Wednesday, May 26, 2010

डायरी : आशुतोष भारद्वाज

बाइस दिसंबर दो हजार तीन। दिल्ली

कांच की बोतल में पानी सिहरा, दीवार पर टंगा बल्ब झिलमिला गया।
बोर्हेसः हम आधुनिक यूरोपीय साहित्य के धर्मभंजक हैं।

तेइस दिसंबर दो हजार तीन। सुबह साढ़े ग्यारह। दिल्ली।

लेखक पाठक को ही नहीं खुद अपने को भी छलता है। अपने जाने अनजाने ही। निर्मल की क्षमता इस छल व छलावे को छुपा ले जाने में निहित है। क्या मैं कभी उनसे पूछ पाउंगा कि जब वे मेरी कहानी पर कहते हैं:‘‘अंग्रेज पिता का अपनी संतान से वह संबंध थोड़े हो पाता है जो भारतीय पिता का होता है।‘‘ तो एक दिन का मेहमान, जिसे साहित्य में शायद उनके सबसे करीबी मित्रों ने आत्मकथात्मक कहा है और उन्होंने सहमति भी दी है, में इस वाक्य के क्या मायने हैं-- वे एक ऐसी बच्ची के हाथ थे जिसने सिर्फ मां के सीमित और सुरक्षित स्नेह को छूना सीखा था, मर्द के उत्सुक और पीड़ित उन्माद को नहीं जो पिता के सेक्स की काली कन्दरा से उमड़ता बाहर आता है।

कोई अनाम तारीख।

पिकासोः मैं चीजों के चित्र बनाता हूं जिस तरह मैं उन्हें सोचता हूं न कि जैसा वे मुझे दीखती हैं।

दो-तीन जुलाई दो हजार सात। दिल्ली-बैंगलोर राजधानी।

एक तीसेक की लड़की उपरी बर्थ पर है, मेरी निचली बर्थ बदलने का आग्रह करती है। बहुत संभल कर चलती, डुलती, हिलती है। पूरा स्पेस देता हूं उसे। खाना बड़े धीमे खाती है। देर तक बैठ भी नहीं पाती। पेट को सहेजे जल्दी ही पसर जाती है। मैं तुरंत उपर चला जाता हूं। वह थैंक्स बोलती है। छत्तीस घंटे की यात्रा है। दिन में हम अखबार की क्रॉसवर्ड पहेली सुलझाते हैं। मुझे कुछ शब्द ज्यादा पता हैं तो वह हंसती है। पता नहीं दिल्ली में कौन है इसका, या बैंगलोर में।

दिन भर सोती सी रहती है। शायद नींद ज्यादा आती होगी इन दिनो।

उपर की बर्थ पर लेटा मैं बार बार नीचे देखता रहता हूं लुढ़क न जाये वह। रास्ते का अंत नजदीक आता है तो रेल कर्मचारी फीडबैक फॉर्म दे जाते हैं। मैं चुपके से नीचे झांक लेता हूं -- सत्ताईस साल, विजय नगर। महज तीन किलोमीटर दूर मेरे घर से।

हैरी बैली ने अपनी गर्भावस्था के दौरान कहा थाः मेरे हॉरमोन मुझे पहले से कहीं अधिक दीप्त किये रहते हैं। इन दिनों मैं कहीं कम मेकअप इस्तेमाल करती हूं। मैं हमेशा गर्भ धारण किये रहना चाहती हूं।

नौ जनवरी दो हजार नौ। सुबह नौ। एम्सटर्डम हवाई अड्डा। रैंब्रा म्यूजियम की गैस्ट बुक में कुछ टीपें।

'हवाई अड्डे में म्यूजियम! अठ्ठाइसवां जन्मदिन रैंब्रा के चित्रों के साथ।'
रोस बोनिन, एडिनबरा। नौ जनवरी

'अंग्रेजी और डच दोनो भाषायें एक साथ। हमारी अटलांटिक भाषा कितनी विपन्न है। लेटिन में म्यूजियम का अर्थः विचार करने का स्थल।'
कैथरीन बारनेट, वॉशिंगटन डीसी। पॉंच जनवरी

