Tuesday, July 06, 2010

गिनती




अब जब कहीं कुछ नहीं की साखी है तो तुम्हारा
जानबूझकर मेरे पास भूल गया क्लचर है
मैं उससे आदतन मगर इस एहतिहात से
खेलता हूँ कि कहीं तुम्हारी आवाज़ बरज ना दे
और टूट जाये तो तुम्हारी तरह वैसा ही मिलना नामुमकिन.

हुमायूँ'ज टूम, शाकुंतलम थियेटर और परांठे वाली गली
तुम साथ ले गई
अब वे मेरी याद के नक़्शे में हैं,
शहर दिल्ली में कहीं नहीं.

यूथ भी,
उसे अकेले पढ़ना असंभव होगा मेरे लिए.

मेरा हरा कुर्ता हैंगर का होकर रह गया है,
मानो उसे तुम्हारे हाथों ने दुलारा ही नहीं.

आसमानी अदालत में मुझे मुजरिम करार दिया गया है,
सज़ा बरसात की सुनाई गई है...हद है!
...आगे कोई अपील नहीं...

सच पूछो तो तुम्हारा एसारके मुझे चिढ़ाता है,
हालाँकि मैं रोमन हॉलीडे चाव से देख सकता हूँ.

फिर भी मैं आजिजी में नहीं, बहुत इत्मिनान में फ्लोरेंतिनो अरिज़ा के
५३ साल, ७ महीने और ११ दिन-रात को अपना मुकम्मल ठिकाना बना रहा हूँ.
पर इतनी उम्र मिलेगी फरमीना ?
****

( कहने को तो माध्यम में कभी सत्यप्रकाश मिश्र ने पांच कविताएं छापी थी, और सिर्फ अब पंकज चतुर्वेदी और पटना के कुछ मित्रों को याद है कि अपने संपादन में 'कथादेश' के युवा पीढ़ी विशेषांक में अरुण कमल ने दो छापी थी. उन सात के आठ साल बाद यह आठवीं. तस्वीर मधुमिता दास की है. )

26 comments:

Farhan Khan said...

Wah! bahut sundar kavita hai! and the poem has great imagery too. Thanks for sharing such wonderful piece of poetry...

Prashant Jain said...

bahut sunder kavita hai anurag ji. keep it up.

habiba said...

kavita ki nyi sheli ke liye mubarakbaad.

saurabh dwivedi said...

आपका लिखा पढ़कर अच्छा लगता है। बहुत बहुत दिनों में कुछ लिखा जाता है, जो बहुत छोटा होकर भी बहुत ज्यादा पर्याप्त लगता है। कम अज कम मैं तो उस सांप या अजगर की तरह महसूस करता हूं, जिसने बहुत बड़े आयतन का जीव निगल लिया और अब उसे पचाने में वक्त लगेगा। न न मैं ये नहीं कह रहा कि संरचना बहुत जटिल होती है, बल्कि ये कहूंगा कि संरचना जीवन की तरह ही पाई है अब तक आपके लिखे की, जीवंतता और पेचीदगियों से भरपूर। कविता आत्म से उपजी है, इसलिए उसके बिम्ब ज्यादा बेहतर बने हैं। कविता के बारे में ज्यादा समझ तो नहीं, बल्कि सच कहूं तो साहित्य भी कहां ही समझता हूं, मगर अच्छा लगा तो खुद को रोक नहीं पाया। मधुमिता की तस्वीर भी कविता के असर को गाढ़ा करती है। दोनों को बधाई

Anonymous said...

यह कविता अच्छी है, बेहद अच्छी। शायद इसीलिए इसे बार-बार पढ़ने को जी चाहता है। मैं कई बार पढ़ गया। लेकिन भाई, आपकी बाकी सात कविताएँ तो मैं अभी तक नहीं पढ़ पाया हूँ। क्या उन्हें भी आप किसी एक पोस्ट में एक साथ प्रस्तुत नहीं कर सकते। जब किसी कवि की एक कविता अच्छी लगती है तो उसकी बाकी रचनाएँ भी पढ़ने का मन करता है। मेरी शुभकामनाएँ।
--अनिल जनविजय

Madhukar said...

प्रिय अनुराग जी
अब तक की लाइफ में मैं कविता और कविता दोनों को बेहतर तरीके से समझ न सका, लेकिन इतना जरूर है की जब भी दोनों दिल को भाई तो मैंने तहे दिल से तारीफ की अपने अंदाज में
आपकी कविता पढ़ने के बाद ५-७ साल पीछे लौट गया और दिल कुछ यूँ गुनगुनाने लगा क्योंकि आज कल मौसम का भी मिजाज भी कुछ ऐसा ही है......

किसने भीगे हुए बालों से ये झटका है पानी, झूम कर आई हवा, झूम कर आई हवा, टूटकर बरसा पानी
मधुकर

नवीन रांगियाल said...

मै कुछ कह नहीं सकता ... !!!

पूनम said...

बहुत अच्छे अनुराग...तुम दिल से लिखते हो...लिखते रहो और ऐसे ही अच्छा लिखते रहो...
पूनम

Navneet gautam said...

bohot khoob... lafz nahi hai abhi... beshak qaynat me iske liye jab kabhi koi lafz hoga to zarur dunga... filhal to bohot khoob.

Sheetal Tewari said...

bahut acha laga padhke.dil ki baat.ekdum dil se..bahut sundar

Archana said...

कविता वगैरह के मामले में मैं थोड़ी कमज़ोर हूं, लेकिन पढ़कर अच्छा लगा। ग्रेट... इसी तरह अच्छी रचनाएं तैयार करते रहिए।

Nirjesh said...

Really you have written a very nice poem. Basically I have no interest in poem but after reading your poem i want to be like you. Now i am falling in love with poem.

अपना आंगन said...

kai jagah samajh nahi paya kyonki main shabdon ka dhani nahi hun. Lekin jahan samjh me ayee, wahin thodi der ke liye ruk gaya. kash main poori tarah samajh pata.
dhanyawad, aapne phir achhi chij padhayee.

Ratnesh said...

priya anuragji
bahut dino se main aap ka blog nahi padh paya tha. or aaj itani anmol kavita pdhane ko mili...
aap apka blog sachmuch me adbhut hai....or aap to..

Fauziya Reyaz said...

waaaahhh...dil khush ho gaya aur udaas bhi

NP said...

I don't know how to write in Hindi here, so I would like to take your permission to say something. After long have I read a poem, that too a Hindi one. I feel there a poem turns into a poem only when the reader either aspires to or is intrigued by or identifies with the life/instance the poem spwaks of. as for this piece of creation, to be inspired by a a clutcher... outstanding. And never to touch/wash that clothing again that had once been touched by someone dear to you.... that is a sentiment many of our age will identify with...

RSUDESH said...

हुमायूँ'ज टॉम्ब, शाकुंतलम थियेटर और परांठे वाली गली तुम साथ ले गई.
अब वे मेरी याद के नक़्शे में हैं, शहर दिल्ली में कहीं नहीं.

बहुत बढिया...

lalit said...

यादों की खि‍डकी जरूरी नहीं कि‍ ठंडी हवा के झौंके ही अंदर आने दे, कभी कभी हवा में अजीब सी उमस या ठंडक और तपि‍श की मि‍श्रि‍त छुअन हो सकती है। लेकि‍न चार दीवारी में बंद अहसास जब घुटन महसूस करने लगें तो खुली खि‍डकी उसे घुटन से जरूर आजाद कर देती है। तुम्‍हारी कवि‍ता मुझे कुछ वैसी सी लगी। तुम्‍हारी कवि‍ता तुम्‍हारे अहसास की उपज है, लेकि‍न आगे चलकर यह मेरे जैसों के अहसास को भी आकार देने लगती है। तुम्‍हारी क्‍या, कोई भी कवि‍ता मेरे लि‍ए तो ऐसी ही होती है। मुझे तुम्‍हारी कवि‍ता अच्‍छी लगी।

प्रवीण पाण्डेय said...

नयापन लिये हुये, शब्दों की आवारगी में झूमती कविता ।

nilm said...

amazing inventiveness,infused with passion and grief.

Priyankar said...

यह कविता ढाई आखर का दुहराव नहीं अजपा जाप है .हमेशा गूंजने वाला अनहद नाद. यह गिनती को भूलने और जीवन को याद रखने की कविता है .जीवन तो उतना ही है जितना प्रेम-परीक्षित है. बाकी तो छोड़ा हुआ या छूटा हुआ है . गिनती के बाहर .

मेरे तईं यह गत-प्रेम की या नॉस्टेल्जिया की उतनी नहीं जितनी लौटते प्रेम की पदचाप पर कान धरती कविता है. प्रेम की प्रतीक्षा की . विपरीत हवाओं के बीच दिये को जगाए रखने की .लौ को बचाए रखने की .

निजी अनुद्धत शैली में अनूठी प्रेम कविता .

चन्दन said...

अच्छी कविता!
You should further explore this diction.

Geet Chaturvedi said...

बहुत सुंदर.

कविता जितनी पर्सनल इंट्रोस्‍पेक्‍शन की है, उतनी ही इन्‍वाइटिंग भी. यहां भी वही है. कुछ बहुत जाने-पहचाने और कुछ अपनी निजता में विशेष, बिंबों के बाद भी अपने असर में रहस्‍यमयी है.

मित्रों का यह कहना सही है कि पहले की सात भी यहां लगाई जाएं.

बोधिसत्व said...

मेरा हरा कुर्ता हैंगर का होकर रह गया है.
मानो उसे तुम्हारे हाथों ने दुलारा ही नहीं.

अच्छा है भाई....और कविताएँ पढ़वाएँ

Shrikant Dubey said...

कमाल है ये कविता. और ऐसी कविताई के नाते, बेशक आप भी.
मेरी कमीनगी, की इसे आज पढ़ पाया.

खैर "लव इन द टाइम ऑफ़ कालरा' भी उसे लिखे जाने के बीस साल बाद पढ़ा था, फिर भी वो उतनी ही महान रही.

आगे सिर्फ एक और बात, ... ... और भी लिखिए, खुद के लिखने पर भी कांसंट्रेट करिए.

Rukaiya said...

udassi ki bhi apni khubsurti hoti hai ...jo is kavita me jhalkti hai ...