Sunday, May 30, 2010

गोष्ठी : १ : स्मृति

( हम कविता क्या है या साहित्य क्या है सरीखे सवालों से तो दो-चार होते रहे हैं, पर कविता/साहित्य जिन अनिवार्य तत्वों की निर्मिति है, उसकी पहचान और परख करने में दिलचस्पी कम लेते हैं. स्मृति रचना का ऐसा ही एक अनिवार्य तत्व है. अपने तईं उसकी व्याप्ति और असर को कुछ रचनाकारों ने सबद के अनुरोध पर यहाँ कलमबद्ध किया है. उम्मीद है विचार-विनिमय की यह प्रक्रिया इसी तरह की कुछ और बुनियादी जिज्ञासाओं की ओर हमे ले जाएगी. सबद गई  १८ मई को दो साल पूरे कर गया. उसका काम और जिम्मेदारी इस दरम्यान बढे हैं, इसका उसे संतोष और अहसास बराबर रहा है. गोष्ठी नामक यह स्तंभ भी उसी अहसास की उपज है. )


किसी स्थगित अर्थ की तरह

गीत चतुर्वेदी

यह ऐसा बुनियादी विषय-संबंध है, जिस पर एक दौर में लगभग हर रचनाकार सोचता है, और आश्‍चर्यजनक तौर पर जो चीज़ें ऊपर-ऊपर अद्वितीय जान पड़ती हैं, वे दरअसल एक साझी क्रीड़ा ही होती हैं. इस पर सोचते हुए मुझे जॉयस, प्रूस्‍त और निर्मल वर्मा एक साथ याद आते हैं.

और महाभारत का वह दृश्‍य याद आता है, जब श्रीकृष्‍ण पराजित हो चुके हैं, उनकी सोलह हज़ार पत्नियां भीलों के साथ भाग चुकी हैं, उनकी मदद को आया अर्जुन परास्‍त-हताश है, उससे गांडीव तक न उठ सका और वह उनकी कोई मदद न कर पाया. इस अपमान-बोध के साथ वह त्रिगर्त में जाकर प्रायश्चित कर रहा है, अपनी असमर्थता के विलाप में प्राचीन सामर्थ्‍य का स्‍मरण कर रहा है, ख़ुद को कोस रहा है. इससे पहले गीता वाले हिस्‍से में वह श्रीकृष्‍ण के कहने पर विस्‍मृति का आवाह्न करता है; सारे नाते-रिश्‍तों के विस्‍मरण का आवाह्न, लेकिन इस बाद वाले प्रसंग में उल्‍टा है. यहां वह स्‍मृति का आवाह्न करता है और विस्‍मृति को कोस रहा है. उसे दुख है वह क्‍यों अपना हुनर भूल गया.

यह पहली बार है जब किसी व्‍यक्ति पर वह शाप फलीभूत होता हो, जो दरअसल उसे मिला ही नहीं था, उसके प्रतिद्वंद्वी को मिला था. एक समय कर्ण को मिला विस्‍मृति का शाप अर्जुन की विजय का कारक बनता है, और आज अर्जुन ख़ुद विस्‍मृति का शाप, जो मिला ही नहीं, झेल रहा है. यह उसे अ-जाने ही लग गया. इस प्रसंग में स्‍मृति और विस्‍मृति के बीच पराजित अर्जुन एक स्‍थगित अर्थ की तरह वास करता है. अर्जुन ने यह प्रसंग जिया, इसीलिए मेरी नज़र में वह एक रचनाकार व्‍यक्तित्‍व बनता है. स्‍मृति और विस्‍मृति के बीच किसी स्‍थगित अर्थ की तरह वास करना रचनाकार या कलाकार को मिला शाप होता है, अर्थ की आहुति या उसे आहूत करने में आकंठ प्रयासरत.

वह स्‍मृति की शरण में होता है. गौरवशाली नहीं, बल्कि पराजित. जो कुछ जिया, वह कोई विजय नहीं था. जो नहीं जिया, वह भी पराजय ही था. स्‍मृति इन सबको मिलाकर बनती है. यहां हां और ना की वर्तनी एक ही वर्ण से बनती है. हकार और नकार अपनी चित्रात्‍मक-ध्‍वन्‍यात्‍मक उपस्थिति में अलग-अलग होने के बाद भी एक ही होते हैं. इसीलिए स्‍मृति पराजय का परिष्‍कार है, हर कि़स्‍म की पराजय. विजय भी दरअसल पराजय का ही एक नाम है.