एक अगस्त दो हजार दो। रात तीन पचास।

पढ़ते में दूध पीने का मन हुआ। गर्म किया, गिलास में डाला, फूंक  मारी --- भाप से चश्मे का शीशा लिहर गया। उंगली से साफ किया जा सकता था, चश्मा उतारना भी था संभव। दृश्य को लेकिन व्याधित नहीं किया। देर तक दुनिया भापमय रही।

अठारह फरवरी दो हजार छः। दिल्ली।

कहानी अजानी धड़कनों से ही बढ़ती होगी। मैं देखता रहूंगा, मसलन तुम्हें। झनझनाता बजता रहेगा तेज संगीत कहीं। परकोटे से गूंजती आयेगी चिचियाती बिल्लियों की लड़ाई, पढ़ोगे इन पंक्तियों को तुम पता भी नहीं चलेगा तुम्हें झांकता हूं मैं इनके मध्य रिसते आकाश से। न मालूम कौन सी कहानी का किरदार तुम्हारी ही तरह पैर समेट बैठा करेगा। तुम्हारे माथे की चोट के निशान पर कोई बचपन में गिरा होगा।

चार अप्रैल। दो हजार छः। दिल्ली।

कल निर्मल की पहली जयंती पर अशोक वाजपेयी बोलेः निर्मल स्वर्ग-नर्क के बीच कहीं विचरते होंगे। उनका लेखन मानवीय संबंधों में पवित्रता की स्थापना का संगीत है।‘

बारह दिसंबर दो हजार दो।

अतीत की धमक वर्तमान तक आती बासी पड़ने लगती है। वह ऑंच जिसके ताप में हम अर्सा पहले सुलगे थे अब महज सूखी राख हो चुका होता है। डायरी के पुराने पन्ने पलटो तो आश्चर्य होता है यही वह लम्हा था जिस पर हमने समूचे जीवन को टिका मान लिया था, जो अब महज एक घटना, पूरी डायरी में खोया एक पन्ना प्रतीत होता है--- पूरा पन्ना भी नहीं, कुछेक शब्द भर जीवन में जगह जिनकी उतनी ही थी जितनी पूरे कलैंडर में एक तारीख।

मैं चाहकर भी आज की लड़ाई कल की जमीन पर नहीं लड़ सकता।

चौदह मार्च दो हजार तीन। दिल्ली।

हरेक चेहरे के अपने होंठ होते हैं, किन्हीं होंठों के लेकिन अपने चेहरे भी होते हैं। उनकी नमी में आप उस चेहरे के होने को जान सकते हो जो अपने होंठों की तलाश में है।

बारह दिसंबर दो हजार तीन दिल्ली।

मास्क पार्टी में हम पूरी शाम एक ऐसे व्यक्ति के साथ बिता देते हैं जिसे हम जरा भी नहीं जानते, महज एक आस में.....। चेखव की भी शायद ऐसी ही कुछ कहानी है।

साइलेंट कंट्री में एक किरदार वेटिंग फॉर गोडो परः 'एबसर्डिटी ख्याल में घटित होता है या घटना में?'

बीस जुलाई दो हजार पॉंच। रात बारह।

वह रूसी पिता बंगाली मां की बेटी है। चौदह वर्ष का सुखद विवाह, उससे पहले बारह वर्ष का लंबा प्रेम। मुड़ती सड़क ने उसके जीवन को मोड़ा है। वह पिछले प्रेम में थी, बचपन के प्रेमी के साथ बड़ी हुई --- मामूली सा झगड़ा हुआ एक बार, जैसा अनेकों मरतबा हुआ था दोनो के बीच। इसी दरमियां किसी से मिली वह दिल्ली की एक सड़क पर --जिसकी बरसों की प्रेमिका परिवार के पास दूसरे शहर छुट्टियों में गयी थी। और महज तीन महीनों में शादी।

छः साल बाद वह फिर दिल्ली की किसी सड़क पर पूर्व प्रेमी से मिली --- देर तक उससे लिपटी रही। घर ले आयी, पति से मिलवाया, कहा: मैं कुछ समय इसके साथ बिताना चाहती हूं।'

मुझे उसके पिता का रूसी होना नहीं पता था लेकिन। मैं उसे सर्बियन समझा था देर तक। मैंने कहा तो उसने कहाः तुम निगाह बड़ी तेज है। है तो मेरा स्लाव ओरिजिन ही।

