Friday, July 02, 2010

रूढि़यों की राजनीति


सबद पर 'स्मृतिरेख' लिखा था, कुछ लोग उसे रपट वगैरह क्यों बोल रहे हैं, समझ नहीं आता? ...स्मृतिरेख भी नेमाड़े जी को फोकस करता है, पंकज प्रसंगवश हैं... अगर रपट और स्‍मृतिरेख का विधागत फर्क कर लिया जाता, तो भी बेहतर होता...खैर...

एक ब्लॉग पर अब पंकज का लोकार्पण-समरोह में दिया गया वह वक्तव्य छपा है, जिसे मैंने मूर्खतापूर्ण पाया था. जिस साथी ने भी उसे लिख भेजा है उन्हें धन्यवाद, क्योंकि मैं इसे मेरे पास उपलब्ध होने के बावजूद वीडियो से कागज़ पर लिखने का व्यर्थ उद्यम कभी नहीं करता. वह इतना बासी है कि उसे सुनना पांच दशक पहले की कहानी की बहसों में पड़ना है, जिसे मैंने उसी 'स्मृतिरेख' में 'रूढि़यों की भी राजनीति' करना बताया है...

आइये विचारें कि यह राजनीति हिंदी के धंधई लेखक कैसे करते हैं...अव्वल वो नए को पढ़ना गवारा नहीं करते...फिर लोकार्पण आदि के बहाने पढ़ने की कोशिश करते हैं तो उनके पुराने पढ़े संस्कारी-मन पर अगर नए से कुछ खंरोच लग जाती है तो बिलबिलाने लगते हैं...ऐसे में अपढ़ दिनों में पोसी गई उनकी ''समझ की रूढ़ियाँ'' उनका सहारा बनती हैं...और वे उसी के हवाले से अपने फैसले सुनाते हैं...कहना ज़रूरी है कि गीत की एक- डेढ़ कहानियों के पाठक पंकज बिष्ट का उनकी कहानियों और पात्रों के बारे में दिया गया फैसला और मासूम-शिकायतें इसी कोटि की है... अब चूंकि पंकज ने इन्‍हीं डेढ़-दो कहानियों पर बात उठाई है, तो मैं अपनी तरफ से उन्‍हीं मुद्दों पर बात करूंगा...

जिन साथी ने रपट भेजी और नियामक ने जिस तत्परता से उसे छापा, उससे अंदाज़ा लगता है कि उन्हें तथ्यों को जांचने का अवकाश नहीं मिला होगा...वरना कम से कम नियामक अपनी तरफ से यह बात शुरू या अंत में जोड़ते कि 'न्‍यूज ऑफ अ किडनैपिंग' मारकेस का नॉवेल नहीं, जैसा कि पंकज कहते हैं, बल्कि यह मारकेस का अत्‍यंत चर्चित नॉन फिक्‍शन, जर्नलिस्टिक वर्क है....खैर... चीनी कवि बेई दाओ को अंग्रेज़ी का कवि कहना... मारकेस के नॉन-फिक्‍शन काम को उनका नॉवेल बता देना... यह सब सोच के सिलसिले हैं जो गुरुडम से पैदा होते हैं...

वह पूछते हैं कि सावंत आंटी की लड़कियां में ऐसा-ऐसा क्‍यों है... बिना ब्‍लैक ह्यूमर को पकड़े वह सवाल उठा रहे हैं... इस पर क्‍या कहा जाए... कहानी से उनकी मांग किस तरह असंगत है... जैसे कि लड़कियां भाग क्‍यों रही हैं... उस कहानी में ही इसका उल्‍लेख कर दिया गया है, जब यह बताया जाता है, डार्क ह्यूमर के ही सहारे कि उस कॉलोनी में कोई परेशानी नहीं, किसी का पानी नहीं जाता था, किसी के यहां बिजली नहीं जाती थी, परेशानी थी तो सिर्फ इतनी कि लड़कियां जवान हो रही थीं और लड़के भी... सबकी जवानी छाती फोड़ बाहर निकल रही थी... कहानी के भीतर ऐसे व्‍यंग्‍य के बाद भी वह इस तरह का सवाल उठाते हैं, यह पढ़ते समय उनकी उस असावधानी की ओर इशारा करता है, जहां वह व्‍यंग्‍य का सुविधापरस्‍त अभिधात्‍मक अनुवाद कर लेते हैं...

