Thursday, June 10, 2010

सुदीप बनर्जी पर विष्णु खरे

{आलोचना को ना-कुछ मानने और उसके उपलब्ध हीनतर यथास्थितिवादी विकल्पों में गुम हो जाने जैसी दो भिन्न आदतों में दरअसल ज़्यादा फ़र्क़ नहीं है. कुछ लोगों की दिक्क़तें और करुण हैं. हम साल भर खराब आलोचना से घृणा करने, उसकी निंदा आदि करने में व्यस्त रह जाते हैं और अगला वसंत आ जाता है. यों, निर्माण प्रायः स्थगित रहता है. लेकिन विष्णु खरे का बीते दो बरसों का आलोचनात्मक लेखन इसका प्रकांड अपवाद है, हम उनके विराट में से एक अत्यंत संछिप्त अंश - जो यद्यपि मात्रा और गुणवत्ता, दोनों में, तमाम (और तमाम कहना भी कम कहना है) मौजूद आलोचनाओं से कहीं प्रबल और प्रासंगिक है - से संबोधित हैं. इसे सीमा या रणनीति, कुछ भी समझा जा सकता है. सूची पेश करने की ज़रुरत नहीं, यह लेखन कुछ लोगों के स्वप्नों और अन्य लोगों के दु स्वप्नों में अहर्निश उपस्थित है. यहाँ प्रकाशित लेख कई कारणों से याद आता रहेगा. अपने मूल रूप में यह 'उद्भावना'  (स्थायी सम्पादक - अजेय कुमार) द्वारा स्वयं विष्णु खरे के अतिथि सम्पादन में प्रकाशित और कवि, प्रशासक सुदीप बनर्जी के जीवन और अवदान पर एकाग्र अंक का सम्पादकीय है. उद्भावना के उस अंक के वैशिष्ट्य की चर्चा भी इस बिंदु पर एक सुखद विषयांतर ही हो सकती है,  इस आलेख की एक ख़ासियत यह है कि इसमें आदि से अंत तक किसी तरह का कोई श्रेणी-निर्माण या क्रमनिर्धारण यही नहीं कि नहीं है, बल्कि सार्थक आलोचना कैसे, किन औजारों के ज़रिये इन हडबडियों और बीमारियों को निरस्त करती है, उसकी सूझ भी यहाँ से हासिल की जा सकती है. यह लेख एक स्थान पर भी व्यापक हिंदी परिदृश्य में रचनाकार की हैसियत बताने की कोशिश नहीं करता और लगातार कवि की अद्वितीयताओं पर केन्द्रित है. सुदीप बनर्जी की कविता को जिन आधारों पर पहचाना गया है, उनके कवि-व्यक्तित्व की पहचान की जो मुख्यधारा है, उसकी निर्भीक सम्यक मीमांसा इस लेख के होने का एक कारण है. इस मीमांसा में अजब तौर पर विष्णु खरे की आलोचना द्वारा आविष्कृत और स्थापित मूल्य (जटिल, प्रतिबद्ध, विवेकशील, बहुवर्णी विश्वबोध) केंद्र में आ गए हैं, इससे पुनः आलोचक की इंटीग्रिटी का पता मिलता है. हमारा वक़्त छोटी=छोटी साँसें लेने का, तत्काल में डूब के समाप्त हो जाने का, भूलने का, कम मेहनत का, लिखने की बजाय अफवाह फैलाने का और कवियों पर दया करने का भी वक़्त हुआ जा रहा है. ऐसे में, इस लेख के, ऐसे लेखों के क़रीब होना, उन्हें पढ़ना और प्रतिकृत होना भी एक सम्पूर्ण प्रतिकार है.} -व्योमेश शुक्ल 


उसके पूर्णतर मूल्यांकन की एक भूमिका


विष्णु खरे


कुछ
कवियों के साथ ऐसा होता है कि उनका पहला संग्रह आता है जिसमें उनके प्रारंभिक दौर की वैविध्यपूर्ण रचनाएँ होती हैं, इसलिए कि उनकी सृजनशीलता एक भ्रमर, तितली या बगटूट अश्व की तरह उस समय अत्यंत ‘संग्राहक’, उत्तेजनापूर्ण और वेगवान होती है और युवा होने के कारण वे अपने उस समय तक के तमाम अनुभवों को कविता में रूपांतरित और प्रकाशित कर पाने के रोमांच और रूमान से लबरेज़ रहते हैं--और शायद स्वयं उन्हें इसका पूरा अहसास नहीं हो पाता कि उन्हीं के उन स्वरों से अंततः कोई तान, कोई धुन, कोई राग या कोई सिम्फ़नी बन पा रही है या नहीं, स्वयं उनकी उन उद्गमीय लहरों या धाराओं से उनकी अपनी कविता की कोई मुख्यधारा अवतरित हो रही है या नहीं। अब यह बात बिल्कुल अलग है कि वे तब अपने समय के अन्य कवियों और उनकी कविता को कितना जानते हैं, स्वयं उस वृहत्तर कविता में कितना वैविध्य है, उसकी कोई सुदीर्घ मुख्यधारा है या नहीं और क्या वे इतने आत्म-सजग और सुविज्ञ हैं कि उसके और अपने बीच कोई आकर्षण-विकर्षण देख-समझ पा रहे हैं। वे करते यह हैं कि काल-क्रम से अपनी कविताओं को रख देते हैं ताकि पाठक देखना चाहें तो देख सकें कि विभिन्न अनुभवों और विषयों पर बारी-बारी से मँडलाती, लौटती, उनसे रस और केसर ग्रहण करती, अब तक के उनके जीवन की ज़मीन को अपनी टाप से मापती-खोजती उनकी प्रतिमा कहाँ तक विकसित हुई है। वे लगभग हमेशा अपनी उन कविताओं को अपने संग्रह के अंत में रखते हैं जिन्हें वे सबसे ज़्यादा ‘हासिल’ समझते हैं और वे अक्सर उनकी ‘अधुनातन’ होती हैं।

