Monday, August 30, 2010

सिद्धान्त मोहन तिवारी की कविताएं



{ कविता में तीक्ष्ण-बुद्धि कैसे लिजलिजी भावुकता को फटकार लगाती है, सिद्धान्त ने इसका पता अपनी इन शुरूआती कविताओं में ही दे दिया है. जो भाव और बुद्धि की कॉकटेल से कविता संभव करने को निर्णायक मान बैठे हैं, उनके लिए ये कविताएं दिक्कत पेश करेंगी. उन्हें अपने मन से इन कविताओं के मर्म को कहीं कुछ पंक्तियों में पाने की दुर्बल इच्छा भी निकाल देनी चाहिए. यह असल में स्फीति को एक काव्य-गुण के रूप में प्रतिष्ठित करनेवाली कविताएं हैं. सिद्धान्त की कविताओं का किसी भी माध्यम में प्रकाशन का यह प्रथम अवसर है. }


मेरा "मैं" होना

मैं यहीं हूँ
अपने पूरे वजूद में अपने शरीर और अपनी बुद्धि के साथ.
लेकिन मेरा "मैं" होना कम ज़रूरी है,
क्योंकि मैं हमेशा से सिर्फ़ "मैं" नहीं रहना चाहता हूँ.

मैं अभी बिरजू हूँ,राधा का बेटा बिरजू,
रामू को अपना भाई कहने से डरता हूँ
क्योंकि वो घबरालू है.
मैं, लाला के खून का प्यासा.

मैं लगान का भुवन नहीं हूँ
क्योंकि भुवन जल्द समझौते कर लेता है
और उन्हें लड़ाई का नाम देता है.

मैं मंगल पांडे हूँ,
क्योंकि छाती पर गोली ठोंकने का माद्दा रखता हूँ बे.

कभी कभी दिल्ली विश्वविद्यालय का दलजीत यानि डी.जे.
होने की सोचता हूँ
लेकिन वो प्रोवोग के कपड़े पहन
क्रांतिकारी सोच कैसे रख सकता है.

मैं केसू फिरंगी या लंगडा त्यागी भी हूँ.
लेकिन ओमकारा शुक्ला तो कतई नहीं,
जिसका प्रेम खोखला है.

मैं फैशन की कंगना रनौत हूँ.

मैं तीन मूर्खों में से कोई भी एक नहीं हूँ.
मैं वो खड़ूस प्रोफ़ेसर शायद हो सकता हूँ.

मैं महिला हॉकी टीम का कबीर खान हूँ.
और शायद नहीं भी हूँ.

अरे हाँ, मैं देव हूँ,
कोलकाता वाला नहीं
दिल्ली या पंजाब वाला देव.

मैं राजपूताना का रनसा हूँ
या बन्ना हूँ.

फिलहाल मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूँ,
जो मैं नहीं होना चाहता हूँ.
****

जैव विकास

तुम एक अजीब से विकास का अंग हो,
जहां तुम्हारे ईष्ट तुम्हारे ही रूप में पाए जाते हैं.

कम से कम मैं तो नहीं ही जानता हूँ कि
त्रेता, द्वापद या सतयुग का समय विभाजन क्या है
और साथ ही मेरे पास कोई भी ऐसा अभिलेख नहीं है
जिससे पता चलता हो कि
क्या राम, लक्ष्मण, विष्णु और शिव लगते होंगे
आज के ही आदमियों के माफ़िक.
या उनके भी कूबड़ उभरे, जबड़े आगे और कपाल गुहिका का आयतन कम होगा
हमारे पूर्वजों की ही तरह.

क्या ये तुम ठीक ठीक बता सकते हो कि
हमारे हज़ारों वर्ष आगे की पीढ़ी
अपने देवताओं को रोबोट की शक्ल में नहीं ढालेगी.

हम पूजते हैं देवों को
होमो सैपियन्स मानकर
तो क्या वो अपने सही-सही समय में
होमो हैबिलिस याक्रो मैग्नान नहीं रहे होंगे.

मुझे तो इस पर भी शक़ है
कि क्या वे इतने आभूषणों के धारक रहे होंगे
या क्या वे पकाया भोजन करते होंगे
क्या वे सभ्यताओं में सम्मिलित रहे होंगे,
क्या वे कपड़े पूरे पहनते होंगे
क्या वे अपने महल/ गुफा की दीवारों पर चित्र नहीं बनाते होंगे,
क्या वे रहे होंगे.

