Thursday, July 08, 2010

पुस्तक अंश : कलामे रूमी


[ अभय तिवारी द्वारा रूमी के काव्यानुवादों की पुस्तक ''कलामे रूमी'' को पढ़ते हुए यह अनुभव होता है कि यह महज मेरी हिंदी में रूमी के अथाह में से कुछ को ले आने का उद्यम नहीं है. काव्यानुवादों के पूर्व रूमी के काव्य, उसकी प्रकृति पर सुशोधित लेखों के अलावा कवि की पत्री, उसके किस्से और करामातों की जितनी रोचक और ज़रूरी जानकारी अभय ने दी है, वह भरेपूरेपन में आपको रामनाथ सुमन के ग़ालिब और मीर पर तैयार की गई पुस्तकों की याद दिलाता है. लिप्यंतरण के आदी दिमाग़ को अभय के मूल फ़ारसी से किये गए काव्यानुवाद रुचेंगें.]

{ तेरहवीं सदी में जन्मे जलालुद्दीन रूमी आज भी फ़ारसी काव्य के आकाश के सबसे जगमगाते सितारे बने हुए हैं। रूमी में एक तरफ़ माशूक़ के हुस्न का नशा है, विसाल की आरज़ू व जुदाई का दर्द है, तो दूसरी तरफ़ नैतिक और आध्यात्मिक ज्ञान की गहराईयों से निकाले हुए मोती हैं। काव्य की दुनिया में और सूफ़ियों के बीच, दोनों जगह उनका स्थान चोटी पर है। ऐसा इसलिए है कि रूमी सिर्फ़ कवि नहीं है, वे सूफ़ी हैं, आशिक़ हैं, ज्ञानी हैं और सब से बढ़कर गुरु हैं। }

रोटी का इश्क़

एक सूफ़ी ने दस्तरख़ान देखा खूंटी पर टंगा
बस वहीं लबादे को फाड़ सूफ़ी नाचने लगा

देखो बेसहारों का सहारा, उसने फिर कहा
देखो वो टंगी है दर्द व क़िल्लत की दवा

दरवेश ने उस शोर ओ गुल इतना बढ़ाया
कि सूफ़ी था जो भी, उस तक दौड़ा आया

चिल्लाया हाय हू और खूब मारे ठहाके
हो गए मस्त बेख़ुदी की मय पी-पा के

कहने लगा एक बेफ़िज़ूल कि ये क्या है
दस्तरख़ान में रोटी नहीं बस हवा है

बोले सूफ़ी कि भाग जा तस्वीर बेमाएनी है तू
है हस्ती के पीछे, तुझे नहीं कुछ इश्क़ की बू

रोटी नहीं रोटी का इश्क़ सूफ़ी की ख़ुराक है
जो भी सच्चा है आशिक़ हस्ती से आज़ाद है

आशिक़ो के लिए बिलकुल बेकार है वजूद
बिन सरमाया२ आशिक़ों को मिलता है सूद

(१. मसनवी मानवी, ज़िल्द तीसरी, ३०१४-२९, . मूल धन)
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नहीं दो की जा

एक शख्स गया कभी अपने दोस्त के मकां
पूछा दोस्त ने अन्दर से, है कौन मेहरबां

कहा मैं हूँ, तो बोला कि घड़ी नहीं ये आने की
जगह नहीं मेज़ पर मेरी, कच्चों को समाने की

कच्चे को रखो अलग, जुदाई की आग के वास्ते
कैसे पकायें? बचायें कैसे जाने से फ़रेब के रास्ते?

वापस हुआ बेचारा, भटकता रहा साल भर
जलता रहा जुदाई के शोलों की आग पर

लौट आया वो ग़रीब जब पक गया जल कर
लगाने लगा फिर यार के घर के वो चक्कर

सौ हिचक और डर से भर कर दी थपकी
लब से मेरे कहीं हो न जाय कुछ बेअदबी

पुकारा यार ने है कौन जिसे मिलने की है आरज़ू?
बोला कि अय दिलनवाज़ और कोई नहीं, है तू

तो कहा कि अब तुम हो मैं, तो फिर अन्दर आ
मेरे मैं! इस घर के अन्दर है नहीं दो की जा

(१. मसनवी मानवी, ज़िल्द पहली, ३०५६-६४, २. शुरुआती साधक, जिसके आगे रूह के राज़ अभी ज़ाहिर नहीं हुए, को कच्चा कह कर बुलाया है। पक्का वह है जो इश्क़ और जुदाई की आग में जलकर पक गया हो। . जगह।)
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क़िबला