फिर
ऐसे युवा कवियों के पाठक, यदि वे हुए और उनमें कोई चिन्गारी देख पाए तो, अक्सर अधिकांशतः उन्हीं कुछ अंतिम कविताओं को सराहते हैं, कवि भी अपनी अगली कविताओं (लिहाज़ा अपने अगले संग्रह) में अधिकतर उन्हीं के आगे और इर्द-गिर्द बढ़ता है, यह नहीं कि अपना वैविध्य खो या तज देता है लेकिन अपनी कविताओं की एक चाही-अनचाही मुख्यधारा बनाता चलता है, ज़रूरी नहीं कि वह ऐसा जान-बूझकर कर रहा हो। उसकी अपनी विषय-वस्तु(एँ), संगीत की भाषा में कहें तो, ‘थाट’, थीम या हस्ताक्षर-धुन (‘सिग्नेचर ट्यून’) बनने लगते हैं, उसकी ‘पहचान’ या ‘अस्मिता’ साकार होती है। पाठक भी उसी की उम्मीद और प्रतीक्षा करने लगता है, उसका अभ्यस्त और व्यसनी हो जाता है, कवि की ‘कविता’ उसके लिए निस्बतन आसान हो जाती है, उसके प्रारंभिक वैविध्य को वह भूल जाता है, बल्कि वैसी ‘दूसरी’ रचनाओं को वह कृपा-भाव से ‘सामान्य’, ‘साधारण’, ‘शुरूआती’, ‘नगण्य’, ‘उपेक्षणीय’ जैसी मानने लगता है। कवि की सृजन-शक्ति भी उसी ‘मुख्यधारा’ को स्वीकार कर लेती है, उसे सिरजकर उसी में समाहित हो जाती है। लेकिन कुछ कवि अपनी कविता के साथ भी राजनीति करते हैं--उसमें से कुछ के साथ पाठक और ज़माने का रुझान देखते हुए कैशोर्य-कुटेव, ग़रीब रिश्तेदार या विकलांग संतान जैसा व्यवहार करते हैं। वे पाठक की आसानीपरस्ती का स्वैच्छिक आखेट बन जाते हैं। यह अलक्षित ही रह जाता है कि इस प्रक्रिया में स्वयं पाठक और कवि तथा वृहत्तर कविता की कितनी हानि होती है।

सुदीप बनर्जी ऐसा कवि क़तई नहीं है जिसने अपने सुख़न के साथ खु़द सियासत की हो लेकिन बदक़िस्मती से उसके कुछ पाठक ज़रूर हैं जिन्होंने उसकी कई ‘दूसरी’ लेकिन मानीख़ेज़ कविताओं को या तो नज़रअंदाज़ किया है या जो अपनी समझ को उसकी मुख्यधारा कविताओं पर ही ज़ोर देते हुए भोंथरा कर चुके हैं। त्रासद विडम्बना यह है कि उसके पहले संग्रह ‘शब-गश्त’ में ऐसी कई रचनाएँ मिल जाएँगी जिनसे न सिर्फ़ एक समांतर ‘दूसरे’ सुदीप का पता चलता है बल्कि उसकी सुपरिचित ‘मुख्यधारा’ कविता के उद्गमों और नये अर्थों की खोज होती है। ‘दायरे से बाहर’ शीर्षक ही अर्थगर्भ है--आखि़र वह कौन-सा दायरा है जिसके बाहर यह कविता या इस कविता के ज़रिये कवि खड़ा हुआ है? क्या वह यह देख रहा है कि उसकी अपनी कविता का दायरा बनना शुरू हो चुका है या उसके पाठक उसे उसी में महदूद रखना चाह रहे हैं या फिर 1980 तक की हिंदी कविता में वह एक बाड़ा, एक घेरा देख रहा है जिसके बाहर वह स्वयं को देखना-महसूसना चाहता है? एक दूसरी बात यह है कि सुदीप सरीखे कवि के अनेक चित्रा, बिम्ब, मुहावरे, वाक्य, व्यक्ति, पात्रा, हवाले आदि अल्पपारदर्शी या अपारदर्शी ही चले आते हैं लेकिन उनके अर्थों और आशयों के आसपास भी फटकने की कोशिश नहीं की गई है। ‘दायरे से बाहर’ कई अर्थों में सुदीप की भी एक असामान्य कविता है--वह मूलतः एक स्त्री, जो शायद पत्नीनुमा प्रेमिका या प्रेमिकानुमा पत्नी हो सकती है, और कवि के बीच एक लम्बे संपर्क के दरमियान चलता हुआ संवाद है। कोई आँखें हैं जिन्हें कवि की आँखों का भरोसा है कि वह अपने शब्दों के ज़ख़्मी शरीरों से एक करतब का आकाश रच देगा। कवि जादूगरी-बाजीगरी का लफ़्ज़ ‘करतब’ इस्तेमाल करता है जबकि जो वह सिरजेगा वह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा जिसके तहत कुछ तो निजी करिश्मे होंगे किंतु एक गाँव सिमराहा की वंध्या ज़मीन पर जंगल भी उग जाएगा। यह किसी सरकारी योजना का ज़िक्र है जिसमें परिहास और त्रासदी दोनों हैं। इस इंद्रजाल में शब्द दफ़्न हो जाएँगे और कविताएँ लज़ारस की तरह (बाइबिल-एलिअट) पुनर्जीवित होंगी। निजी, सार्वजनिक और सृजनशीलता के बीच आवाजाही शुरू हो चुकी है। अचानकस्त्री/प्रेमिका/पत्नी से संवाद प्रारंभ होता है कि उसने जो भाषा दी है उसमें कवि उसे प्यार नहीं कर सकता। वह भाषा शब्दों की है, शरीर की या विचारों की, यह अस्पष्ट ही छोड़ दिया जाता है। फिर लय है जिससे कविता नहीं लिखी जा सकती, हथियार हैं जिनसे क्रांति नहीं हो सकती। लेकिन स्त्री को प्यार से तो कुछ ताल्लुक है, कविता और हथियार से नहीं। ‘प्यार’, ‘अप्यार’, ‘भाषा’, ‘तनाव’, ‘निःशब्द’, ‘ख़ामोश’ के एक जटिल द्वैध में बात करते हुए वह कहती है कि तुम भाषा के दायरे से बाहर आकर मुझे मेरे पूरे शरीर में प्यार करो। उधर कवि है कि उसके लिए देह का रोम-रोम एक शब्द है लिहाज़ा इस आमंत्रित ढंग से प्यार करना उसके लिए सिर्फ़ एक लफ़्ज़ी-ज़ुबानी कविता बन कर रह जाएगा और वह अकवि स्थितियों को कविता बनते देख खिन्न-तो हो जाता है फिर भी यूँ विकल्पहीन कविता स्वतः लिख जाती है। वह यूँ इस तरह है कि कवि (यदि उसे सुदीप बनर्जी ही मानें तो) अपनी कविता में पहली और अंतिम बार कहता है कि मुझसे अधिक कोई नहीं जानता कि क्रांति कितनी ज़्यादा ज़रूरी है लेकिन लड़ने के लिए मेरे पास सिर्फ़ शब्द हैं। हम पाठक इसे साम्यवादी क्रांति के लिए जद्दोज़हद समझेंगे लेकिन कवि इसे हमारी समझ पर छोड़ देता है--सिर्फ़ सिमराहा की बंजर ज़मीन का वनीकरण ही हमें संकेत देता है। स्त्री उसे लगातार छेड़ रही है, कहती है तुम कवियों को भी लड़ना सीखना होगा, लेकिन विडम्बना यह है कि जब वह लड़ने जाता था तो लोग हँसकर कहते थे कि तुम (सिर्फ़) कवि हो। उधर स्त्री की शरारतें जारी हैं, वह कहती है कविता को हथियार मत बनाओ, कवियों की तरह मत लड़ो, लड़ना है तो मुझे चाहने की तरह लड़ो। कभी-कभी शक़ होता है कि वह स्त्री सशरीर बाहर रही होगी लेकिन अब एक कल्पना या ‘विज़न’ की तरह कवि का एक उकसावे-भरा ‘हैल्युसिनेशन’ बन गई है।

उससे उलझता हुआ, उसी के कारण कवि अंततः अपनी ‘क्रीडो’ तक पहुँचता है जो अपनी अभिव्यक्ति, लय और गूँज में लगभग अद्वितीय है: हर एक लड़ाई है कविता लिखने की तरह/पर यह तुम्हारे लिए प्यार का सत्य है / कविता लिखना हर ज़ख़्मी शब्द को सहलाना / पुचकारना और प्यार करना है, जो युद्ध में हताहत हो गए हैं / पर यह सचाई प्यार या कविता की नहीं, क्रांति की है। / क्रांति और कविता और प्यार का कौन सा मिश्रण / या कौन सा अलगाव, तुम्हें मंज़ूर होगा / वह इन तीनों की समस्या नहीं है / फिर भी तुम्हें विश्वास है / मेरे करतब का / और तुम्हारे आखि़री संतोष का। अपनी जटिल सांकेतिकताओं, विडम्बनाओं, विरोधाभासों, स्त्री और कवि के वाग्विचार द्वंद्व को कविता ‘रिज़ॉल्व’ या ‘रिकंसाइल’ करती है या नहीं यह एक स्वतंत्रा निबंध का विषय हो सकता है लेकिन सुदीप बनर्जी का कविता, क्रांति और प्यार का मौलिक मिश्रण या अलगाव--जो सिर्फ़ इन तीनों की ही नहीं, कवि की भी समस्या नहीं लगती--जो नाना वेशों में, प्रस्तारों और समुच्चयों में उसकी कविताओं के कैलाइडोस्कोप में बनता-बदलता रहा, पहली बार इतने स्पष्ट, मुखर रूप में दायरे से बाहर दिखाई देता है।

दरअसल हिंदी में ।ते च्वमजपबं (कवि कर्म, काव्य-कला) पर जितना सुदीप बनर्जी ने अपनी कविताओं में लिखा है उतना शायद किसी और कवि ने नहीं। मैंने पहले भी कहा है कि मुझे कविता पर लिखी गई कविताओं पर बहुत संदेह, तरस और क्रोध हो आता है लेकिन अपनी कविता और कविता-मात्रा को लेकर सुदीप की जो लगातार चिंता है, संशय और दुविधा है, वह इतनी ख़ालिस है कि वह उसे एक नैतिक और कलात्मक मूल्य दे देती है। इसी तरह अपने जीवन को लेकर सुदीप में एक लगातार निराधार अपराध-बोध और क्षमा-याचना है कि वह जितना-जैसा कर सकता था उतना कर नहीं पाया। सुदीप की ऐसी कविताओं का एक चयन तो किया ही जा सकता है, उनका गहरा विश्लेषण भी दरकार है। वह हिंदी के उन विरल कवियों में से है जो अपना काव्य-शास्त्रा, सौंदर्यशास्त्रा और भाषाशास्त्रा स्वयं गढ़ने में सफल रहे हैं।

‘जिस दिन’, ‘लौट आने का सुकून’, ‘तुम्हारे कितने सारे दाँत हैं’, ‘फ़व्वारा नहीं तुम्हारी हँसी’ ‘ठंडी शिराओं के भीतर से’, ‘दरवाज़ा खोलते हुए’, ‘अपने पदचापों से’, ‘बूर्ज्वा समझौता’, ‘पौ फटती है’ तथा ‘इस पागल कर देने वाली सुंदरता में’ जैसी ‘शब-गश्त’ की कविताओं में सुदीप स्त्री-पुरुष सम्बंध/प्रेम/दाम्पत्य के कई मरहलों, पड़ावों और मंज़िलों को उकेरता और जीवंत करता है--उनमें किसी की याद, बारिश, धूप और अंधेरा हैं, किसी का लौट आना पीले फूलों का दरख़्त है, लावा की नदी है, खुशी की शिराओं को किरवानी की गत अंकृत कर रही है, हनी ने लौटकर चीज़ों से सारे कपड़े उतार फेंके हैं और दोनों के बीच प्यार निरर्थक हो चुका है, किसी की उँगलियों में सेब डरावना हो जाता है, कोई बिलावजह हँसी है जिसके इतने सारे दाँत हैं, प्यार करते समय की उसकी निगाह और छुअन कवि को स्थायित्व के बीच भी बदल डालती हैं जबकि उसका कौमार्य कभी भंग नहीं होता, उसकी हँसी नारंगी पर गड़े पैने, जहरीले दाँत, उँगलियाँ, नाख़ून, दरार, आलीशान मकान के राखदानी-नुमा कमरे में कोई स्त्री नहीं जिसमें कवि झाड़ सके बची हुई राख, सर्द नसों से गुज़रती हुई शाम, कैशोर्य की स्मृति, रजस्वला उदासी, दूर होती हुई तस्वीर, दरार के भीतर दरार, घर की दीवार पर छिपकली जैसी चिपकी हुई टेलीफ़ोन की बजी हुई घंटी, दो जन्मदिन, शाम का सूना घर खोलना, शहर की सड़कों को अपने पदचापों से अनुत्तेजित करते हुए बदनामियों को दोहराते चले जाना अपने वैमनस्य में जो न कोई बलिदान है और न पराजय, कवि के संभव-तम प्रेम के बावजूद किसी का दुराग्रह है कुमारी बने रहने का, हर मजमें में सारे कपड़े उतार कर हर लड़की को लुभाने की आत्यंतिक कोशिश और उससे उपजनेवाले मध्यवर्गीय विसंगत, छद्म दार्शनिक-सामाजिक परिणाम, चेहरे से ज़मींदोज़, ग्रीवा स्तन नाभि योनि जंघाएँ टाँगें पैर, उन पर विवश हाथ और उँगलियाँ हैं। सुदीप की यह कविताएँ उसकी ‘मुख्यधारा’ कविताओं से बिल्कुल अलग, उनसे विपरीत, आध्ाद, ऐंद्रिकता, माँसलता, रोमांच, जय-पराजय, हताशा, kun ठा के एक जटिल ‘एरोटिक्स’ का प्रतिसंसार रचती हैं जिसे अज्ञान या उपेक्षा के बट्टेखाते में नहीं डाला जा सकता, उन्हें पाठक ‘असुदीपीय’ कहकर अपना पिंड नहीं छुड़ा सकता--उन्हें या तो ख़राब रचनाएँ मानकर ख़ारिज करना होगा या उनसे निपटना होगा एक दिन।

अपनी ऐसी कविताओं में भी सुदीप ने एक ऐसी रचना दी है जिसे एक निर्मम ईमानदारी और मूल्यांकन के समूचे साहस के साथ अपने ढंग का एक शाहकार ही कहा जा सकता है। ‘इस पागल कर देने वाली सुंदरता में’ सुदीप के युवा कवि का वह ‘पर्सोना’ उजागर करती है जो शायद उसकी किसी अन्य कविता में नहीं है। यह एक अंतरंग रति-प्रसंग है लेकिन अपनी दैहिकता, ऐन्द्रिकता, काम-वेग, वासना, उद्दाम, नियंत्राण से परे तत्काल, किसी भी शर्त पर अपनी संभोग-इच्छा में वह इतना एकतरफ़ा मर्द, पौरुषेय और ‘मैचो’ है कि स्त्राीपीड़क बलात्कार तक की सीमाएँ लाँघ लेता है। लेकिन यह अपनी मर्दानगी की नुमाइश की कविता नहीं है, अपनी वहशियत का इक़बाल है और इस तरह हिंदी में एक अनूठी ‘कन्फ़ैशनल’ रचना है। सैंतीस पंक्तियों की इस कविता में सात बार ‘हिंस्र’ शब्द आता है, दो बार ‘हिंस्रता’ और एक बार ‘पाशविक’। स्त्री के सौंदर्य के आगे वह मात्रा पागल नहीं होता बल्कि उसका ऐसा कायांतरण होता है जो ‘डॉ. जैकिल एंड मिस्टर हाइड’, ‘मेसिए वेर्दू’, मार्की द साद और ब्रैम स्टोकर का स्मरण दिलाता है। अँधेरे, ज़्यादा चेहरे, ज़्यादा बाल, भोंथरे नाखूनों, धधकती दाढ़ी में दरिंदगी की हदें छूता हुआ (पहले से ज़्यादा) कवि हत-अभिप्राय स्त्री से पहले से ज़्यादा दोस्ती का दावा करता हुआ, उस पर पहले से ज़्यादा अधिकार जताता हुआ, चिंघाड़ता हुआ उसका शिकार करता है। सुदीप अपनी कई कविताओं में ‘बूढ़े होने’ या ‘बुढ़ापे’ का अद्वितीय इस्तेमाल करता है जब वह स्वयं और अन्य को युवा वर्तमान में ही भावी वृद्ध के रूप में देखता है। यह बुढ़ापा समय बीतने का अहसास भी हो सकता है, साहचर्य का, और साथ-साथ अपने व्यतीत होने, गुज़रने, छीजने और ‘डिके’ होने का भी। अपने आक्रमण को कवि ‘प्यार’, ‘अकेलेपन’, ‘दोस्ती’, ‘निरीह’, ‘स्वर्ग’, ‘पहले से ज़्यादा वह उसकी और वह उसका’ से कोमल या क्षम्य नहीं बनाना चाहता, वह औरत के शरीर को अभी और यहाँ एक लगभग ख़ूनी आवेग से प्राप्त करने की आदिम, पाषाणकालीय जयेच्छा की आर्तनाद-भरी विडम्बना है। यहाँ साबक़ा जिस्म के गुहांधकार में छिपे ओरांग-ओटांग से है।

यदि औरत के साथ (शारीरिक रूप से) पेश आने की ‘सुदीप’ की एक आत्यंतिक शैली यह है तो उसके अकेलेपन और निष्प्रयोजन ‘रोज़मर्रा’ को अंतरंगता और गहराई से देखने का माद्दा ‘हाथी दाँत के माँझी’ में है। सहानुभूति और संवेदनशीलता से तराशी गई यह कविता इतनी नाज़ुक, बारीक और संगीतमय है कि उसका कोई भी खुलासा उसकी झंकृत शीशागरी को सिर्फ़ तोड़ ही सकता है। जब तक वह युवती किशोरी रही तब तक सुंदर रहने की कोशिश करती रही-- चौबीस की उम्र में पांच वर्षों के दाम्पत्य के बाद सौंदर्य उसका सरोकार नहीं रहा। वह अपने घर की औरत हो चुकी है जो खरोंच, सैलाब, सिगरेट के खाली पैकेटों, माचिस की तीलियों, टूटे कंघों और नारियल के बुचों के पड़ोस से रहती हुई कभी कभार औपचारिक साज-सिंगार कर लेती है। उदास होना पहले उसका शग़ल नहीं था। वह एक अलसाया गु़स्ल करती थी और रेडियो सुनती थी। जिंदगी उसके साथ वह सब कर गुज़री है जो मुमकिन था। धूप भरा आसमान छूने, आत्मविकास के लिए पुस्तकें पढ़ने, साफ़ चीज़ों पर से काल्पनिक धूल हटाते रहने, खिड़की-दरवाजे़ पर खड़े होने, नाखून तराशने की भी एक हद होती है। रूबेंस द्वारा बनाए गए अक्षतयोना ईसामातृ मेरी के चित्रा की अनुकृति उसे अपने उदास घर में अपने विवाहित अभग्न कौमार्य की याद दिलाती है। वह रेडियो पर फ़रमाइशी गीतों के कार्यक्रम सुनती हुई सोचती है कि वे लोग और शहर कैसे होते हैं जिनके नाम उनमें लिए जाते हैं। एक फूलदान है पीले रंग का, जो किसी अपरिचित राजकुमार की वेडिंग-प्रेजे़ट है, जो नामुराद कभी टूटता नहीं हैं बल्कि सिंदूर से भर जाता है। वह आदतन सोने की कोशिश करती है और आदतन उसे नींद नहीं आती। पेड़ और चिड़ियां उसे देखती हैं, वह उन्हें नहीं। वह बच्चों के शोर को नहीं सुन पाती।