सत्रह-बीस अक्टूबर दो हजार पॉंच। नर्मदा घाटी के गॉंव।

ढेर मुर्गे इतने कभी नहीं देखे। दिन भर कुकड़ाते हैं। एक मुर्गा, पता चला है, सुबह तीन से शाम पॉंच तक कुकड़ाता है। कई मुर्गे गंजे भी हैं। फुलझड़ी सी कलंगी --- बाकी गरदन, सिर नंगा। गंजा मुर्गा चलता है गरदन उचकती आगे बढ़ती है, देह उसकी बाद में आगे आती है, पहले गंजी गरदन आगे बढ़ती है मानो किसी से गरदन लड़ाने बढ़ रहा हो। आगरा-मथुरा के लड़ाकू मुर्गे यहॉं ले आये जायें तो इन्हें चिढ़ा-चिढ़ा कर मार डालेंगे --- गंजे, ओए गंजे --- सारी मुर्गियों को भगा ले जायेंगे।

महुये की भट्टी के उपर उंबर का पेड़ तना है। उबलते महुये की भाप भट्टी से जुड़े तने से हो पतीले में इकठ्ठी होती है। दो युवक पतीले को लकड़ी से हिलाते हैं।

‘मैं इसका साड़ू हूं।'
‘नहीं, मैं इसका साड़ू हूं।'

अगर कहानी संस्मरण का, स्मृति को कथानक में ढालने गल्प है, तो संस्मरण बिखरी स्मृतियों को आख्यान न दे पाने का गल्प है।

छब्बीस अक्टूबर दो हजार पॉंच। रात नौ।

अभी लौटा हूं लोधी रोड शमशान घाट से। निर्मल को विदा कर। क्या मेरी लकीरों में उन्हें अंतिम बार देखना बदा था? कल देर रात लौटा था बंबई से। रेल से भी लौट सकता था। कल रात चल आज शाम पहुंचता, पता भी न चल पाता निर्मल के जाने का। कंपनी मेरी भले हवाई जहाज की टिकट दे रही थी मन जरा भी नहीं था उड़ कर जाने का। अगर जिद न की होती बॉस ने...।

आज बीस अप्रैल दो हजार दस, संयोग से निर्मल के जन्म का महीना, डायरी में लिखे को टाइप करते वक्त अचानक कौंधा--- मुझे निर्मल के जाने का पता कैसे चला? छब्बीस की सुबह दैनिक जागरण में। जिन अखबारों को मैं मंगाता हूं उनमें तो नहीं थी यह खबर। कभी अखबारवाला कोई दूसरा अखबार पटक भी जाता है लेकिन ऐसा हो ही नहीं सकता कि एक्सप्रैस या हिंदू के बदले जागरण हो।

मेरे घर सुबह सुबह जागरण आ कहां से गया?
कौन किसकी प्रतीक्षा में था?

उन्तीस दिसंबर दो हजार पॉंच रात दो। मथुरा।

निनुआ का डर। दस साल का बेटा अपनी मॉं का पेट सातवीं बार, उसके होश में तीसरी बार, फूलता देखता डरता है। फिर से सब पड़ौस में चिढ़ायेंगे उसे -- तेरा बाप हर साल डायरी छापता है।

अठारह जनवरी दो हजार छः। रात दस।

आज जनवरी की रात फरवरी की हवा थी। न तो इतनी कंपकंपी कि स्वेटर पहनना पड़े न ही इतनी मुक्त कि बांहें आपस में न भिंच जायें। बगैर गीले की बारिश। टेरिस पर एक कविता बहती थी... नहीं कविता नहीं, किसी प्राचीन काव्य की पंक्तियां शायद। बहुत महीन प्रेम राग। मुखर्जी नगर की सड़क हिलती थी। मन हुआ किसी को बताउं-- कोई फोन या एसएमएस ही सही। मोबाइल की कांटैक्ट लिस्ट पूरी देख डाली। लौट कर डायरी पर आया।

तेइस जनवरी दो हजार छः। मथुरा का कोई गांव।

मौहरू आगे बढ़ता जाता था। पीछे भाईसाब चलते थे। मौहरू के हाथ में छड़ी थी जिसे वह घुमाता चलता था। भाईसाब के हाथ लोटे के न होने से खाली थे।
‘मौहरू कहॉं जा रौ है?'
‘भाईसाबअन ने जंगल लेजाबे।'
‘इतकू कहां जारौ है? खेत तौ बा माऊं ।'
‘भाईसाब सहर ते आये हैं। खेत में ना उतरे उनकी। लल्लन के घर फलेस की लगी है। वहीं ले जा रौ हूं।'