स्‍मृति से निजी कुछ नहीं, कुछ भी नहीं. उससे ज़्यादा मैनिपुलेटेड कुछ नहीं, कुछ भी नहीं. वह विस्‍मृति की बैसाखी पर चलती है, इसीलिए लगातार संघर्ष करती है. स्‍मृति का स्‍मृति से संघर्ष, स्‍मृति का विस्‍मृति से संघर्ष, स्‍मृति का कल्‍पना से संघर्ष, स्‍मृति का सच से संघर्ष और स्‍मृति का अवधारणाओं-परिकल्‍पनाओं से संघर्ष-- यह सब न जाने कितने स्‍तरों पर चलता है, एक साथ न जाने कितनी सृष्टियों में— तभी निर्मल वर्मा कहते हैं—आज का मनुष्‍य विस्‍मृत मनुष्‍य की अनेकानेक सृष्टियों का स्‍मारक है. घटना, स्‍वप्‍न, अनुभूति, कल्‍पना के स्‍मृति बनने के बीच जो अवकाश है, मात्र उसी में विस्‍मृति के महाखंड बन जाते हैं. इसी अवकाश के बीच विस्‍मृति की सृष्टियां रच जाती हैं. इन्‍हीं सारे संघर्षों के बीच सहकार भी जन्‍म ले लेता है- बिना किसी को अंदाज़ा हुए.

जिस
तरह स्‍मृति, विस्‍मृति का निर्माण करती है, उसी तरह विस्‍मृति भी स्‍मृति बनाती है. विस्‍मृति कल्‍पना को पोसती है, उसी तरह कल्‍पना एक ख़ास स्‍मृति बनाती चलती है. यहीं आकर स्‍मृति, काल्‍पनिक स्‍मृति में तब्‍दील हो जाती है और कल्‍पना के भीतर एक शरणार्थी अर्थ की उत्‍पत्ति करती है. तब ही स्‍मृति गल्‍प के स्‍वायत्‍त प्रदेश की मरुभूमि को सींचने लगती है. इसीलिए दुनिया का सारा महान गल्‍प स्‍मृति की काल्‍पनिकता का सृजन है.

लिखना एक तरफ़ जहां स्‍मृति है, वहीं वह विस्‍मृति भी है. एक तरफ़ अधिष्‍ठाता है, दूसरी तरफ़ शरणार्थी भी. विस्‍मृ‍त स्‍मृतियों की शृंखला. काल्‍पनिक स्‍मृतियों की मेखला. स्‍मृति की कल्‍पना की माला. घटनात्‍मक-अनुभूतिजन्‍य स्‍मृतियों का अल्‍प विराम. विस्‍मृति के क्षणों का प्रकाशन और स्‍मृति के क्षणों का आलोपन. लिखना दरअसल ऐसा क्षण है, जिसमें दोनों ही प्रसंग एक साथ वास करते हैं— गीता-प्रवचन से पहले वाला विस्‍मृति का आवाह्न भी और गांडीव तक न उठा सकने की लाचारगी में स्‍मृति का प्रायश्चितपूर्ण प्रक्षालन भी.

हिंदू मिथॉलजी में शिव को स्‍मृतियों का संहारक कहा जाता है. अमर देवताओं को भी हर बार जन्‍म लेना होता है, दरअसल हर जन्‍म में वह अपनी स्‍मृति पा लेते हैं. इसके लिए उन्‍हें शिव की स्‍तुति करनी होती है. यानी विस्‍मृति के विरुद्ध स्‍मृति की तपस्‍या करनी पड़ती है. मेरे लिए कथाकृति या रचना, स्‍मृत व विस्‍मृत क्षणों का आलोकन है, जो काल के अवकाश में अश्रव्‍य ध्‍वनि की मानिंद रहते हैं. तपस्‍या एक ललकार भी होती है, चुनौती भी. इसीलिए मेरे लिए लिखना दुनिया के समस्‍त शिव को चुनौती देने जैसा है. शिव जोकि स्‍मृतियों का अधिष्‍ठाता भी है और संहारक भी.

जेल से बाहर निकलने पर रस्‍कोलनिकोव ने सोन्‍या को किस निगाह से देखा होगा-- स्‍मृति की निगाह से या विस्‍मृति की निगाह से? और ख़ुद सोन्‍या ने उसे किस निगाह से देखा होगा— स्‍मृत निगाह या एक विस्‍मृत निगाह से? उस निगाह से, जो उसका सारा अतीत भूल चुकी हो या फिर उस निगाह से, जो उस सारे अतीत को एक बोतल में बंद कर समंदर में बहा चुकी हो या ख़ज़ाने की तरह गाड़ चुकी हो?

यही तो सवाल है; संघर्ष भी; संबंध भी.

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 जीवंत और प्रवहमान स्मृति संबल होती है
 (यह बयान दोस्त कवि गिरिराज किराडू के लिये)
व्योमेश शुक्ल

 एक दिमाग़ स्मृति को तथ्य की तरह इस्तेमाल करता है. एक अन्य दिमाग़ स्मृति के साथ भिन्न तरीक़े से पेश आता है. यहाँ स्याह-सफ़ेद का विभाजन नहीं किया जा रहा है, लेकिन इतना ज़रूर है कि ये इतने आत्मपरक मसले हैं कि मसलन मैं, दुनिया के किसी भी तथ्य को अपनी चेतना में तथ्येतर कर सकता हूँ, या, इसका उल्टा भी कर सकता हूँ. किसी के लिये गिनती और पहाड़े भी तथ्यों के पार की चीज़ें हो सकते हैं और कोई पूरी ज़िन्दगी स्मृतियों को ही गिनती और पहाड़े की तरह गिनता रह सकता है. किसी के लिये स्मृति आत्मपरकता की वस्तुपरकता है ( साही का प्रत्यय ), किसी के लिये वस्तुपरकता की आत्मपरकता ( पुनः साही ).

