सबद
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मंगलेश डबराल

गुंजायमान

यह कोई विधा नहीं है. स्मृति या राय की बर्बादी से बच निकलने की कोशिश है. ज़्यादातर ये अनुभव हैं जो अक्सर अपने मूल रूप में हैं और किसी संहिता की तरह जीवन-धड़कनों के साथ गूँजते रहते हैं. इसे आलोचना, संस्मरण, डायरी या नोट्स वगैरह समझना भूल है और सच्चाई से खिलवाड़ है. ये बातें निर्माता के प्रति मानसिक तथ्य हैं. यहाँ कुछ शुरू नहीं हो रहा है, कुछ ख़त्म नहीं हो रहा है, कोई दावा नहीं किया जा रहा है. इसलिए क्रमानुक्रम का ख़याल नहीं रखा गया है.
-व्योमेश शुक्ल

2003

' बाहर निकलने पर वे देखते हैं
फूल तोड़ लिये गए हैं
घास कुचली जा चुकी है.......'' ( पैदल बच्चे स्कूल )

वक़्त हमारे लिए ऐसा ही था. हम विपर्ययों को झेल रहे थे लेकिन उन्हें कहते नहीं थे. दरअसल हमसे कोई नहीं कहता था कि लिखो. अगर हमें लिखना आता भी होता तो भी हम उसे ज़रूरी न मान पाते. हमारे अनुभवों को कोई अनिवार्य नहीं मानता था इसलिए हम भी नहीं मानते थे.

011 - 22711805

तभी
एक दिन एक टेलीफ़ोन नम्बर चेतना में दाख़िल होता है. आप फ़ोन करते हैं और एक आवाज़ आपसे कहती है कि 'तुम्हें लिखना चाहिए', 'तुम्हें गंगा प्रदूषण के सवाल पर नए तरीक़े से लिखना चाहिए', तुमने इसे न्यूज़ की तरह लिख दिया है, फ़ीचर की तरह लिखते', 'तुम्हें गंगा घाटों पर लिखना चाहिए', तुम्हें हाशिये पर चली गयी चीज़ों के बारे में लिखना चाहिए'.

ये वाक्य कितने साधारण शब्दों से बने हैं लेकिन इनकी ध्वनियाँ अपूर्व हैं और हमारी नैतिकता की लगातार निगरानी करती हैं. ये हमें गिरने से बचाने की सफल-असफल कोशिशें करती रहती हैं. ये एक असिद्ध और अदृश्य शिल्प है जो जीवन की वास्तु तय कर देता है.

यों जीवन का पहला लेख लिखा गया और दूसरा और तीसरा. हिंदी में फ़िलहाल - जब पत्रिकाओं और उनके संपादकों की आबादी की तुलना सिर्फ़ उन्हीं की गिरावट से की जा सकती है - संपादक के संस्था होने की धारणा के मंगलेश जी आख़िरी और असंभव उदाहरण हैं. अंतिम निर्माता संपादक. उनके आह्वान में कितनी प्रेरणा और शक्ति रहती आयी है. वह जब भी कुछ लिखने को कहते हैं तो उसमे कितनी 'अर्जेंसी' होती है. उन्होंने हिंदी की नयी पीढ़ियों पर कितना यक़ीन किया है. अपनी 'विज़नरी' और मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के ज़रिये उन्होंने, इस प्रकार, कवियों और पत्रकारों के एक पूरे समूह का निर्माण किया है.

मुझे बार-बार लगता है कि मंगलेश डबराल उस दौर के लोगों के रघुवीर सहाय हैं जिन्होंने रघुवीर सहाय को देखा नहीं है.

होने के प्रमाण

मंगलेश
जी के बग़ैर दृश्य की कल्पना नहीं की जा सकती और यह सिर्फ़ साहित्यिक दृश्य नहीं है. यह जीवन, संघर्ष और सौन्दर्य का दृश्य है. यह मेरी ज़िन्दगी का दृश्य है. यह बात कितनी भी भावुक या अजीब लग सकती है लेकिन मंगलेश जी को समझने के बाद कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रा जिसमें उनकी याद या उनका ख़याल या उनके होने के दूसरे एहसास न हों. लेखक और मनुष्य के तौर पर मैं और मुझ जैसे कई लोग उनके बग़ैर संभव ही नहीं थे. मेरा और हमारा लेखक होना उनके होने का प्रमाण है या उनके होने की व्युत्पत्तियाँ.

शमशेर का मतलब

उनकी किताबें - लेखक की रोटी और कवि का अकेलापन हिंदी आलोचना की हैण्ड बुक हैं. अगर कुछ सुझाव देने का हक़ हो तो मैं नौजवान आलोचकों से कहूंगा कि ये दोनों किताबें उनकी टेबुल या उनके झोले में हमेशा होनी चाहिए. याद रखने या उद्धृत करने के लिए नहीं - लेखक की रोटी के अधिकांश निबंध मुझ समेत बहुत से लोगों को याद हैं; ये उसके पार की ज़रुरत हैं. हमारी आत्मिक ख़ुराक. मंगलेश डबराल नामक व्यक्ति या लेखक की चिंतन और जीवन-प्रक्रिया को समझने के सबसे विश्वसनीय और उज्जवल स्त्रोत यहाँ हैं. शमशेर की कविता और रघुवीर सहाय के कवि-व्यक्तित्व की ख़ासियतों के ज़िक्र यहाँ इतने मौलिक और सम्मोहक हैं के पाठक को वे स्वयं मंगलेश डबराल की अच्छाइयों के रूपक की तरह नज़र आते हैं, जो वे हैं भी. उनकी सराहनाओं के नावीन्य और बड़प्पन से अच्छा होना, अच्छा बनना सीखा जा सकता है.

