
(सिद्धेश्वर सिंह ने निज़ार क़ब्बानी की इन कविताओं का अनुवाद सबद के सतत आग्रह पर किया है. उनका आभार. चित्र-कृति सिल्विया की.)
जादू
दुनिया भर के बच्चों को
सिखला दिया है मैंने
तुम्हारे नाम का उच्चारण
और चेरी के वृक्ष में
परिवर्तित हो गए हैं उनके होंठ।
कि वह कंघी फेर दे
तुम्हारे घने काले बालों में
उसने मना कर दिया
और कहा :
वक्त बहुत कम है
और बहुत... बहुत लम्बे हैं तुम्हारे बाल।
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मैंने लिखा नाम
प्यार करता हूँ जिसे
लिखा उसका नाम
हवा पर।
प्यार करता हूँ जिसे
लिखा उसका नाम
पानी पर।
लेकिन
हवा को सुनाई देता है कम
और पानी को
याद नहीं रहता कोई भी नाम।
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चुम्बन
एक लम्बे बिछोह के बाद
जब भी
चूमता हूँ तुम्हें
तो महसूस होता है कि
छोड़ कर जा रहा हूँ
लाल लेटरबाक्स में
जल्दबाजी में लिखा गया कोई प्रेमपत्र।
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क्या है प्रेम?
प्रेम क्या है?
हमने पढ़े हैं इस पर लिखे गए हजारों - हजार प्रबन्ध
और अब तक जान न पाए
कि वास्तव में पढ़ा क्या?
खूब अध्ययन किया
अनुवाद ज्योतिष और औषधिशास्त्र की अनगिनत कृतियों का
फिर भी समझ न आया
कि कहाँ से की जाय इस विषय की शुरुआत?
हमने कंठस्थ कर लिया
समूचा लोक साहित्य
संपूर्ण काव्य
सारा का सारा गीत साहित्य
और स्मरण न रख सके एक भी पंक्ति !
हमने प्रेममार्गी संतों से
पूछा उनका हालचाल
कुरेदा उनका अनुभव संसार
और पाया
कि हमसे थोड़ा भी अधिक नहीं है उनका ज्ञान!
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पाखी
ओ ! हरे पाखी
जबसे हुए हो तुम मेरे प्रियतम
तबसे ईश्वर विराजता है
वहीं ऊपर आकाश में।
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दर्प
जबसे मैं प्रेम में हूँ
मैंने फारस के शाह को
बना लिया है
अपने अनुगामियों में से एक
और मेरे आदेश को शिरोधार्य करता है चीन।
मैंने समुद्रों को खिसका दिया है
उनकी परम्परागत जगहों से
और अगर मैं चाहूँ
तो रोक सकता हूँ समय का गतिमान रथ।
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साधारणीकरण
जब मैं होता हूँ तुम्हारे संग
तो अनुभव करता हूँ
कि भूल गया हूँ कवितायें लिखना।
जब मैं सोचता हूँ तुम्हारे सौन्दर्य के बारे में
तो हाँफने लगता हूँ साँस लेने के लिए।
मेरी भाषा मुझे धोखा देने लगती है
और गायब हो जाती है पूरी शब्दावली।
मुझे इस ऊहापोह से उबारो
अपने सौन्दर्य में करो थोड़ी कतर - ब्योंत
तनिक कम खूबसूरत बनो
ताकि मैं फिर से हासिल कर सकूँ अपनी प्रेरणा।
एक स्त्री बनो
मेकअप करने और परफ्यूम लगाने वाली
एक ऐसी स्त्री बनो जो बच्चों को देती है जन्म
तुम करो यह सब कुछ
ताकि फिर से शुरु हो सके मेरा लिखना।
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सागर प्रेम
मैं तुम्हारा समुद्र हूँ
मुझसे मत पूछो
आगामी यात्राओं की समय सारणी के बारे में।
तुम्हें वही करना है जो है तुम्हारी फितरत
भूल जाओ दुनियावी आदतों को
पालना करों सामुद्रिक नियमावली का।
मेरे भीतर धँस जाओ एक पागल मछली की तरह
टुकड़े - टुकड़े कर दो
मेरे जलयान के
क्षितिज के
मेरे जीवन के
छिन्न - भिन्न कर बिखेर दो मेरा अस्तित्व।
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आशंका
मैं डरता हूँ
तुम्हारे सामने
अपने प्रेम का इजहार करने से।
सुना है
जब चषक में ढाल दी जाती है शराब
तो उड़ जाती है उसकी सुवास।
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कवि की पत्री :- निजार क़ब्बानी ( 21 मार्च 1923 - 30 अप्रेल1998 ) न केवल सीरिया में बल्कि अरब के समूचे साहित्य जगत में प्रेम, ऐंद्रिकता, दैहिकता और इहलौकिकता के कवि माने जाते हैं। उनकी कविताओं में एक दैनन्दिन साधारणता है और देह से विलग होकर देह की बात किए जाने की चतुराई जैसा छद्म नैतिक आग्रह नहीं है। उनकी कविता साहित्य और संगीत की जुगलबन्दी की एक ऐसी सफल - सराहनीय कथा है जो रीझने को मजबूर तो करती ही है, रश्क भी कम पैदा नहीं करती।--अनुवादक.

