Monday, June 14, 2010

व्योमेश शुक्ल की प्रेम कविता


(
हिंदी की अभी बिलकुल अभी संभव होती कविता में जितनी दख़ल अब तक कुल साठ प्रकाशित
कविताओं के कवि व्योमेश शुक्ल की है, उतनी उनके अनेक समवयसी शतकवीर युवाओं की भी नहीं. इसकी सबसे बड़ी वजह अपनी काव्य-भाषा, शिल्प और कहन में हासिल उनका वह नैरन्तर्य है जिसे अन्य दूसरे कवि आरंभिक उठान के बाद दूर तक संभाल पाने में अक्षम साबित हुए हैं. इस इकसठवीं कविता के ज़रिये व्योमेश प्रेम की सांकरी गली में प्रवेश कर रहे हैं. लेकिन अपने हुनर से उन्होंने आधुनिक हिंदी कविता में अब तक प्रेम के लिए ''थोड़ी-सी जगह'' बनाने के मुहावरे के बरक्स इसमें अपने काव्य-स्वाभाव ''होना अब ज़्यादा होगा'' के अनुरूप ही प्रेम, उसके अहसासों और स्वप्न का एक बड़ा भूगोल अर्जित किया है.)




मैं रहा तो था
साफ़ झूठ

शिकायतें वक़्त से भी तेज़ गुज़र रही हैं ख़ुद को तुम्हारी मुस्कराहट से बदलती हुईं
उनकी फ़ेहरिस्त में कई शब्द आ गए हैं कई ग़ैर शब्द
आगामी शिकायतों का संगीत
उन्हें लिखना स्वरलिपियाँ लिखना

और कोई चुपके-चुपके लगा रहता है कि अपनी महान हिन्दी भाषा में कुछ वाक्य लिख ले

अरे महोदय, कितना पेट्रोल और पसीना बहता है ये सब करने में - उसका हिसाब लिखने में मन लगाओ, यही कर्त्तव्य है और तुम इसी के लायक़ भी हो। उनके कमरे में खिड़की खोलने से क्या फ़ायदा? अपने ख़त्म होते अनुभवों पर भरोसा रखो। ताकाझाँकी जैसी चालाकियाँ कुछ समय बाद शोभा देंगी। अभी तो तुम्हारे साफ़ झूठ में भी उसकी सच्ची हँसी की आहट है।

उस शहर की उस गली में

... कि तभी उस शहर की उस गली में उसके नाम का साइनबोर्ड दिखा। उस जैसा। बिलकुल उस जैसा और लगभग उस जैसा। उसके पसीने की बरसात में भीगा हुआ-सा। उसके चेहरे की धूप में चमकता हुआ-सा। उसको देखने-सा। उसके देखने-सा। उसकी चमक के ख़िलाफ़ धुँधला होता हुआ-सा। उसकी ज़बान जितनी ग़लत भाषा में लिखा हुआ। सबको दिखता हुआ-सा। हालाँकि देखने पर वहाँ सिर्फ़ ढाई अक्षर दिखाई देते हैं।

गुज़रना

इतनी बीहड़ क्रूरता के साथ बसे देश में सिर्फ़ तुम्हारे घर के नीचे, अफ़सोस, कभी ट्रैफ़िक जाम नहीं लगता जिसमें फँसा जा सके। वहाँ से ख़याल की तरह गुज़रना होता है।

दोनों एक ही बातें हैं

ऋतुओं के विहँसते सूर्य की तरह, दोपहर की झपकी की तरह, गर्भ की तरह, प्यास या ख़ास तुम्हारी शर्म की तरह, क्रूरतम अप्रैल में मई के आगमन की तरह

मैं रहा तो था

थकान की तरह मोज़ों के पसीने में तुम्हारे, वर्तनी की भूलों में, क्रियापदों के साथ लिंग के लड़खड़ाते रिश्ते में। तुम्हारी नाराज़गी में - ख़ुद को न देख पाता हुआ या सिर्फ़
ख़ुद को देखता हुआ या दोनों एक ही बाते हैं।

एक दिन

बृहस्पतिवार - तुम काजल लगा के नहीं आई थी। (उस दिन अपनी पेशी के दौरान नरेन्द्र मोदी ने कई झूठ बोले और कई धमकियाँ दीं।)

अब हो

आज मैंने मसलन बी.ए. पास कर लिया। आज मैं श्यामसुंदरदास बी.ए.। उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में अपनी शिशुभाषा का पाठ्यक्रम बनाने वाला और एक भारी-भरकम बवालिया संस्था का निर्माता मैं आज। तीस साल का होने के तीन महीने पहले वह अगर ऐसे ही नाहक़ नाराज़ हो जैसे आज मुझसे हुई है तो तुम भी संस्थापक, प्रधानमंत्री या रूलिंग पार्टी के जनरल सेक्रेटरी हो सकते हो। ख़ैर, मेरी फ़िक्र न करो और आगे से मत डराओ। आगे तो तय है कि बहुत सा अपमान और उचाट है। बहुत सा पीछे है आगे। ख़ात्मा है आगे।

अब हो।

एक और दिन

शुक्रवार - फिर नहीं । ( आज सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस महानुभाव ने तमाम गुज़ारिशों के बावजूद मोदी के साथ मंच शेयर किया )

क्यों

इतने ग़ौर से क्यों सुनती हो तुम आँखों से क्यों सुनती हो?

