सबद
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सगरो अंजोर



( ख़ुशी, धैर्य-ध्रुव, और रूद्र के लिए बड़े भाई-बहनों की तरफ से)

हमारे यहाँ छट्ठी होती है. छः दिन का जब मैं रहा होऊंगा तो क्या गाया गया था, मेरी याद के बाहर है वह. बाद में जब दिमाग़ यादों का घर बनने लगा तो भी छोटे भाई-बहनों के जन्म पर जो मंगल-गीत गाए गए, उसकी उसमें मुकम्मल जगह नहीं बन पाई. मेरा ध्यान गीतों में कम, उन आयोजनों के दौरान अपने हम उम्र के संग छुपम-छुपाई के खेल में ज़्यादा रहा. मैं यह नहीं कह सकता कि सोहर और बधाई सुनते हुए बड़ा हुआ हूँ क्योंकि सुना तो खूब पर तब गुनने का विवेक नहीं था. फिर यह भी था कि मैं एक ऐसे बदलते वक़्त में बड़ा हुआ जब हर अवसर पर गाए जानेवाले मंगल-गीत-- जिसे माएं, मौसियां और उनकी माएं गाती थीं-- को गाने वालों की तादाद घर में कम होती गई और सारे आयोजन अततः टेलीविजन के अनुवाद हो कर रह गए.

संजय उपाध्याय की नाटक-मंडली में सीताराम सिंह ''नांदीपाठ'' का संगीत देने आते थे, उनकी सोहबत में स्क्रिप्ट पर काम करने के बाद मैं भी साथी कलाकारों के साथ बैठ कर गाता-गुनता था. तब चाव बढ़ा. ''नांदीपाठ'' में अनेक भोजपुरी गीतों की जगह थी. भोजपुरी की मेरे मगह आदमी को वही राग-स्मृति है. हालाँकि मां के पास शारदा सिन्हा के कुछ कसेस्ट्स पड़े थे, जिसे उसके घिस जाने तक सबने सुना था. छन्नूलाल मिश्र को तो बहुत बाद में सुनना हुआ.

इधर कुछ दिन पहले दफ़्तर देर से पहुंचने की आशंका में ऑटो में सवार हुआ तो ऑटोवाले की मोबाइल से उठता संगीत और स्त्री-कंठ ने मेरा मन बांध लिया. मैंने आग्रह कर सफ़र पूरा होने तक उसे अपने साथ रखा. बोल थे :

''जुग जुग जिय सु ललनवा भवनवा के भाग जागल हो...
ललना लाल होइयें कुलवा के दीपक मनवा में आस लागल हो...

आजु के दिनवा सुहावन रतिया लुभावन हो...
ललना दिदिया के होरिला जनमले....होरिलवा बड़ा सुन्दर हो...

नकिया त हवे जैसे बाबूजी के अंखिया ह माई के हो...
ललना मुहवा ह चनवा-सुरुजवा त सगरो अंजोर भैले हो...

सासु सोहागिन बड़भागिन अन्न-धन लुटावेली हो...
ललना दुअरा पे बाजे ला बधैया अंगनवा उठे सोहर हो...

नाचि-नाचि गावेली बहिनिया ललन के खेलावेली हो...
ललना हंसी हंसी टिहुकी चलावेली रस बरसावेली हो...

जुग जुग जिय सु ललनवा भवनवा के भाग जागल हो...
ललना लाल होइयें कुलवा के दीपक मनवा में आस लागल हो...''



इसकी पूरी काया में कितनी इकॉनमी है, और इसके वावजूद यह कितनी ज़्यादा कामनाओं और शुभेच्छा से भरी हुई है- एक बड़े पाए की कविता और क्या होती है ? यहाँ ललनवा के लिए की जाने वाली मंगलकामना क्या शुक्लजी का वृहत्तर लोक-मंगल नहीं है? आठवें दशक के कवि जब यह कहते हैं कि हिंदी कविता का इतिहास बमुश्किल सौ साल का है तो उनसे विनम्र असहमति क्या कबीर-तुलसी की ही साखी देकर व्यक्त की जाएगी? यह सोहर और इसके अनेक ठेठ भाई-बहिन की याद दिलाना क्या काफी न होगा?

