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Showing posts from August, 2010

सिद्धान्त मोहन तिवारी की कविताएं

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{ कविता में तीक्ष्ण-बुद्धि कैसे लिजलिजी भावुकता को फटकार लगाती है, सिद्धान्त ने इसका पता अपनी इन शुरूआती कविताओं में ही दे दिया है. जो भाव और बुद्धि की कॉकटेल से कविता संभव करने को निर्णायक मान बैठे हैं, उनके लिए ये कविताएं दिक्कत पेश करेंगी. उन्हें अपने मन से इन कविताओं के मर्म को कहीं कुछ पंक्तियों में पाने की दुर्बल इच्छा भी निकाल देनी चाहिए. यह असल में स्फीति को एक काव्य-गुण के रूप में प्रतिष्ठित करनेवाली कविताएं हैं. सिद्धान्त की कविताओं का किसी भी माध्यम में प्रकाशन का यह प्रथम अवसर है. }


मेरा "मैं" होना

मैं यहीं हूँ
अपने पूरे वजूद में अपने शरीर और अपनी बुद्धि के साथ.
लेकिन मेरा "मैं" होना कम ज़रूरी है,
क्योंकि मैं हमेशा से सिर्फ़ "मैं" नहीं रहना चाहता हूँ.
मैं अभी बिरजू हूँ,राधा का बेटा बिरजू,
रामू को अपना भाई कहने से डरता हूँ
क्योंकि वो घबरालू है.
मैं, लाला के खून का प्यासा.

मैं लगान का भुवन नहीं हूँ
क्योंकि भुवन जल्द समझौते कर लेता है
और उन्हें लड़ाई का नाम देता है.

मैं मंगल पांडे हूँ,
क्योंकि छाती पर गोली ठोंकने का माद्दा रखता हूँ बे.
कभी कभी दिल्ली विश्वविद्य…

प्रेम पर कुछ छोटी कविताएं : पंकज राग

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{ पंकज राग की इन ताज़ा कविताओं में अनुभूतियों का विपर्यय है. यह विपर्यय सिर्फ़ प्रेम के परिचित कथोपकथन से दूरी बरत कर प्राप्त नहीं किया जा सकता. इसके लिए ठंडी वस्तुपरकता और मितकथन दरकार है, क्योंकि इन घटकों से मिलकर ही कविता गैररूमानी अभिधात्मक प्रतिफलन से आगे जाने का सामर्थ्य पाती है. कविताओं के साथ दीगई तस्वीर हेनरी मतीस की है. }

(एक)
प्यार को सूफ़ियाना मत बनाओ
प्रेम यूं भी एक अतिशयोक्ति है
बेहद की कल्पना कर रहे मेरे सज्जादानशीनों
वहाँ भी मिलेंगी चारदीवारियाँ - वहाँ भी खुलेगा मन्नतों का नया सिलसिला
तुम्हारे पाले हुए दरगाहों की तरह

(दो)
यूं वह खाली मैदान था जहाँ हम और तुम बैठे थे
और घास गीली भी नहीं थी
फिर भी हम बेचैन हो कर थोड़ी ही देर में उठखड़े हुए
प्यार एक बाज़ी की शकल लेने लगा था
और हम दोनों पहले से ही परास्त थे

(तीन)
मुझे किताबों में सूखे हुए फूल कभी नहीं मिले
एक कमपढ़ी लिखी अनुभूति की तरह मैंने प्यार को हमेशा सरपरस्त किया
उसकी तरक्की पर अपनी पीठ भी थपथपाई
और उसे दिखाने के लिए कुछ और किताबें खरीद लाया
मैं सुबह सवेरे बगीचे में टहलने नहीं गया
न ही शाम में बाल्कनी पर खड़े हो कर आकाश की रंगीन रेखाएँ …

निर्मल : साहित्य-शिक्षक के रूप में

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हमें उन चीज़ों के बारे में लिखने से अपने को रोकना चाहिए, जो हमें बहुत उद्वेलित करती हैं, जैसे - बादलों में बहता हुआ चाँद, हवा की रात और हवा, अँधेरे में झूमते हुए पेड़, पहाड़ों पर चाँदनी का आलोक, स्वयं पहाड़ और उनकी निस्तब्धता- इन सबको अभिव्यक्त करना ज़रूरी नहीं है, न ही इन्हें नाम देने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि वे अपनी भावमुद्रा में बहुत रहस्यमय और 'इल्यूसिव' हैं. किंतु जब हम लिख रहे हों तब इन सब चीज़ों के 'इम्प्रेशन' हमारे भीतर मौजूद रहने चाहिए- एक तरह का ठोस आलोक-मंडल- जो चीज़ों की गहराई और पार्थिकता को बरकरार रखता है और उन्हें स्वतः शब्दों में बदल देता है.

