भालचंद्र नेमाड़े से पहले मनुष्य की तरह मिलना होता है. मराठी हैं, यह उनकी हिंदी सुनकर लगता है. किसान होंगे, यह उनकी काया देख कर लग सकता है. लेकिन 'कोसला' और 'बिढार' के लेखक भी हैं, यह बताने पर ही ज़ाहिर होता है. दरअसल, ऐसे लोग अपने लेखक होने का सबसे कम पता देते हैं. इसीलिए पहले उन्हें मनुष्य की तरह मिलना/पाना होता है. हालाँकि मनुष्य की तरह मिलना सबसे आत्मीय ढंग से मिलना है, फिर भी उसमें ''पहली दफ़ा मिल रहे हैं'' का अहसास तो रहता ही है, लेकिन यहाँ तो यह अहसास भी नहीं. गीत को तो उन्होंने पढ़ा था और इसी नाते जानते थे, मुझ ना-कुछ के साथ तो यह भी नहीं था. पर वो मिल रहे हैं. और वो जारी हैं, हमें शामिल करके. पूछ रहे हैं, सुन रहे हैं...बातचीत चल पड़ी है... आप न कुछ में भी भरपूर रूचि ले रहे हैं...अभी होटल के कमरे में हैं, अभी आपके लिए एक कप चाय निकालेंगे. चाव से पियेंगें और इसकी परवाह नहीं करेंगे कि उनकी पकी हुई बड़ी मूंछें चाय का रंग पकड़ रही है. साहित्य का प्रसंग आएगा तो अपनी बात रखेंगे और ऐसे मानो बड़ी बातों को सहजता से कहने की आदत उनमें ७२ की उम्र ने नहीं डाली.
गीत चतुर्वेदी के कहानी-संग्रहों के लोकार्पण के लिए आए हैं, लेकिन गीत और मेरी उम्र के हो गए हैं और अब हम लोग इस बात से बेपरवाह कि शाम में लोकार्पण है, दिल्ली घूमने के नाम पर क़ुतुबमीनार देखने की इकठ्ठा चाहत पाल बैठे हैं. हम अपने ठिकाने से वहां जल्द पहुंचा देने वाली एक गाड़ी में सवार हुए हैं और क़ुतुब के परिसर में हैं. नेमाड़े जी मीनार और परिसर देख विभोर हो रहे हैं और इस बात से चकित हैं कि एक आम गर्म दिन में भी इस परिसर में करीब २५ हज़ार लोग आए हैं. सैलानी, जिज्ञासु, परिवार और प्रेमी...ज़्यादातर हमारी ही तरह किसी गाईड की मदद के बिना शिलालेख पढ़ने और उसे इंटरप्रेट करने में मसरूफ़ .
वे हमारी जिद पर कई जगह रुकते हैं और हम मराठी साहित्य में क़ुतुब जैसे ऊंचे कद के इस लेखक की तस्वीरें ले रहे हैं..वे अपनी दुनिया देखी हुई आंखों से हमें फर्क करके बता रहे हैं कि परिसर का कौन सा हिस्सा ठेठ हिन्दू काट का है...हम खुदे हुए अक्षरों से एकाध बार उनसे नज़रें बचाकर इसका अचरज भरा सत्यापन करते हैं...
क़ुतुब से लौटते हुए मेरे कमरे पर आए हैं....बहुत छोटा पैग व्हिस्की का लेकर किताबों की तरफ अपना रुख कर लिया है...और अब वे किताबें देख रहे हैं...फ़िल्में भी...हमारे सिने-प्रेम पर खुश हैं, किताबों के अटाले पर यह कह कर मुग्ध कि यह तो जीने का सबसे समृद्ध कबाड़ है... मुझे याद पड़ता है कि यह उनके आने वाले उपन्यास का थीम-सब टाइटल भी है, लेकिन यह याद नहीं पड़ता कि किसी बड़े लेखक ने इतनी देर तक और इतने चाव से चुपचाप एक उमस भरी दुपहरी में दूसरी भाषा की किताबों को यहाँ इतना दुलारा हो...