यह मुद्दा हमेशा असमाधेय है कि स्मृति का रचना के साथ क्या सम्बन्ध है, क्योंकि यह एक बड़ी उपलब्धि है कि हम इस सम्बन्ध को लेकर किसी उपलब्ध एकतरफ़ा निष्कर्ष तक नहीं पहुंचे हैं, स्वयं स्मृति और रचना की प्रकृति के बारे में हमें ज़्यादा मालूम नहीं है, जिन्हें ज़्यादा मालूम है, हम उन्हें संबोधित ही नहीं हैं. बस इतना तय है कि स्मृति रचना का एक बुनियादी पदार्थ है. स्मृति से रचना में कुछ जुड़ता है, बल्कि स्मृति रचना के साथ मिलकर कुछ ऐसा बनाती है जिसे संज्ञापित करना इतना आसान नहीं होता, जितना मान लिया गया है.

स्मृति के प्रकार बड़े धुंधले बेख़बर ढंग से रचना के रेशों में व्याप्त रहते हैं, मसलन विस्मरण के रूपों में. उन्हें नाम से पुकारना दरअसल उन्हें नया नाम देना है. स्मृति का कोई पुराना नाम नहीं होता. रघुवीर सहाय की एक महान कविता हमसे कहती आयी है कि '' देखो वृक्ष कुछ रच रहा है / किताबी होगा वह कवि जो कहेगा हाय पत्ता झर रहा है '' अगर हम किताबी होंगे तो स्मृति के निर्माणों को देखकर उन पर '' हाय पत्ता झर रहा है '' का आरोप लगाने लगेंगे. अगर हम निर्माणसंभावी होंगे तो स्मृति के निर्माणों पर ग़ौर करेंगे और स्मृति की ताक़त से ख़ुद भी कुछ अपने लिये, कुछ उनके लिये रचेंगे.

जीवंत और प्रवहमान स्मृति संबल होती है. वह वर्तमान में वर्तमान होकर दखलंदाज़ी करने लगती है. जो स्मृति वर्तमान में उपद्रव न कर दे वह क्या स्मृति. गुस्ताख़ी माफ़ हो, लेकिन कम जीवंत स्मृति ही '' वे दिन '' हो जाती होगी. स्मृति के संस्करण ही उसका मूल रूप होते हैं, जिस स्मृति ने अपने नये संस्करण तैयार करना बंद कर दिया है उसे शक की निगाह से देखा जाना चाहिए. स्मृति को जब भी किसी शाश्वत और आदिम अर्थ में स्थिर किया गया है, इतिहास गवाह है, वह प्रतिक्रियावादियों का हथियार बनती दिखाई दी है. जो क्रियाएँ स्मृति की शाश्वतता को चैलेन्ज कर रही हैं, स्मृति के निश्चित और आत्मविश्वस्त इस्तेमाल को उलझा दे रही हैं, निजी स्मृति और लोक स्मृति के द्वैत को धूमिल कर रही हैं, उन्हें एक दूसरे में घंघोल देने की चेष्टा कर रही हैं, रचनाकार का उपकरण वही हो सकती हैं. हमारा रास्ता उन्हीं में से होकर जाता है.

आजकल स्मृति और कल्पना में बहुत से फ़र्क़ देखने वाली निगाह भी रद्द लगने लगी है. यह यथार्थ से डरने या भागने की तरक़ीब हो सकती है या सरल बातचीत करने की सुविधा. उसे जायज़ विभाजन मानना मुश्किल है. क्योंकि किसी भी यथार्थ का अनुभव या तो स्मृति है या कल्पना. या दोनों एक ही बातें हैं. आख़िर स्मृति से कल्पना का काम क्यों नहीं लिया जा पा रहा है ? यह कोशिश या ऐसी कोशिश हमारे रचनात्मक अभियान का हिस्सा क्यों नहीं है ? अगर है तो इतनी कम और अपवाद-सी जगहों पर क्यों है ? और भविष्यों की स्मृतियाँ कहाँ हैं ? उनका इतना बुरा हाल क्यों है ? क्या कोई सर्वानुमति बन गई है कि आगामी की कोई स्मृति नहीं होती, और हर मौक़े पर स्मृति एक व्यतीत वस्तु, एक बीत गई चीज़ है ?