मैं क्षमा मांगता हूँ
उन सभी से जो तुलसी, वाल्मीकि या वेदव्यास को
बहुत विशिष्ट रचनाकार मानते होंगे,
लेकिन मुझे इन पर भी संदेह है,
या इनकी ईमानदारी पर.

हमसे तो मुसलमान अच्छे
जो किसी मज़ार को ही अपना पैगम्बर मानते हैं.
उन झंझटों से दूर रहते हुए,
जहां ईश्वर को मानने को
सत्यापित कर पाना कठिन है.
****

पत्थर में लिपटा गुलाब

जुलाई का वो अजीब सा दिन,
जिसकी दोपहर को एक प्रेम का आगाज़ हुआ.
जब इज़हार-ए-मोहब्बत के लिए
उस छोटी जात के लड़के ने किसी ब्राह्मण लड़की को
भेजा था पत्थर में लिपटा वो गुलाबी कागज़.

कागज़ तो केवल प्रेम पत्रों के लिए ही बना था,
और वो पत्थर
नदी के किनारे पर पड़ा मिला था,
घिस कर सुन्दर और गोल हो चुका था.

उस लड़के और लड़की ने अपने प्रेम की नियति को पा लिया था,
जब एक बड़े जातीय संघर्ष के बाद दोनों की शादी हुई
और उन्होंने सम्भोग कर लिया.

लेकिन घर के कहीं किसी दरदराते कोने में
पड़ा था वो पत्थर
और साथ में थोड़ी दूर पर था
वो गुलाबी कागज़,
दरअसल, प्रेम पनपा इनके बीच
जिस दिन से दिया गया इन्हें एक प्रक्षेप्य का रूप
उसी दिन से पत्थर व्याकुल हो उठा था,
उसकी गुलाबी भी उसे रिझाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी.

बिना किसी सामाजिक सरोकार के,
किसी आदर्श प्रेम कहानी की तर्ज़ पर
वे दोनों साथ ही अपनी नश्वरता को
जीने के वायदे कर रहे थे.

किसी दिन खँडहर हो चुके घर में,
करीब २०० साल बाद
पत्थर ने ज़ाहिर किया कि
थोड़ा प्यार करोगी.

उसकी गुलाबी ने ज़रा भी देर नहीं की
उस २०० सालों के फासले को घटाया पत्थर ने
और जा बैठा गुलाबी के कटि-प्रदेश पर
काफ़ी कोशिशों के बाद
कोई भी
कैसी भी
उत्तेजना शांत नहीं हुई.
तो गुलाबी की तरफ़ से हुई पहल
बोली - हमें अपने रिश्ते की शुरुआत में जाना चाहिए.

एक बार फिर से
उस गुलाबी कागज़ नें भर लिया पत्थर को
अपने भीतर
चपका लिया अपने उभारों से शायद
और फ़िर से दोनों ने रूप अख्तियार किया
प्रेम प्रक्षेप्य का
और चले गये दरदरा चुके कोनों के और भीतर
जहां शायद वो सफल रहे होंगे
अपनी नश्वरता को जी पाने में.
****

स्कूटी पर लड़की

तुम या तो पेट्रोल या बिजली से चलने वाली
दुपहिया चलाती हो, ज्यादातर लाल और गुलाबी रंग का.
सारे बाल और आँखों के नीचे का चेहरा
एक दुपट्टे से ढका रहता है,
और वो दुपट्टा अधिकतर कॉटन का ही पाया जाता है,
शायद कई बार वो बाकी कपडों से मेल नहीं खाता है.
कई बार लाल.

इसके बाद भी तुम्हारा कलेजा नहीं पसीजता है,
तुम अपनी केहुनी तक दस्ताने चढ़ा लेती हो,
क्रीम या सफ़ेद रंग का.
ठीक विपरीत रंग का चश्मा (भूरा या काला) आँखों पर रहता है.

हम सभी ये चाहते हैं कि
हम देख सकें अपने मनपसंद हिस्सों को,
पर यार तुम कपडे भी ठीक से क्यों पहनती हो?

हमें बहुत मज़ा आता है जब तुम जींस और टॉप पहनती हो,
कोशिश ये रहती है कि तुमसे ये कह दें
कि कोशिश करो थोडा और टाइट टॉप पहनने की.