अब तैयार हैं...गीत अपने फिक्शन के हीरो के साथ स्टेज शेयर कर रहे हैं... नेमाड़े जी, नामवरजी और पंकज बिष्ट के बीच बैठे हैं...लोकार्पण का कार्यक्रम जारी है...पंकज मुख्य वक्ता हैं, और यह बताकर कि वे गीत के दोनों संग्रहों की ६ में से बड़ी मुश्किल से २ कहानियां ही पढ़ पाए हैं, अपना मूर्ख-वक्तव्य शुरू करते हैं और उसे लगभग हास्यास्पद होने की हद तक खींचते जाते हैं... (बलिहारी समझ की!!!)... उनके सवालों से ऐसा लगता है कि... अब 'रूढि़यों की भी राजनीति' होनी है... नेमाड़े जी पंकज का हल्कापन अपने वक्तव्य से ढांप लेते हैं और नामवर जी के अध्यक्षीय वक्तव्य से ऐसा लगा कि उन्होंने गीत की कहानियों के साथ 'क्षण-भर' नहीं, कम से कम आज दिन-भर की संगत की है... उपरांत-गोष्ठी में नेमाड़े जी जैसे गैर हिंदी-भाषी तक नोट करना नहीं भूलते कि क्यों नामवर के यहाँ आलोचना इतनी समृद्ध है...

Tuesday, 29 June, 2010
आभार सरलमना साहित्यकार से परिचय कराने का ।
Tuesday, 29 June, 2010
नेमाड़े जी से मुखातिब होना अच्छा लगा. लोकार्पण की विस्तृत रिपोर्ताज होती तो अंतिम हिस्सा और ज्यादा पठनीय हो जाता.
Tuesday, 29 June, 2010
अच्छा लगा......एक कवि या बेहतर लेखक होने से भी ज्यादा जरूरी है एक बेहतर मनुष्य होना ...क्यूंकि एक बेहतर समाज के लिए यही सबसे पहली शर्त है ....
गीत जी को शुभकामनाये
Tuesday, 29 June, 2010
सबसे पहले तो गीत को ईर्ष्या से भरपूर बधाई । कितना लिख लेते हो भाई!
नेमाड़े जी से मुलाकात कमाल की रही ! यह रपट ज़रा विस्तार से लिखी होती तो एक अच्छा संस्मरण बन जाता।
नेमाड़े जी के बारे में थोड़ी और जानकारी दें।
Tuesday, 29 June, 2010
अनुराग भाई, पंकज बिष्ट ने क्या मूर्ख वक्तव्य दिया, और महामहिम नामवर जी ने कैसे एक दिन की संगत निभाई, इसे भी टीपें. तभी बात साफ होगी.
नेमाड़े जी जैसा आदमी ही साहित्य को सच में जीता है. मेरा निजी मानना है कि आदमी का कद कवि/कहानीकार के कद से हमेशा बड़ा होना चाहिए.
मैंने गीत का साक्षात्कार पढ़ा. कई जगह घोर असहमतियाँ हैं. पर मैं फिलहाल इस पर कुछ नही कहूँगा. वैसे भी मैं नियमित ब्लागर नहीं हूँ. बस यही विनम्र पर निजी सलाह है कि किसी बात पर बहुत आथरटेटिव होने से बचना चाहिए. साथ ही कवि/कथाकार के परिचय में विशेषणों के प्रयोग से भी बचना चाहिए.
Tuesday, 29 June, 2010
aashchary yah hai ki kisne kya kaha yah kahin nahi bataaya gayaa bas fatve zari ka diye gaye.
pankaj ji ne (aur sirf unhe hi ji se mahroom kiya gaya hai) kya kaha yah bataya jana zaroorii hai aur phaisala pathkon par chodna chahiye.
aaya geet ko badhai dene tha par kshubdh hokar ja raha hoon.
Tuesday, 29 June, 2010
गीत भाई को बधाई और निमाड़ जी से परिचय करवाने के लिए धन्यवाद. मै आम तौर पर शबद से गुजरता रहा हूँ. कई बार सोचा भी टिप्पड़ी ... पर अफ़सोस यह है कि पहली ही टिप्पड़ी ऐसे अवसर पर दे रहा हूँ जब आपने रिपोर्ट का अंतिम पैरा लिखते-लिखते आपने मन खट्टा कर दिया. पंकज बिष्ट जी एक शानदार कथाकार ही नहीं हैं वो समयांतर जैसी पत्रिका भी निकाल रहे हैं. मेरे ख्याल से फ़िलहाल को छोड़ दिया जाये तो हिंदी भाषा में कोई भी ऐसी पत्रिका इत्ते बड़े पैमाने पर नहीं निकलती. एक स्थापित कथाकार का ये अतिरिक्त योगदान ही है. ऐसे व्यक्ति को मुर्ख बताना वो भी बिना कारण बताये एक निंदनीय और घटिया कृत्य है... आपसी भाईचारे के लाड में आपने ऐसा किया है तो भी ये निंदनीय है. शबद क्या अपनी कुंठा निकलने का साधन बनता जा रहा है.