Monday, 12 July, 2010
सचमुच प्रेम कविताएं। बहुत सुंदर अनुवाद भी।
Monday, 12 July, 2010
Behad Khubsurat...........Sonali Singh
Monday, 12 July, 2010
ये अनुवाद नयी खिड़कियाँ खोल रहे हैं ..पाठकों के लिए -बहुत सुन्दर
Tuesday, 13 July, 2010
bahut hee sundar kavitayen hain aur saath hee saath hindi pathakon ko bhee bahut aakarshit karengee mujhe lagtaa hai!
Tuesday, 13 July, 2010
नयी वादियाँ विचारों की, कल्पनाओं की।
Tuesday, 13 July, 2010
काफ़ी व्यस्त रहा इधर बीच. अब भी हूँ. समर्थ की कविताएँ शानदार थीं पर मैं अपनी बात कहने चूक गया. व्योमेश के बाद एक बार फिर एक नया कवि पिक्चर इस तरह आया कि भीतर कुछ हलचल हुई. यूँ समर्थ को मैं पहल के ज़माने से जानता हूँ.
सिद्धेश्वर सिंह को मैं प्यार से चच्चा कहता हूँ...उतने ही प्यार से वे मुझे बच्चा.
वे इस बीच लगातार अनुवाद का काम करते रहे हैं और ये अनुवाद उनके उस काम की एक बानगी भर हैं, जिसे उन्होंने मिशन की तरह अंजाम दिया है. दरअसल उनके अन्दर जो अद्भुत किन्तु संकोच में पड़ा हुआ एक कवि है वो ख़ुद रुक कर उन्हें कविता के अनुवाद की राह देता है. उनके इस समर्पण को मेरा सलाम.
सबद को इस शानदार पोस्ट की बधाई.
Tuesday, 13 July, 2010
सच्ची कविताएं
Wednesday, 14 July, 2010
प्रेम की तरह सुंदर
Wednesday, 14 July, 2010
ये कविताएं नहीं प्रेमपत्र हैं। एक कवि होने के नाते कविता का विचार और उनका इतना सहज अनुवाद देखकर अंचभित हुए बिना नहीं रहा जा रहा है। आपको और सिद्धेश्वर जी को बधाई।
Wednesday, 14 July, 2010
निजार कब्बानी की बेहतरीन कविताओं के लिये अनुवादक को तथा ब्लॉगर को धन्यवाद. निजार की कवितायें अस्सी के दशक में पढ़ी थी जो अब भी याद हैं. हिन्दी में उन्हे देखकर अच्छा लगा.
शिरीष जी एक कवि हैं पर अपने कमेंट में एक ब्लंडर कर गुजरे हैं. कुछ ब्लॉग पर यह समस्या दिख रही है कि जैसे वे लोग कोई हिसाब किताब निभाने के लिये छपते/छापते हैं और कमेंट करते हैं. शिरीष ने समर्थ की तारीफ की है जो निश्चित ही समर्थ कवि हैं. अनुवादक की भी तारीफ की है जो निश्चित ही तारीफ के काबिल हैं पर जिस कवि पर यह पूरा मामला बना है, जो ना लिखता तो शायद अनुवादक की तारीफ मुश्किल हो जाती, शिरीष ने उसी कवि की कोई बात नही की है. इस पर वो बतौर बहाना यही कहेंगे कि निजार की तारीफ क्या करनी? वो तो हैं महान ही. पर वो भी जानते हैं यह सच नहीं है.
Friday, 16 July, 2010
निज़ार कब्बानी का नाम नेट पर कहीं दिखाई द जाता है तो डॉ. सिद्धेश्वर सिंह के अनुवादों का स्मरण हो आता है!
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और हाँ,
अक्सर मेरा अनुमान सही निकलता है!
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डॉ. सिद्धेश्वर सिंह तथा सबद के ब्लॉग स्वामी मेरी बधाई स्वीकार करें!
Wednesday, 23 November, 2011
Sunder Kaviton ka sunder anuwaad ...
Wednesday, 22 February, 2012
बहुत अदभुत कविताये है । आपकी पीढी बहुत सजग है ।उनके अनुवाद की भाषा स्वाभाविक है }सबद की टीम को शुभकामनाये
स्वप्निल श्रीवास्तव
फैज़ाबाद
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