मैं तो इन्हें घुट्टी कविता कहना चाहता हूँ. इसे गोबर, रोटी और बच्चों को थापनेवाली उन औरतों ने गढ़ा था जो, जैसा मैंने कहा, कम रही हैं, और अब यह अच्छा ही है कि औरतें गोबर थापने की बजाय विद्यालय जा रही हैं और यह भी कि यह गीत अब कंठ को अगर कम याद है तो, तो 'गूगल की गुल्लक' में जा घुसा है और इस रोशन ज़माने में कहीं-कहीं तो ललना-लालनी का लिंग-भेद किये बिना गाया-सुना जा सकता है. मेरी यादाश्त में शारदा सिन्हा या छन्नूलाल मिश्र के यहाँ जो यह भदेस कंठ निथर गया है (एक फिल्म में इस्तेमाल होने की वजह से इस सोहर में भी), तो इससे न तो उन औरतों का घरु-गायन ही महान रह जाता है और न ही फिल्म या सीडी आदि में उपलब्ध होने कि वजह से यह बाज़ार की चीज़ और लोक-बाहर हो गाया है. अपनी सब्लिमिटी और एसेंस में वह लगातार घटित हो रहा है.

लोक क्या है? एक शिनाख्त भर और क्या? वर्ना जितना बड़ा इसका भूगोल है उसकी थाह क्या तो वामन के डग लेंगे? हम क्या खाकर इसकी संभाल करने का दम भरेंगे? इसके उलट, भला कुछ मनोज तिवारी और गुड्डू रंगीला ही मिलकर इस थाती का क्या बिगाड़ लेंगे? असल बिगाड़ तो तब होगी जब हम, जो लोक की क्षति का एक तरफ अभी और आनेवाले वक्तों में मर्सिया गायेंगे और दूसरी तरफ उसकी शिनाख्त की गुंजाइश तक को नज़रंदाज़ करेंगे. ऐसे तो कुछ नहीं होगा. लोक जहां कहीं भी स्पंदित है, उसे निहुर कर लेना होगा. बार-बार गाँव जाने या ड्राइंग-रूम में कुदाल रख देने से लोक किन्हीं हाथों प्रतिष्ठित नहीं हो जाएगा.

होगा तो वह एक सोहर याद रख लेने से भी नहीं. लेकिन अपने तईं कम से कम मैं सोहर और उसकी सगी कविताओं को अब एक ज़रूरी रेफरेंस की तरह हिंदी कविता पढ़ते हुए याद रखना चाहूँगा. और यह तो तय रहा कि मेरे बच्चू/बच्ची जब दुनिया में आयेंगे और पत्नी सोहर आदि के बारे में अनिभिज्ञता प्रकट करेंगीं तो मैं छः दिन के नए सलोने को गोद में लेकर मां के बगल लग ख़ुद भी दो-चार सोहर गाने लगूंगा...आखिर संपन्न मर्दाना कीर्तन के बनिस्बत  गायन में भी कितने कम साज़ चाहिए-- महज एक चम्मच, जो नाल पर पड़े, नाल न हो तो परात या थाली की पीठ ही सही!
****
12 comments:

बहुत सुन्दर !इस सोहर को उपलब्ध कराने के लिए तहे- दिल से शुक्रिया। और इस पर आपकी कमेन्ट्री लाजवाब ! लगा अपने बचपन में लौट रहा हूँ।…दुर्भाग्य से लोकगीत अब या तो बाज़ार में बिक रहे हैं या भूखे लोगों के पास हैं।उत्तर-पूर्व की रेलगाड़ियों में बाँसुरी बजाते… पैर में घुंघरू बाँधे लोग भिक्षा पाने के लिए बाउल-गीत गाते हैं …और हमारे गाँव में सारंगी पर लोकगीत गा-गाकर भिक्षुक एक मुट्ठी अनाज माँगते हैं …


बड़ा सुन्दर लोकगीत।


सोहर का शुक्रिया और पेंटिंग भी बड़ी अच्छी है.