इस पूरी कविता में कहीं भी अतिभावुक, वक्तव्यबाज़, ‘नारीवादी’ हुए बगै़र कवि इस चौबीस वर्षीया विवाहिता के दाम्पत्य-विहीन, निरुद्देश्य तथा निरर्थक-निष्क्रिय जीवन को हाथी दाँत के माँझियों वाली उस शीशम की नाव के जड़ प्रतीक के ज़रिए और मार्मिक बना देता है जो एक वाहन है और सुंदर है किंतु मात्रा सजावटी और जीवनहीन, जो उसे उसकी घुटन-भरी कैद से कभी मुक्त नहीं करवा सकता: तकरीबन जल्दी ही पहुंचे ठंड के मौसम/ का अंधेरा और मातम सपाटे से घुस रहा / था कमरे में कपड़ों में नसों में और इंतज़ार में/ उसने भीतर जाकर बाल ठीक किए। फिर बाहर नहीं गई खिड़की से ही देखती रही/ मैले-कुचैले चेहरे के बावजूद शायद/ साफ सुथरे ही कपड़ों में उसके पति ने/ हंसा रोज़ से थोड़ा अलहदा/ हर रोज़ की तरह/रात भर चुप रहने के लिए।

सुदीप की कविताओं में अकेलापन या विलगाव सिर्फ़ स्त्रिायों की नियति का हिस्सा नहीं है--‘नर्क की कोई दहलीज़ नहीं है’, ‘इस दीवाल की व्याख्या करनी है’, ‘मकान मना करते हैं’,  ‘उसे तामीर करने दो’, ‘व्यर्थ वाचाल’, ‘ऐसे भी दिन होते हैं तथा ‘अपने बाद’ सरीखी रचनाएं कवि के लगभग वैसे ही एकाकीपन की अभिव्यक्तियां हैं जिसे वह चौबीस वर्षीया विवाहिता बर्दाश्त करने को आजीवन अभिशप्त थी। निर्लिप्त, बेखबर पड़ोस को देखती हुई उसकी आंखें जैसे अकेलेपन के दोज़ख़ की दहलीज़ बन जाती हैं, सार्त्रा के अविस्मरणीय कथन ‘दूसरे लोग ही नरक होते हैं’ का स्मरण दिलाती हुई। एक दीवाल है पूरब से पश्चिम तक फैली हुई जो कमरों, मकानों, शहरों, व्यक्तियों, परिवारों और पड़ोसों के बीच उठी हुई उन्हें विभाजित कर रही है, एक-दूसरे से निर्वासित, कैद और ‘आइसोलेट’ कर रही है। यदि उस दीवाल की व्याख्या हो सके तो इस विलगाव को भी समझा जा सकेगा। मकान हैं लेकिन वे जोड़ते नहीं, बांटते हैं, क्योंकि उनमें पेड़, नदी, आकाश जैसा खुलापन नहीं है, उनमें अंदरूनियत है। मकान हमारी वर्जनाओं के परिणाम हैं--वे अपने-आप-में- मकान नहीं बन पाए हैं। एक आदमी है जो प्रतीक्षा करता है क़दमों और टेलीफोन की आवाज़ों की और शायद वही अपने दूसरे प्रतिरूप में मर्दुमशुमारी करता भटकता है और अपने अकेलेपन में एक कोलाहल बुनता है तो दूसरा अपना एकांत तामीर करता है। विडम्बना यह है कि अकेला व्यक्ति कभी अकेला नहीं होता, उसके भीतर एक ‘दूसरा’ भी होता है, ये दोनों अपने ‘पिता’ और ‘पुत्रा’  बनते हुए ‘कारण’ और ‘परिणाम’ की एक शाश्वत द्वंद्वात्मकता में ‘अकेले’ एक-दूसरे को उत्पन्न करते रहते हैं।

ऐसे भी दिन होते हैं जब आदमी अपने तईं कुछ नहीं हो पाता, मृत्युदंड और रिहाई, स्त्राी की टांगों और लटों, अपने सांस और सांस के बीच लिए गए उसके फै़सले ही उसे प्रतिबिम्ब-विहीन नंगा छोड़ जाते हैं। आदमी का ख़ुद हो पाना एक नामुमकिन प्रयत्न लगता है बल्कि आदमी का वजूद उसी से विलग एक कोशिश बन जाती है। कोई चीज़ उसकी नहीं रह जाती, उसका समय  तक पीछे चला जाता है। उसे अपने तजुर्बे दूसरे के लगते हैं, अपना किया गया प्रेम किसी और का अनुभव लगता है, अपना नाम किसी और का। अकेलेपन का यह चरम-बिंदु है जहां आदमी अपने अस्तित्व और अस्मिता से ही विलग होकर स्वयं से अजनबी हो जाता है।