ये सब तभी हो सकता है जब तुम किसी गली के नुक्कड़ पर
स्कूटी पर चढ़े हुए और सामने देखते हुए
और मेरी तरफ नहीं देखते हुए
उस गली में से निकलने वाली अपने ही जैसी
अपनी दोस्त का इंतज़ार कर रही हो,
यानी जब तुम स्कूटी तेज़ नहीं चला रही होती हो.

उस समय हम अपने पहनावे के बारे में
शायद ही सोचते हैं.
हाँ, घर पहुँच कर कभी-कभार
शीशे में ज़रूर देखते हैं.

शरीर ज़रूर चाहता है कि
तुम्हारे शरीर के कपड़े कुछ कम होने चाहिए थे
लेकिन मन कपड़ों की आंखमिचौली में
इसलिए खुश रहता है क्योंकि
मन अपने मन ही मन में शरीर की ज़रूरतों को
अजीब से रोमांच के साथ पूरा करता रहता है.

ओफ़! तुम्हारा रिक्शे वाला संस्करण इतना रोमांचकारी नहीं होता है
शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि रिक्शे पर
जींस टी-शर्ट कम पाया जाता है
वहाँ पर सलवार-सूट होता है
और उसे ढकने के लिए बड़ी चुन्नी.
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Monday, August 23, 2010

प्रेम पर कुछ छोटी कविताएं : पंकज राग


{ पंकज राग की इन ताज़ा कविताओं में अनुभूतियों का विपर्यय है. यह विपर्यय सिर्फ़ प्रेम के परिचित कथोपकथन से दूरी बरत कर प्राप्त
नहीं किया जा सकता. इसके लिए ठंडी वस्तुपरकता और मितकथन दरकार है, क्योंकि इन घटकों से मिलकर ही कविता गैररूमानी अभिधात्मक प्रतिफलन से आगे जाने का सामर्थ्य पाती है. कविताओं के साथ दी गई तस्वीर हेनरी मतीस की है. }


(एक)
प्यार को सूफ़ियाना मत बनाओ
प्रेम यूं भी एक अतिशयोक्ति है
बेहद की कल्पना कर रहे मेरे सज्जादानशीनों
वहाँ भी मिलेंगी चारदीवारियाँ - वहाँ भी खुलेगा मन्नतों का नया सिलसिला
तुम्हारे पाले हुए दरगाहों की तरह

(दो)
यूं वह खाली मैदान था जहाँ हम और तुम बैठे थे
और घास गीली भी नहीं थी
फिर भी हम बेचैन हो कर थोड़ी ही देर में उठ खड़े हुए
प्यार एक बाज़ी की शकल लेने लगा था
और हम दोनों पहले से ही परास्त थे

(तीन)
मुझे किताबों में सूखे हुए फूल कभी नहीं मिले
एक कम पढ़ी लिखी अनुभूति की तरह मैंने प्यार को हमेशा सरपरस्त किया
उसकी तरक्की पर अपनी पीठ भी थपथपाई
और उसे दिखाने के लिए कुछ और किताबें खरीद लाया
मैं सुबह सवेरे बगीचे में टहलने नहीं गया
न ही शाम में बाल्कनी पर खड़े हो कर आकाश की रंगीन रेखाएँ देखीं
मैंने अपनी दिनचर्या कायम रखी
और उसके अतिक्रमण की एक-एक कोशिश नाकाम की

इस तरह बड़े सलीके से
एक अदबी तरीके से
मैंने भी प्यार किया

(चार)

मैंने कहा मुझे सीधी रेखा अच्छी लगती है
उसने कहा मैं इस रेखा के दोनों ओर
परछाइयाँ बनाना चाहती हूँ

मैंने कहा कि साफ़-साफ़ देखना अच्छा होता है
उसने अंतर्मन का हवाला दिया और बोलने लगी
कि उसे ऐसी आवाज़े सुनाई देती है जिन्हें
वह पहचानती नहीं

मेरे हाथ में बँधी-बँधाई एक किताब थी
उसके हाथों में उलझती बिखरती छायाओं की एक तस्वीर
शायद मुझे किसी खास रंगत का पूर्वाग्रह था
शायद उसे धुँधले की आदत पड़ चुकी थी
मैं शायद चल रहा था
और वह शायद कुहनियों के बल लेटी थी