सिर्फ कुछ रचनाये पड़ी होने कि बात स्वीकारना तो ईमानदारी है ... उसकी बजाये क्या झूठ बोलकर वो ज्यादा समझदार हो जाते. (जैसे अक्सर लोग हो जाया करते हैं ..इस तरह के जलसों में तो खासकर). आपको माफ़ी मांगनी चाहिए अपने उद्धरण के लिए या फिर कारण बताएं कि कि आपने ऐसा क्यों लिखा.
Tuesday, 29 June, 2010
अपने बदतमीज़ होने का सबसे अधिक मुजाहिरा...
Tuesday, 29 June, 2010
अनुराग भाई,
अशोक कुमार पांडेय और पवन मेराज ने जिस तरफ इशारा किया है, उस पर सबद की पूरी टीम को संजीदा होकर सोचना चाहिए.
सबद की फितूर यह है कि वह हर बार रचना पर टिप्पणी करने से पहले रचनाकार पर भारी भरकम टिप्पणी कर देता है और इस तरह वह रचनाकार के प्रति पहले से ही एक हौव्वा जैसा कुछ तैयार कर देता है.
विनम्र और उत्तम तो यह है कि आप बस रचनाओं को पाठको के सामने रखें. रचनाओं और रचनाकार पर कोई अकादमिक, अध्यापकीय प्रस्तावना न टीपें. हम सब हिंदी के पाठकों के लिए ही रचनारत हैं. किसी पश्चिमी पाठक वर्ग के लिए नहीं. हिंदी के पाठकों को कमतर और कम पढा़-लिखा न समझें. गांव-जवार में बसे-धंसे हिंदी के पाठक भी देर-सबेर सही निर्णय करते हैं. इस देश में किसान अकसर विद्वानों से कहीं ज्यादा ज्ञानी साबित हुए हैं.
और एक बात. ब्लाग की पहुँच अभी भी पत्र- पत्रिकाओं की तुलना में काफी कम है. इस पर किसी रचना की परख, पहुँच और व्यापकता को लेकर आत्ममुग्ध होने की जरुरत नहीं है। हमें ब्लाग पर काम करते हुए यह ध्यान में जरुर रखना होगा कि यह संवाद और सूचना का जरिया भर है. पूरी तरह से पत्रिका नहीं.चाहे आप ब्लाग को कितना भी पत्रिका का रुप-स्वरूप दे दें ,किताब या पत्र-पत्रिका का यह सुख नहीं ही देता.
मेरी बातों का अन्यथा न लें. यह मित्रवत सुझाव जैसा है.पर केवल वाह-वाह करना भी रचनात्मक नहीं है.
Tuesday, 29 June, 2010
Nemare ji s ek baar phir milna sukhad hai,but this time I fear that you are a little bit biased and this lead to a blurring blogging ....
Tuesday, 29 June, 2010
एक और शंका है मेरे मन में…क्या गीत भी यही सोचता है। उससे हुई सिर्फ़ एक व्यक्तिगत मुलाकात और तमाम बातचीत व उसको पढ़ते रहने के बीच मैने उसे हमेशा एक संजीदा इंसान पाया है। असहमतियों के प्रति असहिष्णु वह कभी नहीं लगा। इसलिये मुझे अब भी विश्वास नहीं कि वह भी इस 'विशेषण' से सहमत होगा। लेकिन दरवाज़ा पर हुई व्यक्तिगत बातचीत में तो हम दोनों इस बात पर सहमत थे कि इस उपन्यास को हिन्दी में वह जगह नहीं मिली जो यह डिज़र्व करता था।
उसे अपनी स्थिति स्पष्ट करनी ही चाहिये।
Wednesday, 30 June, 2010
मित्रों,
१. नेमाड़े जी के बारे में जिनकी जिज्ञासा बरक़रार है, वे कुछ तो नेट की सहायता से और कुछ उनके हिंदी में छपे दो उपन्यासों 'कोसला' और 'बिढार' पढ़कर अपनी राय ख़ुद बना सकते हैं. इसके प्रकाशक हैं नैशनल बुक ट्रस्ट तथा राजकमल. नेमाड़े जी उपन्यास चतुष्टय लिखते रहे हैं और उनका बहुप्रतीक्षित दूसरा चतुष्टय ''हिन्दू'' का पहला खंड १५ जुलाई को मराठी में आ जाएगा. हिंदी में अनूदित होते कुछ वक़्त लग जाएगा इसलिए हमने नेमाड़े जी से आग्रह किया है कि कम-से-कम वे हमारे लिए इस चतुष्टय और इसकी रचना-प्रक्रिया क बारे में एक निबंध लिख कर दे दें. मराठी में लिखा उनका वह टेक्स्ट सबद को ज्यों ही प्राप्त होगा, आपसे साझा किया जाएगा.
२. मूर्ख वक्तव्य वाली अपनी बात पर कायम हूँ, रहूँगा. क्योंकि यह व्यक्ति के लिए नहीं वक्तव्य के लिए कहा है. लोग अपने विवेक से यह फर्क कर लें तो आगे की बात और स्पष्ट हो जाएगी...
३. बिना पढ़े एक सार्वजनिक मंच से बोलना वक्ता में आई गंभीर नैतिक गिरावट की सूचना है. अपने प्रिय कवि के शब्दों का इस्तेमाल करूँ तो मंच पर ''दरअसल गिरावट के अन्तहीन मुकाबले चल रहे हैं ''.
४. पंकज के बोलने में शामिल उनके बयान बासी हैं...आपत्तियां ऐसी जैसे ''अँधेरे में'' को बिना पढ़े कोई यह कहने लगे कि कुछ और लम्बी होती तो एक किताब ही बन जाती...और सरलमति यह कि सेक्स वाले सभी (?) प्रसंग अंग्रेजी में हैं...कि कहानीकार अपने पात्रों के प्रति निर्मम क्यों है...इस फिकरेबाजी के बाद हाथ में पड़ी कहानी की पुस्तक पढ़ रहे हैं और यहीं सबसे ज़्यादा एक्सपोज़ हो रहे हैं...
यह ज़ाहिर हो रहा है कि वे एक अनएक्सप्लोर्ड टेरिटरी में दिल्ली की ट्रैफिक से निकल कर चले आए हैं...और अब यहाँ अटल बिहारी वाजपेयी की तरह लम्बे-लम्बे पॉज़ लेकर आई बला को टाल रहे हैं. वे ध्वनियों में बात करने लग रहे हैं और आलोचनात्मक पदावली के अभाव में ''ये...मेरा मतलब है कि...वो है...'' जैसी अबूझ बातें बना रहे हैं...और यह सब करते हुए मंच से ही नहीं उपरांत-गोष्ठी में भी बिना कहानियां पढ़े ज्ञान देना जारी रखे हुए हैं, लेकिन फिसलन ऐसी कि '' चीन के आत्मसाती'' अपने इस वक्ता को यह पता है कि वहां इधर के सबसे चर्चित कवि बेई-दाओ अंग्रेजी में कविताएं लिखते हैं!!!...यह तो है विडंबना बंधु...आप क्षुब्ध होते हैं तो इन तथ्यों पर भी क्षुब्ध हों...
५. रही बात नामवर जी की तो आप उनका वक्तव्य पूरा पढ़ें और उसे विडियो में देखें इसके लिए व्यवस्था करने की कोशिश करूंगा...
६. सबद कोई टीम नहीं है...मैं ख़ुद काम करता हूँ, सलाह किया है, लेकिन सारे फैसले अपनी की-बोर्ड से लिए...इसलिए एक-एक हर्फ़ के लिए ख़ुद जिम्मेदार हूँ...मेरे लेखक यहाँ आकर आपके शंका निवारण नहीं करेंगे...वह मैं ही करूँगा...मैं ग़लत हो सकता हूँ, पर नीयत में कोई खोट नहीं...दो साल से ज़्यादा हुए इस चंचल, अपार अधैर्य और आत्म-मुग्ध माध्यम में साहित्य के लिए थोड़ा-सा कुछ किया गया है सबद के ज़रिये...सख्ती बरती है और इसी वजह से ज़्यादा लोगों को नहीं छाप पाया हूँ...कुछ-कुछ अलोकप्रिय और हालिया बदतमीज भी ठहरा दिया गया हूँ...लेकिन इससे विचलित नहीं हूँ...काम जारी रहेगा...आपलोगों को आभार कहने के कितने कम मौके निकल पाया...आभार...
...अभी इतना ही...