परसों दिल्ली के डाकखाने में रजिस्ट्री करवाने की लाइन में गौंडा का एक मजदूर खड़ा था। छोटा, गठीला। मैल की भभक। सहसा लगा कितनी चीजें के बारे में तो मैं जानता ही नहीं --- मनीआर्डर के पैसे इकठ्ठे करना, लाइन में लग घर भेजना, फोन पर बताना कि पैसे चल दिये हैं फिर पहुंचने का इंतजार।

मनीआर्डर तो तीन दिन में ही पहुंच  जाता है, देहात तक ले जाने में डाकिया देर कर देता है। मनीआर्डर पर दस रुपया अलग से लेता है। कितनी राशि थी उसकी--- नौ सौ रुपये। उस पर पैंतालीस डाक खर्च। पॉच रुपया सैकड़े के हिसाब से।

सबसे करीबी जो मैं ऐसे अनुभव के पहुंचा हूंगा --- बंबई के दिनों में रेल टिकट आरक्षण को वीटी पर लाइन। कन्फर्म टिकट, साइड की बर्थ उन दिनों दुनिया की सबसे बड़ी इनायत हुआ करती थी।

तेइस फरवरी दो हजार छः दिल्ली।

फुटपाथ पर एक आदमी दो बच्चों से अपने काली पीठ खुजवा रहा था। पूरी बनियान उघाड़ दी थी उसने। कुबड़े की मुद्रा में पूरा झुक गया था। बच्चों ने आधी आधी पीठ बांट रखी थी। उपर से नीचे तलक खुजला रहे थे। पूरी तन्मयता से। छोटा वाले बच्चे के लिये पिता की पीठ पियानो का की बोर्ड हो गयी थी। बच्चे की उंगलियॉं पीठ के उपर तक नहीं पहुंच पाती थीं। पिता झुकता जाता था। पियानो पिता बजते राग में खो गया था।

छः अप्रैल। दो हजार छः। दिल्ली।

सर्वश्रेष्ठ ने बताया मेरा नाम उसके पिता का भी है। जब भी मुझे नाम से बुलाता है या मेरा नाम मोबाइल स्क्रीन पर चमकता है पिता का चेहरा चमकता है।

यूरी मार्कोविच नागीबिन की कहानी माई फर्स्ट एंड मोस्ट बिलव्ड फ्रैंड का समर्पण वाक्यः बेवजह प्यार करने लग जाना आसान है। दोस्ती कभी इतनी गैरजिम्मेदार नहीं होती।

अठारह मई दो हजार छः। दिल्ली।

पंद्रह मई आईटीओ पुल से गुजर रहा था। नीचे एकदम सपाट मैदान। महीना भर पहले अखबार में-- शायद द हिंदू में ही -- था यहॉं की

झुग्गियॉं हटा दी गयीं। तब से अब आ रहा हूं जहॉं साल पहले सबसे पहले रिपोर्ट की थी कि यहॉं की झुग्गियॉं कॉमनवैल्थ गेम्स के लिये हटायी जाने वाली हैं और इन दो-ढाई लाख लोगों के लिये कोई पुनर्वास योजना नहीं है।

नीचे उतरता जाता हूं। दीवार खिंच रही है। 'बड़ी रौनक थी यहॉं, लक्ष्मी नगर तक से लोग आते थे।' कुछ लड़के वहीं बैठे तंबाखू पीते बताते हैं।

दूर तक मलबा जो अभी नहीं हटा। दूर काली के टूटे मंदिर पर चार लोग गांजा पी रहे हैं। देवी का जूड़ा खुल गया है, मिट्टी की नंगी चांद चमक रही है। देवी का शेर लंगड़ा लेटा है। यहीं कहीं वो बंगाली परिवार रहता होगा जिसका बीमार आदमी अपनी औरत को बाहर जाता देखता रहता था, जिसकी कहानी मैं लिखना चाहता था।

मैं गांजा पीने में खांसता हूं, छोटू हालदार कहता हैः ‘अभी एलकेजी में हैं ये।‘ ‘नहीं, नर्सरी में।‘ मैं कहता हूं।
मिट्टी की चिलम में गांजा और तंबाखू का बुरादा। तंबाकू 502 पताका बीड़ी को खोल निकाला गया।
अभी भी याद है मुझे क्या हैडलाइन दी थी मैंने ----Games On Graves.