‘किसके तीर से बिंधी’, ‘वह दीवाल के पीछे खड़ी है’, ‘आसमान तुम्हारे कितने तारे’, ‘ये अनजान दरख्त, अपरिचित फूल-पत्तियाँ’, ‘मैं खिड़की से बाहर देखता हूं’, ‘ज़ख़्मों के कई नाम’, ‘आप लगातार’, ‘नींद से उठकर’, ‘महरी’, ‘तुम्हारी हंसी होती’, ‘वैसे तो उसके बारे में यह है’, ‘इतने उजाले में’, ‘ध्रुवतारा’, ‘अगर ऐसी रात’, ‘तारे’, ‘अथाह में’, ‘आईने में उसकी हंसी’, ‘उसके भी तो एक अन्तरंग’, ‘कितने ईश्वर प्रतिद्वंद्वी’, ‘यह एक सिलसिला शालीन है’, ‘सुबह अब आसान नहीं’, ‘खाकनशीं सारे अभिमान’, ‘वह तो बैठी, वहीं खिड़की पर’, ‘उंगलियां भूल आई हूं’, ‘टिमटिमाती बत्तियों से’, ‘खटखटाने से उसकी नब्जें दुखती’, ‘कोई विचार, कुछ भी बाक़ी नहीं’, ‘सबके आख़िर में है वसंत’, ‘धीरे-धीरे दरकिनार होते’, ‘नमस्कार के मर्म में है उदासी’, ‘इतना सब कुछ करने को’, ‘इतना औसत समय’, ‘अब तक जितना जीवन’, ‘ऐश्वर्य तो तुम्हें नहीं देगा यह जीवन’, ‘वहां तो अब भी इंद्रावती’, ‘तुम्हारे मन में तुम्हारा अद्वितीय जागृत’, ‘अगर ठीक से तय कर सकता’, ‘बेमुरव्वत’, ‘डाक’, ‘शुरूआत में शब्द था’, ‘मिले बहुतेरे’, ‘बचा रखा है खुद को अब तक तो’, ‘साफ-साफ कहने की कोशिश में’, ‘घर लाये वे योद्धा को मरा’, ‘मरे हुओं को लौटना पड़ना है’, ‘हाथ में गुलदस्ता नहीं’, ‘चुपचाप खड़े पहाड़ों को’, ‘तुकबंदी’, ‘मेज़बान’, ‘फैसला’, ‘वे बचे रहें’, ‘उनके जीवन में’, ‘एक दिन छूटेगा ही’ तथा ‘एक तारा हारा पारा’ जैसी कविताओं को भी मीजान में लें तो सुदीप बनर्जी की ऐसी रचनाओं की संख्या 73 तक पहुंचती है और यदि उसके जीवन काल में प्रकाशित उसके संग्रहों और मृत्योपरांत प्रकाशित असंकलित कविताओं को देखें तो उसकी कुल उपलब्ध रचनाओं की संख्या 200 के आसपास निकलती है।

निहितार्थ यह है कि सुदीप की लगभग एक-तिहाई कविताएं, जिनमें से उसने किसी को ‘डिस्ओन’ नहीं किया और प्रकाशन में बनाए रखा, उसी के काव्य संसार में एक समांतर विश्व रचती हैं। यह ध्यातव्य है कि ये दो परस्पर प्राथमिक प्रतियोगी (कंपीटिंग) या विरोधी दुनियाएं नहीं हैं। इनमें श्रेष्ठ और श्रेष्ठतर का प्रश्न भी शायद सिर्फ़ कलात्मक स्तर पर उठाया जा सकता है लेकिन सुदीप की जिस कविता को उसकी मुख्यधारा मानकर अपेक्षाकृत अधिक सराहा और विश्लेषित किया जा रहा है उसकी सामाजिक-राजनैतिक-वैश्विक प्रतिबद्धता के बरक्स उसकी इन ‘निजी’, ‘आंतरिक’, ‘इंट्रोस्पैक्टिव’ कविताओं को दबाने, छिपाने, अनुल्लिखित रखने, अवमूल्यित करने की चेष्टा नहीं की जानी चाहिए।

हम मुक्तिबोध को पढ़कर यह जान चुके हैं कि किस तरह एक बड़ा कवि कविता में अपने सार्वजनिक के साथ निजी को भी जोड़ सकता है। सुदीप बनर्जी में वह ‘वेल्डिंग’ या यौगिक बहुत कम मिलता है लेकिन वह अपने निजी अनुभवों, संकटों, जय-पराजय, हर्ष-विषाद, आशा-निराशा, सफलता-असफलता, ऐंद्रिकता-अध्यात्म को प्रतिबद्ध सामाजिक-राजनीतिक कविताओं से जान-बूझकर अलग रखता है और उन्हें एक स्वायत्तता देता है। ‘दायरे से बाहर’ में तो उसने साबित कर ही दिया था कि वह निजी प्रेम की ठोस, जिरह-भरी उपस्थिति को कविता और क्रांति जैसे संभावित और उपलब्ध तत्वों के साथ बेजोड़ तकनीक से जोड़ सकता है। निस्संदेह उसने यही महसूस किया होगा कि उसके निजी अनुभव उसकी प्र्रतिबद्ध सार्वजनिकता से न केवल नहीं जोड़े जा सकते बल्कि वे इस तरह के हैं कि उन्हें नहीं जोड़ा जाना चाहिए। हम देखते ही हैं कि निजी कविताओं में सुदीप की भाषा और शैली दोनों संयमित और नियंत्रित हैं, उनका स्वाद और संगीत अलग है, वे अधिकांशतः छोटी हैं और अपना अर्थ कभी-कभी बहुत आसानी से नहीं सौंपती। लेकिन निजी को लेकर यह चिंतनशीलता, संवेदना, करुणा--जो आत्मदया नहीं है--तकलीफ़ और विषाद ही रूपांतरित होकर सार्वजनिक प्रतिवाद, तिक्तता, व्यंग्य, दुःख, सहानुभूति, जुझारूपन, विद्रोह और प्रतिबद्धता में अवतरित होते हैं। सुदीप के कवि को आप सपाट और एकायामी नहीं कह सकते। उसके व्यक्तिगत तथा सामाजिक-राजनीतिक-प्रशासनिक तजुर्बों में विरल वैविध्य है। वह बहुभाषीय, बहुसांस्कृतिक और बहुशैलीय है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि प्रतिबद्धता के सस्ते बॉक्स-ऑफ़िस पर टकटकी लगाकर सुदीप अपने अनुभव-तथा-अभिव्यक्ति-स्वातंत्रय पर न तो कोई सेंसर लगाता है और न लगने देता है, और ऐसा वह करे क्यों जबकि उसने अपनी प्रतिबद्ध समाजी-सियासी शाइरी पर कोई अफ़सरी संकोच और सेंसर हावी नहीं होने दिया, बल्कि अपने वास्तविक कार्य-कलाप पर भी? इस दृष्टि से भी सुदीप हिंदी के गिने-चुने भयशून्य-चित्त कवियों में से है। वह एक प्रतिबद्ध विवेकवान विश्वचेतस् काव्य-प्रतिभा है।

