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सूरज की तीन नई कविताएं


( किस्से के मुताबिक एंगल्स के पास एक कवियश: प्रार्थी युवक पहुंचा और उसने वर्ग-संघर्ष का अपनी कविता में जिस सरलमति से अनुवाद कर डाला था उससे लगभग आश्वस्त था कि उस्ताद की तो दाद मिलेगी ही। एंगल्स ने अपनी बूढी आँखों से युवक की कविता लगाये रखने के कुछ लम्हे बाद बहुत चिंतित लहजे में कहना शुरू किया कि भई, तुम्हारी उम्र में तो युवक प्रेम करते हैं, और उनकी कविता को जीवन और विषय वही देता है, तुम यह क्या कर लाये! सूरज की कविताओं को पढ़कर यह लगता है कि उन्होंने यह किस्सा और इसमें निहित गूढ़ निर्देश को बहुत कायदे से गुना है। उनकी तीन नई कविताएं। )


परिमेय संख्याओं के जलसे में योगरूढ़ संख्या का अरण्यरोदन

यौगिक, सम, विषम
अपने लिये सब खतम

अपने गुणत्व से हरी, भाजक गुणों से लदी फदी
तमाम यौगिक, सम, विषम संख्यायें कर रही होती
दूसरी संख्याओं से प्रेम, उनकी चुहलबाजिया
मशहूर किस्से की तरह दुहराती हैं खुद को जैसे
बत्तीस लहरा रहा होता है दो, चार, आठ, सोलह
से चले अपने प्रेमिल किस्से
जैसे छत्तीस में शामिल तीन और छ: के सारे झगड़े
नहीं कर पाते उन्हें अलग, छत्तीस के आंकड़े का मुश्किल
मुहावरा भी।
तीन और छ: के मशहूर चुम्बन से उपजता तिरेसठ
जहाँ सात किसी डरे जानवर की तरह आता है,
वहीं,

ठीक वहीं
हम योगरूढ़ संख्यायें अपने ही असीम एकांत में सिमटी हैं
परिभाषा ने हमें किया पद-दलित तुम्हें दिया ठौर
हमें नवाजा खुद के ही भाज्य और खुद के ही भाजक
बन जाने के शाप से
संख्याओ की इतनी विशाल जनसंख्या में
कोई दूसरी संख्या नहीं कर सकती सम्पूर्ण हमें
चुभता है दसमलव प्रेम की हर अतृप्त और
दंडनीय आकांक्षा के सिरहाने
हंसता है क्रूर वह
मुझे टुकड़ों में बाँट
हम अभिशप्त हुए कुछ इस तरह
खुद में जीते खुद ही में शेष होते
खुद से ही विभाजित होंगे का यह
अभिशाप अकथनीय दु:ख है।
रहा एक-

एक ‘ईश्वर की तरह’ सबका है
और किसी का भी नहीं
‘दो’
छ: और आठ से मिल आती है
होली दीवाली की तरह पहाड़े में

मैं अकेला सात खुद का ही भाजक खुद से ही भाज्य
यह क्या जरूरी नहीं अधिकार मुझे
किसी संख्या से विभाजित होती जाऊँ
तब तक जब तक ना बचे कोई शेषफल

बचे सिर्फ शून्य,

पूर्ण विभाजित मैं उस स्त्री के असीम आनन्द को पाऊँ
जिसने जन्मा हो अभी अभी स्वस्थ बच्चा भागफल की तरह,
जिसे वो माँ चाहती हो निहारना अपलक; होते हुए अशेष
यह अपलक की निहार किसी शेषफल के होते सम्भव नहीं
किसी दशमलव की जरूरत नहीं

बार बार
हर बार
क्यों चला आता है दशमलव हमारे एकाग्र उत्सव को क्षत-विक्षत
करने; मजबूर किया हमें अपना ही अंश दशमलव के पार रखने पर
हर बार
बार बार

क्या तुम्हारी इंसानी आंखों में ऐसी
बूँद भी नहीं जो धुले मेरे खंडित जीवन
से दशमलव – जिसके पार पड़ा
मेरा लगभग आकाश
असीम इच्छाओं की खोह
****
जी मेल

ओ पृथ्वी,
तुम्हारे चैट लिस्ट में था मैं
सुनाम उपग्रह की तरह
तुम्हारी गति से अंजान

चलते हुये एक ही राह
आर पार गुजरते स्वप्न
जगे अधजगे सांसो के
बजते ढोल, नींद से बहुत
बाहर चलते हुए साथ टूटे पुल

पर
तब तक साथ जब तक दबा नहीं ‘डिलीट’ का मतलबी बटन।
****
सब दिन नया दिन

रौशनी अपने गुच्छे में लपेटती है
फूल की पंखुरियों सा ताजादम दिन
हो नमक धुली सुबह और बीती रात
तकरार हो/ वार हो पर बची रहे इतनी
समझदारी जितना बीज-पराग रह जाता है
जाते हुए एक फूल से दूसरे फूल तक

मन तृप्त हो भूख सिमट आये अंजुरियों में
रोटी का सच्चा रंग रहे मेरी आंखो में
गवाह की तरह, करते हुए कोई भी करार

एक दिन बस एक दिन नहीं होता
वर्षों के मकड़जाल का सुनहला धागा
किसी एक दिन ही मिलता है इंतजार का खोया
पाया रास्ता एक दिन ही अलविदा की डगर

वर्तमान के कोई एक दिन पड़ता है
नशे में चूर वर्षों वर्ष के निचाट पर
हथौड़े की तरह
****
6 comments:
कृष्णमोहन झा

सूरज का जैसा नाम है वैसा ही काम भी।बिल्कुल नई तरह की कविताएं।बहुत रिफ्रेशिंग! उनके बारे में भी कुछ जानकारी होनी चाहिये।बहरहाल……उनको बधाई और आपको शुक्रिया !


सूरज का कवि अद्भुत है, वह सांख्यिकी की स्थूल परिमेयता से सूक्ष्म अपरिमेय अर्थ खोज कर अपनी हथेली पर दिखा सकता है. प्रेम तो उनकी कविताओं में शिल्प के अवयव की तरह नहीं, कथ्य के मूल अनुनाद की तरह गुंजित है.
सूरज किसी विभ्रम से अवरुद्ध न हो जाय, इस आकांक्षा के साथ उन्हें बधाई.
अशोक गुप्ता


गणितीय जटिलताओं का जीवन। सुन्दर।


सूरज की कविताएं अच्‍छी लगी..


तीनों ही कविताओं अभिव्यक्ति उम्दा है, बधाई सूरज।


सूरज को हमारी शुभ कामनाएँ ,सुन्दर संवेदनात्मक......


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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