Sunday, June 13, 2010

उदयन वाजपेयी की कविताएं

{आगे दी जा रही कविताएं उदयन वाजपेयी की काव्य-श्रृंखला ''कुछ वाक्य'' की नई कड़ियाँ हैं. उदयन की यह चर्चित काव्य-श्रृंखला उनके पहले और दूसरे संग्रहों ( कुछ वाक्य तथा पागल गणितज्ञ की कविताएं ) में रही हैं और अपने अनंतिम रचाव में, ज़ाहिर है, उनके आगामी संग्रहों में भी अपनी जगह बनाती रहेंगी. सबद के आग्रह पर उन्होंने कविताएं भेजी, उनका आभार. शीघ्र ही उनका गद्य और एक पुस्तिका भी प्रकाशित की जाएगी. कवि का चित्र आस्तीक के सौजन्य से.}

साँस


मरने के ठीक पहले माँ की साँस की डोर छाती के भीतर बुरी तरह उलझ गयी है। उसे सुलझाने की जगह मैं उसका हाथ पकड़ लेता हूँ। रसोईघर के फहराते प्रकाश में मैं आग के सामने बैठा हूँ। माँ चूल्हे में फूलती रोटी को ताक रही है। सुदूर गहराते आकाश-मार्ग पर पिता के छूटे हुए पद-चिन्हों की तरह नक्षत्र दिखायी देना शुरू हो जाते हैं। माथे की झुरियों में फँसे हाथों से नाना नींद की ओर सरक रहे हैं।

अँधेरी छत पर खड़ी नानी पूरी ताकत से चीखती है: लो-लो वह चल दी।
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यमदूत

पिता को जितना बीत गया उसके सामने जितना बीतने वाला है, इतना छोटा लगता कि उन्हें मृत्यु के पहले का अपना जीवन दो हाथ लम्बी ज़मीन मालूम देता जिसे वे एक बार में कूद कर पार सकते थे। वे इस लम्बी कूद के लिए अपना शहर छोड़ना नहीं चाहते थे। नाना के ऐसा चाहने पर पिता माँ की ओर देख मुस्करा देते। माँ गाय के सामने भूसा भरा बछड़ा रख देती। गाय के थनों में दूध और आँखों में आँसू उतर आते। मरे हुए चमड़े पर उसे जीभ फेरते देख माँ किसी चमत्कार की कामना करती।

नानी ज़िन्दगी को पूरा जी चुकने के बाद अपनी ही प्रेतछाया की तरह घर के जिस बरामदे में सरकती रहती उसी के कोने में पगड़ी पर सिर धरे एक बूढ़ा यमदूत सोता रहता।
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परदे

माँ धूप में बैठी है। (ओफ़ कितने दिनों बाद मैं माँ को इस तरह धूप में बैठा देख पाया हूँ, कितने दिनों बाद ...)। माँ धूप में बैठी है। जाने किसी बात पर हँसते पिता गुसलखाने से लौटते हुए आँगन में ठहर गये हैं। उनकी सफ़ेद धोती उनकी तोंद पर अटकी है। आँगन में सूखते कपड़ों के असंख्य परदे हवा में डोल रहे हैं। इन्हीं में से किसी एक के पीछे न होने का मंच तैयार हो चुका है। माँ की बन्द आँखों के पीछे पिता घर से दूर होते जा रहे हैं।

बरसों अपने जीवन पर फिसलने के बाद नाना नानी की मौत के सामने जा खड़े हुए हैं।
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साड़ी

पिता लम्बी मेज़ के सिरे पर बैठे काँट-छुरे से रोटी तोड़ रहे हैं। मैं उनके बगल में बैठा उनके इस कारनामे पर अचम्भित होता हूँ। माँ झीने अँधेरे में डूबती, खाली कमरे में बैठी है। उसकी साड़ी पर पिता की मौत धीरे-धीरे फैल रही है। नाना वीरान हाथों से दीवार टटोलने के बाद खूँटी पर अपनी टोपी टाँग देते हैं। नानी दबी आवाज़ से बुड़बुड़ाती है: ‘क्या बुड़ला फिर सो गया ?‘

माँ मेरी हठ के कारण सफ़ेद साड़ी बदलती है। पिता सड़क के मुड़ते ही आकाष की ओर मुड़ जाते हैं।
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पेट 