स्वप्न का मुद्दा भी यों ही छूटा हुआ सा है. उसे सचाई या जीवन-व्यवहारों से जुदा करके समझने का रूमान फिलहाल बहुत चुप्पे जोश में है और यह तेवर इतने मनचले ढंग से सक्रिय किया जा रहा है जैसे ये निरे व्यक्तिगत मामले हों, जैसे इंसानियत कोई सामूहिक ख़्वाब देखती ही न हो, जैसे स्वप्न की स्मृति होती ही न हो. बीसवीं सदी ने हमारी मनुष्यता में जो कुछ विशिष्ट और महान जोड़ा है - ज़ाहिर है कि सपने की शख्सियत का अभिज्ञान उसका अनिवार्य अंग है - उसे अवमूल्यित करके पेश करने के षड्यंत्र का हिस्सा हो सकता है यह रूमान. लेकिन रचनाकार को याद रहना चाहिए कि उसे किसी भी षड्यंत्र के ख़िलाफ़ रहना है. इसलिए इसके भी विरुद्ध.

मैं बनारस में रहता हूँ और बनारस में एक गाँव है लमही. हम जानते हैं कि इस गाँव के एक नागरिक को इस गाँव समेत पूरी दुनिया में भूला जा रहा है लेकिन इस गाँव या इस सभ्यता के लोगों की सबसे बड़ी पहचान है कि वे भूलने से डरते हैं. वे भूलते ज़रूर हैं लेकिन भूलने से डरते हैं. यही उनका व्यक्तित्व है. यही उनका बयान है. वे अपने नागरिक को भूलना नहीं चाहते लेकिन भूलते जाते हैं. ऐसे हालात में एक सभ्यता अपने विस्मरण के ख़िलाफ़ अनोखी कार्रवाइयां करने लगती है. लमही के लोगों ने गाँव में बाबा भोलेनाथ का एक दिव्य मंदिर बना डाला है. क्या आप उस मंदिर का नाम जानना चाहते हैं ? उस मंदिर का नाम है प्रेमचंदेश्वर महादेव. इस स्थापना पर हँसा जाये या रोया जाये ? मैं कहना चाहता हूँ कि स्मृति को विध्वंसक हो जाने से रोकने के लिये साहित्य ज़्यादा से ज़्यादा एक मोर्चा हो सकता है, उस पर निर्भर होना, जैसा मुक्तिबोध ने कहा था, ''मूर्खता'' है.

तो एक लेखक के रूप में मैं ख़ुद पर स्मृति की ज्ञानसम्मत, विवेकसम्मत और राजनीतिसम्मत निगरानी की ज़िम्मेदारी आयद करता हूँ. और यह भी कि यह कोई साहित्यिक मामला नहीं है.
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मुड़ कर किसी याद में सेंध मार लेना, आसान लिखाई है


प्रत्यक्षा


जंगल
में सूखे पत्तों पर पाँवों की चरमराहट स्मृति है, जो कहीं भी चलो साथ चलती है , पहाड़ पर, समतल पर, सूखे बंजर चट निचाट धरती पर. पत्तों की ध्वनि हर चाप पर भीतर बजती है. जैसे कोई बार बार देखा सपना दिन में भी साथ चलता है, उठते बैठते न होते न दिखते हुये भी भीतर कहीं, उन रास्तों पर जहाँ चले नहीं, उस दुनिया में जहाँ रहे नहीं का मीठा आस्वाद.

स्मृति सिर्फ बीता हुआ समय नहीं, वो आगत का भी स्मरण है, और लिखना किसी समूची तस्वीर में उनसब का समावेश है, अपने भीतर की उन सभी यर्निंग्स को खोजने की कोशिश है, समय जगह रस रंग की शिनाख्त है, जो हो चुका और जिसका होना हम चाहते हैं, वही कथा में आता है. लिखते हुये याददाश्त हमेशा साथ रहे, कि जो हमारी कल्पना है वो उन सब चीज़ों के मिश्रण से बनी जो हमने भोगी, जो भोगना चाहते हैं. स्मृति के छौंक के बिना कथन अधूरा है बशर्ते ये साफ समझ लिया जाये कि स्मृति का कनोटेशन कितना व्यापक है, जो हम नहीं जानते वो भी हमारी सामूहिक याददाश्त का हिस्सा है, या यों कहें कि हम उनका हिस्सा हैं.

कोई बुनावट होती है जिसके रेशे एक दूसरे में गुँथे होते हैं, परतें होती हैं कई उनमें से अदृश्य फिर भी अहम । स्मृति कई बार वही अदृश्य परत होती है जिसकी नींव पर लिखने की इमारत खड़ी की जाती है, वही कोरा सफेद कैनवस होता है जिसके सामने कूची लिये हम खड़े होते हैं रंगों के उन्मत्त हुल्लड़ की भव्य पच्चीकारी करने की सिहरती सँभावना से.

कुछ लिखना अपने भीतर के कूँये से ठंडा मीठा पानी निकालना होता है, शरीर तर करना होता है, आत्मा नम.

शब्द के चारों तरफ एक “औरा” होता है, एक महक होती है, कोई नंगा तार होता है, उसकी नोक को छूने भर की देर हो और स्मृति भक्क से फट जाती है, कोई जलती सुलगती लकड़ी की आँच होती है, कोई लपकती ज्वाला कभी.