हम फिर भी प्रेम कर सकते थे
पर किया नहीं

(पाँच)
कमबख्त यह भी एक उम्र है
जब रोशनी की हर पगडंडी
झीने कपड़ों में लिपटी हुई सी लगने लगे
धूप छाँव से बढ़ कर लगे हल्की धूपों का यह खेल
उसके बारे में सोच-सोच कर ही थक जाए आदमी
झीने कपड़ों की सरसराहट कानों को चिढ़ाए
पर हाथ उठने से इंकार कर दें
अब इस उम्र में तुम भी तो हल्की सी ही नज़र आओगी
कितनी भी रोशन हो तुम्हारी याद
अब तुम्हारे साथ भी खेल फीका ही रहता है
फिर भी खेलते हैं कभी-कभी
बराबरी पर तो नहीं छूटते हम दोनों
पर न कोई जीतता है न ही कोई हारता है

उम्र के इस पड़ाव पर
ऐसे किसी खेल को भी
प्रेम ही कहते हैं
****

Thursday, August 19, 2010

निर्मल : साहित्य-शिक्षक के रूप में




हमें उन चीज़ों के बारे में लिखने से अपने को रोकना चाहिए, जो हमें बहुत उद्वेलित करती हैं, जैसे - बादलों में बहता हुआ चाँद, हवा की रात और हवा, अँधेरे में झूमते हुए पेड़, पहाड़ों पर चाँदनी का आलोक, स्वयं पहाड़ और उनकी निस्तब्धता- इन सबको अभिव्यक्त करना ज़रूरी नहीं है, न ही इन्हें नाम देने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि वे अपनी भावमुद्रा में बहुत रहस्यमय और 'इल्यूसिव' हैं. किंतु जब हम लिख रहे हों तब इन सब चीज़ों के 'इम्प्रेशन' हमारे भीतर मौजूद रहने चाहिए- एक तरह का ठोस आलोक-मंडल- जो चीज़ों की गहराई और पार्थिकता को बरकरार रखता है और उन्हें स्वतः शब्दों में बदल देता है.

हर छोटा लेखक मौलिक होने की चेष्टा करता है, जहां वह अपने पूर्ववर्ती लेखकों से अलग कुछ लिख सके ...किंतु जो सही अर्थों में 'मौलिक' होता है, वह हमेशा अपने प्रिय, महान लेखकों की नक़ल करना चाहता है- किंतु लिखने की घड़ी में - वे महान लेखक विनयशील, शालीन मित्रों की तरह उससे विदा ले लेते हैं और उसे अकेले कमरे में छोड़ देते हैं - जो उसका नरक है - और मौलिकता का उद्गम स्रोत भी.

हर कहानी किसी संकल्प के भीतर कलपती है, आधे से उठकर सम्पूर्ण की और जाती हुई; उसके कितने कटे-फटे हिस्से बाहर निकले रहते हैं, शीशे के कोनों की तरह, जिन्हें बाँधनेवाला फ्रेम वह ज़िन्दगी है, जिसे क़तर-ब्योंत करने पर ही 'कहानी' बनती है. हर कहानी में ज़िन्दगी के खून भरे हाथ चिपके रहते हैं, एक कहानी की उतरी हुई थिगलियाँ जो दूसरी कहानी के लिए पैबन्द का काम करती हैं.

जो आदमी कीचड़ से बचकर निकालना चाहता है, कविता उसके पास नहीं आती, क्योंकि कविता अपने भीतर के नाटक और दु:स्वप्नों से उत्पन्न होती है, उदासीनता से नहीं. उदासीनता मृत्यु है. एक दिन ऐसा आएगा कि हम अपने को बचाते-बचाते अचानक देखेंगे कि बचाने की कोशिश में सब कुछ गँवा दिया है. यह ज़िन्दगी का हमारे लिखने से सही प्रतिशोध होगा- न कम न ज़्यादा. सही.

ऐसे मौके आते हैं, जब प्रकृति हमसे भाषा छीन लेती है, तब शायद असली मौन उत्पन्न होता है- वह मौन नहीं जो हमारे बाहर है, बल्कि जो हमें जन्म से मिला है, हमारे भीतर, जो बहुत बाद के वर्षों में- अगर हम सौभाग्यवान हुए- हम अपनी कविता, संगीत, कहानी के भीतर पुनः उगता हुआ देखते हैं, और अपने दुर्भाग्य के दिनों में खो देते हैं.