या शायद

मैंने सोचा कि उनको या कहूंगा और सोचने लगूंगा कि इस चीज़ का नाम अब तक क्या रहा था और जानकर हैरान हो जाऊंगा कि जितनी आवाज़ें हैं उतने तो नाम हैं इसके और शायद इसे या भी बार-बार कहा गया होगा तो इसका एक नाम शायद भी हो सकता है और इसे कई बार कुछ नहीं कहा गया है तो इसका एक नाम कुछ नहीं या कुछ हो सकता है।

कुछ हो सकता है तो कुछ भी हो सकता है। एक फूल खिल सकता है नाम देने के लिए। बहुत से फूलों के बीच एक फूल। दूसरे फूल दूसरों के नाम के लिये। ये फूल उन निगाहों का नाम हो सकता है।

कुछ भी हो सकता है कुछ नहीं भी हो सकता है। उनको देखने लिये उनकी ओर देखना पड़ सकता है और यह तो अक्सर होता है कि उनको देखने के लिए उनकी ओर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

यह उलझन दूर तक जा सकती है और यह उलझन बीच में ही ख़त्म हो सकती है ।

कुछ हो सकता है तो कुछ भी हो सकता है

जब कुछ भी हो सकता है तो तुम भी कुछ भूल सकती हो। तुम जानबूझकर या भूल से भी भूल सकती हो काजल लगाना। यों उस महान क्रिया का जन्म होता है जिसका नाम है काजल लगाना भूलना।

चुप हो जाने के लिये

जब जीवन में बहुत से अंक हासिल करने का शोर मचा हुआ था, तुम उसमें कैसा तो अनाप-शनाप संगीत सुनने में लग गई, शोर के भीतर का संगीत, शोर की बेक़ाबू साँस का संगीत, शोर का उल्टा संगीत। तुम नहीं जानती कि ऐसे सुनने ने शोर को कितना नामुमकिन कर दिया है। सबसे ज़्यादा नुक़सान मेरा हुआ, मेरी शोर मचाती कविताओं का। उन्हें भी संगीत की तरह सुनोगी तुम, यह एहसास ही काफ़ी है चुप हो जाने के लिये।

धूप नहीं

धूप की कालीन बिछी थी और तुम्हारे उस पर से गुज़रने भर से वह सिर्फ़ धूप की कालीन नहीं रह गई। विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के पन्नों पर एक साथ उगे दो सूर्य सिर्फ़ पन्नों पर नहीं उगे थे। मैंने देखा उस सूर्य को तुम्हारे चेहरे पर और तुम्हारे चेहरे के सूरज को वहाँ उगते हुए।

पार

देशभक्ति का कालजयी नाटक पढ़ते हुए हमारी आँखें मिलीं और तुम्हें पता ही नहीं। हद है। शब्दों और वाक्यों को आईने की तरह इस्तेमाल करते हुए मैंने उस चीज़ को देखा जिसे बोलचाल की भाषा में राष्ट्रप्रेम वगैरह कह दिया जाता है।

वे तुम्हारी आँखें थीं राष्ट्र के पार देखती हुईं। तुमको नहीं पता था तुम्हारी आँखों को पता था मेरी आँखों का। तुमको नहीं पता था तुम्हारी आँखों को पता था कि न देखते हुए कैसे देखा जाता है?

सपना

कलाई में दिल की धड़कन थी बायप्सी की रिपोर्ट में दाँत दर्द का अनुवाद कैंसर किया गया था नींद बहुत लम्बे-लम्बे वाक्यों में जागने का सपना थी सारी थकान एक बहुत चुस्त चालाकी में बदली हुई थी शरीर आत्मा पर फ़िदा हुआ जा रहा था सारे दुश्मन दोस्त हो गए थे सभी स्पर्शों की गिनती और सारे स्विच ऑफ़ मोबाइल फ़ोनों के नंबर याद हो गए थे जिस नदी को इस पार से उस पार तक सत्तर धोतियों से बाँधा जाता था वह अब दस धोतियों में पूरी हो जाती थी

हम ख़ुद से शर्माए जा रहे थे और आज इसका कितना शिद्दत से अफ़सोस था कि लोरी लिखना नहीं आता और एक ग़ैर निबंधात्मक प्रेमपत्र भी लिखना हुआ तो असलियत सामने आ जायेगी.

यहाँ


पीले पन्नों वाली किताब में छपी बच्चा कविता में से निकलकर आया था मामू मौसम के बिल्कुल पहले आम लेकर.
मामू सरकारी कर्मचारी है
वह आया तो सरकार आयी हमारी हैसियत भर की
और नींद में उसकी आवाज़ उसकी आवाज़ का सप्तक उसकी तक़लीफ़ उसका रिटायरमेंट उसकी पेंशन उसके लड़के का पैकेज
इन सभी मुद्दों पर अम्मा की हाँ-हूँ

मामू जगाता नहीं
और कौन जागना चाहता है इस छंदमय जगनींद से उस जागरण में

वहाँ सिर्फ़ तुम हो और तुम हो और तुम हो

और यहाँ भी
****
{चित्र : मधुमिता दास}

18 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

सुन्दर रोचक प्रस्तुति के लिए आभार ...

lalit said...

यार ये तो बहुत खूबसूरत है। बहुत ज्‍यादा। मैंने ऐसा शि‍ल्‍प पहले नहीं पढा था।

पूजा प्रसाद said...

ओह गजब है..व्योमेश जी तारीफ के लिए शब्द नहीं और अनुराग तुम्हें तो सचमुच का थैंक्स..

पूजा प्रसाद

शरद कोकास said...

प्रकाशित कविताओं की संख्या से व्योमेश या किसी भी कवि को नापने का यह पैमाना क्या उचित है ? कविताई को क्रिकेट के खेल की तरह क्यों देख रहे हैं ?

anurag vats said...

@शरद कोकास:- एक ज़रूरी तथ्य की ओर इशारा खेल-कूद की शब्दावली में कर दिया गया है यहाँ...इसे लिखने का दूसरा ढंग भी है अपने पास...लेकिन इसी में ऐसी अपच है तो उसका तो...खैर...आप भंगिमा-दोष बता रहे हैं,लेकिन इस स्थापना का खंडन नहीं कर रहे...न ही कविता पर कुछ बोला जा रहा आपसे...मित्र, देखिये तो इसी कविता में, जो हालाँकि एक प्रेम कविता है, कवि आपके लिए क्या कह गया है...''अरे महोदय, कितना पेट्रोल और पसीना बहता है ये सब करने में - उसका हिसाब लिखने में मन लगाओ, यही कर्त्तव्य है और तुम इसी के लायक़ भी हो। उनके कमरे में खिड़की खोलने से क्या फ़ायदा?''...कहना न होगा कि ''चुपके-चुपके...अपनी महान हिन्दी भाषा में कुछ वाक्य लिख'' लेने का जतन नहीं है मेरा...मैं दुहराता हूँ...हिंदी की अभी बिलकुल अभी संभव होती कविता में जितनी दख़ल अब तक कुल साठ प्रकाशित कविताओं के कवि व्योमेश शुक्ल की है, उतनी उनके अनेक समवयसी शतकवीर युवाओं की भी नहीं.

शरद कोकास said...

ज़रूर ... कविता भी देख रहा हूँ व्योमेश की कवितायें तो बेहद पसन्द हैं मुझे । जल्द ही इस पर भी लिखता हूँ । यह एक तात्कालिक विचार आया था सो लिख दिया भाई ।

Geet Chaturvedi said...

एक सुंदर कविता, जो आवेगों की तीव्रता का स्‍वशासित विलोपन करती है, उसके ब्‍लर्ड इमेजेस उसकी अंदरूनी गति को मेनिफेस्‍ट करते हैं, और गतिशील ठहराव जैसे विलोम की रचना करते हैं-- जैसा ट्रेन से बाहर देखने पर दिखता है, जब ट्रेन चलकर भी नहीं चलती, दृश्‍य रुककर भी चलता रहता है; और दृष्टि... निरंतर चलायमान रहती है, अपनी धुरी पर एक विशेष डिग्री पर झुकी हुई.

अजेय said...

padh to lee ye saaree kavitaayen.... par kuchh kahane ka man nahin hua. ho sakata hai, yah vyomesh se kuchh zyada ki apeksha rakhane ke karan hua ho.bhai, aap ka qad aade aa raha hai. xama karen.

Ganesh said...

