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आलोचना का पक्ष : २ : नामवर सिंह


आलोचना में पहचान का भी महत्‍व है

जब कोई किसी कविता की गलत व्याख्या करे तो उसे जोर से पढ़वाकर सुनिए. ग़लती पकड़ में आ जाएगी.

किसी रचना में पकड़ने की असल चीज़ है 'स्वर' ! इस स्वर में लेखक की खामोशियाँ भी शामिल हैं; बल्कि ये 'खामोशियाँ' ज़्यादा मानीखेज होती है। घनानंद की 'मौन मधि पुकार' और क्या है? आनंदवर्धन की घंटे-सी गूंजती हुई 'ध्वनि' का अर्थ और क्या है?

कोई रचना अच्छी लगे, लेकिन ठीक-ठीक वजह का पता न चल पाए तो भी आलोचक में यह कहने का साहस होना चाहिए कि रचना अच्छी है. आलोचना में पहचान का भी महत्व है.

आलोचना जैसी कोई निरपेक्ष वस्तु नहीं होती, सिर्फ आलोचक होते हैं- अच्छे या बुरे.

आलोचना औज़ारों का बक्सा नहीं, जिसे पाकर कोई आलोचक बन जाए. अक्ल हो तो एक पेचकस ही काफी है!

कवि अपने बारे में कहे तो कविता हो सकती है, पर आलोचना तो तभी होती है जब रचना के बारे में कहा जाए. आलोचक को अपने बारे में कहने की छूट नहीं है.

आलोचना के बारे में भी आलोचना हो सकती है, ठीक उसी तरह जैसे कविता के बारे में कविता. आत्मरति के खतरे कहां नहीं हैं?

सार्थक उत्तर अपने ही प्रश्नों के होते हैं, लेकिन इसका अर्थ वही समझ सकते हैं जिनके पास अपने प्रश्न हों...

गेटे ने कितना सही कहा था कि हम सचमुच उन्हीं पुस्तकों से सीखते हैं जिनकी आलोचना नहीं कर सकते. अभागे आलोचक के भाग्य में ऐसी पुस्तकें कितनी होती हैं?

मक्स वेबर अक्सर कहा करते थे : 'हर आदमी वही देखता है जो उसके हृदय के पास होता है.' वे गर्दन झुका सकते थे, निगाहें नीची कर सकते थे.

बड़े आलोचकों में कौन है जिसका कोई 'अंधविंदु' न हो! क्या वह 'अंधविंदु' ही उसकी 'अंतर्दृष्टि' का कारण नहीं? पाल डि मान ने इसी को लेकर एक लम्बा-चौड़ा सिद्धांत रच दिया है. प्रज्ञाचक्षु आलोचक सुख की नींद सो सकते हैं!

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{ इससे पहले इस स्तंभ में आप वागीश शुक्ल के विचार-विंदु पढ़ चुके हैं.
नामवर
सिंह की ये पंक्तियाँ उनकी पुस्तक ''वाद विवाद संवाद'' के आखिरी पन्नों से साभार. }
5 comments:

अनुराग ये बहुत काम की चीज़ लगायी आपने. कई जटिल प्रसंगों में ....आज भी... अब भी नामवर जी ही काम आते हैं....इसीलिए वे नामवर जी हैं....उन्हें मेरा सलाम.


shabad ke bahane namwarji ko salaam.


नामवर जी कहा सदैव महत्व का होता है। यह हिंदी का भाग्य है कि नामवर जी उसके पास हैं....उनका होना हिंदी की जय जय कार है


बड़ी कठिन राह प्रस्तुत की है आलोचना की । जब पुस्तकों से कुछ भी सीखना संभव न हो तो बड़ी ही रूखा हो जायेगा उन्हे पढ़ना ।


bahut badeea! pad ke mazaa aa gaya!


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

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