'पिंक स्लिप डैडी' के संदर्भ में पंकज ने गीत को लैटिन अमेरिकी मैजिक रियलिज़म के प्रभावों में लिखने वाला बताया है...यह भी 'न्‍यूज ऑफ अ किडनैपिंग' को नॉवेल बता देने और ग़लत कोट करने जैसी ही एक मक्कार-गलती है... दरअसल 'पिंक स्लिप डैडी' पूरी तरह मैजिक रियलिज्‍म का निषेध है. वह मैजिक रियलिज़्म के सिद्धांतों, औज़ारों आदि को तोड़ते हुए लिखी गई कहानी है. सिनिसिज़्म या सनकीपन जिसकी ओर पंकज का इशारा है, वह कभी मैजिक रियलिज़्म का प्रमुख औज़ार नहीं रहा, बल्कि मैजिक रियलिज़्म में एक ख़ास कि़स्‍म की नज़ाकत होती है, जो इस कहानी में नहीं है. एस्‍ट्रैंजमेंट या एलियनेशन, जिसे इस कहानी की एक थीम के रूप में गीत ने अपने इंटरव्‍यू में बताया भी है, ज़रूर दिखता है. नॉन फिक्‍शन को फिक्‍शन कहने वाले पंकज मैजिक रियलिज़म की जगह कुछ और तो नहीं कहना चाहते थे, या स्‍मृति धोखा खा गई? यह महसूस होता है कि पंकज को लातिन अमेरिका की बूम पीढ़ी के मैजिक रियलिज़म के बाद हुए तोड़-फोड़ और बदलावों के बारे में जानकारी नहीं है, इसीलिए लातिन अमेरिकी प्रभावों की बात में वह सिर्फ मैजिक रियलिज़म तक ही पहुंच पाते हैं. बूम के बाद 'क्रैक' कथा आंदोलन भी चल रहा है, जो पूरी दुनिया के फिक्‍शन को प्रभावित भी कर रहा है. यह कथा आंदोलन बूम और उसके मैजिक रियलिज़म का मुखर विरोध है.

'पिंक स्लिप डैडी' को आर्थिक मंदी की कहानी कहना यह बताता है कि पंकज कहानी के कितने खराब पाठक हैं... मंदी आखि़र के कुछ पन्‍नो में महज़ एक घटना की तरह आती है, जो कहानी के प्‍लॉट का विस्‍तार तो करती है, लेकिन वह पीएसडी की मानसिकता में तेज़ी से परिवर्तन का बायस बनती है... वह दिखाती है कि कैसे मैनेजमेंट अपरिमेय क्रूरता को हासिल कर सकता है और बहुधा उसकी सार्वभौमिक क्रूरता के पीछे एक छिपा हुआ व्‍यक्तिगत कारण होता है, जिसे वह आदमी कंपनी का फ़ैसला बता देता है. पीएसडी छंटनी के कंपनी के फ़ैसले का प्रयोग अपने जीवन में आई महिलाओं द्वारा मिले अपमान (दरअसल वह ख़ुद सबका अपमान और इस्‍तेमाल करता है, लेकिन उनकी प्रतिक्रियाओं को अपना अपमान मानता है; यह वह पुरुष-प्रवृत्ति है, जिसे गीत ने अपने इंटरव्‍यू में 'प्रोटोटाइप मिडिल क्‍लास मस्‍कुलीन ट्रेट' कहा था.) का बदला लेने में करता है. वह अपने आक्रोश और कुंठा में निरपराध मासूम कर्मचारियों को अपमानित करके उन्‍हें नौकरी से निकालता है. यह उसका डिफेंस मैकानिज़म है. जब यह कहानी उन लोगों पर नहीं लिखी गई है, जिन्‍हें छंटनी-मंदी की मार झेली, तो पंकज का यह सवाल उठाना ही हास्‍यास्‍पद और अनुचित लगता है कि इसमें उन लोगों का दुख दर्द क्‍यों नहीं?

कॉर्पोरेट में स्त्रियों के मानसिक, भावनात्‍मक या शारीरिक शोषण पर आए दिन रपटें आती रहती हैं, यहां उनमें जाना मेरा उद्देश्‍य नहीं, लेकिन पंकज ने पूछा है कि पीएसडी में स्त्रियों को महज उपभोग्‍य ही क्‍यों दिखाया गया है? पंकज फिर पढ़ें, पीएसडी में स्त्रियां सिर्फ भोग्‍य नहीं है, वे भोग भी रही हैं. पृशिला पांडे अपना इस्‍तेमाल नहीं होने दे रही, बल्कि वह पीएसडी का इस्‍तेमाल अपनी साधना के लिए कर रही है, जिसे पीएसडी उसका प्रेम मानने की भूल कर रहा है. नताशाबेन सारे लोगों का इस्‍तेमाल कर रही है. इसमें जो भावनात्‍मक रूप से कमज़ोर होता है, वह पाता है कि उसका इस्‍तेमाल कर लिया गया. और इस कहानी में सिर्फ स्त्रियां ही नहीं, पुरुष भी, सारे पात्र एक-दूसरे का इस्‍तेमाल करके फेंक दे रहे हैं. क्‍या वह पोतदार वाला प्रसंग पढ़ना भूल गए, जिसमें बरसों पुराना लॉयल पोतदार को जब अपमानित किया जाता है, तो यह भूल जाया जाता है कि उसने कितनी लगन से कंपनी के लिए काम किया था. ऐसा अपमान, जिससे उसे हार्ट अटैक हो जाता है. क्‍या मैनेजिंग डायरेक्‍टर जयंत लाल का इस्‍तेमाल नहीं कर रहा होता, और हमेशा उस मौके की तलाश में रहता है, जब उसे नीचा दिखाया जा सके।

अगर पंकज यह कहते कि यहां सब एक-दूसरे का इस्तेमाल कर फेंक दे रहे हैं, तो लगता कि उन्‍होंने न केवल कहानी को, बल्कि उस कहानी में आए हमारे मक्‍कार, धूर्त और अवसरवादी समय को भी बखूबी पढ़ा है. पर पंकज पुरातन शैली में सिर्फ महिला-पुरुष के भेद तक ही रह गए। भेद भी क्‍या, सिर्फ महिलाओं की स्थिति तक ही। वह पुरुष-प्रवृत्ति प्रधान परिवेश की कहानी है, जिसमें हर पात्र की स्थिति उस परिवेश के चंगुल में उसी तरह फंसे रहने का चित्रण है.

यह अपर मिडिल क्‍लास के उन लोगों की कहानी है, जिनका हर कार्य व्‍यवहार अंग्रेजी में चलता है. उसका चित्रण करने के लिए कथाकार अंग्रेजी के शब्‍दों को कैसे छोड़ देगा ? इस कहानी में संवाद बहुत कम हैं, जहां हैं भी, तो अंग्रेज़ी का ही प्रयोग है, यह भी जनाने के लिए कि यहां सारी अनुभूतियां अंग्रेजी में ही व्‍यक्‍त होती हैं। यह इस बात का भी संकेत है कि इन्‍होंने पराएपन को इतना अपना लिया है कि वह उनका अपना सेल्‍फ नजर आने लगता है. यही होमोजेनाइजेशन और क्‍लैश के भी सूत्र मिलते हैं। अपनी 'रूढि़यों की राजनीति' पोषित समझ में पंकज अगर निपट मासूमियत से यह पूछ बैठें कि फिर लेखक ने इस कहानी को हिंदी में क्‍यों लिखा, अंग्रेजी में क्‍यों नहीं लिख दिया, तो आश्‍चर्यचकित नहीं होना चाहिए।