इसीलिए समीक्षकों को सुदीप की समूची कविता का मूल्यांकन एक चुनौती की तरह लेना चाहिए। यह वही चुनौती है जिसे शमशेर, विनोद कुमार शुक्ल और चंद्रकांत देवताले जैसे वरिष्ठ कवि पेश करते हैं और इसके पूरे संकेत हैं कि कुछ समसामयिक युवा कवि भी ऐसी समस्या खड़ी कर सकते हैं। सुदीप ने एक और भारी परेशानी की तामीर दी है--उसने आलोचना के इस कथित सिद्धांत के ध्वस्त कर दिया है कि किसी रचनाकार के जायजे़ के लिए उसका निजी जीवन कोई प्रासंगिकता नहीं रखता लिहाज़ा उसे हिसाब में लेने की कोई ज़रूरत नहीं है। टी एस एलिअट का अवैयक्तिकता का उसूल शुरू से ही संदिग्ध था, सुदीप जैसा कवि तो उसे नितांत खोखला और हास्यास्पद सिद्ध कर देता है। उसकी प्रतिबद्ध कविताओं की समीक्षा करते हुए आप कभी नहीं भूलते कि वह एक आइ.ए.एस. अफसर था जो आइ.पी.एस. भी रह चुका था--यह तथ्य न सिर्फ़ उसकी कविता को समझने बल्कि उसके विशेष महत्व को समझने के लिए एक अनिवार्य जानकारी है। इसी तरह उसकी निजी कविताएं भी उसके व्यक्तिगत जीवन से निकली हैं, भले ही हमारी ज़िंदगियों में भी उसकी अनुगूंजें हों या वे हमारे जैसे अनुभवों से भी उपजी हुई लगंे। निस्संदेह निजी कविताओं के साथ मसला यह रहता है कि हम कवि की जीवनी के वे तथ्य नही जानते जिनसे वे प्रेरित हुई होंगी--यदि वे तथ्य हमें सहज, स्वाभाविक और वैध तरीकों से मिलें तब तो वे निस्संदेह हमारी समझ के लिए सहायक होंगे, वर्ना हमें कवि के जीवन के विश्वसनीय ब्यौरों की प्रतीक्षा करनी होगी और चूंकि वे भारतीय सामाजिक-साहित्यिक संस्कृति में मुश्किल से मिलते हैं या दिए जाते हैं इसलिए हमें अनुमानों और ‘फजी लॉजिक’ से ही काम चलाना होगा। वैसे यह भी आवश्यक नहीं कि हर निजी कविता को समझने के लिए किन्हीं पूरक तथ्यों को जानना ही पड़े, जरूरी है उस मानसिक, भावनात्मक या बौद्धिक स्वर और ध्वनि को महसूस कर पाना जिसमें वह लिखी गई है। मसलन जब विवाहित कवि-कवयित्रियां शुद्ध प्रेम-कविताएं लिखते हैं और स्पष्टतः वे दाम्पत्य-प्रेम की नहीं होतीं तो हम उन्हें  ‘समझने’ के लिए जायज़-नाजायज़ निजी सवाल नहीं उठाते, सिर्फ़ उन कविताओं की कलात्मक गुणवत्ता से तसल्ली कर लेते हैं।

सुदीप की उन व्यक्तिगत कविताओं को छोड़ भी दें जिनके लिए एक या कई चाबियां चाहिए किंतु उसकी उदासी, विषाद और नैराश्य की, मानव के अस्तित्व मात्रा से उपजी हुई, रचनाएं हमें दो स्तरों पर परेशान करती हैं--एक तो यह कि उनका आंतरिक निजी या सार्वजनिक निजी कारण क्या है और दूसरा, जो कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है, कि वे हमें भी क्यों विचलित करती हैं? क्या वजह है कि अपनी सकारात्मक प्रतिबद्धता में भी हमें ऐसी अभिव्यक्तियां पराजयवादी, आत्मदयापरक नहीं लगतीं? इसका विवेचन करने जाएंगे तो शायद हमें वह ‘मास्टर की’ मिले जो इनमें ही छिपी रहती है और जिससे हम खुद अपने जं़ग लगे संदूकों और जालों से ढंके तहख़ानों को खोल सकते हैं लेकिन उसका साहस जुटा नहीं पाते और किसी दिन अचानक उनमें से उन्हें तोड़ते हुए जिन्नात और कृत्याएं निकल ही आते हैं। मुझे याद है जब सुदीप भोपाल में वन सचिव था तब एक बार उससे मिलने मैं वल्लभ भवन गया और अपने दफ्तर में उसने मुझे नोटशीट-पैड पर लिखी अपनी कुछ छोटी कविताएं दिखाईं। शाम हो रही थी और हम दोनों अकेले ही थे और जब मैंने उन्हें पढ़ा तो मैं एक ऐसे विषाद से रुंध गया जिसकी कोई कैफ़ियत मेरे पास नहीं और रोने सा लगा। फिर किसी तरह संयत होकर मैंने उससे सिर्फ़ इतना ही पूछा कि बताना चाहो तो बताओ कि इनकी वजह क्या है? वह आदतन आंखें कुछ निकालकर मुझे देखता रहा और फिर ‘‘अरे बस यूं ही’’ कहकर उसने एक झटके से उन्हें टेबिल के ड्रॉअर में बंद कर लिया। वे कविताएं मैंने उसके बाद कभी नहीं देखीं, वे उसकी मृत्योपरांत शाया रचनाओं में भी नहीं हैं, लेकिन उसके जीते-जी और अब भी वह अवसाद लौटता रहा है। मैं कभी उस ग़मगीनी का सबब जान नहीं पाऊंगा।