लिखना बार बार उसी दुनिया में लौटना होता है, हर बार नये तरीके से और नये दरवाज़ों से. लौटना फिर अपने आप को, अपने परसेप्शन को और उस दुनिया को रीइंवेंट करना होता है. हर बार खुरचकर और भीतर जाना होता है, शायद एक आर्कियॉलॉजिकल एक्स्पेडिशन है जहाँ गहराई के हर स्तर पर किसी और दबी हुई स्मृति के अवशेष मिलें.

मेरे भीतर का लेखक स्मृतियों का पैरासाईट है, उस मायने में बेहद खुदगर्ज़ और स्वार्थी है, बहुत हद तक लुटेरा चोर है. कुछ मक्कारी की नीयत भी है, आलस भी. मुड़ कर किसी याद में सेंध मार लेना, आसान लिखाई है .

तथ्य और कल्पित, स्मृति और संज्ञा रचना की ज़मीन पर एक दूसरे में गुँथे हेलिक्स हैं, कुँडली. महीन बुनावट की कारीगरी है, कोई अल्केमी है जो एक रहस्यमय मिश्रण बनाती है जिसके पीछे कोई तर्क नहीं होता कोई फॉर्मुला नहीं. यह स्वत: स्फूर्त प्रक्रिया बहुत हद तक इंट्यूटिव है.

और अंत में स्मृति मेरी रचनाओं में हमेशा आईसबर्ग की तरह है जिसका कभी ऊपर निकला कम हिस्सा जो दिखता है, उस जैसा और ज़्यादा बार न दिखने वाले उस बड़े पानी में डूबे हिस्से की तरह, जो बहुधा मुझे भी नहीं दिखता या ''वो है ऐसे'' का इल्म मुझे भी नहीं रहता.
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रचना स्मृति के निषेध से भी जन्मती है


आशुतोष भारद्वाज

रचना समेत समस्त दर्ज अभिव्यक्तियॉं एक सतह पर अगर स्मृति का गल्प में कायांतरण है तो वहीं स्मृति के पाश से परे निकल जाने की आकांक्षा भी। स्मृति अगर रचना को उत्प्रेरित करती है तो सर्जन प्रक्रिया स्मृति को संस्कारित करती है। यह गल्प के साथ तथाकथित गैर-गल्पात्मक अभिव्यक्ति मसलन विज्ञान अथवा गणित के प्रमेय या दर्शन की प्रस्तावना, जिन्हें हम निगमनात्मक ज्ञान मान लेते हैं, के संदर्भ में भी उपयुक्त है। क्रौंच पक्षी के दृश्य ने अगर एक कवि को प्रेरित किया था तो किसी वैज्ञानिक को गिरते सेब के बिंब ने या नहाने के टब से फैलते पानी ने झनझना दिया था।

परंतु एक महान रचना स्मृति के सम्मोहक पाश में ही बंधकर नहीं रह जाती। वह अतीत के कतरों से आरंभ करती है लेकिन अपनी स्वायत्त सत्ता भी रचती जाती है। पक्षी की मौत हुई, सेब भी गिरा, नहाने के टब से पानी फैला जरूर, लेकिन उसके बाद जो हुआ वह विशुद्ध अननुमेय था। वाल्मीकि की सर्जना अथवा आर्किमिडीज की स्थापना अपनी स्मृति का बीज फोड़ कहीं बड़े फलक पर अपने को उद्घाटित करती है। सृजन प्रक्रिया में कुछ ऐसा मायावी रहस्य निहित रहा आता है जिसे बुद्धिजन्य समझ या स्मृतिजन्य अनुभव की कोटियों से नहीं चीन्हा जा सकता।

दूसरे, गल्पकार स्मृति के कच्चे माल को तराश अपना आख्यान रचता है तो इस प्रक्रिया में वह कच्ची स्मृति को भी तहजीब सिखाता है, अतीत के घुमड़ते आते बदहवास लम्हों को अनुशासित करता है, आगामी स्मृति किस प्रत्यंचा पर रची जायेगी यह भी उसे सिखलाता है।