ग्यारह जून दो हजार छः। मथुरा रात साढ़े नौ।

बचपन की ये गलियॉं, दोस्त किसी दूसरे ग्रह के दीखते हैं। कुछ भी नहीं जो आज साझा कर सकूं इनसे। आश्चर्य होता है किसी उम्र में यहॉं रहा था, पागल हुआ था।

मच्छर पकड़ने का रैकिट पहली बार देखा। बैडमिंटन के रैकिट जैसा। मच्छर पकड़ते पकड़ते चिड़िया बल्ला खेलने लगो या फिर चिड़िया बल्ला खेलते में मच्छर मारने लग पड़ो। मथुरा आ हर बार कुछ ऐसा पता चलता है जो दिल्ली में नहीं ही होने पाता। ढेरों दिलचस्प गालियां  या सट्टेबाजी मसलन --- छंगू का छोरा नाले में गिर गया। यह कोड वर्ड है इंगित करने का कि बोली बढ़ने वाली है।

दो जुलाई दो हजार छः रात साढ़े चार। दिल्ली।

अभी अभी हमने पच्चीस साल बाद वैस्ट इंडीज में पहली टैस्ट सीरीज जीती। कमेंटेटर अंत तक आते भावुक हो गया। एकदम अंत में, विदा लेने से पहले बुलंदी से कहा--- जय हिंद।

अंधेरे में जाग कर कमेंट्री सुनना, और जय हिंद। और मेरा यह तीसरी मंजिल का हवा में डोलता कमरा। न जाने कितने समय बाद किसी को जय हिंद कहते सुना।

आठ जुलाई दो हजार छः रात पौने दो। दिल्ली।

एक बिंदु वह भी आता है जब हम किसी और को चाहने की आड़ में खुद अपने को ही चाहने लगते हैं। हम प्रेम करते हैं तो महज इसलिये हम अपने को चाहना चाहते हैं। यही बिंदु है जब हम भीतर से खाली होने लगते हैं।

सत्रह जुलाई दो हजार छः सुबह साढ़े पॉच। दिल्ली।

जुलाई की सुबह, उमस का आभास दिलाते लेकिन असलियत में रूखे बादलों की सुबह कितनी शुष्क होती है। उगते आकाश में रत्ती भर चमक नहीं होती। बादलों के पार्श्व में महीन सी नीली लकीरें दीखती हैं बस... बाकी पूरा आकाश उदास रहा आता है।

कल सुबह की याद है। सूरज बाबू सफेद गोला थे महज। कोई पहली मरतबा देखे तो जान ही न पाये यह कितनी रंगतों के साथ सुबह के आकाश में भासित होता है। वे अनेक सुबहें और शामें, जब सूरज को एकदम ठंडे फीकेपन में उमड़ते, उतरते देखा किया है। नितांत ठंडा गोला...चुपचाप। भूगोल या भौतिकी का न जाने कौन सिद्धांत होगा जो बतायेगा सूरज कैसे रंगतें बदलता है।

एक तरीका तो मेरे पास भी है वैसे। अपनी डायरी से हर मौसम के सूरज की कतरनें अलग करूं--- रेलगाड़ी में सुबह, हवाई जहाज में शाम, माउंट आबू का सहमा सा सूरज, औरंगाबाद का चिल्लाता। और बंबई का? मायावी। बंबई का आकाश भी कमबख्त तिलिस्मी है। बड़ा मुश्किल है उसे थामना।

नौ जनवरी दो हजार सात रात एक। दिल्ली।

ब्रेष्टः ‘‘वह इंसान वाकई दुर्भाग्यशाली है जिसके पास कुछ कहने को है लेकिन सुनने को कोई नहीं, लेकिन उससे भी अधिक भाग्यहीन वे हैं जो किसी को सुनना चाहते हैं लेकिन उनसे बात करने को कोई नहीं।‘‘