अनुराग भाई, आप का बहुत धन्यवाद.
धन्यवाद तो व्योमेश्जी का भी करना चाहिए की उन्होंने एक बार फिर अच्छी कविता हमें दी.
व्योमेश परिचित वस्तुओं, भावों और घटनाओं को जिस अनोखे कोण से देखते हैं वह अद्भुत हैं. परिचित कैनवास पर अपने अलग ब्रश और ब्रश स्ट्रोक्स से वे एक अनदेखा संसार रचते हैं, जिसे हम ने पहले कभी इस कोण से न देखा हो. उनकी कविताओ में भारतीयता को अलग कर के देखा नहीं जा सकता; क्यों की वह उनका अभिन्न हिस्सा हैं. यही वजह थी की उनकी कविताओं को मराठी में अनुदित करना मेरे लिए एक आनंद का अनुभव रहा. वे सिर्फ हिंदी के नहीं, सर्व भाषाओँ के कवी हैं.
aap ka गणेश विसपुते

शिरीष कुमार मौर्य said...

मुझे इनमें से कुछ कविताएँ पढने का सौभाग्य पहले मिल चुका है. प्यारी हैं ये प्रेम कविताएँ. तब भी उन्हें पढना सुखद था और अब भी उतना ही सुखद और ताज़गी भरा.

और किसी से नहीं, व्योम से कहना है मुझे - इस शिल्प में तुम पूर्णता प्राप्त कर चुके हो प्यारे ...आगे की राह कुछ और नया मांगेगी. तुम जैसी प्रतिभा से नहीं...तो...फिर किस से मांगेगी?

उम्मीदों का आकाश तना है.

रात आइना है "तुम्हारा"
जिसके सख्त ठंडेपन में भी
छुपी है सुबह
चमकीली और साफ़.

झील में दाढ़ी भिगोते सप्तऋषि
मुस्कुराते हैं आपस में
"तुम्हारी" तरफ़ इशारा करके.
***

और क्यूँ न वो आख़िरी बात भी कह दूँ -

मैं तुझमे धंसा रहूँ
तेरे दिल में मुसलसल गड़ती
एक मीठी फांस
***
- तेरा शिरीष "भैया"

चन्दन said...

अब तक छुपाये रखा...!
बहुत अच्छी कवितायें!!

पुरुषोत्तम नवीन said...

शिकायतें वक़्त से भी तेज़ गुज़र रही हैं ….इतनी बीहड़ क्रूरता के साथ बसे देश में सिर्फ़ तुम्हारे घर के नीचे, अफ़सोस, कभी ट्रैफ़िक जाम नहीं लगता जिसमें फँसा जा सके। वहाँ से ख़याल की तरह गुज़रना होता है।…कलाई में दिल की धड़कन थी बायप्सी की रिपोर्ट में दाँत दर्द का अनुवाद कैंसर किया गया था नींद बहुत लम्बे-लम्बे वाक्यों में जागने का सपना थी सारी थकान एक बहुत चुस्त चालाकी में बदली हुई थी शरीर आत्मा पर फ़िदा हुआ जा रहा था….गद्यनुमा ये कविताएं डायरी लेखन की विधा की भी याद दिला जाती हैं। हिन्दी में अपने तरह का अलग शिल्प है व्योमेश जी का। शानदार...।

ssiddhant said...

ek naya drishtikon, ek naya shilp fir se hamesha ki tarah nayi taazagi...puraani hai to do hi cheezein SABAD(ek naye look ke saath) aur Vyomesh(nayi kavita ke saath)

nisha jha said...

ye jo Kajal Lagana Bhoolna hai....


Teesta Setalwad
Bhoolti nahi kajal lagana
par Kajal me jiske
pasarav hai bikhrav hai pata nahi kyu?
jisme rakh hai
Godhra ki Naroda Patiya ki
Jahira ke sach aur jhooth ke bhed ke khatm hote jane ki rakh
narendra modiyon ki muskan ki rakh..

Alok Dhanva yad aate hain.."kaise dekhte ho tum is shram ko"

Kaise dekh rahe ho
tum
is kajal lagana bhoolne ko

सुशीला पुरी said...

धूप की कालीन बिछी थी और तुम्हारे उस पर से गुज़रने भर से वह सिर्फ़ धूप की कालीन नहीं रह गई। विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के पन्नों पर एक साथ उगे दो सूर्य सिर्फ़ पन्नों पर नहीं उगे थे। मैंने देखा उस सूर्य को तुम्हारे चेहरे पर और तुम्हारे चेहरे के सूरज को वहाँ उगते हुए।
............ नए शिल्प मे प्रेम ? जैसे प्रेम भी ताज़गी महसूस रहा हो !!!!

Nirjesh said...

Thanks Anurag. You have done remarkable work.

विमलेश त्रिपाठी said...

बहुत बढ़िया कविताएं....शुक्रिया अनुराग भाई...
व्योमेश भाई बधाई...

NP said...

Kajal lagana naa bhoolna bhi ek kriya hai...