हैं और आँखों के प्युपिल डयलेट हो गए हैं...सिम्प्ली सुपर्ब.

Navneet gautam said...

बहुत खूब लिखा ........ कभी सागर की गहराई भी शब्दों की गहराई के सामने कम ही दिखती है....... आपके शब्दों में वो गहराई है ...... "days of bieng wild" में शब्दों कि गहराई और लेखक कि सोच कि ऊंचाई बखूबी दिखाई दे रही है....... बहुत सुन्दर.......

Apni zami apana aasam said...

Jivaan main ye achanak aaye mod kabhi to ek khoobsurat ehsaas chhod jate hai jo ankhree sans tak mahkata rahta, lakin kabhi ye mod aapki zindagi ko itna uljha dete hai ki har mod par bhatakne ka dur or har sans main tees uthati hai.. Anyway
ख्वाहिश : सिर्फ़ एक मिनट के लिए यों ही रहो --

राजेश उत्‍साही said...

यह तो सचमुच का दृश्‍यांकन कर गए आप। बिलकुल मुग्‍ध कर देने वाला। खासकर एक मिनट की अवधारणा और समय की शिला।

सुशीला पुरी said...

गज़ब !!!!!

अरुण देव said...

Ek yuva ka akelapan bhut pidadayak hota hai.isko aadhar bnakar bhut kuch likha gya hai-mujhe Kafka yaad aate hain. anurag ji ne bhut sundar tukda likha hai.iska aur vistar hona chhiye.akelepn ki pida se aksr mahan rachnayen jnm leti hain.There will be hope.
mohak akelapn. bdahi.

sidheshwer said...

बहुत बढ़िया !

Prasanna said...

अद्भुत! अभी अभी पढा । क्या लिखूँ ? अभी तो उसी मेँ खोया हुआ हूँ ।

Dr Arvind said...

Anurag, nice ! both blog n content.

ssiddhant said...

अनुराग जी से "प्रेम की तरह" कुछ हो रहा है. गद्य को काव्यात्मक बनाना अनुराग को बखूबी आता है. ये जितना भी सुन्दर है, "बहुत" से तो ज़्यादा सुन्दर है.

poonam pandey said...

bahut accha...choti choti kahani vo asar ddalti hai jo 10-20 page ki kahani nahi dal pati.

शिरीष कुमार मौर्य said...

अनुराग मुझे लगा कि ये कुछ शानदार कविताएँ हैं....मेरी बधाई.

आवेश said...

हम इसे पढते हुए उस एक मिनट के हिस्सेदार हो जाते हैं जो एक मिनट अब भी वहीँ ठहरा हुआ है उसी दीवार पर ,औरत अब भी रोती है बाहें पकड़ ,वो आदमी अब भी खामोश है,अब तो बोल ,बोलता क्यूँ नहीं ?वो मिनट अब भी वहीँ ठहरा है |

shikha varshney said...

Superb..

Geet Chaturvedi said...

कुछ चीज़ें कितनी संक्रामक होती हैं,
जैसे युग, जैसे प्रेम, जैसे ईर्ष्‍या, जैसे अवसाद, जैसे भय, जैसे धुन, जैसे वांग कार-वाई...
जैसे एक क्लिक से मेल पहुंचता है, वैसे एक उसांस से आस भी.
बहुत सुंदर लिखा है. यादगली की हरी घास का रंग है.

प्रदीप जिलवाने said...

स्‍मृतियों से चुरा कर या कहें बचा-बचा कर रखे गए हैं शब्‍द.... शब्‍दों में दूर-दूर तक एक खुशबू है, और खुशबू जानी पहचानी लगती है !!!!

spardha said...

shabdheen hun main!

prashant kumar said...

Anurag...

bahut khoob...

kya kahoon isse...
apne man ki syahi se dil ke panno par likhe gaye kuchh alfaaz???

zindagi ke athah samumder se chune gaye kuchh seep aur beshkeemti moti???

duniya ke kolahal se bhachakar...dil ki saaj par gaye gaye kuchh komal geet jo daayri ke panno me sambhal kar rakh chhore the aapne???

khair....jo bhi hai...bahut sunder hai...pyara hai aur saral hokar bhi beboojh hai :)

keep writing...
god bless you :) :) :)

Anonymous said...

Wang Kar Wai used camera to paint them on celluloid and you??? Wondering if it is feelings or words!!??? Sublime!!!!

Sonali

Anonymous said...

Aur padhne ka mann hua..... likhte rahiye