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कोठार से बीज : ९ : भवानीप्रसाद मिश्र



घर की याद

आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रात-भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,

अब सवेरा हो गया है,
कब सवेरा हो गया है,
ठीक से मैंने न जाना,
बहुत सोकर सिर्फ़ माना--

क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,
अभी तक चु
चाप है सब,
रात वाली छाप है सब,

गिर रहा पानी झरा-झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर,
कांपते हैं प्राण थर-थर,

बहुत पानी गिर रहा है,
घर नज़र में
तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर ख़ुशी का पूर है जो,

घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हाय रे परिताप के घर !

आज का दिन दिन नहीं है,
क्योंकि इसका छिन नहीं है,
एक छिन सौ बरस है रे,
हाय कैसा तरस है रे,

घर कि घर में सब जुड़े हैं,
सब कि इतने कब जुड़े हैं,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,

और माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुःख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुःख नहीं फिर,

माँ कि जिसकी स्नेह-धारा
का यहां तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता.

और पानी घिर रहा है,
घर चतुर्दिक घिर रहा है,
पिताजी भोले बहादुर,
वज्र-भुज नवनीत-सा उर,

पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएं,
जो अभी भी खिल-खिलाएं,

मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
कम में झंझा लरजता,

आज गीता पाठ करके,
दंड दो सौ आठ करके,
ख़ूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उसकी मिला लेकर,

जब कि नीचे आए होंगे
नैन जल से छाये होंगे,
हाय, पानी गिर रहा है,
घर नज़र में
तिर रहा है,

चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नज़र उनको पड़े होंगे.

पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पांचवें का नाम लेकर,

पांचवां मैं हूं अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,

आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं
उन पर सुहागा
बंधा बैठा हूं अभागा,

और माँ ने कहा होगा,
दुःख कितना बहा होगा,
आँख में किस लिए पानी,
वहां अच्छा है भवानी,

वह तुम्हारा मन समझ कर,
और अपनापन समझ कर,
गया है सो ठीक ही है,
यह तुम्हारी लीक ही है,

पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और बच्चे,

पिताजी ने कहा होगा,
हाय, कितना सहा होगा,
कहां, मैं रोता कहां हूं,
धीर मैं खोता कहां हूं,

गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,
उसे थी बरसात प्यारी,
रात-दिन की झड़ी झारी,

खुले सिर नंगे-बदन वह,
घूमता-फिरता मगन वह,
बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगता,

तुझे बतलाता कि बेला,
ने फलानी फूल झेला,
तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती,

मैं न रोऊंगा,--कहा होगा,
और फिर पानी बहा होगा,
दृश्य उसके बाद का रे,
पांचवें की याद का रे,

भाई पागल, बहिन पागल,
और अम्मा ठीक बादल,
और भौजी और सरला,
सहज पानी, सहज तरला,

शर्म से रो भी न पाएं,
ख़ूब भीतर छटपटाएं,
आज ऐसा कुछ हुआ होगा,
आज सबका मन चुआ होगा.

अभी पानी थम गया है,
मन निहायत
नम गया है,
एक-से बादल जमे हैं,
गगन-भर फैले रमे हैं,

ढेर है उनका, न फांकें,
जो कि किरणें झुकें-झांकें,
लग रहे हैं वे मुझे यों,
माँ कि आँगन लीप दे ज्यों,

गगन-आँगन की लुनाई,
दिशा के मन में समाई,
दश-दिशा चुपचाप है रे,
स्वस्थ की छाप है रे,

झाड़ आँखें बंद करके,
सांस सुस्थिर मंद करके,
हिले बिन चुपके खड़े हैं.
क्षितिज पर जैसे अड़े हैं,

एक पंछी बोलता है,
घाव उर के खोलता है,
आदमी के उर बिचारे,
किस लिए इतनी तृषा रे,

तू ज़रा-सा दुःख कितना,
सह सकेगा क्या कि इतना,
और इस पर बस नहीं है,
बस बिना कुछ रस नहीं है,

हवा आई उड़ चला तू,
लहर आई उड़ चला तू,
लगा झटका टूट बैठा,
गिरा नीचे फूट बैठा,

तू कि प्रिय से दूर होकर,
बह चला रे पूर होकर,
दुःख भर क्या पास तेरे,
अश्रु सिंचित हास तेरे !

पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको,
देह एक पहाड़ जैसे,
मन कि बड़ का झाड़ जैसे

एक पत्ता टूट जाये,
बस कि धारा फूट जाये,
एक हलकी चोट लग ले,
दूध की नद्दी उमग ले,

एक टहनी कम न होले,
कम कहां कि ख़म न होले,
ध्यान कितना फ़िक्र कितनी,
डाल जितनी जड़ें उतनी !


इस तरह का हाल उनका,
इस तरह का ख़याल उनका,
हवा, उनको धीर देना,
यह नहीं जी चीर देना,


हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य
पावन,
तुम बरस लोग वे न बरसें,
पांचवें को वे न तरसें,


मैं मज़े में हूं सही है,
घर नहीं हूं बस यही है,
किन्तु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है,

किन्तु उनसे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा हूं,
उन्हें कहना पढ़ रहा हूं,

कम करता हूं कि कहना,
नाम करता हूं कि कहना,
चाहते हैं लोग, कहना
मत करो कुछ शोक कहना,

और कहना मस्त हूं मैं,
कातने में व्यस्त हूं मैं,
वज़न सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,


कूदता हूं, खेलता हूं,
दुःख डट कर ठेलता हूं,
और कहना मस्त हूं मैं,
यों न कहना अस्त हूं मैं,

हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूं,
आदमी से भागता हूं,

कह न देना मौन हूं मैं,
खुद न समझूँ कौन हूं मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक ने देना,

हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य
पावन,
तुम बरस लोग वे न बरसें,
पांचवें को वे न तरसें.

****
( भवानीप्रसाद मिश्र की यह कविता आपातकाल के दौर में लिखी गई थी. पर अपनी अंतर्वस्तु की वजह से इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है. कोठार में इस बार यही.तस्वीर मधुमिता दास की. )
5 comments:

ashok vajpeyi ne ek baar ye kavita ham logon ko sunai thi aur sunate sunate unka gala roondh aaya tha. unhone kaha tha ki jab bhi is kavita ko we parhte hain to yahi hota hai. waise mujhe bhi ye kavita bahut pasand hai. krishnadutt paliwal ham logon ko ye kavita apne smaran se aisi shaili men sunate the ki aaj bhi yaad hai.


Prabhat ji Sahi kehte hain aap....Ye kavita he kuch aisi hai...gala bhar bhar aata hai... aur kavita goojti rehti hai der tak....


कविता के असल देसी कोठार में तो आपने अब हाथ डाला है . संकर नहीं,बीज भी खालिस देसी हैं. कोई जेनेटिक इंजीनियरिंग नहीं.किसी भी किस्म की मिलावट नहीं. इसी मिट्टी-आकाश के सहलाए-दुलराये देशज बीज हैं.

इस कविता में पानी का,भावनाओं ज़िक्र भर नहीं है.वैसा ही प्रवाह भी है. पानी का ’गिरना’ और उसके साथ घर का नज़र में ’तिरना’ जिस तरह का अद्भुत प्रयोग है उसे राजस्थानी,मालवी जैसी बोलियों के रसिक ज्यादा आसानी से समझ पाएंगे. इसमें सिर्फ़ तुक नहीं है. डबडबाई आंखों में तैर रहे नहीं,तिर रहे घर को देख पाना भवानी भाई जैसे सिद्ध कवि के ही बूते की बात है.


kitni sundar, saras kavita hai, yaad dilati ghar ki


aaj ham apne ghar se dur hain... ise men yah kavita hamen kahan khinch kar le jati hai yah kahne ki nahin hai. par ak bat jo ham bhulte jarahen hain ki ab babuji man bhai sarla ye sab riste nate dhire dhire gayab hote ja rahe hain... jeevanse aur sahitya se bhi...


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