माँ का पेट ढीला पड़ गया है मानो वहाँ समुद्र की कोई लहर आकर बैठ गयी हो। मैं दूर तक फैली इस लहर में गोते लगाता हूँ, भीगता हूँ और माँ को अपनी ओर मुस्कराते देखता हूँ। नानी को यह पसन्द नहीं है। वह बार-बार मुझे किनारे पर बुलाती है। इस सब से बेखबर नाना हर शाम मुझे पार्क ले जाते हैं। मैं घनी झाड़ियों में छिपकर नाना के चेहरे पर उम्र की गहराती छाया देखता हूँ।

पिता की विदाई के बाद समुद्र की लहर समुद्र लौट जाती है। माँ की गोद में फैली बालू में मेरे पैरों के निषान भरना शुरू हो जाते हैं।
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थाली

बरामदे की मेज़ पर खाना खा रहे पिता गुस्से में थाली उठाकर आँगन में फेंक देते हैं। आँगन के फर्ष पर गर्म दाल फैल जाती है। नानी किसी लुप्त प्रजाति के पक्षी की तरह अपनी टेढ़ी टाँगों से चलकर पूजा के कमरे से बाहर निकलती है। मैं नाना को उनके मुवक्किलों के लम्बे-लम्बे मुकदमें पढ़कर सुना रहा हूँ। वे बार-बार मेरे उच्चारणों पर मुझे टोक रहे हैं। घर के जाने किस कोने से निकलकर भाई आँगन में बिखरे बर्तनों को उठाकर पिता के सामने रख देता है। वे उसे पूरी ताकत से घूरते हैं। चौके के दरवाजे़ पर खड़ी माँ सहमने को होती है कि पिता की आँखों का झुकना शुरू हो जाता है।

माँ का कद बढ़ते-बढ़ते आसमान तक जा पहुँचता है।
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कटोरे में अंगार

होली की आग में माँ मुझे गेहूँ की बालें भूनने को कहती हैं। चौराहे पर जलती ढेरों लकड़ियों की सुनहली आभा पास के मकानों को बुहारते हुए आकाष तक जा पहुँचती है। माँ की बहन पिता के सफ़ेद कुर्ते पर बाल्टी भर गहरा नीला रंग डालकर माँ के पीछे जा छिपती है। गुस्से में तमतमाते पिता को देख माँ सबकी खिलखिलाहटें फूलों की तरह चुनकर अपने आँचल में डालती जाती। पौ फटते ही नानी की कड़कती आवाज़ और माँ के शान्त स्वर के इंगित पर मैं चौराहे तक भागता चला जाता।

कटोरे में अंगार लेकर लौटते हुए मुझे देख पिता धीरे से अपना मुँह फेर लेते।
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9 comments:

Mrs. Asha Joglekar said...

बहुत पसंद आई आपकी ये लघु कथाएं या कविताएं (आप कहें तो )
सच माँ का कद कितना ऊँचा होता है ।

निर्मला कपिला said...

सभी रचनायें भावमय हैं आभार्

kahana hai kuch aur said...

kitna kuch kah jati hai ye kavitaye...andar tak hila jati hai

Ashutosh Bhardwaj said...

Anupasthiti ke bahut bareek reshon se Udayanji apni lipi ko abhisikt karte hain. Mrityu dhime se pravesh karti, apna sthaan banati hai. Sadak ke mudte hi pita akash ki aur mud jate hain, putra ko angaar le laut-ta dekh dhire se munh fer lete hain.

Pita ki vidayi ke baad samudra ki lehar samudra laut jati hai.
Kavi bade hi prashant dhairya se avsaad ko chhupaye le jata hai. Aapko kahin gehre utar utkhanan karna padega tab kahin in shabdon ki rooh men base us kavi ko chinhit kar payenge jo khud ko abhivyakt karne ke virudh sangharshrat hai.
Great art lies in concealing the art.

Smriti ke beej ko phod kar janmi ye kavitayen mithak ho jane ki akansha liye rehti hain.

Anonymous said...

मुझे ये सभी कवितायें बहुत अच्छी लगीं लेकिन 'मां' तो ह्रदय को छु गयी

pratibha said...

maine Udayan ji ki kavitayen jyada nahi padhi hain lekin jab bhi jitni bhi padhin yaad rah gayin. yahan unhen padhkar bahut achcha laga....

पारूल said...

अलग अलग समय के बारीक़ हिस्से....उभरते हैं...पढ़ते पढ़ते ..उदयन जी को और पढ़वाइए सबद पर

manisha kulshreshtha said...

उदयन की कविताएँ अनूठी हैं. मन की कोर पर ठहर जाती हैं.

समर्थ वाशिष्ठ / Samartha Vashishtha said...

बहुत कमाल की कविताएं। ये कविताएं हैं - सचमुच की, जीवित! इन्हें 'लघुकथाओं' जैसे छोटे नाम से संबोधित न किया जाए!