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कवि कह गया है : ६ : शिरीष कुमार मौर्य


{ कवि कह गया है शीर्षक इस स्तंभ में हिंदी के महत्वपूर्ण युवा कवि शिरीष कुमार मौर्य का लिखना अपरिहार्य था, और हमारे आग्रहों पर उन्होंने अपनी कविता के जिन स्रोतों की ओर यहां इशारा किया है, वे उनकी कविता की हमारी समझ को और बेहतर बनाने में मददगार सिद्ध होंगे, इसमें दो राय नहीं. }

शर्मिन्दा होना भी कवि होना है

अपनी कविता के तीन निर्णायक और बुनियादी तत्वों के बारे में कुछ बातें रखूँगा...

स्मृति
कविता से परिचय पुराना है और नया भी। 12-13 बरस का था। पहाड़ में बहुत ऊंचाई पर बसे अपने गांव नौगांवखाल से चीज़ें ज़्यादातर सुन्दर ही दिखती थीं। आसपास बिखरा जीवन स्वाभाविक रूप से संसाधनहीन था पर उसे हम अपना मानते थे और ख़ुश रहते थे। स्कूल के अलावा छुट्टियों में गाय चराने जाना, दाय रिंगाना यानी गेंहू की बालियों पर मुंह बंधे हुए बैल घुमाना, सीढ़ीदार खेतों में हल चलाने की कोशिश करना और अपने विशालकाय 70 किलो वज़नी कुत्ते के साथ चीड़ की गिरी हुई पत्तियों पर फिसलना जैसे कई शगल थे। स्तब्ध रातों में जंगलों से निकल कर कुत्ते और गायों को शिकार बनाने वाला तेन्दुआ जिसे हम बाघ कहते, हमारे दिलों में छुपा एकमात्र भय था। बालों को कंघी से संवारने की जगह कबरी नाम की गाय से चटवा कर उनके साथ वैसा सलूक करना जैसा आज के किशोर जैल लगाकर करते हैं, हमें प्रिय था। वह गाय इतनी रहमदिल कि अपने बछड़े के साथ-साथ हमें भी उतनी ही ममता से चाटती थी। यह पूरा जीवन ही कवितामय था, कविता जिसे हम जानते नहीं थे, कोर्स में पढ़ते ज़रूर थे। तब किताबों में सूर, तुलसी, कबीर को पढ़ते तो लगता यह धर्म जैसी कोई चीज़ है, जिसे बिना समझे रट लेना और स्वीकार करना ही विद्यार्थी के रूप में हमारा कर्त्तव्य है।

समूचा जीवन ही मानो कविता था पर कविता लगभग नहीं थी। इस जीवन के अपने संघर्ष थे। उनमें कितनी तो औरतें थीं - काम में खटतीं, थोड़े-से प्यार और सम्मान की आकांक्षा लिए ज़माने से जूझतीं और पिटतीं। उन औरतों ने ही मेरा व्यक्तित्व बनाया, यह बात आज मेरे लिए जीवनमूल्य की तरह है। इलाक़े में न बिजली थी, न नल। पानी के लिए नौलों (जल स्रोतों) तक जाना होता था। सर पर बंठे और हाथ में जरीकेन लिए गांव की औरतें ही इस सफ़र में हमारी अगुआ होती थीं। हम नौलों पर नहाते और टैडपोल पकड़ते, औरतें कपड़े धोतीं और घर तक ले आने को पानी भरतीं। पानी लाने के बाद खेतों कमर झुकाए काम करतीं, ढलानों पर घास काटतीं, पेड़ पर लूटा लगाने में मर्दों से मदद की मनुहार करतीं वे औरतें....उफ़ वे औरतें......लड़कपन जाने के बाद उनके श्रम को भीगी आंखों देख पाया हूँ क्योंकि कवि हूँ ! हो न हो, जीवन में घट रहे बुनियादी श्रम को जानना ही कवि होना है। वह दिल को आरपार भेद जाने वाली चीज़ है...आज उसकी याद भर से ही दिल टूटता है...शर्मिन्दगी होती है....हो न हो, शर्मिन्दा होना भी कवि होना है ।

सबद के पन्ने टटोलते हुए कहना चाहता हूँ कि स्मृति के नाम पर बार-बार मिथकीय महाकाव्यों और उनके विद्रूप और विषाद में जाने वाले दोस्तो...हो सके तो स्मृति को मिथक बनने से बचाओ। ये एक हाड़मांस से बनी मस्तिष्क के भी भीतर कोई एक और मस्तिष्कनुमा चीज़ हैं, जिसमें वास्तविक मानवीय सन्देश ले जाने वाले न्यूरॉन्स दौड़ते हैं। इनमें असली छुअन है - ममतालू कमेरी औरतों के कठोर हाथों की छुअन! इनमें वास्तविक गंध है - जीवन में खिले पहले फूलों और फिर हमारे सड़ चुके सामाजिक-राजनीतिक ढांचे और उसके विद्रूपों की गंध! पहाड़ी आदमी हूँ इसलिए कहूँगा कि इनमें जाड़ों के दिनों की गर्म सुखद भाप है- कविता में विलीन हो जानेवाली हमारे पूरे वजूद से उठती भाप! इनमें कुछ खेल हैं - सपाट मैदानों में भरपूर दौड़ते उपद्रवी बच्चों के और भाषा में कुछ अन्दरूनी कूदफांद, कुछ खिलवाड़ - जानलेवा, जैसे जानबूझ कर ग़लत वक़्त पर सड़क पार करना!

स्मृतियाँ बेइन्तहा हैं - भारी और थिर मगर भीतर के भूचालों में हिलते पहाड़ों जैसी, कभी शान्त तो कभी गहराते-हहराते समन्दरों जैसी, घास के बेहद छुपे हुए नन्हें-पतले-हल्के बीजों जैसी -- मेरे लिए जब वे कविता में हैं तो कविता है-- जो मेरे लिए तो कविता पर औरों के लिए शायद लगातार जारी रहने वाला स्मृतिलेख -- अनापशनाप -- वैसा ही मेरा जीवन भी उनमें -- बढ़ाचढ़ा -- ऊटपटांग! हमेशा बाक़ी रह जाने वाला। चन्द्रकान्त देवताले ने एक बार कहा फोन पर कि शिरीष सबसे ज़रूरी बात हमेशा रह जाती है - वैसी ही कई ज़रूरी स्मृतियां मेरी, वैसी ही अधूरी और बेबस, बाद में भीतर से टीसती इतनी सारी बातों से भरी पर सबसे ज़रूरी को छोड़ जाने वाली कमबख़्त कविता मेरी!
***

स्वप्न

कितने स्वप्न जीवन में, कितने ज्यों के त्यों कविता में भी। रातों को, सुबहों - दोपहरियो और शामों को गुंजाते हुए स्वप्न। नींदों में ले जाने और नींदों से बाहर लाने वाले स्वप्न। उनमें कितनी राजनीति, कितना समाज, कितना व्यक्ति, कितनी प्रकृति, कितना प्रेम, कितना प्रतिशोध, कितना क्षोभ, कितनी वीप्सा उनमें ....कितना वक़्त ज़ाया किया उन्हें देखते...कभी बहुत धीमे तो कभी तेज़ी से। निकल गए कितने ही क़ाफि़ले, कितने दोस्त- मैं स्वप्नों में भटकता रहा, वे चलते रहे स्वप्न से बाहर- मैंने उन्हें चलता देखता रहा, उनके साथ क़दमताल करने की ख़्वाहिश नहीं जगी कभी मन में। अपने जीवन की क्रूर, दयनीय और भयावह वास्तविकताओं से थककर सोया कभी तो महान, अनन्त और अपार स्वप्नों ने जगाए रखा। मालूम नहीं कब वे स्वप्न से वास्तविकता में बदलते गए, उतने ही महान, अनन्त और अपार। कई कविताएं स्वप्न में बनीं और पन्ने पर उतारते हुए स्खलित-असफल हो गईं। इतना ज़रूर कहूँगा कि कभी कुछ खोया नहीं स्वप्न में, हमेशा पाया ही। जीवन पाया और कविता भी। यथार्थ भी पाया वहीं, छटपटाता हुआ।
***

यथार्थ

स्मृति और स्वप्न के बीच एक जगह। मेरे लिए प्रॉमिस्ड लैण्ड - पाकज़मीन - येहूदा की कविताओं के अनुवाद करते हुए जाना ये शब्द। सैद्धान्तिक होने के बावजूद यथार्थ एक शानदार चीज़ है। दारूण, कारुणिक, भयावह, क्रूर, जैसा नहीं होना चाहिए, वैसा.... मगर शानदार! इंसानियत और कवित्त दोनों को जगाए रखनेवाला। उसमें मेरी राजनीति है, मेरे लोग हैं, मेरा प्रेम है, मेरा परिवार है, मेरी कविता है, मेरे दोस्त हैं। उसमें धमकियां हैं, हौसला है, लड़ाई है, हार है, असफलताएं हैं उसी में कहीं ठीक बीचोंबीच। पुरखे कवि हैं स्मृति और स्वप्नों के बीच खड़े हुए - इसमें से कुछ यथार्थ उनका भी है - कुछ सिर्फ़ मेरा है - पहचान पाएं या नहीं, कुछ दोस्तो का भी है। उसे कभी मैं बदलकर दूसरा यथार्थ कर देना चाहता हूँ और कभी लौट कर पिछला वाला ही!

मैं 73 के अखीर में पैदा हुआ पर 1857 का यथार्थ मेरा है, चालीस और पचास और साठ! ये मेरे यथार्थ हैं, जिनसे वह यथार्थ बना, जिसमें मैं आज रहता हूँ। मेरे दादा तन मन से समर्पित सामन्त थे, पिता बीच में झूलते रहे, मैं पूरी तरह अध्यापक बना ! आज पुरखों की ज़मीन बिक चुकी तो पिता उदास हैं, आज उन्हें कोई उतनी इज़्जत नहीं देता, जितनी उनके पिता को, तो वे उदास हैं, कुछ है, तो वे उदास हैं, कुछ नहीं है, तो वे उदास हैं - पिता उदास हैं, तो मैं ख़ुश हूँ। उनकी स्मृतियों और स्वप्न के बीच जहां अब कोई जगह नहीं, ठीक वहीं मेरे पैरों ने सीधा खड़े हो पाने का भरोसा पाया - यह निजी यथार्थ है।

फिर सामाजिक यथार्थ - विकल हाहाकार से भरा, टूटता, बिखरता, शर्मिन्दा करता! मेहनतकश कौमों को रौन्दता। देखिए ज़रा ग़ौर से हज़ारों साल पुरानी सभ्यताओं के टीलों में कुछ सांप सा बिलबिलाया !

फिर राजनीतिक यथार्थ - साम्प्रदायिकता, जातीयता और वैश्विक प्रपंचों से अटा एक दीर्घकाय अंधकार। दीवारों पर लिखने, पोस्टर चिपकाने, जुलूस निकालने और नारे लगाने के सिर्फ आशय नहीं बदले, अर्थ भी बदल गया। शाखामृगों ने धरती सम्भाली और धरती के प्राणी पहले भूमिगत हुए फिर मायावी। बजंरगबली छात्रनेता बने, फिर विधायक और फिर मुख्यमन्त्री-प्रधानमन्त्री। मलेच्छ को राष्ट्रपति बनाने का पुण्य कमाया- रामनाम भाया!

फिर आर्थिक यथार्थ - बड़ी तनख़्वाहों और खेतिहर कमकरों की आत्महत्याओं का यथार्थ - राष्ट्रीय और कितना तो बहुराष्ट्रीय। पहले राजीवनयन, मनमोहन और अटल - और फिर हर कहीं सोनियासमन्दर लहराया!