सोहर अब भी रेफ़रेंस है .

कविता लोकगीत नहीं है.पर समय-परीक्षित लोकगीत और संस्कारगीत जब सन्दर्भ नहीं रहते हैं तो कविता अजायबघर की वस्तु हो जाती है. और हमें श्रोता/पाठक खोजने जाना पड़ता हैं क्योंकि वह कोई और होता है. जबकि लोकगीतों में हम आत्मीयता और शुभाकांक्षा के एक अनन्य संसार की धड़कनें सुन सकते हैं . वहां यह भेद नहीं होता.


*****

लोक गीतों के संरक्षण-दस्तावेजीकरण और कानूनी हक को लेकर एक टिप्पणी इस सन्दर्भ में ’टूटी हुई बिखरी हुई’ ब्लॉग पर की थी .चिपका रहा हूं :

सबसे मुख्य बात होती है नीयत/इंटेंशन या उद्देश्य. हम यह किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए न करके एक सांस्कृतिक आदान-प्रदान के तहत कर रहे हैं . आखिर सामुदायिक हक भी कुछ होता है कि नहीं . तो इसे एक हद तक लेखकों / गायकों / कलाकारों/
प्रकाशकों/म्यूज़िक कम्पनियों का सहयोग व समर्थन मिलना चाहिए . राज्य नाम की शक्ति को, उसके कानून के बारीक नुक्तों को और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट आदि के प्रावधानों को बिना ललकारे/चुनौती दिए मैं इसके पक्ष में दो दलीलें रखता हूं :

पहली यह कि जब जंगल पर जनजातियों के अधिकार का हम समर्थन कर रहे हैं,पानी के सामुदायिक हक की बात कर रहे हैं तो सांस्कृतिक पर्यावरण पर एक समुदाय के अधिकार को कुछ स्पेस ज़रूर मिलना चाहिए,तमाम कॉपीराइट आदि के बावज़ूद, ताकि सांस्कृतिक आवाजाही बनी रहे .


दूसरा यह कि साहित्य-संगीत की उपेक्षा के इस दुस्समय में आम जनता में साहित्य-संगीत और ललित कलाओं के प्रति एक आस्वाद जगा कर और जनरुचि को परिष्कृत कर हम प्रकारांतर में उनका सहयोग ही कर रहे हैं --उनके लिए पाठक/आस्वादक
या उनकी भाषा में कहें तो उनके संभावित ग्राहक तैयार करके .

मुझे यह भी लगता है कि लोकगीतों/ संस्कारगीतों का इस्तेमाल करके जो फ़िल्म या म्यूज़िक कम्पनियां पैसा बना रहीं हैं,उनकी कमाई का कुछ हिस्सा किसी सामुदायिक कोष में जाना चाहिए जो इस प्रकार के संगीत के संरक्षण-संवर्धन पर खर्च हो . आखिर सैकड़ों-हज़ारों वर्षों से समुदाय का कंठहार रहे इन लोकगीतों और संस्कारगीतों पर एक समुदाय का ही स्वत्वाधिकार हो सकता है ,किसी व्यक्ति या कम्पनी का नहीं.इस कोष का ट्रस्टी समुदाय/समाज हो, राज्य नहीं . कोई पंजीकृत स्वायत्तशासी संगठन हो सकता है जिसे जनता चुने और संचालित करे .