जिबरील सी रूहों का काबा सदरूहा२ है
पेटुओं के लिए दस्तरख़ान३ ही क़िबला४ है

वस्ल५ का नूर आरिफ़ों६ का है क़िबला
फ़लसफ़ी६ ख़्याल आक़िलों का है कि़बला

ख़ुदा की नेमत ज़ाहिदों का है क़िबला
सोने का बटुआ लालची का है क़िबला

माएनीवरों७ का क़िबला सबर व सुकुन है
सूरतपरस्तों८ का क़िबला नक़्शे सनम९ है

क़िबला ख़ुदा है जिनको बातिन१० की जुस्तजू११
ज़ाहिर परस्तों१२ का क़िबला है ज़नाना मुँह

(१. मसनवी मानवी, ज़िल्द छठी, १८९६-२०००, . सूफ़ी मत की जो ब्रह्माण्ड की कल्पना है उसमें नौ आसमानों के पार ईश्वर का वास है। ईश्वर का एक सिंहासन है जिसे अर्श कहते हैं। उसके नीचे एक कुर्सी है जिस पर ईश्वर के पैर रहते हैं। उस कुर्सी के दाहिनी ओर झुक कर एक उजले मोती सा लोक है जिसमें एक कमल का गाछ है, जिसका नाम सदरूह है; रूमी इसी कमल के गाछ को फ़रिश्तों का क़िबला बता रहे हैं। . खाना खाने के लिए जो कपड़ा बिछाया जाता है, उसे ही दस्तरख़ान कहते हैं। . क़िबला का अर्थ अति पूज्य धुरी, या केन्द्र। . मिलन . ज्ञानी . तत्ववादी, आध्यात्मिक लोग . मूर्तिपूजक . मूर्ति का सौन्दर्य १०. छिपा हुआ)
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दो ग़ुलाम-दो मालिक

किसी शाह ने एक शेख़ से बोला कभी
माँगते हो क्या मुझसे ले लो अभी

शेख़ बोले क्या आती नहीं तुझको शरम
तुम हो क्या और रखते हो क्या भरम

बड़े ओछे, बड़े अदना हैं मेरे दो ग़ुलाम
तेरे मालिक हैं व करे उनको तू सलाम

शाह तड़पा कौन हैं वे, सरासर ये ग़लत
कहा शेख़ ने एक ग़ुस्सा है दूजा हवस

जान उसको शाह जो निकला शाही से दूर
सूरज-चांद के बिना भी चमके जिसका नूर

ख़ज़ाना उसका जिसका हुआ दिल ख़ज़ाना
हस्ती है उसकी जो हुआ हस्ती से बेगाना

(१. मसनवी मानवी, ज़िल्द दूसरी, १४६५-७०.)
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आदमी की तरक़्क़ी

बेजान चीज़ों से मर गया, पौधा बन गया
फिर पौधों से मर गया, हैवान बन गया

हैवानों से मर गया और आदमी हो गया
डरूँ क्यों, कि कब मर कर कम हो गया?

अगली दफ़े आदमियों के बीच से मर जाऊँ
ताकि फ़रिश्तों के बीच पर व पंख उगाऊँ

और फ़रिश्तों में से भी चाहिये निकल जाना
कि सिवा उस के हर शै को फ़ना हो जाना

एक बार फिर फ़रिश्तों से क़ुरबां हो जाऊँगा
फिर जो सोच में नहीं आता, वो हो जाऊँगा

(१. मसनवी मानवी
, ज़िल्द तीसरी, ३९०१-०५.)
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बिन मेरे