अठ्ठाइस जनवरी दो हजार सात दिल्ली।

सत्यजित रे की शक्ति उनके क्लोज अप में है। इतना विश्वास है उन्हें अपने किरदारों पर, शायद खुद अपने पर उनसे मनचाहे अनुभाव हासिल कर लेने का कि वे कैमरा उनके चेहरे पर ठहरा सा देते हैं, कोई आप पर निगाह गड़ा बैठा हो।

टिन ड्रम का नायक ऑस्कर अपने जन्म के समय को याद करता हुआः मैंने इस सृष्टि की रोश्नाई पहली मरतबा साठ वॉट के बल्ब में देखी।

अठारह अगस्त दो हजार सात दिल्ली।

आज कहीं पढ़ा 1994 में पूना की पच्चीस मनोरोगी औरतों के गर्भाशय निकाल दिये गये। डॉक्टर ने कहा यह एकमात्र तरीका था उनका रोग दूर करने का।

कार्लोस सौरा की क्रिया क्युयरवॉस
एक चौदह साल की लड़की अपने टॉप के उपर ब्रा पहन, शीशे में अपने को देखती है। आठ साल की उसकी बहन कहती है:‘ये बहुत बड़ी है। तुम्हारे साइज की नहीं है। मैं कभी ऐसी चीजें नहीं पहनूंगी'।
बड़ी बहनः इसके बिना तुम कभी दौड़ नहीं पाओगी।

व्हाट इज डिजायर में सार्त्रः मनुष्य इसलिये एक यौनिक प्राणी नहीं है कि उसके पास यौनांग हैं। उसके यौनांग हैं क्योंकि वह मूलतः एक यौनिक प्राणी है।

बीस जनवरी दो हजार नौ। हेलेना।

धूप सन्नाटा भी होती है, हेलेना आकर ही पता चला है। भारत की धूप में अजीब सा शोर समाया रहता है...एक बवंडर सी धूप, गर्मियों में किसी बौराये कुत्ते की भौंक, सर्दियों में हलवाई की दुकान के नीचे ठिठुरते भूखे मरियल पिल्ले की कोंक। लेकिन हेलेना की धूप चुप चुप रहती है, अक्सर सहमी सी चुप्पी जो गॉथिक शैली की बर्फ से ढकी इमारतों से गुजरते हुये भयावह सी भी लगने लगती है। भारत के पहाड़ी इलाकों में बेढब, बेतरतीब घरों को देख करुणा उमड़ती है लेकिन यहॉं की चुप खड़ी सफेद इमारतें डराती है, मानो कितने राज अपने में डबोये बैठी हों। एडगर एलन पो असहनीय की हद तक अपनी क्रूर कहानियॉं इसी देश में लिख सकते थे।

कल पो का दो सौंवां जन्मदिन बीत गया। अर्से से उनकी कहानियॉं पढ़ते आये मुझे कल के दिन उनकी ही भूमि पर होना था। क्या दूसरा न कोई ऐसे ही किसी बर्फीले पहाड़ी शहर में लिखा गया था? वैद साहब अगर अमरीका न आये होते तो क्या इसे लिख पाते? बर्फ निर्मल के यहां भी है, ढेर बर्फ। लेकिन बड़ी कोमल है। बर्फ के गाले, निर्मल को बहुत प्रिय। वैद की बर्फ मायावी है। निर्मल की बर्फ छुओ तो पिघलने लगती है, वैद की बर्फ चट्टान सी ठोस। लेकिन यह भी लगता है यह है महज टिप ऑफ़ दि वैदबर्ग। कुछ ऐसा है उनमें जो पकड़ में आते आते कमबख्त छिटकने लगता है।

बाल्टीमोर में पो की कब्र है। उनकी हर जन्मतिथि पर कोई चुपके से एक गुलाब का फूल रख जाता है।

आठ फरवरी दो हजार नौ। दोपहर डेढ़। मिनियापोलिस हवाई अड्डा।

एक अमरीकी मां। प्रैम में बैठा एक बच्चा। मां हवाई अड्डे पर गणित के सवाल साथ ले आई है। छोटे छोटे बोर्ड बच्चे को दिखलाती है -- 7+4=? 4+0=? बच्चा कुनमुनाता है। प्रैम की रॉड मसलता है, नीचे उतर भागना चाहता है। मां नहीं मानती लेकिन। जब वह दूर चॉकलेट की दुकान के बाहर खड़े अपने बड़े भाई की ओर इशारा करता है तो उसे भी बुला लेती है, निकाल लेती है अंग्रेजी के बोर्ड और पूछती है उससे स्पैलिंग humongous की। कसम खाकर निकली है घर से खून पी जायेगी अपने बच्चों का आज ये।

