Friday, May 28, 2010

ज़बां उर्दू : ७ : ग़ालिब : दिल की बात



आइन: देख अपना सा मुँह लेके रह गए
साहब को, दिल न देने प' कितना ग़ुरूर था

दिल उसको, पहले ही नाज़-ओ-अदा से दे बैठे
हमें दिमाग़ कहाँ, हुस्न के तक़ाज़ा का

मैं, और इक आफ़त का टुकड़ा, वो दिल-ए-वहशी कि है
आफ़ियत का दुश्मन और आइन: तेरा आशना

सौ बार बन्द-ए-इश्क़ से आज़ाद हम हुए
पर क्या कारें, कि दिल ही अदू है फ़राग का

सबके दिल में है जगह तेरी, जो तू राज़ी हुआ
मुझ प' गोया, इक ज़माना मेहरबाँ हो जाएगा

है एक तीर जिसमें दोनों छिदे पड़े हैं
वो दिन गए कि अपना दिल से जिगर जुदा था

लाज़िम था कि देखो मिरा रश्ता कोई दिन और
तन्हा गए क्यूँ ? अब रहो तन्हा कोई दिन और

मैं बुलाता तो हूँ उसको, मगर ऐ जज़्ब-ए-दिल !
उस प' बन जाए, कुछ ऐसी, कि बिन आए न बने

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी या रब ! कई दिए होते

पीनस में गुजरते हैं जो कुचे से वो मेरे
कन्धा भी कहारों को बदलने नहीं देते

रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गए
धोए गए हम ऐसे, कि बस पाक हो गए

जिस ज़ख्म की हो सकती हो तदबीर, रफ़ू की
लिख दिजिए, यारब ! उसे क़िस्मत में अदू की

यार से छेड़, चली जाए, 'असद'
गर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही
****

( कुछ शब्दार्थ : पीनस = पालकी, फ़राग= मुक्ति, वस्ल = मिलन, अदू =शत्रु )
सबद पर ग़ालिब दूसरी दफा.

2 comments:

डॉ .अनुराग said...

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी या रब ! कई दिए होते

kya kahne Galib ke.....

Farhan Khan said...

wah! kya baat hai !