‘इतने गुमान’ में संकलित, घोषित रूप से 1994 में लिखी गई उसकी बहुत छोटी कविता ‘अब तक जितना जीवन’ अभी भी मुझे परेशान करती है: अब तक जितना जीवन / उतना हारा/ आगे का जो भी बाकी वह भी/ मारा मारा//अब एक उसकी ही शरण/ जिसको अब तक नहीं पुकारा। यह सुदीप की उन विरल रचनाओं में से है जो कलात्मक स्तर पर उसकी उपलब्धियों से कमतर कही जा सकती हैं लेकिन यह मुझे उतना उद्विग्न नहीं करता जितना यह कि इतनी गहरी निराशा का कारण आख़िर क्या था और उसने उसके जीवन को इस दृष्टि और इस लाचारी से देखने पर विवश क्यों किया? एक सफल, प्रसिद्ध, वरिष्ठ, बेदाग आइ.ए.एस. अधिकारी, जो सिर्फ़ 48 वर्ष का है और एक सुखी परिवार का मुखिया है, यह क्यों कह रहा है कि वह जितना जिया है उतना ही हारा है? वह अपने भावी जीवन को भी तिरस्कृत करता है और कहता है कि वह भी दर-ब-दर भटकने का रहेगा। यहां तक तो फिर भी ग़नीमत है लेकिन अंतिम दो पंक्तियां, वह भी सुदीप बनर्जी की युयुत्सु लेखनी से, बहुत चौंकाती और निराश ही नहीं, सुदीप के मुझ जैसे प्रशंसक को कुछ नाराज़ भी करती हैं कि उसमें यह मैथिलीशरण गुप्त या रामधारी सिंह दिनकर का ‘मामेकं शरणं ब्रज’-उन्मुख लोकप्रिय आस्तिक आत्मसमर्पण कैसे? यह अचानक कबीर में तुलसीयत के दाखि़ले जैसा है। ज़ाहिर है कि सुदीप के जीवन में यह कोई निजी सम्बन्धों की ‘क्राइसिस’ नहीं है, यह उससे कहीं संगीन मामला है, यह जिं़दगी की रात में काला चोग़ा पहनी हुई मल्कुलमौत को देख लेने का है--सुदीप ने अपनी एक दूसरी कविता में इंग्मार बेर्गमान की फ़िल्म ‘सातवीं मुहर’ की याद दिलानेवाली शतरंज की बाज़ी का ज़िक्र किया है जिसमें कवि सफे़द मोहरों से खेल रहा है और मृत्यु काली गोटियों से, लेकिन जहां वह शतरंज का खेल बेहद रोमांचक आस्तित्विक और कलात्मक संभावनाओं से भरा हुआ है, वहां ‘अब तक जितना जीवन’ का ‘हारे को हरिनाम’ भाव पाठक को वंचना, हताशा और असहायता से भर देता है। लेकिन कवि क्या करे? यदि उसे अपनी मृत्यु का सकारण पहला आभास हो गया हो, भले ही वह अभी शुक्र है कि 15 वर्ष बाद घटित होगी, और उस हॉरर में वह लाचार हो जाए, तो क्या वह अपनी अभिव्यक्ति पर सेंसर लगा ले? क्या ‘महाभारत’ के महारथी आर्तनाद  का अधिकार भी खो बैठते हैं? क्या सैकड़ों प्रतिभावान कवियों ने कभी-न-कभी गहरे दुख, नैराश्य, बेचारगी और मृत्यु की कविताएं नहीं लिखी हैं, अधिकतर तो युवावस्था में ही?

एक सार्थक कवि हमें बाध्य करता है कि उसकी कोई भी रचना पढ़ते समय हम उसकी सारी उपलब्ध पंक्तियां, उनका खुलासा, हमारे जे़हन में ठहरी हुई उनकी छाप याद रखें। इस तरह वह हमें उसकी और वृहत्तर  कविता का बेहतर, पूर्णतर या कम अपूर्ण पाठक-समीक्षक बनाता चलता है। जिस तरह मानव होते हुए हम सभी मानव हैं किंतु अगणित तत्व हमें अपनी एकल अस्मिता देकर अलग-अलग भी करते हैं उसी तरह एक कवि का संपूर्ण तो होता है, उसमें वर्गीकरण भी किए जा सकते हैं, तब भी उसकी एक-एक कविता का अपना स्वायत्त वजूद रहता है। यूँ तो सुदीप की कविता को ‘राजनीति’, ‘समाज’, ‘आत्मा’, ‘अंतरात्मा’, ‘अध्यात्म’, ‘प्रेम’, ‘स्त्रिायाँ’, ‘ऐन्द्रिकता’, ‘नैराश्य’, ‘मृत्यु’, ‘जंगल’, ‘आदिवासी’, ‘मध्यप्रदेश’, ‘मालवा’, ‘छत्तीसगढ़’, ‘मित्रा’, ‘आगंतुक’ ‘विदेश’, ‘शायर’ / ‘कवि’, ‘बच्चे’, ‘पारिवारिकता’, ‘मा की याद’, ‘अन्य स्मृतियाँ’, ‘पुलिस’, ‘प्रशासन’, ‘अंग्रेज़ी’, ‘उर्दू’, ‘संस्कृत’, ‘बांग्ला’, ‘तत्सम’-‘तद्भव’-‘देशज’ आदि के कई खंडों-उपखंडों, शीर्षकों- उपशीर्षकों के अंतर्गत रखा जा सकता है, निजी और सार्वजनिक का एक मौलिक विभाजन भी उनमें है ही, फिर भी यह सब मिलकर ही उसे पूर्णता देते हैं। हमारे यहाँ पंचधातु, अष्टधातु आदि की मूर्तियों की परम्परा है लेकिन उनकी ढलाई दर्शकों, आराधकों या तस्करों के लिए एक प्राथमिक कुतूहल या अचंभे की बात तो है, बाद में मूर्ति ही बचती है जिसे तोड़कर भी आप अलग-अलग धातुएँ न देख सकते हैं, न छू पाते हैं और न हासिल कर सकते हैं। फिर एक परम्परा उन मूर्तियों या चित्रों की है जो कई अन्य वास्तविक या मिथकीय व्यक्तियों और अन्य प्राणियों की उपमूर्तियों, उपचित्रों के ‘कोलाज’ से बनते हैं। उनमें आप कभी पूरी मूर्ति देखते हैं या चित्रा और कभी-कभी उनका एक समूह और कभी उनमें से मात्रा एक। अधिकांश बड़े चित्रों या ‘मिनिएचर्स’ के कई हिस्सों और कोनों को उनकी वास्तविक या प्रतीत स्वायत्तता में देखा जा सकता है, फिर उनसे उस बड़ी कृति के अर्थ बहुगुणित होते रहते हैं। सारी कलाओं को संपूर्णता और ‘पिक्सेल्स’ में देखना संभव है। सुदीप क्या, सभी समर्थ कवियों के बारे में हमें उनकी अखंडता और विखंडन के साथ-साथ सोचना होगा, हम इसे चाहें या उसे। सुदीप के मामले में तो हमने यही सोचना शुरू नहीं किया है कि उसके ‘निजी’ और ‘सार्वजनिक’ परस्पर कितने प्रेरित और प्रभावित हैं और कैसे उसे एक पूर्ण, या कम अपूर्ण, कवि बनाते हैं।
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(चित्र-कृति हेम राणा.)

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