यदि कोई मुझसे पूछे कि मैं लिखने से क्या कहना चाह रहा हूँ तो मैं कहूँगा, कि मैं अपनी निजी, प्राइवेट अनुभूति को एक ऐसे चरम बिंदु तक खींच ले जाना चाहता हूँ, जहां वह 'सार्वजनिक कर्म' बने बिना भी, दुनिया की सतह पर एक प्रेत-छाया की तरह प्रकट होती रहे, कुछ-कुछ उन दिवास्वप्नों-सी, जिन्हें लोग सड़क पार करते हुए, बस की प्रतीक्षा करते हुए या सिर्फ़ अकेले में बैठे हुए देखते रहते हैं...
****

(
निर्मल जी की डायरी '' धुंध से उठती धुन'' से यह तीसरा चयन है. चयन का शीर्षक उनके नबोकोव पर लिखे निबंध से प्रेरित है. तस्वीर: गगन गिल के सौजन्य से. )

Saturday, August 07, 2010

बही-खाता : १० : हृषीकेश सुलभ



{ इस स्तंभ का उद्देश्य कथा लेखकों का सहचर होना रहा है और इस बार हिंदी के वरिष्ठ कथाकार, नाटककार और नाट्य-समीक्षक हृषीकेश सुलभ हमें अपनी उस रचना-भूमि की यात्रा पर साथ लिए चल रहे हैं, जिसकी उदास लेकिन उर्वर मिट्टी ने उन्हें गढ़ा है. सुलभजी को उनकी कथा-कृति 'वसंत के हत्यारे' के लिए हाल ही में कथा-यूके सम्मान प्रदान किया गया है. सबद पर उनका लेखन पहले भी रंगायन शीर्षक स्तंभ में प्रकाशित होता रहा है. यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा. } 


प्रेम की दुर्गमता मुझे आकर्षित करती है

दादी और अम्मा जब तक जीवित रहीं एक घटना का ज़िक्र करती रहीं। बचपन से सुनते-सुनते मैंने इस घटना को लेकर मन ही मन कुछ दृश्य रचे और वे दृश्य लगातार उभरते रहते हैं। सन् 1942 की अगस्त क्रांति के तत्काल बाद का समय। इस अफ़रा-तफ़री भरे समय में मेरी बहन का जन्म हुआ। गर्भवती अम्मा जैसे-तैसे एक सम्बन्धी के घर पटना पहुँच गई थीं। पिता अपनी धुन में थे, आज़ादी की धुन में। यह संयोग ही था कि पिता पटना में मिल गए। बहन के जन्म के सप्ताह भर बाद वे नवजात शिशु और सद्यःप्रसूता पत्नी को साथ लेकर जैसे-तैसे सीवान, जो अब मेरा गृह जनपद है, पहुँचे। पत्नी और नवजात बेटी को एक बैलगाड़ी पर बिठाया। गाड़ीवान को पता बताया और फ़रार हो गए।

दिन भर की यात्रा के बाद जब बैलगाड़ी गाँव पहुँची, मेरी विधवा दादी दरवाज़े पर खड़ी थीं और पुलिस घर की तलाशी ले रही थी, पिता के बारे में पूछताछ कर रही थी। पिता आज़ादी मिलने तक फरार रहे। और सालों बाद फिर बेटी को देखा। आज़ादी का संघर्ष और इसराज (अब दुर्लभ हो चला एक वाद्य यंत्र) बजाना, यही दो काम करते रहे। सन् 1947 के बाद होमियोपैथ चिकित्सक बने। किसानी और गाँव-गाँव घूमकर मुफ़्त चिकित्सा का सिलसिला सन् 1968 के आरम्भ तक चलता रहा। और एक दिन मुझे लेकर पटना आ गए। वे मुझे बेहतर शिक्षा देना चाहते थे। गाँव छूटा। न सही पूरी तरह, पर पिता-पुत्र दोनों उखड़ तो गए ही थे अपनी माटी से। वे विस्थापन की पीड़ा झेलते हुए मरे और मैं अपनी छाती में विस्थापन का हाहाकार सँजोए हुए जी रहा हूँ। यह विस्थापन का हाहाकार ही मेरी रचनात्मकता का उत्स है।

मेरे गाँव में एक नीलही कोठी हुआ करती थी। नील का व्यापार करनेवाले प्रभुओं की कोठी का भग्नावषेष। नाफ़रमानी के अपराध में असमय काल का ग्रास बननेवालों और प्रभुओं की वासना की लपटों में धू-धू जलनेवाली स्त्रियों की आत्माओं के वास के लिए यह कोठी कुख्यात थी। मेरे बचपन और किशोर उम्र के गहन, उदास और निर्भय एकांत की कई दोपहरें इसी कोठी में बीती हैं। मैंने इस कोठी की काई लगी दीवारों पर ढ़ेरों आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींची है। गर्मी की निचाट दोपहरी में नीलही कोठी मेरी शरण्यस्थली रही है। यह कोठी मेरी आरम्भिक पाठशाला रही है। इसके एकांत की निविड़ता में छिपे भय, आतंक, बर्बरता और आर्तनादों को मैंने छोटी-सी उम्र में अपने लिए आविष्कृत किया था। मेरी जिज्ञासाओं के उत्तर में पिता पूर्वजों के अपमान की जो अनगिन कथाएँ सुनाते, मैं उन्हें नीलही कोठी के भीतर जाकर अपने लिए फिर-फिर रचता।

उस समय मेरे लिए यह समझ पाना कठिन था कि मेरे भीतर क्या घट रहा है, पर आज लगता है कि दुःख, बेचैनी और अवसाद की जो गठरी मैंने उन दिनों बाँधी, उसे ही अपनी पीठ पर लिए भटक रहा हूँ। आज नीलही कोठी का नाम-ओ-निशान मिट चुका है। उसकी ईंटें लोगों की मोरियों में लग गईं। नई पीढ़ी को मालूम भी नहीं कि कभी यहाँ कोई नीलही कोठी हुआ करती थी। पर यह कोठी मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह मेरा पीछा कर रही है।


मैंने बहुत कम कहानियाँ लिखी हैं। मेरे लिए लिखना मरणांतक पीड़ा से गुज़रने की तरह है। जैसे कोई हलक में हाथ डालकर कलेजा निकाल ले। पर यह मेरे जीने की आवष्यक शर्त है। मैं एक कहानी को महीनों ही नहीं, सालों-साल मन ही मन लिखता रहता हूँ। मेरे लिए कहानी में प्रवेश के रास्ते अनंत हैं। कभी कोई पात्र,.....कभी कोई घटना या स्थिति,......कभी कोई विचार.....तो कभी कुछ भी।

अपनी हर कहानी को आरम्भ करते हुए मैं थरथर काँपता हूँ। किसी स्कूली बच्चे की तरह न लिखने के अनगिन बहाने बनाता हूँ। कभी उदास चुप्पी तानकर घंटों सोता, तो कभी प्रसन्न होकर पैदल अपने शहर की सड़कें नापता हूँ। मैं नहीं जानता कि जर्मन कवि राइनेर मारिया रिल्के की सलाहों को युवा कवि काप्पुस ने कितना स्वीकार किया था! पर मैं उसकी सलाह पर बार-बार अपने खोल में बंद होता हूँ और अंडे से बाहर निकलते पंछी की तरह आँखें मिच-मिचाकर इस जगत को निहारता हूँ, और अपने से हर क्षण सवाल करता हूँ कि ‘मैं जो लिखने जा रहा हूँ, क्या उसे लिखे बिना मैं चैन से जी सकता हूँ?’ अगर हाँ, तो लिखने से मुक्ति मिल जाती है। फिर आवारगी और यायावरी।

रिल्के की तरह मुझे भी सबसे दुर्गम प्रेम लगता है और इसकी दुर्गमता मुझे आकर्षित करती है। सचमुच हमने प्रेम की विराटता को, प्रेम के विस्तार को संकुचित किया है और प्रेम को पाने की उत्कंठा और खो देने की निराशा दोनों को रूढ़ियों से भर दिया है। मैं इन रूढ़ियों से मुक्ति के लिए न जाने कबसे सिर पटक रहा हूँ। हर बार जीवन नई छवियों के साथ प्रकट हो जाता है। मैं जो सच ढूँढ़कर लाता हूँ, अगले ही क्षण उसकी आभा बदल जाती है। कभी कोई कोना दीप्त हो उठता है, तो कभी कोई कोना अँधेरे से आच्छादित हो जाता है। रेतकणों को मुटठी में भर लेने या पलकों से ओसकणों को चुनने की तरह है प्रेम को जान लेना और इसे अपने भीतर बचाए रखना। मैं इसे हर हाल में बचाए रखना चाहता हूँ।