यह दिलचस्प है। मनुष्य के बोध तंतु जो दृश्य को किसी विशिष्ट स्वरूप में ग्रहण कर, उसे स्मृति में ढालते हैं, एक रचना सबसे पहले इन्हीं तंतुओं को परिष्कृत-परिमार्जित करती है। रचना से गुजरते पाठक और खुद गल्पकार को भी पता नहीं चलने पाता, रचना का संविधान किस तरह उनकी ग्राहण प्रक्रिया को निर्णायक ढंग से परिवर्तित कर देता है। विनोद कुमार शुक्ल ने इस कदर हमारी चेतना को गढ़ा है कि इन्हें पढ़ने के कई बरसों बाद आज भी किसी छोटे सरकारी दफ्तर, डाकखाने टैलीफोन एक्सचैंज इत्यादि, जाना होता है तो वहॉं के किरदारों की देह पर संतू बाबू की कमीज ही हम ढूंढते हैं। इस स्तर पर शुक्लजी हमारी स्मृति का स्थायी निर्माण कर देते हैं। जीवन के न मालूम कितने पहलू हैं -- पहाड़, बरसात, धूप, प्रेम -- जिनकी स्मृति रचना से ही निर्धारित होती है, जिनके स्मरण में किसी बचपन में पढ़ी कविता, प्रेमिका के साथ भागकर डरते हुये देखी फिल्म के लम्हे बसे होते हैं। प्रेम सी स्वयंभू दीखती अनुभूति के रूपाकार भी कई बार हमें कहानी ही स्मरण कराती है।

जो चीज शुक्लजी के संदर्भ में अबोले तौर पर कार्यरत होती है कई रचनाकार इस संविधान का सृजन घोषित तौर पर कर देते हैं। मसलन दिमित्री मैंदलीव की आवर्त सारणी (periodic table) । महज अनुमान से, बिना यह अनुभूत किये कि आगामी तत्वों का स्वरूप कैसा होगा, इतना बारीक तंत्र रच देते हैं वे कि परवर्ती पीढ़ियॉं सदियों तलक अपनी तत्व-संबंधी स्मृति उनके ही विधान में तलाशती है। मैंदलीव की सृजनात्मक कल्पना किसी महान उपन्यासकार से कहीं कम थी? जिस लम्हे वे उन अदेखे तत्वों के जन्म से पहले ही उनका जन्माक्षर रच रहे थे, वही तत्व जिन्हें उनके विद्यार्थी बरसों बाद आविष्कृत करने वाले थे, नक्षत्रमंडल में उनका स्थान बड़ी सुघड़ता से निर्धारित कर रहे थे; उनका ही एक समवर्ती उनसे कुछ ही दूरी पर एक विवाहित स्त्री के बहाने उन सभी प्रेमिकाओं की नियति गढ़ रहा था जो किसी पगलायी हसरत की पुकार के पीछे बिंधी चली जाती हैं। इन दोनो फनकारों के प्रचलित-स्वीकृत अभिधान भले भिन्न हों, समाज इन्हें अलग, शायद विपरीत इकाइयों में भी रखे, खुद इनके औजार व आकाश बहुत अलग न थे। दोनो ही गल्पकार थे, अपने किरदारों की कथा आगामी पीढ़ियों को सुनाना चाहते थे।

एक रसायनशाला में उबलते टैस्ट-ट्यूब से अपनी बूढ़ी उंगलियॉं जला रहा था, दूसरा डैस्क पर झुका स्याही में अपनी रूह भस्म कर रहा था कि अपने चरित्रों को उनकी संपूर्णता में थाम सकें। ब्रौंस्की व अन्ना कैरेनिना अगर उस महान उपन्यासकार की निर्मित थे तो कांच के मर्तबान में चमकते रसायन मैंदलीव के किरदार ही थे जिनसे वे अपनी कथा गढ़ रहे थे, अपनी पीढ़ियों को संबोधित हो रहे थे।

उन दोनो की सृजन-कल्पना के मध्य की प्रचलित फांक कितनी नकली थी इसका हलफ खुद उनके देशवासी कुछ सालों बाद उठाने वाले थे जब टॉलस्टॉय की शवयात्रा में अगर हजारों किसान उमड़ आये थे तो हजारों विद्यार्थी सैंट पीटर्सबर्ग की सड़कों पर आवर्त सारणी के पोस्टर लिये मैंदलीव की देह के साथ चल रहे थे।

तीसरे, स्मृति अगर रचना को निर्मित करती है तो रचना भी स्मृति को रचती है। कहानी के शब्दों में अवतरित होने के बाद स्मृति की काया वही नहीं रहती जो उस शाम थी, जब वह गल्पकार के सम्मुख आ खड़ी हुई थी। स्मृति को खुद भी पता नहीं चलने पाता कितने बारीक स्तरों पर गल्पकार उसे रूपांतरित करता है, अपनी सृजन कल्पना से उसके डीएनए यानी जैविकीय मानचित्र में ऐसी कोशिकाओं को प्रविष्ट देता है कि स्मृति खुद एक गल्प, एक मायावी मिथक बन जाती है। महान रचना अपनी स्मृति को मिथक में परिवर्तित कर देती है।

एक रचना लेकिन स्मृति के निषेध से भी जन्मती है। काफ्का मसलन। अपना पहला उपन्यास, अमरीका, लिखने चले युवा काफ्का, लेखकीय कौमार्य को सहेजे संभाले, उस उपन्यास को ऐसी भूमि पर अवस्थित करते हैं जहॉं वे तब तक तो क्या अपने पूरे जीवन में कभी नहीं जाने वाले थे और जिसके प्रति उन्हें कोई विशेष लगाव या अलगाव रहा हो ऐसा भी नहीं दीखता। क्या कोई बतायेगा एक सत्रह वर्षीय नायक के भटकावों को चित्रित करने के लिये वे उसे यूरोप से भगा अमरीका क्यों ले आते हैं? कल्पना कीजिये कोई लेखक जो कभी रांची या आगरा या नागपुर से कभी बाहर नहीं गया लेकिन अपना उपन्यास इटली पर लिखता है।