इक सफर पर मैं रहा बिन मेरे
उस जगह दिल खुल गया बिन मेरे

वो चान्द जो मुझ से छिप गया पूरा
रूख पर रूख रख कर मेरे बिन मेरे

जो ग़मे यार में दे दी जान मैंने
हो गया पैदा वो ग़म मेरा बिन मेरे

मस्ती में आया हमेशा बग़ैर मय के
ख़ुशहाली में आया हमेशा बिन मेरे

मुझ को मत कर याद हरगिज़
याद रखता हूँ मैं ख़ुद को बिन मेरे

मेरे बग़ैर ख़ुश हूँ मैं, कहता हूँ
कि अय मैं रहो हमेशा बिन मेरे

रास्ते सब थे बन्द मेरे आगे
दे दी एक ख़ुली राह बिन मेरे

मेरे साथ दिल बन्दा कैक़ूबाद२ का
वो कैक़ूबाद भी है बन्दा बिन मेरे

मस्त शम्से तबरीज़ के जाम से हुआ
जामे मय उसका रहता नही बिन मेरे

(१. कुल्लियाते दीवाने शम्स तबरेज़ी में ग़ज़ल संख्या १२८, . कैक़ूबाद नाम से रूम में दो सेलजुक सुल्तान हुए एक १२२०-३७ और दूसरे १२४९-५७, ये ज़िक़्र कैक़ूबाद दुव्वम का ही होना चाहिये। चुनौती ग़ालिब ने भी दी थी शहंशाह को लेकिन इस तरह प्रत्यक्ष नहीं, रूमी की सांसारिकता को ठोकर का ये अच्छा उदाहरण है।)
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क़ब्र से गेहूँ

क़ब्र से मेरी अगर गेहूँ जो उगता
गर रोटी पकती उस से, नशा बढ़ता

गँवाते होश लोई, पगलाता नानबाई२
और चूल्हा भी नग़मे मस्तानो के गाता

अगर मेरी क़ब्र पर ज़ियारत३ को आते
तो उसकी शकल को नाचता हुआ पाते

देख भाई बिन डफ़ली के नहीं आना
मना है ख़ुदा की बज़्म४ में ग़मगीन जाना

चिबुक बँध कर क़ब्र में चुपचाप सोता
मुँह यार के ज़रिये मीठी अफ़ीम५ खाता

मेरे कफ़न को चीर और बाँध सीने पर
और अपनी रूह से खोल एक मयकदे का दर

हर तरफ़ है मस्तानों का लड़ना-गाना
हर बदकारी से है और बलाओं का आना

मेरे ख़ुदा ने बनाया मुझे इश्क़ की मय से
रहूँ मैं इश्क़ ही कर दे मौत चाहे टुकड़े-टुकड़े

मैं मस्ती हूँ, मेरी पैदाईश इश्क़ से है
कहो कि मस्ती के सिवा क्या मय से है?

दम न लेगी एक लम्हा ये रूह मेरी
शम्स की छत पर दिखेगी रूह मेरी

(१. कुल्लियाते दीवाने शम्स तबरेज़ी में ग़ज़ल संख्या ६८३, . रोटी बेचने वाला, . मर चुके लोगों की याद में उनकी क़ब्र पर जाना, . सभा, . अर्थ एक ख़ुद को अस्तित्व को भुला देने वाले आनन्द से है।)
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{ कानपुर में जन्मे अभय तिवारी फ़िल्मकार के रूप में शिक्षित हैं और लम्बे समय तक मुम्बई में फ़िल्म व टीवी के लिए लिख कर ख़ुद को खो देने के बाद ब्लॉग के निर्मल-आनन्द (http://nirmal-anand.blogspot.com) में वापस पाया। फिर एक लघु फ़िल्म 'सरपत' बनाई, अब ''कलामे रूमी''
नाम से
यह किताब।}

6 comments:

प्रभात रंजन said...

anuvaad achha lag raha hai. flow hai. maine isse pahle roomi ki kavita nahi parhi thi. maza aaya.

समर्थ वाशिष्ठ / Samartha Vashishtha said...

रूमी की कविता से पहले-पहल गीत की कहानी "साहिब है रंगरेज़" के ऐन शुरु में सामना हुआ था। हतप्रभ करने वाला पल था।

अब ये अनुवाद पढ़के अच्छा लग रहा है। धन्यवाद, अनुराग!

रविकान्त said...

शुक्रिया, अभय, ये काम करने के लिए। अंग्रेज़ी अनुवादों से जी नहीं भरता था। जल्द से जल्द कितबिया ख़रीद के पढ़ता हूँ।

रविकान्त

Mired Mirage said...

मैं भी बस यह पुस्तक लेने ही वाली हूँ। शायद रूमी से जानपहचान हो ही जाए।
घुघूती बासूती

abcd said...

क्या कहे ?!.
तारीफ़ भी तो नही कर सक्ता "मै" /
क्योन्की पेह्ले हि कहा जा चुका है कि-"नहीं दो की जा "/

रवि कुमार, रावतभाटा said...

अनोखा अनुभव...
गज़ब की रवानगी भरा अनुवाद....