लोकगीतों के सम्बंध में एक प्रवृत्ति और देखने में आती है कि शब्दों और संगीत की संरचना में थोड़े-बहुत हेरफेर/इम्प्रोवाइजेशन से फ़िल्मों में लोग --कई प्रतिष्ठित गीतकार/संगीतकार भी -- अपना नाम डाल देते हैं . ऐसा कहां तक उचित है ? और क्या इससे उनका कोई स्वत्वाधिकार बनता है ? वह भी उस चीज़ पर जो मूलतः उनकी नहीं है,भले ही थोड़ा-बहुत वैल्यू एडीशन उनका है और जिसका वे पर्याप्त फायदा भी उठा रहे/चुके होते हैं

संस्कारगीतों/लोकगीतों की बहुत कम समय की कुछ बानगी -- क्लिपिंग्स -- यहां देखी जा सकती हैं :

http://www.beatofindia.com/arists/smita_a.htm

http://www.beatofindia.com/arists/aj.htm

http://www.beatofindia.com/arists/mdd.htm

http://www.beatofindia.com/arists/ss.htm

http://www.beatofindia.com/arists/us.htm

http://www.beatofindia.com/arists/mskk.htm

http://www.beatofindia.com/arists/dnm.htm


नवप्रसूता एवं नवजात शिशु से जुड़े दो सुन्दर राजस्थानी लोकगीत,

http://www.divshare.com/download/12094511-8eb


अद्भुत.पहले शारदा सिन्हा की आवाज में लोकगीत और संस्कार गीत सुनने के लिए मिल जाते अब तो न रेडियो पर बजते हैं न आसानी से कहीं मिलते हैं. एक बार उनका एक गीत 'जगदम्बा घर में दियना बार अइनी हो' सुनकर पागल हो गया था और इस गीत को अंतत:रेडियो स्टेशन से एक सज्जन को पटा कर प्राप्त किया.
यह आपने बहुत अच्छा किया है. साहित्य के इतिहास में इस परम्परा का गला क्यों घोटा गया,मुझे नही पता.


sundar prayas....apke sabhi post behtareen hote hai.Lok geet to bhoolibishari bat ho gai hai.Aaj gaon me bhi yah jinda hai ki nahi yah bhi chinta ka visay hai.Lokgeeto ko ab sirf all india radio me hi suna ja sakata hai pr aaj radio sunta hi koun hai. Lokgeeto ka bhi filmi karan ho chuka hai.Aap ka computery karan aachha laga.


बहुत ही अच्छा लिखा है आप ने मेरे पास शब्द की कमी होने कारण मैं इतना कहना चाहूंगा ' वाह'!


बहुत सुन्दर और सार्थक गद्य....

कितना सच लिखा अनुराग आपने -

"आठवें दशक के कवि जब यह कहते हैं कि हिंदी कविता का इतिहास बमुश्किल सौ साल का है तो उनसे विनम्र असहमति क्या कबीर-तुलसी की ही साखी देकर व्यक्त की जाएगी? यह सोहर और इसके अनेक ठेठ भाई-बहिन की याद दिलाना क्या काफी न होगा?"

शमशेर ने सप्तक में लिखा था.....असली कला लोक कलाकारों के पास है.....आज इस वक्तव्य की प्रतिध्वनि सुनकर अच्छा लगा.


मै तो अपने गाँव पहुँच गई .......


सकेर के रख दो...अँधेरी रात में इस अंजोर की आवश्यकता है बहुत...गांव में ताखे पर रखी डिबरी की थरथराती लौ और पेट्रोमेक्स की दूधिया चौंध में ऐसे गीत याद आते हैं...बहुत सा गुनगुन शोर भी इसके साथ...खो जाएगा तो किसी ऐसे वक्त याद आएगा जबकि गांव वापस लौटने को कोई पगडण्डी भी नहीं होगी.

सबद मुझे हर बार कुछ नया दे जाता है...इस पन्ने पर आना एक कलाईडोस्कोप में एक आँख डाले देखना है...हर बार चंद चूड़ी के रंगीन टुकड़ों से बनता अद्भुत दृश्य...मनमोहक...सम्मोहक.


सगरो अंजोर...
वाह!

सचमुच सुबह की रौशनी सा सौम्य सुन्दर...
सजल हो गयीं आँखें!

आभार!


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संपादन : अनुराग वत्स.

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