Friday, May 21, 2010

महबूब की गली

अपनी मिट्टी को छिपायें आसमानों में कहाँ
उस गली में भी न जब अपना ठिकाना हो सका!
शमशेर

यह महबूब की गली से वापसी थी.

उसे अंदाज़ा न था कि उसके शहर में अब भी ऐसी गलियां मौजूद हैं जो पहले हिन्दू या मुसलमान गली हैं, इंसान गली बाद में. महबूब की गली यों कहीं थी भी नहीं. महबूब की गली तो दरअसल उसने बनाई थी. अपने दोस्तों से ही नहीं खुद लड़की से भी वह उसके वहां होने का जिक्र नगर निगम के नक्शे में इंगित जगह और नाम से कतई नहीं करता था. वह पहली दफा सुन कर हंसने लगी थी. लेकिन उसके इसरार और रियाज़ से हासिल सहजता ने लड़की को अपनी ही गली को नए नाम से पुकारना सिखा दिया था.

वह
कभी-कभी कहती,''तुम्हारे जैसे आदमी को लखनऊ के खयालीगंज में पैदा होना चाहिए था.'' लड़के ने न खयालीगंज देखा न लखनऊ. महबूब की गली देखी थी. उसके कूचे, नुक्कड़, लोग-बाग, यहाँ तक कि पहली दफा वहीं खाई गई 'बड़े' की बिरयानी भी उसकी दिनचर्या में इन वर्षों में इस कदर शामिल रहे कि वही उसका खयालीगंज और वही लखनऊ बन गए. उस गली से कभी वापसी भी हो सकती है, उसे ऐसी बदगुमानी तक न हुई थी.

...
और वापसी हो रही थी!

प्राथमिक
विद्यालय में रोज की तरह ६ दिसंबर, १९९२ को बस्ता बांध कर घर लौटते हुए सिर्फ एक घर मुसलमान वाले अपने ननिहाल गाँव में शुरू हुए जश्ननुमा कीर्तन और १० साल बाद के गुजरात को भी लड़के ने कहां देखा था! जश्न की बात उसने सुनी थी और और गुजरात के बारे में अख़बारों या टीवी में बेध्यानी से पढ़ा/देखा था.

महबूब की गली से वापसी के दौरान उसने इन हादसों के अपने ही 'महबूब वतन' में होने को अपने खिलाफ सबसे ज्यादा पाया. अदालत किसी साक्ष्य के अभाव में इसके गुनाहगारों को अगर बरी भी कर दे तो वे उस जैसे असंख्य 'महज हिन्दू' ठहरा कर उस गली से वापिस भेज दिए गए लोगों की निगाह में बरी कैसे हो जायेंगे?
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11 comments:

nilm said...

umda khani hai Kamleswer ji ki 'kitne pakistan'yaad ho aee.yahn sb hona assan hai ,bes insaan hona hi muskil hai.

सागर said...

आज उम्मीद नहीं है कि इससे सुन्दर कुछ पढ़ पाऊंगा...

Farhan Khan said...

mughe bahut hee achee lagee. padne ke baad aisaa prateet hota hai jaise sab kuch saamne hee ghatit hua ho...

kuch lines to bahut mazedaar hain... "पहली दफा वहीं खाई गई 'बड़े' की बिरयानी"

keep on bhayeea...

i will for another one...

spardha said...

बेहद मार्मिक और दिल को छूने वाली...कुछ ऐसी जिसमे दर्द के साथ धर्म भी जुड़ा है..
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Priyankar said...

कभी बरी नहीं होंगे .

उसकी आंखों से देखी हुई हर गली महबूब गली है. वैसे तो हम सब खयालीगंज वाले ही हैं.

मर्मस्पर्शी !

soul said...

apne rahi massom raza ki yaad dila di..vahi andaz..vahi shelley vahi bahsha.....bhaut khub

anita said...

sundar soch ke kahani....es kahani ke khas baat hai ke kahani ka nayak beshak mehboob ke gali se apne mehboob ke bina khali hath laut aaya lekin uske kyayalat roshan he rahe tang nahi huye...dil me talkhi nahi aai ...ye badi baat hai...sabke khayal aise he ho jaye tabhi is mulk ke gali aur mohalle hindu-musalman ke naam se mukt honge...har gali mehboob ke gali hogi....waha se kisi ke wapsi mayusi ke sath nahi hoge....

kahana hai kuch aur said...

issa hi hota hai humesha..hindu-muslim ki jung me kaun bachayega guli mahboob ki...kise parvah?

सुशीला पुरी said...

आपकी लघु कथा और शमशेर का वह शेर ऐसे जुगलबंदी कर रहे हैं कि पलके नम हो आईं ....!!कितनी त्रासदी है आज भी ! हम सब 'खयाली गंज ' मे रहते हुये भी ' महबूब की गली ' मे अमन नहीं ला पा रहे हैं ....., आपने एक शब्द बहुत सुंदर प्रयोग किया -- 'रियाज से हासिल सहजता ' , काश हम सब भी रियाज से ही सही राम व रहीम को एक समझ पाते !!!!!
इतनी मार्मिक और सशक्त लघु कथा के लिए मेरी बहुत बहुत बधाई ।

Arpita said...

बेह्तरीन....

Akash Rawat said...

Waah bahut umda behtareen.
Thank you Anurag Sir.