युद्ध, हिंसा, घृणा यानी गहन संकट-काल में प्रेम ही है, जो जीवन के काम आता है,...मनुष्य के काम आता है,...चर-अचर सबके काम आता है। यह हमें क्षण भर में संवत्सरों के पार ले जा सकता है। यह हमें हमारी नैसर्गिक विराटता सौंपता है। यह हमें पछोरकर अंधसंशय, अहं और संकीर्णता से मुक्त करता है। अपनी कहानियों में प्रेम के दुर्गम गह्वरों में उतरना और प्रेम के दुर्गम राहों पर भटकना मेरी साध रही है। मैं नहीं जानता कि यह हो पाया है या नहीं, पर अपनी रचनाओं में प्रेम की सनातन आवृत्ति की अनुगूँज रचना चाहता हूँ। अपनी रचनाओं के मुखर बहिरंग के अंतरंग में निर्व्याज और निष्कलुष प्रेम की संवेदनाओं का झिरझिर प्रवाह मेरा अभीष्ट रहा है।

कथा-लेखन के साथ-साथ नाट्यालेखन और रंगकर्म मेरी रचनात्मक सक्रियता का अविभाज्य हिस्सा रहे हैं। कहानी और नाटक के बीच आवाजाही चलती रहती है। आवाजाही के इस कौतुक में मुझे बहुत मज़ा आता है। इस आवाजाही का कई बार मैं रचनात्मक मौन के रूप में उपयोग करता हूँ। रंगकर्म एक सामूहिक कला है।.....कई कलाओं का सम्मुचय है रंगमंच। इसने मुझे कला की दूसरी विधाओं से जोड़ा है और शुद्धतावाद के ख़तरों से परिचित कराया है। रंगमंच ने मुझे युवाओं के एक बड़े वर्ग से निरन्तरता में जुड़े रहने का अवसर दिया है। उनकी रचनात्मकता का नवाचार मुझे माँजता है और उनकी आभा के स्पर्श से मैं स्वयं को दीपित करने का प्रयास करता हूँ। मेरे गाँव का रंगमंच बहुत समृद्ध था। मैंने नौ साल की उम्र में ‘सत्य हरिश्चंद्र’ में रोहिताश्व की भूमिका से अपनी रंगयात्रा आरम्भ की थी।

कुमार
गंधर्व के गाये निर्गुन मेरे एकांत के साथी हैं और गहन संकट काल में हज़ार-हज़ार स्त्रियों के कंठ से फूटे असंख्य लोकगीतों की पंक्तियाँ-ध्वनियाँ मेरे मन-प्राण को सहारा देती हैं और प्रसन्नता के क्षणों में मेरी आत्मा को उल्लास का मदवा पिलाती हैं। मेरे लोक का विस्तार होता है। मेरा लोक अँग्रेज़ी के फ़ोक से अलग है। लोक की अदम्य जिजीविषा मुझे अनुप्राणित करती है। मेरा लोक मुझे पवित्र करता है। यही बजाता है अभय की तुरही मेरे भीतर। लोक की धवलता मुझे रंजित करती है। इस लोक में विन्यस्त हैं - धूल-धक्कड़ भरी आँधियाँ, दहला देनेवाले आर्त्तनाद, टीसनेवाले करुण विलाप, चंदनलेप जैसी शीतलता वाला नेह-छोह, लहराती हुई हज़ारों जामुनी भुजाओं का विश्वास, सोहर के पद, फगुआ और पूरबी के बोल आदि।
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Tuesday, August 03, 2010

दृश्यांकन




 चुंगकिंग एक्सप्रेस

लड़का २५ की उम्र में एक बदहवास रात अपनी उन दोस्तों को फोन करता है जिनके साथ उसने प्राथमिक कक्षाएं पढ़ी थीं और अब जिनसे बरसों बरस बात तक नहीं हो पाती... अभी उनमें से अधिकतर पति के लिए डिनर बना रही हैं, कुछ बच्चों को सुला रही हैं, कुछेक गहरी नींद में हैं और कुछ कहीं और किसी की हो रही हैं...वह सबको अपनी याद दिलाता है...प्रायः सबने अपनी यादाश्त पर जोर डालकर उसे एक खलल की तरह ही दर्ज किया है...अगली सुबह वह तेज़ दौड़ लगा रहा है...स्ट्रेस बस्टर : ख़ुद को इतना थका दो कि न दिमाग़ और न तुम्हारी देह ही किसी की याद में कहीं भटक सके...