फिर साहित्यिक यथार्थ - जनता बिला गई। स्वप्न डूब गए। नैतिकता मुहावरा बनी। कुछ लोग तब भी लगे रहे। बचे रहे। पुरखे बने, अगुआ बने-अग्रज बने, साथी बने। अंधेरे में टटोलने पर हाथ आयी डाल बने। कविता में भी सत्ता बनी, थूकी गई गिलौरी फिर पान का नया पत्ता बनी। कुछ लोग तब भी मुंह मोड़े रहे, बिलाई हुई जनता से दिल जोड़े रहे। उनके दिल टूटे पर कविता जुड़ी रही। उन्हें देखता-उनकी आहटें और राहें टोहता आह भरकर कहता हूँ चलो इस लिखने-पढ़ने से कुछ तो पाया!
***

मैं कुछ कहूँ और बाक़ी न रहे! सबसे ज़रूरी बात हमेशा रह जाती है। अब भी रह गई होगी। जैसा कि एक कवि ने कहा है -अनिद्रा की रेत पर तड़पड़ तड़पती रात / रह गई है / रह गई है कहने से सबसे ज़रूरी बात !
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6 comments:

जीवन का चित्रण काव्यात्मकता से प्रारम्भ कर यथार्थ पर ला कर छोड़ा है । जीवन ही कविता थी उस समय । वे क्षण, निर्मल, निश्छल, सत्य, प्राकृतिक, रह रह कर याद आते हैं क्योंकि वर्तमान के तथ्य मन का साम्य रहने नहीं देते ।
सपने, उमंगें, सुख दुख, ये सब कविता के ही अंग हैं । व्यक्तित्व कविता है, कोई व्यक्त कर पाता है, कोई मन में गुनगुना लेता है ।
मोहक चित्रण ।


शिरीष ने कविता के वास्तविक स्रोतों का पता दिया है, जहां से कविता अपने होने के पूरे एहसास के साथ न केवल हस्तक्षेप करती है बल्कि अपने समय का एक वैकल्पिक इतिहास भी रचती है। जहां आख्यान जादू नहीं करते, आंखों में आंखें डालकर बतियाते हैं। यह बहुअर्थीय, अंतर्राष्ट्रीय या विशिष्ट होने के मोह से कहीं आगे की चीज़ है जो कविता को अर्थपूर्ण और ज़िम्मेदार बनाती है।

शुक्रिया शिरीष कि आपने हम सबकी बात कही।


शिरीष के काव्‍यात्‍मक वक्‍तव्‍य में उनकी रचनाप्रक्रिया और उनकी कविताओं में आने वाले प्रतीकों के स्‍त्रोत का उद्घाटन है.


* अच्छा लगा !
* कवि शिरीष कुमार मौर्य की कविता के उत्स को उन्हीं के शब्दों में जानना!
* मुझे अक्सर लगता है कि न तो यह दुनिया एकसार है , न ही हम सबका जीवन फिर भी इसी में रहना है और असमाप्य कोरस के बीच अपनी बात को अपने ही स्वर में कहना है, यही कवि होना है। मुझे खुशी है कि जिस कवि को मैं लंबे समय से पढ़ - गुन - देख रहा हूँ वह ( अब भी) सचेत और सावधान है साथ ही अपनी एक अलग - सी कहन के साथ पूरी उर्जा के साथ विद्यमान है।
* बढ़िया जी!


मुझे लगता है ये शिरीष सर की कविता ही नहीं बल्कि व्यक्तित्व के निर्णायक तत्वों का लेखा जोखा है !ये सफ़र कवि होने के साथ साथ एक संवेदनशील मनुष्य हो जाने का सफ़र है !स्मृतियों में nostalgic हो जाना हो या स्वप्न में सुन्दर अनागत का बुनाव या फिर यथार्थ के 'जो है जैसा है' का मुखर विरोध, इनकी कविता और व्यक्तित्व में बराबर की बेबाकी और साफदिली है !


Sundar likha hai Shireesh ji! kavita sa lekh!


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संपादन : अनुराग वत्स.

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