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Showing posts from July, 2010

जुगलबंदी : व्योमेश शुक्ल और बिस्मिल्लाह खाँ

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{ हमें आपको यह बताते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी के प्रखर युवा कवि-आलोचक व्योमेश शुक्ल को उनकी कविता ''बहुत सारे संघर्ष स्थानीय रह जाते हैं'' के लिए वर्ष २००९ का प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार दिया गया है. यह कविता सबसे पहले सबद पर १५ अप्रैल, २००९ को प्रकाशित हुई थी. व्योमेश की कविता पर वह बहसों की शुरुआत का दौर था, जो अब भी उनकी लगभग हर कविता के प्रकाशन के साथ जारी है. याद नहीं आता कि किसी एक कवि के आरंभिक सृजन को इतनी सराहना और स्वकृति पहले कभी मिली हो. व्योमेश अपने कवि-कर्म में लगातार निखर रहे हैं और उन्हें बधाई देने के इस दूसरे अवसर पर यह कहना अत्युक्ति नहीं कि उन्हें पढ़ना अब ज़्यादा पढ़ना होगा. किसी रियायत या लापरवाही से काम नहीं चलेगा.
हम कवि की इस उपलब्धि में उनके ही नव्यतम सृजन के रास्ते शिरकत कर रहे हैं. उन्होंने शहनाई के सरताज बिस्मिल्लाह खाँ को अपने गद्य में उनकी मृत्यु के चार बरस बाद उनके शहर और गलियों में खोजा है. व्योमेश का गद्य  प्रौढ़, प्रांजल, स्मृतिजन्य और जातीय है. वे शब्द नहीं उसके अनेक आकार-प्रकार को गद्य में याद करते हैं और ऐसी …

सूरज की तीन नई कविताएं

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( किस्से के मुताबिक एंगल्स के पास एक कवियश: प्रार्थी युवक पहुंचा और उसने वर्ग-संघर्ष का अपनी कविता में जिस सरलमति से अनुवाद कर डाला था उससे लगभग आश्वस्त था कि उस्ताद की तो दाद मिलेगी ही। एंगल्स ने अपनी बूढी आँखों से युवक की कविता लगाये रखने के कुछ लम्हे बाद बहुत चिंतित लहजे में कहना शुरू किया कि भई, तुम्हारी उम्र में तो युवक प्रेम करते हैं, और उनकी कविता को जीवन और विषय वही देता है, तुम यह क्या कर लाये! सूरज की कविताओं को पढ़कर यह लगता है कि उन्होंने यह किस्सा और इसमें निहित गूढ़ निर्देश को बहुत कायदे से गुना है। उनकी तीन नई कविताएं। )

परिमेय संख्याओं के जलसे में योगरूढ़ संख्या का अरण्यरोदन

यौगिक, सम, विषम
अपने लिये सब खतम

अपने गुणत्व से हरी, भाजक गुणों से लदी फदी
तमाम यौगिक, सम, विषम संख्यायें कर रही होती
दूसरी संख्याओं से प्रेम, उनकी चुहलबाजिया
मशहूर किस्से की तरह दुहराती हैं खुद को जैसे
बत्तीस लहरा रहा होता है दो, चार, आठ, सोलह
से चले अपने प्रेमिल किस्से
जैसे छत्तीस में शामिल तीन और छ: के सारे झगड़े
नहीं कर पाते उन्हें अलग, छत्तीस के आंकड़े का मुश्किल
मुहावरा भी।
तीन और छ: के मशहूर चुम्बन से उपजता …

सगरो अंजोर

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( ख़ुशी, धैर्य-ध्रुव, और रूद्र के लिए बड़े भाई-बहनों की तरफ से)

हमारे यहाँ छट्ठी होती है. छः दिन का जब मैं रहा होऊंगा तो क्या गाया गया था, मेरी याद के बाहर है वह. बाद में जब दिमाग़ यादों का घर बनने लगा तो भी छोटे भाई-बहनों के जन्म पर जो मंगल-गीत गाए गए, उसकी उसमें मुकम्मल जगह नहीं बन पाई. मेरा ध्यान गीतों में कम, उन आयोजनों के दौरान अपने हम उम्र के संग छुपम-छुपाई के खेल में ज़्यादा रहा. मैं यह नहीं कह सकता कि सोहर और बधाई सुनते हुए बड़ा हुआ हूँ क्योंकि सुना तो खूब पर तब गुनने का विवेक नहीं था. फिर यह भी था कि मैं एक ऐसे बदलते वक़्त में बड़ा हुआ जब हर अवसर पर गाए जानेवाले मंगल-गीत-- जिसे माएं, मौसियां और उनकी माएं गाती थीं-- को गाने वालों की तादाद घर में कम होती गई और सारे आयोजन अततः टेलीविजन के अनुवाद हो कर रह गए.

संजय उपाध्याय की नाटक-मंडली में सीताराम सिंह ''नांदीपाठ'' का संगीत देने आते थे, उनकी सोहबत में स्क्रिप्ट पर काम करने के बाद मैं भी साथी कलाकारों के साथ बैठ कर गाता-गुनता था. तब चाव बढ़ा. ''नांदीपाठ'' में अनेक भोजपुरी गीतों की जगह थी. भोजपुरी …

कथा : १ : उदयन वाजपेयी

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(छिटपुटकहानियोंकेछपनेकेबाद 'कथा' शीर्षकयहस्तंभअंततःसबदपरकुछविलंबसेहीसही, शुरूहोरहाहै. इसमेंकहानियों व उपन्‍यासों काप्रकाशनहोगा. स्तंभकीशुरुआतहमउदयनवाजपेयीकीकथा-कृतिसेकररहेहैं. यहकथा-कृतियहभीबतलातीहैकिएकआधुनिकमनकैसे परंपरा कीखोज-संभालकरताहै. खासकरऐसेसमयमेंजबहमारेयहाँयहवृत्तिबिसरादीगईहै, उदयनवाजपेयीकाकामएकअनुपममिसालकीतरहहमारेसामनेहै. कथाकेसाथदीगईचित्र-कृतिशिवकुमारगाँधीकीहै.)


समकालीनचित्रकलाकेसंसारमेंकुछदशकपहलेएकअद्भुतघटनाघटी. गौड़संप्रदायकेवंशावलीकारऔरगायकपरधानसमुदायकेएकसदस्यजनगढ़सिंहश्यामनेचित्रकलाशुरूकी. जैसेहीजनगढ़नेचित्रकलाकीयहअनूठीशैलीईजादकी, तमामपरधानचित्रकलाकीओर