पिता पूरे दौरान वॉशिंगटन पोस्ट पढ़ता रहा है।

बीस जुलाई दो हजार आठ रात बारह।

कई दिनों से हो रहा है यह। एक किताब उठाउं  , चार पांच पंक्तियां पढ़ पाता हूं दूसरी किताब बुलाने लगती है...फिर तीसरी... अंतहीन सिलसिला चलता रहता है, म्यूजिकल चेयर के बीच बदहवास सा किताबों के दरमियां भागता फिरता हूं कुछ हाथ नहीं आता। मेज पर ढेर जमाता जाता हूं, अलमारी से निकाल रखता जाऊंगा...अलमारी खोल देर तक खड़ा रहूंगा।

लैपटॉप ऑन कर बैठूंगा , दो पंक्ति एक कहानी की, दो तीसरी की, तीन किसी और की.....। न कहीं से आता, न कहीं को जाता।

बीस-पच्चीस मिनट हुये यह डायरी खोले भी, पूरी दुनिया घूम आया हूंगा लेकिन शब्द महज चार। कोई भी चीज नहीं खींचती, कोई धड़कन भीतर नहीं बजती। कोशिश भी करूं कुछ याद नहीं आता --- मेरा अतीत, स्मृति। अगर इसी समय मौत हो जाये तो भी यूं  ही ऑंखें फैलाये मर जाऊंगा और आखिरी इच्छा कोई पूछे भी तो सबसे पहले यह पूछूंगा  --- इच्छा? मतलब?

तेईस जनवरी दो हजार दस। रात एक। शनिवार।

मलयजः लिखो तभी जब संकट में हो
चीजें जब सब हिली हुई हों
जमीन सरकी हुई थिर कुछ भी नहीं
एक सांस भीतर एक बाहर बीच में
हलचल जिसमें कोई तरतीब नहीं
बक्से उलट दिए गए चीज-बस्ता बाहर
एक खुलापन जिसे सब घूर सकें
एक नंगापन जिसमें देख सकें सब
अपने दुखी कुछ विकृत चेहरे
----
लिखो वह संबंध जो संकट से बचा हो

नौ जुलाई दो हजार सात। रात दस। उटी बस अड्डा।

काफी देर से सामने देख रहा हूं। पहाड़। बारिश में भीगता रेसकोर्स। जलती बत्तियां। सोचता रहा कभी इस दृश्य को कहानी में कायांतरित करना हुआ तो कैसे करूंगा , तभी एक परिवार छाते के नीचे चलता दृश्य को बींधता गुजर गया।

मेरे लेखन की सबसे बड़ी अक्षमता क्या यही है? दृश्य जैसा नजर आना चाहता है, मैं वैसा ही देख पाता हूं और परिणामस्वरूप वही दर्ज कर पाता हूं। इसके अलावा कुछ और होने ही नहीं पाता। जरा भी संदेह नहीं मुझे दृश्य पर कि प्रत्यक्ष के सिवाय और भी कुछ होगा कहीं। इसकी अन्य संभावनाओं को मैं टटोल ही नहीं पाता। निरा मूढ़ दर्शक। आंचल ही नहीं, सब कुछ ही पसारे बैठा। जब तक मेरी निगाह, नहीं महज निगाह भी नहीं, दृश्य से गुजरने व उसे ग्रहण करने की समूची प्रणाली नहीं बदलती मुझे खुद से कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिये।

मुझे आरंभ ही अपनी निगाह के दारिद्रय पर घनघोर विश्वास से करना चाहिये कि सामने है कुछ और जिसे मैं रत्ती भर भी नजर नहीं कर पा रहा हूं। ये पहाड़ शायद पहाड़ नहीं, रेसकोर्स का मैदान भी कुछ और है। बरसात दृष्टि-भ्रम है।
****
( आशुतोष हिंदी के युवा कहानीकार हैं और आलोचनाएं भी लिखते रहे हैं. 'जो  फ्रेम में न थे ' शीर्षक एक कहानी संग्रह  अभी-अभी आया है और कथादेश का ''कल्प-कल्प का गल्प'' नाम से उनके संपादन में अभिनव रचनाओं का एक संकलन शीघ्र प्रकाश्य है. वे फ़िलहाल एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक में कार्यरत हैं. )

9 comments:

Pratyaksha said...