फिर पंकज कहते हैं, 'दुनिया में बहुत ही कम लेखक ऐसे हैं जिन्होंने लंबी कहानियां लिखी हैं। जो लिखीं हैं वह इक्की-दुक्की हैं।' हैरत है कि पंकज ऐसा जानते हैं, जानते ही नहीं, इसे जानने को इस तरह जनाते भी हैं. टॉल्‍स्‍टॉय की ‘इवान इल्यिच की मृत्‍यु’ और ‘हाजी मुराद’, चेखोव की ‘इन द रैवाइन’ और ‘वार्ड नंबर सिक्‍स’, तुर्गनेव की ‘फर्स्‍ट लव’, ज्‍वॉयस की ‘द डेड’ (डब्‍लाइनर्स में), ज्‍वाइग की ‘द रॉयल गेम्‍स’, हुआन रूलफो की ‘पेद्रो पार्रामो’, जॉन स्‍टाइनबैक की ‘ऑफ माइस एंड मैन’ और ‘द पर्ल’, सॉल बेलो की ‘सीज़ द डे’, जोसेफ कॉनरेड की ‘शैडो लाइन’, मारीयो वरगास योसा की ‘द कब्‍स‘ आदि लंबी कहानियों के अनगिनत उदाहरण हैं. यहां तक कि पापा हेमिंग्‍वे की ‘द ओल्‍ड मैन एंड द सी’ का पहला प्रकाशन 'लाइफ' पत्रिका में लंबी कहानी या नॉवेला के रूप में ही हुआ था. फिलिप रॉथ का महत्‍वपूर्ण लेखन ‘द डाइंग एनिमल’, ‘एवरीमैन’ आदि लंबी कहानियों में ही हुआ है. हिंदी में ही निर्मल वर्मा, अखिलेश और उदय प्रकाश ने यादगार लंबी कहानियां लिखी हैं। और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं।

किस आधार पर पंकज यह बात कहते हैं कि 'दुनिया में बहुत ही कम लेखक ऐसे हैं जिन्होंने लंबी कहानियां लिखी हैं। जो लिखीं हैं वह इक्की-दुक्की हैं।' लंबी कहानियों के लिए अंग्रेजी में नॉवेला शब्‍द चलता है, लांग शॉर्ट स्‍टोरी नहीं. जैसे हिंदी में शॉर्ट स्‍टोरी के लिए कहानी शब्‍द मान्‍य है, लघुकथा नहीं. पंकज यह कह सकते हैं कि वह नॉवेला को लंबी कहानी क्‍यों मानें ? कह सकते हैं तो कह सकते हैं. पर जब वह काफ्का की ‘मेटामॉर्फासिस’ को लंबी कहानी कह सकते हैं, जबकि उसे अंग्रेजी में नॉवेला के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, तो उन्‍हें बाकी के नॉवेला को लंबी कहानियां मानने में परहेज नहीं होना चाहिए. गीत ने अपनी लंबी कहानियों को नॉवेला ही कहा है। और लंबी कहानियां इस दौर में कितना प्रमुख हैं, यह साइंस फिक्‍शन के लीजेंड रॉबर्ट सिल्‍वरबर्ग की इस बात से भी पता चल जाता है कि

The novella is one of the richest and most rewarding of literary forms...it allows for more extended development of theme and character than does the short story, without making the elaborate structural demands of the full-length book. Thus it provides an intense, detailed exploration of its subject, providing to some degree both the concentrated focus of the short story and the broad scope of the novel.

तो पंकज की यह बात ही निराधार है कि दुनिया में लंबी कहानियों की कोई परंपरा नहीं। अगर उस परंपरा को जाना जाए तो गीत की कहानियों को पढ़ने में उन्‍हें आसानी होगी और गलत दिशाओं की ओर निष्‍कर्ष खोजने जाने का उनका श्रम भी बचेगा...