उनकी कविता

और
उनकी कविता, जिसने चुपचाप हिंदी कविता को बनाया, बढ़ाया और बदला है, उसका संकोच अब हमारे लिए एक राजनीतिक मूल्य है. इस संकोच को हिंदी के मौजूदा पर्यावरण में अंततः जिस हद तक माना और समझा गया है, वह समवेत उपलब्धि है और तमाम शोर और वाचालताओं का प्रतिकार.

उनकी कविता एक ऐसी चीज़ है जिस पर अकेले बात नहीं की जा सकती. उस कविता का दौर, उस कविता के दौर की राजनीति, संघर्षों, मुख्याधाराओं, हाशियों, प्रकृति, बचपन, स्त्री और मनुष्यता के संगीत के बग़ैर वह ज़ाहिर नहीं होती. वह ज़ाहिर होना भी नहीं चाहती. आज अगर सेकुलरिज्म समकालीन कविता का सबसे बड़ा मुद्दा है तो इतने डायरेक्ट और तल्ख़ बिंदु तक कविता को ले आने में " गुजरात के मृतक का बयान '' की केन्द्रीय भूमिका है. वह सन १९९२ या २००० के बाद के भारत में कविकर्म का घोषणा पत्र है.

आज मंगलेश जी का जन्मदिन है. वह ६२ साल के हो रहे हैं, यानी रघुवीर सहाय से दो साल ज़्यादा. हिंदी के लिए ये २ और आगामी कई वर्ष, जो जीने के लिए मंगलेश जी को रघुवीर सहाय से ज़्यादा मिले हैं, सम्पदा हैं. इसलिए हम उनके होने को, होने की राजनीति और होने के सौन्दर्य को सेलिब्रेट कर रहे हैं.
****

( यह लेख युवा कवि-लेखक व्योमेश शुक्ल ने अनेक आग्रहों पर सबद के लिए लिखा है. तस्वीरों में मंगलेश जी के अलावा उनकी पत्नी संयुक्ता, पुत्र मोहित और पुत्री अल्मा हैं. )
8 comments:

मंगलेश जी के कविता और हमारे जीवन में होने की ही तरह सुन्दर है व्योमेश का ये लेख(?). गो प्यार के दस्तावेज़ कई हैं पर युवा कवियों को उनसे मिला अपूर्व प्रेम एक दिन दस्तावेज़ से भी ज़्यादा कुछ बनेगा. ख़ुशनसीब हैं कि हम उसके गवाह होंगे. प्रतिभाओं को पहचानने और सुधारने में उनकी निगाह घडीसाज़ की चिमटी सी सुघड़ और कुशल है. जन्मदिन की अनेक बधाईयाँ ...मंगलेश जी से ज़्यादा हमें....मैं अभी अनुनाद पर उनसे सम्बंधित पोस्ट लगा रहा था पर सबद पर यह काम इतना शानदार हुआ है कि उसकी कोई ज़रूरत नहीं रही....वहाँ पोस्ट के रूप में सिर्फ़ लिंक जा रहा है.


एक कवि को इससे बेहतर ढंग से बधाई नहीं जा सकती!


यह जो भी है व्योमेश बेहद सुन्दर (शिरीष से शब्द उधार लिये…कुछ और सूझा ही नहीं) है…लिखना हुआ तो कभी इसमें से बहुत कुछ पंकज बिष्ट जी के लिये लिख सकता हूं जिन्होंने मुझसे न जाने क्या-क्या लिखवा लिया। लेखक बनाने वाले बेहद कम संपादक बचे हैं…

मंगलेश जी को इससे बेहतर बधाई और क्या होती…उनकी कई कवितायें एकसाथ याद आ रही हैं…शाम को हमकलम पर लगाऊंगा


vyomesh का यह *लेख* अद्भुत है. उन की कविताओ की तरह. बहुत से सन्दर्भ समझ नही आए, फिर भी वरिष्ठ कवि को जन्म दिन की बधाई.


आदर जोग मंगलेश जी
सादर प्रणाम ,
आप को किताबो में बहुत पढ़ा है , क्या कहू आप के बारे में , आप के लेखन को नमन है , आदर '' आखार्कालाश '' की और से भी आप को प्रणाम ,
सादर


der se aaya, Manglesh ji ko Janmdin ki shubhkaamnayen.
in sab baaton se alag main ek ye baat jodna chahoonga ki Manglesh ji ko sangeet(kanth sangeet) se adwitiya Prem hai aur khaaskar Raag Kedar se. main khushnaseeb hi hoon ki kai baar main manglesh ji se kedar ki tooti-footi bandish sun chuka hoon.


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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सम्‍मुख - 1

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अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

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मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी