सबद
vatsanurag.blogspot.com

उदयन वाजपेयी की कविताएं

{आगे दी जा रही कविताएं उदयन वाजपेयी की काव्य-श्रृंखला ''कुछ वाक्य'' की नई कड़ियाँ हैं. उदयन की यह चर्चित काव्य-श्रृंखला उनके पहले और दूसरे संग्रहों ( कुछ वाक्य तथा पागल गणितज्ञ की कविताएं ) में रही हैं और अपने अनंतिम रचाव में, ज़ाहिर है, उनके आगामी संग्रहों में भी अपनी जगह बनाती रहेंगी. सबद के आग्रह पर उन्होंने कविताएं भेजी, उनका आभार. शीघ्र ही उनका गद्य और एक पुस्तिका भी प्रकाशित की जाएगी. कवि का चित्र आस्तीक के सौजन्य से.}

साँस


मरने के ठीक पहले माँ की साँस की डोर छाती के भीतर बुरी तरह उलझ गयी है। उसे सुलझाने की जगह मैं उसका हाथ पकड़ लेता हूँ। रसोईघर के फहराते प्रकाश में मैं आग के सामने बैठा हूँ। माँ चूल्हे में फूलती रोटी को ताक रही है। सुदूर गहराते आकाश-मार्ग पर पिता के छूटे हुए पद-चिन्हों की तरह नक्षत्र दिखायी देना शुरू हो जाते हैं। माथे की झुरियों में फँसे हाथों से नाना नींद की ओर सरक रहे हैं।

अँधेरी छत पर खड़ी नानी पूरी ताकत से चीखती है: लो-लो वह चल दी।
****
यमदूत

पिता को जितना बीत गया उसके सामने जितना बीतने वाला है, इतना छोटा लगता कि उन्हें मृत्यु के पहले का अपना जीवन दो हाथ लम्बी ज़मीन मालूम देता जिसे वे एक बार में कूद कर पार सकते थे। वे इस लम्बी कूद के लिए अपना शहर छोड़ना नहीं चाहते थे। नाना के ऐसा चाहने पर पिता माँ की ओर देख मुस्करा देते। माँ गाय के सामने भूसा भरा बछड़ा रख देती। गाय के थनों में दूध और आँखों में आँसू उतर आते। मरे हुए चमड़े पर उसे जीभ फेरते देख माँ किसी चमत्कार की कामना करती।

नानी ज़िन्दगी को पूरा जी चुकने के बाद अपनी ही प्रेतछाया की तरह घर के जिस बरामदे में सरकती रहती उसी के कोने में पगड़ी पर सिर धरे एक बूढ़ा यमदूत सोता रहता।
****
परदे

माँ धूप में बैठी है। (ओफ़ कितने दिनों बाद मैं माँ को इस तरह धूप में बैठा देख पाया हूँ, कितने दिनों बाद ...)। माँ धूप में बैठी है। जाने किसी बात पर हँसते पिता गुसलखाने से लौटते हुए आँगन में ठहर गये हैं। उनकी सफ़ेद धोती उनकी तोंद पर अटकी है। आँगन में सूखते कपड़ों के असंख्य परदे हवा में डोल रहे हैं। इन्हीं में से किसी एक के पीछे न होने का मंच तैयार हो चुका है। माँ की बन्द आँखों के पीछे पिता घर से दूर होते जा रहे हैं।

बरसों अपने जीवन पर फिसलने के बाद नाना नानी की मौत के सामने जा खड़े हुए हैं।
****
साड़ी

पिता लम्बी मेज़ के सिरे पर बैठे काँट-छुरे से रोटी तोड़ रहे हैं। मैं उनके बगल में बैठा उनके इस कारनामे पर अचम्भित होता हूँ। माँ झीने अँधेरे में डूबती, खाली कमरे में बैठी है। उसकी साड़ी पर पिता की मौत धीरे-धीरे फैल रही है। नाना वीरान हाथों से दीवार टटोलने के बाद खूँटी पर अपनी टोपी टाँग देते हैं। नानी दबी आवाज़ से बुड़बुड़ाती है: ‘क्या बुड़ला फिर सो गया ?‘

माँ मेरी हठ के कारण सफ़ेद साड़ी बदलती है। पिता सड़क के मुड़ते ही आकाष की ओर मुड़ जाते हैं।
****
पेट 

माँ का पेट ढीला पड़ गया है मानो वहाँ समुद्र की कोई लहर आकर बैठ गयी हो। मैं दूर तक फैली इस लहर में गोते लगाता हूँ, भीगता हूँ और माँ को अपनी ओर मुस्कराते देखता हूँ। नानी को यह पसन्द नहीं है। वह बार-बार मुझे किनारे पर बुलाती है। इस सब से बेखबर नाना हर शाम मुझे पार्क ले जाते हैं। मैं घनी झाड़ियों में छिपकर नाना के चेहरे पर उम्र की गहराती छाया देखता हूँ।

पिता की विदाई के बाद समुद्र की लहर समुद्र लौट जाती है। माँ की गोद में फैली बालू में मेरे पैरों के निषान भरना शुरू हो जाते हैं।
****
थाली