जाहिरी तौर पर स्मृति महज अतीत की ही नहीं होती, रचनात्मक स्मृति तो कतई नहीं। महान लेखक अपने शब्दों में भविष्य का भी स्मरण करता है। उसमें अनुभव, अनुमान, कल्पना व स्वप्न का कुछ ऐसा अनिर्वचनीय घालमेल रचता है कि कथासागर के किस्से जन्म लेते हैं, अदेखे भविष्य का यूटोपियन आदर्श अपनी उपलब्धि पाता है तो अपनी रूह को तिनता तिनका कौंचते जाते चेतना के तहखाने में बैठे दॉस्तोयवस्की के दुःस्वप्न भी।
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13 comments:

शशिभूषण said...

स्मृति पर यह गोष्ठी महत्वपूर्ण है. ईमानदारी से कहूँ तो इस ब्लाग पर आना सुसंपादित पत्रिका पढ़ने जैसा होता है.

प्रत्यक्षा जी सहित चारों लेखकों के विचार एक कड़ी की तरह हैं.इसलिए यहाँ किसी को श्रेय दे देना ठीक नहीं होगा.आशुतोष ने मैंडलीफ़ की आवर्त सारणी के बहाने जो कहा है वह मौलिक है.लेकिन मैं अपनी बात गीत जी के बहाने से रखना चाहूँगा.क्योंकि उन्होंने जिस मिथकीय स्मृति का सहारा लिया है वह महत्वपूर्ण चुनाव है.समान समान को घोलता है.स्मृति पर आख्यान के बहाने बात हो इससे संप्रेषणीय कुछ हो नहीं सकता.
मैं समझता हूँ स्मृति का एक अच्छा प्रसंग और महाभारत में ही है.

जिन दिनों पांडव अज्ञातवास में थे कौरवों ने उस राज्य में हमला कर दिया.राजा जिसके आश्रित पांडव थे का बेटा बेहद डरा हुआ था.अर्जुन ने उसे न केवल युद्ध के लिए तैयार किया बल्कि उसका सारथी बनना स्वीकार किया.रास्ते में अर्जुन एक जगह रथ रोकने को कहता है.वहाँ एक पेड़ पर छुपाए अपने धनुष को लेता है और राजकुमार को सारथी बनने को कहता है.मोर्चे पर आकर जब वह धनुष की डोरी से टंकार करता है तो द्रोण,भीष्म तुरंत समझ जाते हैं यह अर्जुन का गांडीव है.कौरवों की सेना लौट जाती है.

मैं समझता हूँ यह पारखी योद्धाओं के दिमाग़ में अद्वितीय वीरता की स्मृति है.लेखन भी ऐसे ही पाठकों की स्मृति में आता है.बशर्ते प्रतिबद्धता अर्जुन की सी हो...कि कोई भी एक काम सिर्फ़ आप ही कर पाएँ.तुलसी या कबीर की लाइने सुनाकर आप लोगों को धोखा नहीं दे सकते की ये लाईने किसी और की हैं.क्योंकि ये सृजन अपने मूल रूप में लोक स्मृति का ही पुनर्सृजन है.प्रेमचंद का कथा साहित्य ब्रिटिशकालीन भारतीय कृषक जीवन की सर्वांग स्मृति ही है.

दूसरा प्रसंग खोज की स्मृति का है.व्याकुल राम वन में सीता को ढूँढ रहे हैं
हे खग मृग मधुकर श्रेणी
तुम देखी सीता मृग नैनी
स्मृति की यह मार्मिकता महज काव्य प्रयास नहीं है उस लोक के मानस की अभिव्यक्ति भी है जो वनस्पतियों,पशु-पक्षियों से भी स्मृति विमुख होकर नहीं मिलता.स्मृति को रचनात्मक होने के पहले उसका लोकोन्मुखी होना जरूरी होता है.लेखन स्कूलों के स्नातक स्मृति दुहराते रह पाते हैं.साहित्य में स्मृति और कल्पना की फोटोकापी उचित नहीं.पर दुर्भाग्य से यह खूब चल भी रही है.
कर्म और खोज की ईमानदार स्मृति यही साहित्यकार के दो मुख्य अवलंब होने चाहिए.जिन साहित्यकारों का पीछा प्रसिद्ध,पद,धन की सत्ताकामी स्मृति करती है वे मरीचिका में ही मारे जाते हैं.

मुझे लगता है साहित्य और कलाएँ मनुष्यता के व्याकरण में स्मृति का अनुवाद हैं.

लंबी प्रतिक्रिया के लिए माफ़ करें.

ashutosh dubey said...

sundar aayojan.

nilm said...