उस ब्‍लॉग पर नेमाड़े जी के वक्‍तव्‍य को भी आधा-अधूरा इस तरह से लिखा-छापा गया है, जैसे उन्‍होंने पंकज की बातों का समर्थन किया हो, और यह दावा किया भी गया है। नेमाड़े जी ने कहानी की जगह लघुकथा शब्‍द का प्रयोग किया था, जो कि शॉर्ट स्‍टोरी के लिए मराठी में प्रयुक्‍त होता है। उनका कहना था कि एडगर एलन पो, चेखोव, मोपासां और ओ हेनरी लघुकथा (अंग्रेजी में शॉर्ट स्‍टोरी, हिंदी में कहानी) की सारी संभावनाओं को इतने बेहतरीन तरीके से एक्‍सप्‍लॉयट कर चुके कि उसमें कोई नई संभावना नहीं बचती। मराठी में एक समय लघुकथा का ज़ोर था, जिसके खिलाफ हम लोगों ने आवाज उठाई थी और यह कहा था कि यह कॉमर्शियल वैल्‍यू की कहानियां हैं, शनिवार रात को बैठे, सोमवार सुबह अखबार को भेज दी। उसकी जगह हमारे लेखकों को दीर्घकथा (लंबी कहानी के लिए मराठी शब्‍द, नॉवेला के आशय वाला) या कादंबरी (उपन्‍यास का मराठी) की तरफ जाना चाहिए। उन्‍होंने गीत की सराहना की कि वह लघुकथा की जगह दीर्घकथा में काम कर रहे हैं। और जब उन्‍होंने अशोक माहेश्‍वरी से मंच पर कहा कि उन्‍हें लघुकथा छापना बंद कर देना चाहिए, तो उन्‍होंने बाकायदा लघुकथा शब्‍द का प्रयोग किया, इससे उनका आशय कहानी, शॉर्ट स्‍टोरी से था, न कि दीर्घकथा, लंबी कहानी, या नॉवेला से...

नेमाड़े जी की टिप्‍पणी को ही इतने गलत तरीके से उद्धृत करके उस ब्‍लॉग ने बता दिया है कि उसका उद्देश्‍य कुछ और है- शायद पंकज के हास्‍यास्‍पद, जानकारियों से अछूता, अज्ञानी, खराब और अधूरी रीडिंग से प्रेरित वक्‍तव्‍य के पक्ष में नामी-बेनामी समर्थन हासिल करना... मैंने विस्‍तार से वे कुछ मुद्दे गिना दिए (और भी हैं, जिनका जिक्र और समय ले लेगा), जिनके आधार पर मैंने उस वक्‍तव्‍य को ‘मूर्ख वक्‍तव्‍य‘ कहा था। क्‍या अब भी आपको इस वक्‍तव्‍य के सयाना होने का विश्‍वास है? अगर है, तो कुछ नहीं किया जा सकता...

मैंने सिर्फ दो पंक्तियां लिखीं, वह भी नेमाड़े जी पर ‘स्‍मृतिरेख’ लिखने के सिलसिले में...मैं कार्यक्रम को छूता हुआ गुज़र गया, क्‍योंकि मुझे रपट नहीं लिखनी थी... इसलिए उसके विस्‍तार में नहीं गया...पर मेरी दो-तीन ‘आलोचनात्‍मक’ पंक्तियों पर इतना बवाल कर दिया गया... बदतमीज, अहंकारी आदि कहा गया... यार लोग मुझसे सवाल करने लगे कि पंकज ने गीत की कहानियों की आलोचना की, तो मैं क्‍यों असहिष्‍णु हो रहा ? दो-तीन पंक्तियों पर इतना बवाल क्यों?, जबकि मैं तो तीस मिनट का पंकज का वह वक्‍तव्‍य सुनकर आया था। असहिष्‍णु कौन साबित होता है?

व्‍यक्तियों का अनादर नहीं होना चाहिए, कहने वाले लोग यह क्‍यों नहीं सोचते कि रचनाओं का भी इस तरह अनादर नहीं किया जाना चाहिए, यदि उनमें कुछ नया, कुछ बड़ा, लीक से हटकर करने की कोशिश की गई हो... हमारी भाषा में वह अध्‍यवसाय कब पैदा होगा जब पाठक या आलोचक रचना के साथ साथ हाथ में हाथ डालकर यात्रा करें, अपनी ओर से भी उसकी ओर झुकें? कब तक सिर्फ रचना से ही इस बात की उम्‍मीद की जाती रहेगी?

इस साहित्‍य समाज में मेरी उपस्थिति क्षुद्र तिनके की तरह है, पर यह जरूर कहूंगा कि किताबों की दुनिया, अपने समय की दुनिया के बीच मैंने भी सिर गड़ाया है, खूब प्रयासों और मेहनत के साथ... अच्‍छी रचनाओं का अनादर, उनकी खराब रीडिंग मुझसे बर्दाश्‍त नहीं होगी... मैं अपनी क्षमता, समझ और सीमा के अनुरूप उनका विरोध करता रहूंगा। मैं ‘रूढि़यों की इस राजनीति’ का विरोध करता हूं, जो अच्‍छी रचनाओं पर कातिलाना हमले करने के ऐतिहासिक आख्‍यानों से भरी पड़ी है।

नेमाड़े जी को तो गलत कोट किया गया है, पर रपट से यह तो कम से कम साबित हो ही रहा है कि नामवर जी ने पंकज की बातों को नोटिस लेने लायक भी नहीं समझा...इसे भी एक विज्ञ आलोचक की उस मूर्ख-वक्तव्य की मौन अवहेलना ही मानना चाहिए...अपने परम आलस्य पर विजय पा सका तो नामवर जी का वक्तव्य कभी सबद पर वीडियो से उतारकर छापूंगा...