हर छोटा लेखक मौलिक होने की चेष्टा करता है, जहां वह अपने पूर्ववर्ती लेखकों से अलग कुछ लिख सके ...किंतु जो सही अर्थों में 'मौलिक' होता है, वह हमेशा अपने प्रिय, महान लेखकों की नक़ल करना चाहता है- किंतु लिखने की घड़ी में - वे महान लेखक विनयशील, शालीन मित्रों की तरह उससे विदा ले लेते हैं और उसे अकेले कमरे में छोड़ देते हैं - जो उसका नरक है - और मौलिकता का उद्गम स्रोत भी.

हर कहानी किसी संकल्प के भीतर कलपती है, …

बही-खाता : १० : हृषीकेश सुलभ

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{ इस स्तंभ का उद्देश्य कथा लेखकों का सहचर होना रहा है और इस बार हिंदी के वरिष्ठ कथाकार, नाटककार और नाट्य-समीक्षक हृषीकेश सुलभ हमें अपनी उस रचना-भूमि की यात्रा पर साथ लिए चल रहे हैं, जिसकी उदास लेकिन उर्वर मिट्टी ने उन्हें गढ़ा है. सुलभजी को उनकी कथा-कृति 'वसंत के हत्यारे' के लिए हाल ही में कथा-यूके सम्मान प्रदान किया गया है. सबद परउनका लेखन पहले भी रंगायन शीर्षक स्तंभ में प्रकाशित होता रहा है. यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा. } 


प्रेम की दुर्गमता मुझे आकर्षित करती है
दादी और अम्मा जब तक जीवित रहीं एक घटना का ज़िक्र करती रहीं। बचपन से सुनते-सुनते मैंने इस घटना को लेकर मन ही मन कुछ दृश्य रचे और वे दृश्य लगातार उभरते रहते हैं। सन् 1942 की अगस्त क्रांति के तत्काल बाद का समय। इस अफ़रा-तफ़री भरे समय में मेरी बहन का जन्म हुआ। गर्भवती अम्मा जैसे-तैसे एक सम्बन्धी के घर पटना पहुँच गई थीं। पिता अपनी धुन में थे, आज़ादी की धुन में। यह संयोग ही था कि पिता पटना में मिल गए। बहन के जन्म के सप्ताह भर बाद वे नवजात शिशु और सद्यःप्रसूता पत्नी को साथ लेकर जैसे-तैसे सीवान, जो अब मेरा गृह जनपद है, पहुँचे।…

दृश्यांकन

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चुंगकिंग एक्सप्रेस

लड़का २५ की उम्र में एक बदहवास रात अपनी उन दोस्तों को फोन करता है जिनके साथ उसने प्राथमिक कक्षाएं पढ़ी थीं और अब जिनसे बरसों बरस बात तक नहीं हो पाती... अभी उनमें से अधिकतर पति के लिए डिनर बना रही हैं, कुछ बच्चों को सुला रही हैं, कुछेक गहरी नींद में हैं और कुछ कहीं और किसी की हो रही हैं...वह सबको अपनी याद दिलाता है...प्रायः सबने अपनी यादाश्त पर जोर डालकर उसे एक खलल की तरह ही दर्ज किया है...अगली सुबह वह तेज़ दौड़ लगा रहा है...स्ट्रेस बस्टर : ख़ुद को इतना थका दो कि न दिमाग़ और न तुम्हारी देह ही किसी की याद में कहीं भटक सके...
रिकॉर्ड से ''कैलिफोर्निया ड्रीमिंग'' की धुन उठ रही है...यह उसके लिए सांत्वना का संगीत है...वह इसे उस लड़की की पसंद का संगीत भर नहीं मानता जो उसके पीछे उसका ख़याल रख रही है...
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डेज़ ऑफ़ बीइंग वाइल्ड

लड़के
ने जब उसे पहली बार देखा तो उसका हाथ पकड़ उसे दीवार से टिका दिया...और ख्वाहिश : सिर्फ़ एक मिनट के लिए यों ही रहो ...अगले एक मिनट तक सिर्फ़ वह और वह हैं...दीवार पर टंगी घड़ी में साठ सेकंड पूरे होने हैं, किसी दिन का कोई एक मिनट पूरा…