रिकॉर्ड से ''कैलिफोर्निया ड्रीमिंग'' की धुन उठ रही है...यह उसके लिए सांत्वना का संगीत है...वह इसे उस लड़की की पसंद का संगीत भर नहीं मानता जो उसके पीछे उसका ख़याल रख रही है...
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डेज़ ऑफ़ बीइंग वाइल्ड

लड़के
ने जब उसे पहली बार देखा तो उसका हाथ पकड़ उसे दीवार से टिका दिया...और ख्वाहिश : सिर्फ़ एक मिनट के लिए यों ही रहो ...अगले एक मिनट तक सिर्फ़ वह और वह हैं...दीवार पर टंगी घड़ी में साठ सेकंड पूरे होने हैं, किसी दिन का कोई एक मिनट पूरा होना है, किसी एक वर्ष की नन्ही इकाई ...समय के ज्ञात इतिहास में वे दोनों इस एक मिनट में एक-दूसरे के लिए थे...लड़की की हैरत अपने तरह की थी और लड़के की अपने तरह की...

बहुत बाद में एक चलती ट्रेन में भोर की उजास में, जब बहुत सारा जीवन शुरू हो रहा है, अपनी मौत से ठीक पहले लड़का क्या याद कर रहा है?...प्रेम, मैत्री, धोखे या चालाकियां?...उसके लिए बीच का जीवन छूटते स्टेशन हो गए हैं...वह एक मिनट सबसे ज़्यादा अर्थवान....और वही उसकी बची हुई साँसों को याद रह गया है...सुन्दर इस संसार से चंद लम्हों में यह छोटा वक्फा भी उसके साथ बिला जाएगा...दामने ख़याले यार जीतेजी कहां छूटता है?...

****

इन द मूड फॉर लव

औरत की तकलीफ़ अलग है...वह लैम्पपोस्ट के नीचे भीगते खड़े उदास और चुप्पा आदमी की बांह पकड़ कर रोने लगती है...इस बार कहती कुछ नहीं...बारिश उसकी स्वरलिपि है...

आदमी को रोना ही नहीं आता...अभागा...वह अपनी तकलीफ़ किसी से नहीं कह पाता...उन दोनों का पड़ोस अब अलग है...आदमी के पड़ोस में एक पेड़ है और पेड़ में एक खोह...आदमी पेड़ से लगकर उस खोह में अपना दिल रख आता है...लौटते हुए दुःख उसके चेहरे पर एक उदास गरिमा में झलफला रहा है...ठूँठ जैसी खोह हरे पत्ते जन रही है...
****

@...

इसी मेज़ से लगकर चिट्ठियां लिखी गई थीं उसे
अनगिनत 
वे @ के पहले उसका उल्टा नाम और पीछे 
जीमेल जोड़ देने भर से उस तक पहुंच जाती थीं.

बैठना यहाँ अब भी होता है
मज़मून लिखे और रद्द भी किये जाते हैं
लेकिन कोई चिट्ठी उस तक नहीं पहुँचती

चिट्ठियां अपना पता अब खुद हैं जिनमें
याद को लिखा जाता है, लिखे हुए से याद किया जाता है.
****

चट्टान रह रह कर धुल जाती है

समय
की शिला पर क्या सब धुल जाता है? क्या वह स्पर्श भी? पत्थरों को कुछ याद नहीं रहता?

( एक काली चट्टान है/ जिस पर बेतहाशा धारा/ अपना सर पटकती है/ लेकिन हिला नहीं पाती/ सिर्फ़ चट्टान रह रह कर/ धुल जाती है / और उसके भीगे कलेवर से/ हज़ार सूरज चमकते हैं/ तुम उससे कतरा कर/ निकल नहीं सकोगे/ बार बार मुड़कर देखोगे/ और कोई न कोई चकाचौंध सूरज/ तुम्हें पीछा करता जान पड़ेगा...)
--''सामने, आस-पास,पीछे'' शीर्षक कविता से साही.
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( तस्वीर कुमार अव्यय के कैमरे से )