यह सब अंतत: उस नैतिक गिरावट की ही नोटिस है... और कुछ नहीं... अब हिंदी में वे दिन लद जाने चा‍हिए जब मंच पर कोई बिना पढ़े चढ़ बैठे और कुछ भी बोलकर निकल ले... फिर वह कोई कितना ही कुछ क्‍यों न हो... हम लिखकर असहमति जाहिर करेंगे...

2 comments:

बोधिसत्व said...

लोकतांत्रिक असहमति से किसे एतराज हो सकता है अनुराग। आपत्ति असहमति की भाषा और तरीके पर है। जैसे अभी इस लेख में आपने लिखा मक्कार गलती। गलती हो सकती है। यह मक्कार गलती क्या है। यह किस प्रकार की असहमति जता रहे हैं आप। क्या पंकज जी ने किसी खास तरह की वफादारी का उल्लंघन कर दिया है जिसके लिए आपको मक्कार गलती लिखना पड़ रहा है। खैर...आप स्वसंचालित शक्ति हैं और दुआ करूँगा कि यह शक्ति बरकरार रहे।

pakheru said...

गीत चतुर्वेदी के दो कहानी संकलनों के लोकार्पण के अवसर पर वरिष्ठ कथाशिल्पी और पत्रकार पंकज बिष्ट के वक्तव्य पर अनुराग वत्स की प्रतिक्रिया पढ़ी.. किसी भी वक्ता के सार्वजनिक वत्तव्य पर श्रोता को अपनी समझ और ग्राह्यता के अनुसार अपनी असहमति, घोर असहमति यहाँ तक कि आपत्तिजनक लगने पर प्रतिवाद उठाने की पूरी आज़ादी होती है और इस आज़ादी का समर्थन किया जाना चाहिए. किन्तु, यहाँ इस बात की अनिवार्यता से इंकार नहीं किया जा सकता कि श्रोता की अभिव्यक्ति वैचारिक तर्कों और उदाहरणों से युक्त, संतुलित और सहज भाषा में हो, न कि मात्र एक फतवा भर, बिना कोई आधार बताए अभद्र अशिष्ट भाषा में. इन चारित्रिकताओं से भरी किसी भी श्रोता की प्रतिक्रिया उस की असहमति ज़ाहिर नहीं करती बल्कि यह ज़ाहिर करती है कि श्रोता नें वक्ता द्वारा संकेतित तथ्यों को असहनीय पाया है और वह उस से बौखला उठा है, ख़ास तौर पर यह भी कि इस थोथी बौखलाहट में वह अपनी संस्कारहीनता भी उजागर कर बैठा है. यह स्थिति प्रतिक्रिया देने वाले को निंदनीय से ज्यादा दयनीय बनाती है..
अनुराग वत्स अपनी प्रतिक्रिया से बड़े फलक पर एक्सपोज़ हुए हैं. उनके साथ सहानुभूति की जा सकती है क्योंकि कि उनका कद और अनुभव का दायरा अभी बहुत छोटा है. यहाँ सीखने का पाठ गीत चतुर्वेदी के लिए है कि वह ऐसे बौने, विवेक रिक्त और बड़बोले तथाकथिक प्रशंसकों से बचें जिनकी कुल प्रबुद्ध पूंजी चाटुकारिता भर है, अन्यथा यह उनके लिए द्रुत यश अर्जित करने के बजाय छीछालेदर ही सामने लाएगा. निश्चित रूप से गीत चतुर्वेदी की रचनात्मक प्रतिभा उनके लिए जेनुइन पाठक और प्रशंसक जुटा सकती है.

अशोक गुप्ता

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