" Mud ker kisi yaad main sandh maar lena assan likhaee hai" Mr.Wordsworth are you listening?
nice read i must say..

आशुतोष कुमार said...

हो जाएँ आप भी कहीं पत्थर न देखिये
जादूगरों का शहर है, मुड़ कर न देखिये

अशोक कुमार पाण्डेय said...

कई बार यहां आया और फिर कभी पूरा, कभी अधूरा पढ़कर लौट गया…कुछ समझ आया, कुछ नहीं समझ पाया और ज़्यादातर बस सौंदर्य से अभिभूत करने वाला…ख़ूब-ख़ूब सौंदर्य्…इतना कि डर लगने लगे…उबन होने लगे।

व्योमेश ने जो सामूहिक स्मृतियों के लोप का सवाल उठाया मुझे वह बेहद महत्वपूर्ण लगा…काश कि उसका और विस्तार होता…निजी स्मृतियों के तमाम आख्यानों के बीच इस प्रतिआख्यान की चिंता होती…

राहुल राजेश said...

सबद पर आना अच्छा लगता है.पर इसकी अकादमिकता देखकर लौट जाने का मन करता है.
कुछ चीजों से ज्यादा छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिये. उनमें स्मृति और कविता दोनों शामिल मानता हूँ.
यह सब एक तरह से बस कहन और लिखन में जादूगरी पैदा करने का उपक्रम है या फिर मैंने इतना पढ़ा,फलां को पढ़ा,वगैरह वगैरह बघारने की बहुत ही जहीन और महीन कला. जैसे प्यार को प्यार ही कहना बेहतर है, कुछ और नहीं. वैसे ही स्मृति, कविता और जीवन को वही कहा जाना बेहतर है , कुछ और नहीं. न ही उसमें इतनी अकादमिक घुसपैठ. बस उन्हें जीना चाहिए.

हाँ, बेहतर,नई कविताएँ,कहानियाँ,डायरी अंश छापने का काम आप बहुत ही नफीस और संजीदा होकर कर रहे हैं. यह अच्छा भी लग रहा है.

यह मेरी निजी राय है.
अन्यथा न लेंगे.

राहुल राजेश.

शरद कोकास said...

बेहतरीन है ... पढ़ रहे हैं ।

सुशीला पुरी said...

अच्छा लगा यहाँ आकर... स्मृति का तत्व ही रचनात्मकता का शुरुआती आधार है ... ।

प्रदीप जिलवाने said...

स्‍मृतियों के पास जब भी जाओ, बहुत कुछ मिल जाता है.... स्‍मृतियों को लेकर बहुत अच्‍छी चीजें या कहूं विचार निथरकर आये हैं.

Aparna Manoj Bhatnagar said...

स्मृति-विस्मृति पर ये विचार विनिमय दिशा सूचक रहा . गीत जी , आप ठीक कहते हैं कहते हैं -लिखना एक तरफ़ जहां स्‍मृति है, वहीं वह विस्‍मृति भी है. एक तरफ़ अधिष्‍ठाता है, दूसरी तरफ़ शरणार्थी भी. विस्‍मृ‍त स्‍मृतियों की शृंखला. काल्‍पनिक स्‍मृति...यों की मेखला. विस्मृत स्मृतियाँ आज को पहचानने में सहायक हैं .. इस विस्मृति में हम पदचाप सुनते हैं स्मृतियों की .. जैसा प्रत्यक्षा जी ने कहा ... "सूखे पत्तों पर चलना या फिर एक नंगा तार जो भक्क से जल उठता है ...l "
"परंतु एक महान रचना स्मृति के सम्मोहक पाश में ही बंधकर नहीं रह जाती। वह अतीत के कतरों से आरंभ करती है लेकिन अपनी स्वायत्त सत्ता भी रचती जाती है। वाल्मीकि की सर्जना अथवा आर्किमिडीज की स्थापना अपनी स्मृति का बीज फोड़ कहीं बड़े फलक पर अपने को उद्घाटित करती है।" आशुतोष जी रचना का सृजन बीज फोड़ कर बाहर निकलने जैसा ही है. अपना शरीर अन्दर-अन्दर रचती है ... आकार पाती जाती है और फिर स्फुर्लिंग ... या एक विस्फोट .. नाभकीय ऊर्जा की तरह जिसका बाहर आना या जेनरेट होना big bang जैसा ही है ...ये स्मृति एक chaos से निकलकर संयोजन करती है नयी व्यवस्था का .अनुराग जी सुन्दर लेखों के लिए ह्रदय से आभार !

सीमा स्‍मृति said...

Hindinest.com के जरिये सबद पर आना के संयोग था । "गोष्ठी : १ : स्मृति" पढना एक सुखद एहसास ।

anupama pathak said...

बेहद सुन्दर प्रस्तुति!
अच्छा लगा इन सबके बीच से गुजरना!

गीता पंडित said...

आहा ....आहा....