Wednesday, 30 June, 2010
मुझे नहीं लगता कि पंकज जी रातों रात मूर्ख हो गए होंगे। कहीं यदि वे बिना पढ़े भी गीत के पक्ष में बोल गए होते तो क्या आप का तेवर इतना ही अहंकार से भरा होता।
मेरी आपत्ति आपके अहंकार भरे लहजे पर है। जो आपकी पोस्ट और आपकी सफाई दोनों में साफ चीख रही है।
गीत को बधाई। आपको सद्बुद्धि का संदेश।
Wednesday, 30 June, 2010
गीत क्या सोचते हैं यह यहाँ जरा भी मायने नही रखता.... दूसरी बात कि ईमानदार स्वीकरोक्ति का कोई इससे भी अच्छा उदाहरण यदि हो सकता है तो वो यह कि कोई युवा किसी परीक्षा में बैठे और परीक्षक से कहे कि मैं तो पढ़ कर नही आया जी! मुझे ऐसे ही पास कर दो. आपको मुख्य वक्ता बनाया गया है और वो निर्णय एक दिन अचानक नही हो गया होगा. पहले से तय हुआ होगा फिर तो वक्ता का नैतिक दायित्व बनता है कि वो विमोचित हो रही किताबे पढ़े या फिर मुख्य वक्ता बनने से मना कर दे. पंकज विष्ट बड़े रचनाकार है, लेकिन दरवाजा ही नही उस चिड़िया का नाम भी शानदार उपन्यास है, इन्हे पढ़ना कमाल का अनुभव रहा है पर इसका अर्थ यह नही कि आँख मून्द कर उनका सब कुछ कहा सुना क्लासिक मान लिया जाये.. अभी उनकी कहानी पंखो वाली नाव हंस में आई थी और दुर्भाग्य से बहुत ही खराब कहानी थी. तो क्या उसे खराब नही कहा जाये? पंकज जी को मूर्ख नही कहा गया है..यहाँ जिक्र उस वक्तव्य मात्र का हुआ है.
अनुराग युवा है, बेहद विनम्र है और लगातार काम कर रहा है. वो भी इस बेकार सच को जानता है कि ब्लॉग दुर्भाग्यवश ही, मठों और ‘मन्दिरों’ से ज्यादा पॉपूलर नही हैं, फिर भी नित नये रचनाओं को प्रस्तुत करने में लगा हुआ है. Its completely a thank less job.. काश, आप कभी इस नौजवान का हौसला बढ़ाने भी आते...
Wednesday, 30 June, 2010
अनुराग जी,
'अपने ही ब्लॉग पर पलट कर लिखने' के लिए धन्यवाद. खासकर आपके पैशनेट एपिलॉग ने द्रवित कर दिया. सख्ती तो आपने लेखकों को छापने में ही नहीं, टिप्पणियों को छापने में भी बरती है.
आपके (और मेरे भी) प्रिय कवि ने जिस 'नई तमीज़' की बात की है, उसके हिसाब से व्यक्ति को मूर्ख न कहकर वक्तव्य को मूर्ख कहना बदतमीज़ी नहीं है शायद. इसलिए मैं अपने शब्द वापिस लेता हूँ.
Friday, 02 July, 2010
दरअसल अनुराग ने व्यक्तिगत आवेगों और समझबूझ के दायरे में बंध कर एक निहायत ही निजी ब्यौरा प्रत्स्तुत किया है- मैं इसे रपट मानने के पक्ष में नहीं हूँ. पंकज बिष्ट के वक्तव्य के लिए जिस विशेषण का प्रयोग लेखक ने किया है, उसी अर्थ को ध्वनित करने वाले किसी और शालीन शब्द का प्रयोग वहाँ किया जा सकता था....यह मेरी राय है....जिसे मैं कभी किसी पर भी थोपना नहीं चाहूँगा...अनुराग पर भी नहीं.....बस कहना चाहूँगा. अनुराग ने जो लिखा उसकी उन्होंने जिम्मेदारी ली है....जो कि उन्हें लेनी ही चाहिए....अपनी टिप्पणी में उन्होंने जो लिखा...उस शब्द की जगह बस उसे ही वे पोस्ट में भी लिख सकते थे....बाक़ी पाठकों पर छोड़ देते .....लेकिन यह उनका विवेक है.... जिससे उन्होंने काम लिया.....इस शब्द से मैं अपनी पूरी असहमति यहाँ व्यक्त करना चाहता हूँ. इस असहमति को अनुराग से बातचीत में भी मैंने व्यक्त किया था. ...किन्तु मेरी राय के बरखिलाफ़ उनके अपने तर्क थे....और जाहिर है अब भी होंगे ही.
गीत को बहुत सारी बधाई...शुभकामनाएँ....
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