बरामदे की मेज़ पर खाना खा रहे पिता गुस्से में थाली उठाकर आँगन में फेंक देते हैं। आँगन के फर्ष पर गर्म दाल फैल जाती है। नानी किसी लुप्त प्रजाति के पक्षी की तरह अपनी टेढ़ी टाँगों से चलकर पूजा के कमरे से बाहर निकलती है। मैं नाना को उनके मुवक्किलों के लम्बे-लम्बे मुकदमें पढ़कर सुना रहा हूँ। वे बार-बार मेरे उच्चारणों पर मुझे टोक रहे हैं। घर के जाने किस कोने से निकलकर भाई आँगन में बिखरे बर्तनों को उठाकर पिता के सामने रख देता है। वे उसे पूरी ताकत से घूरते हैं। चौके के दरवाजे़ पर खड़ी माँ सहमने को होती है कि पिता की आँखों का झुकना शुरू हो जाता है।

माँ का कद बढ़ते-बढ़ते आसमान तक जा पहुँचता है।
****
कटोरे में अंगार

होली की आग में माँ मुझे गेहूँ की बालें भूनने को कहती हैं। चौराहे पर जलती ढेरों लकड़ियों की सुनहली आभा पास के मकानों को बुहारते हुए आकाष तक जा पहुँचती है। माँ की बहन पिता के सफ़ेद कुर्ते पर बाल्टी भर गहरा नीला रंग डालकर माँ के पीछे जा छिपती है। गुस्से में तमतमाते पिता को देख माँ सबकी खिलखिलाहटें फूलों की तरह चुनकर अपने आँचल में डालती जाती। पौ फटते ही नानी की कड़कती आवाज़ और माँ के शान्त स्वर के इंगित पर मैं चौराहे तक भागता चला जाता।

कटोरे में अंगार लेकर लौटते हुए मुझे देख पिता धीरे से अपना मुँह फेर लेते।
****
9 comments:

बहुत पसंद आई आपकी ये लघु कथाएं या कविताएं (आप कहें तो )
सच माँ का कद कितना ऊँचा होता है ।


सभी रचनायें भावमय हैं आभार्


kitna kuch kah jati hai ye kavitaye...andar tak hila jati hai


Ashutosh Bhardwaj

Anupasthiti ke bahut bareek reshon se Udayanji apni lipi ko abhisikt karte hain. Mrityu dhime se pravesh karti, apna sthaan banati hai. Sadak ke mudte hi pita akash ki aur mud jate hain, putra ko angaar le laut-ta dekh dhire se munh fer lete hain.

Pita ki vidayi ke baad samudra ki lehar samudra laut jati hai.
Kavi bade hi prashant dhairya se avsaad ko chhupaye le jata hai. Aapko kahin gehre utar utkhanan karna padega tab kahin in shabdon ki rooh men base us kavi ko chinhit kar payenge jo khud ko abhivyakt karne ke virudh sangharshrat hai.
Great art lies in concealing the art.

Smriti ke beej ko phod kar janmi ye kavitayen mithak ho jane ki akansha liye rehti hain.


मुझे ये सभी कवितायें बहुत अच्छी लगीं लेकिन 'मां' तो ह्रदय को छु गयी


maine Udayan ji ki kavitayen jyada nahi padhi hain lekin jab bhi jitni bhi padhin yaad rah gayin. yahan unhen padhkar bahut achcha laga....


अलग अलग समय के बारीक़ हिस्से....उभरते हैं...पढ़ते पढ़ते ..उदयन जी को और पढ़वाइए सबद पर


manisha kulshreshtha

उदयन की कविताएँ अनूठी हैं. मन की कोर पर ठहर जाती हैं.


बहुत कमाल की कविताएं। ये कविताएं हैं - सचमुच की, जीवित! इन्हें 'लघुकथाओं' जैसे छोटे नाम से संबोधित न किया जाए!


सबद से जुड़ने की जगह :

सबद से जुड़ने की जगह :
[ अपडेट्स और सूचनाओं की जगह् ]

आग़ाज़


सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

पिछला बाक़ी

साखी


कुंवर नारायण / कृष्‍ण बलदेव वैद / विष्‍णु खरे / चंद्रकांत देवताले / राजी सेठ / मंगलेश डबराल / असद ज़ैदी / कुमार अंबुज / उदयन वाजपेयी / हृषिकेश सुलभ / लाल्‍टू / संजय खाती / पंकज चतुर्वेदी / आशुतोष दुबे / अजंता देव / यतींद्र मिश्र / पंकज मित्र / गीत चतुर्वेदी / व्‍योमेश शुक्‍ल / चन्दन पाण्डेय / कुणाल सिंह / मनोज कुमार झा / पंकज राग / नीलेश रघुवंशी / शिरीष कुमार मौर्य / संजय कुंदन / सुंदर चंद्र ठाकुर / अखिलेश / अरुण देव / समर्थ वाशिष्ठ / चंद्रभूषण / प्रत्‍यक्षा / मृत्युंजय / मनीषा कुलश्रेष्ठ / तुषार धवल / वंदना राग / पीयूष दईया / संगीता गुन्देचा / गिरिराज किराडू / महेश वर्मा / मोहन राणा / प्रभात रंजन / मृत्युंजय / आशुतोष भारद्वाज / हिमांशु पंड्या / शशिभूषण /
मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / ज़बिग्नियव हर्बर्ट / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / सबीर हका / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी