Skip to main content

ज़बां उर्दू : ७ : ग़ालिब : दिल की बात



आइन: देख अपना सा मुँह लेके रह गए
साहब को, दिल न देने प' कितना ग़ुरूर था

दिल उसको, पहले ही नाज़-ओ-अदा से दे बैठे
हमें दिमाग़ कहाँ, हुस्न के तक़ाज़ा का

मैं, और इक आफ़त का टुकड़ा, वो दिल-ए-वहशी कि है
आफ़ियत का दुश्मन और आइन: तेरा आशना

सौ बार बन्द-ए-इश्क़ से आज़ाद हम हुए
पर क्या कारें, कि दिल ही अदू है फ़राग का

सबके दिल में है जगह तेरी, जो तू राज़ी हुआ
मुझ प' गोया, इक ज़माना मेहरबाँ हो जाएगा

है एक तीर जिसमें दोनों छिदे पड़े हैं
वो दिन गए कि अपना दिल से जिगर जुदा था

लाज़िम था कि देखो मिरा रश्ता कोई दिन और
तन्हा गए क्यूँ ? अब रहो तन्हा कोई दिन और

मैं बुलाता तो हूँ उसको, मगर ऐ जज़्ब-ए-दिल !
उस प' बन जाए, कुछ ऐसी, कि बिन आए न बने

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी या रब ! कई दिए होते

पीनस में गुजरते हैं जो कुचे से वो मेरे
कन्धा भी कहारों को बदलने नहीं देते

रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गए
धोए गए हम ऐसे, कि बस पाक हो गए

जिस ज़ख्म की हो सकती हो तदबीर, रफ़ू की
लिख दिजिए, यारब ! उसे क़िस्मत में अदू की

यार से छेड़, चली जाए, 'असद'
गर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही
****

( कुछ शब्दार्थ : पीनस = पालकी, फ़राग= मुक्ति, वस्ल = मिलन, अदू =शत्रु )
सबद पर ग़ालिब दूसरी दफा.

Comments

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी या रब ! कई दिए होते

kya kahne Galib ke.....
Farhan Khan said…
wah! kya baat hai !

Popular posts from this blog

गीत चतुर्वेदी : दिल के क़िस्से कहां नहीं होते

(अब से 'सबद' पर हर पंद्रह दिन में कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी का यह कॉलम प्रकाशित होगा.)



जब से मैंने लिखने की शुरुआत की है, अक्सर मैंने लोगों को यह कहते सुना है, 'गीत, तुममें लेखन की नैसर्गिक प्रतिभा है।' ज़ाहिर है, यह सुनकर मुझे ख़ुशी होती थी। मैं शुरू से ही काफ़ी पढ़ता था। बातचीत में पढ़ाई के ये संदर्भ अक्सर ही झलक जाते थे। मेरा आवागमन कई भाषाओं में रहा है। मैंने यह बहुत क़रीब से देखा है कि हमारे देश की कई भाषाओं में, उनके साहित्यिक माहौल में अधिक किताबें पढ़ने को अच्छा नहीं माना जाता। अतीत में, मुझसे कई अच्छे कवियों ने यह कहा है कि ज़्यादा पढ़ने से तुम अपनी मौलिकता खो दोगे, तुम दूसरे लेखकों से प्रभावित हो जाओगे। मैं उनकी बातों से न तब सहमत था, न अब।


बरसों बाद मेरी मुलाक़ात एक बौद्धिक युवती से हुई। उसने मेरा लिखा न के बराबर पढ़ा था, लेकिन वह मेरी प्रसिद्धि से परिचित थी और उसी नाते, हममें रोज़ बातें होने लगीं। हम लगभग रोज़ ही साथ लंच करते थे। कला, समाज और साहित्य पर तीखी बहसें करते थे। एक रोज़ उसने मुझसे कहा, 'तुम्हारी पूरी प्रतिभा, पूरा ज्ञान एक्वायर्ड है। तुम्हारा ज्…

ईरानी कविता : सबीर हका : अनुवाद - गीत चतुर्वेदी

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 10 : भुजंग, मेरा दोस्त

कई दिनों की लगन के बाद आज मैंने सौ साल पुराना वह फ्रेंच उपन्यास पढ़कर पूरा कर दिया। किताब का पूरा होना एक छोटी मृत्यु जैसा है। जीवन से ज़्यादा बहुरूपिया मृत्यु होती है। हम सबके पैदा होने का तरीक़ा एक है, लेकिन हमारे मरने के तरीक़े अलग-अलग होते हैं। इसीलिए किताब का पूरा होना हम सबको अलग-अलग अनुभूति से भरता है। मेरा मन अक्सर दुख की एक चादर ओढ़ लेता है। सोचता हूँ, किस बात का दुख होता है? किताब के पूरा होने का दुख? अपने बचे रह जाने का दुख? जिन चरित्रों से मैंने एक मैत्री कर ली, उनके पीछे छूट जाने का दुख? कथा का दुख? या मेरे भीतर सोये मेरे अपने दुख, जिन्हें किताब जगा देती है?
इंदुमति के मृत्यु-शोक से अज रोया था। उसे लिखनेवाले कालिदास रोये थे। उसे पढ़कर मैं क्यों रोता हूँ? क्या मेरे भीतर अज रहता है? कालिदास की कविता रहती है? मृत्यु का शोक रहता है?
हाँ, ये सब रहते हैं। इसीलिए तो, पढ़े व लिखे हुए शब्द, मेरी मिट्‌टी पर उगते हैं।
हमारा हृदय एक पिरामिड है। मरे हुए लोग अपने पूरे साज़ो-सामान के साथ इसमें सुरक्षित रहते हैं- उनके चेहरे नहीं बदलते, उनके कपड़े, गहने, किताबें, उनकी बातें, आदतें, उनके ठह…