सुबह सुबह इन पन्नों को पढ़कर तरल अनुभूति हुई .. अब तक आशुतोष का कुछ पढ़ा नहीं था ..अब खोजनी होगी कहानियाँ

anita said...

anurag tumhari kahani diary jaise lagti hai aur ashutosh ke diary kahani jaise ......diary padhkar boriyat nahi hui itna badia likha hai ashutosh me......

प्रवीण पाण्डेय said...

आपकी डायरी व अवलोकन दोनो ही विशेष हैं । पढ़ने में सरल, विचारों को तरंगित करते, व्यक्तिगत व सर्वार्थ के अधर में, पठनीय व मननीय ।

Geet Chaturvedi said...

इच्छा? मतलब?

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Sunder ansh. Main khud ko is lekhak ke aur qareeb mehsoos kar raha hoon.

डॉ .अनुराग said...

one of the best of this blog.....

बिना भारी शब्दों के विम्ब चित्रों के ....जहाँ लेखक की विद्ता ...कंटेंट पर जरा भी हावी नहीं है ....

vyomesh said...

आशुतोष कितनी शांत शक्ति के साथ प्रवेश करते हैं, लेकिन सब कुछ को 'पूरा स्पेस' देते हुए. उनके वाक्यों में इतनी सुखद मौलिक आपत्तियां हैं कि अवाक हो जाइये, कि '' मैं देखता रहूंगा, मसलन तुम्हें '' और '' देर तक दुनिया भापमय '', और हमारी चेतना के विभिन्न स्तरों को एक साथ संबोधित करने की कितनी विराट और नेक बेचैनी - ''पढ़ोगे इन पंक्तियों को तुम पता भी नहीं चलेगा तुम्हें झांकता हूं मैं इनके मध्य रिसते आकाश से। तुम्हारे माथे की चोट के निशान पर कोई बचपन में गिरा होगा।'' काफ़ी समय बाद एक वाक्यमय रचना से मिलना हुआ है और इस रचना की ज्वाला में बहुत सी कविताएँ स्वाहा हुई हैं - अपनी और दूसरों की.

जाओ दोस्त! तुम्हें कोई कभी न समझ सके.

varsha said...

vaah kitne rang hain is diary mein...indradhanush!!!nahin zyada kahin zyada.

शिरीष कुमार मौर्य said...

आशुतोष की डायरी अद्भुत है. कथादेश वाले विशेषांक के सन्दर्भ में उसने मुझे फोन किया था और मैं उसे उम्र में काफ़ी बड़ा समझ कर भाई साहब कहता रहा. दो-तीन फोन बाद पोल खुलने पर उतनी ही हंसी भी आई. इस डायरी में वर्णित अनुभव संसार और जीवन किंचित भिन्न अर्थ में उन्हीं निर्मल की याद दिलाता है, जिनका काफ़ी ज़िक्र इसमें मौजूद है. हिंदी में पिछले दिनों नए कहानीकारों का काफ़ी हल्ला गुल्ला रविन्द्र कालिया जी और अखिलेश जी के संपादन में रहा....कुछ वास्तविक विलक्षण प्रतिभाएं भी प्रकाश में आयीं ....और....पर....किन्तु...... देखो कि यह अद्भुत गद्यकार उससे बच पाया ...मेरे लिए यह एक स्वस्थ संकेत है. जीवन के तलघर में शायद संज़ीदा काम ऐसे ही होते है. इस आदमी के गद्य में भीतर छुपी जो एक कवितानुमा तीव्र झनझनाती सी भावुकता है, ख़ुद को उसके बहुत निकट पाता हुआ उसका मैं कायल हो गया हूँ. तुमने जिस कहानी संग्रह का ज़िक्र किया, उसका प्रकाशन ब्यौरा मुझे मेल कर देना प्रियवर.....

आख़िर में जैसा कि व्योम ने कहा - जाओ दोस्त तुम्हें कोई कभी नहीं ...

शायदा said...

impressed.