Wednesday, May 12, 2010

शिरीष कुमार मौर्य की नई कविता


{ कविता में कहानी सुनाना शिरीष की इस बीच की पहचान है लेकिन कहानी में कविता कहना उनकी सबसे बड़ी शक्ति, यानी जिस चीज़ को हम किसी किस्से की तरह सुनना चाहते हैं कवि उसे कविता की शर्तों पर हासिल करता है और हमसे, पाठकों से, भी ऐसी उम्मीद करता है; यों वह हमारे साहित्य-मिजाज़ को कुछ बदल देता है या कम से कम बदल देना चाहता है. यह कहानी की आवाज़ में कविता की ख़ामोशी की पेशकश है. ज़ाहिर है, ऐसा करने वाले शिरीष पहले कवि नहीं हैं, कवि पहला होना भी नहीं चाहता, लेकिन कविता निर्मित करने के अत्यन्त निजी साधनों के साथ यह कोशिश करते हुए वह हमेशा अनूठे और अनिवार्य लगा किये हैं.
शिरीष की कविता में क्रीड़ा-भाव पर्याप्त है किन्तु उन्होंने ज़िन्दगी को ही कला के बुनियादी पदार्थ के रूप में स्वीकार किया है, उनकी कविता में जीवन के बढे-चढ़े अनुपात को उनके कर्त्तव्य की तरह पढ़कर उससे और प्यार किया जा सकता है. यह देखना कितना दिलचस्प है कि कवि अपनी लगातार कविताओं में इसी पदार्थ के मनमाने प्रयोग करता चला जा रहा है, अपनी पहाड़ी, पठारी और मैदानी नागरिकताओं के प्रयोग, स्मृतियों के प्रयोग, स्त्री के साथ विविधतर मानवीय संबंधों में जाने के जोखिम के प्रयोग - शिरीष की कविता का विषय-वैविध्य जीवन के साथ कवि के अकुंठ रिश्ते की व्युत्पत्ति है.
सेल्फ-सेंसरशिप के ख़िलाफ़ प्रमाण या उदाहरण की तरह जो कविता आज हमारा सर्वाधिक साथ देती है, शिरीष की कविता को उसमें रखा जा सकता है. वह कोई राजनीति न करने के बहाने से राजनीति कर रही कविता को शर्मिन्दा करते हुए संभव होती है.} --व्योमेश शुक्ल.

प्रकाश केश कर्तनालय

उच्चतरमाध्यमिक कन्याशाला से छुट्टी होने पर
साइकिल से घर लौटती
लड़कियों के झुंड चिड़ियों के झुंड हैं

पुलिया पर बैठ उन्हे छेड़ते किशोर
कभी घबराई बकरियों को खदेड़ते कुत्ते हैं
और कभी शायद कुछ दिल हैं हसरत भरे
जिन्हें व्याकरण में अभी कुछ कहना नहीं आता

बाल काटते हुए अपनी पटायी हुई एक ग़रीब औरत का क़िस्सा तोता-मैना सुनाता
मुझे पता है प्रकाश केश कर्तनालय मध्य प्रदेश का बल्लू नाऊ
उत्तराखंड का चाँद नाई नहीं है
हालाँकि उसका पेशा बिल्कुल वही है

फ़ोश क़िस्सा सुनाना
कुर्सी पर बैठे दालमिल वाले सेठ के नौउम्र इकलौते लड़के के लिए
हज़ामत के साथ
हर दिन निभाया जाने वाला उसका फ़र्ज़ है
और उससे उसकी यही उम्मीद है

उस्तरे के नीचे जो रोमांच नहीं है वह दरअसल ऐसे ही कुछ क़िस्सों के पीछे है
दोनों यह जानते हैं

नाऊ की भाषा शुरू से ही कुछ उलझने लगी है
थोड़ी पेंचदार
जिसे सुधारने के लिए उसे कंघी की ज़रूरत किसी भी वक़्त पड़ सकती है

मैं पान चबाता बैठा हूँ जिसमें चौरसिया पान भंडार ने हाथ की घिसी तम्बाकू डाली है
यहीं कहीं आसपास के किसी खेत की उगी
उसमें शुरूआती तेज़ी के बाद एक हल्का अद्भुत मीठापन है गले से नीचे उतरकर
हिचकियों में बदलता हुआ

नाऊ भी अब उस औरत के साथ खेतों में है
वहाँ उन रसीली फलियों के बीच उसे लिटा रहा है जिन्हें वह अपने देस में बटरा कहता है
और मैं अपने देस में मटर समझता हूँ
भाषा का ब्लाउज़ भदेस में पोलका है जिसके भीतर नाऊ का उस्तरे जैसा हाथ है
औरत को उससे साठ रुपयों की दरकार है
नाऊ की ज़ुबान उसके कान के बिलकुल पास है
दुकान में ग्राहक बहुत हैं और नाऊ का घटनाक्रम अभी बाक़ी है
मुझे इंतज़ार करना पड़ रहा है

मैं पान चबाने के साथ साथ आईने में झाँकता हुआ अपने बाल भी सहलाने लगा हूँ सामने एक कैंची भी है
वह चमकदार है पर उसकी ध्वनि फ़िलहाल तो धातु की ध्वनि नहीं है
वह अभी नाऊ के कौशल की ध्वनि भी नहीं है
जबकि वह कुछ कर नहीं रही है उसमें एक इच्छा की ध्वनि है
जैसी नाऊ की ज़ुबान में है बहुत तीखी

कैंची को लगातार देखते हुए
मुझे पता चलने लगा है कि वह मेरी उँगलियों के लिए नहीं बनी है और नाऊ अभी खेत में ही है
वहाँ लेटी हुई औरत तब तक कुछ फलियाँ तोड़ रही है और ऊपर उठी हुई साड़ी का सिरा खोज रही है
जिनमें वह उन्हें बाद में बाँधेगी
फलतः नाऊ अब थोड़ा नाराज़ है और भाषा में वैसा व्यवहार करना चाहता है
जैसा शरीर में संभव नहीं

उधर कुर्सी पर सेठ का लड़का अब कसमसाने लगा है
वह शरीर में वैसा व्यवहार करना चाहता है जैसा भाषा में संभव नहीं
उसके गालों को चिकना बनाती ब्लेड के नीचे फ़िलहाल उसके पास शरीर तो है
पर भाषा नहीं है

मैं प्रतीक्षा का व्यवहार करते करते अब आराम का व्यवहार करने लगा हूँ
मैं बेंच पर बैठा शरीर से भी कुछ व्यवहार कर सकता हूँ और भाषा से भी लेकिन दोनों से ही मुझे कुछ भी व्यवहार
करना
अब जम नहीं रहा है

नाऊ बता रहा है कि वह वहाँ खेत में बहुत खीझा हुआ है
साड़ी के छोर में बटरा बाँधनेवाली औरत दरअसल इस काम के लिए पलटना चाह रही है
उसकी इन इच्छाओं का नाऊ के कार्यव्यहार पर फ़र्क पड़ रहा है और वह भी अब जितना जल्दी हो
सुलटना चाहता है
एक बार दाढ़ी बनाकर उसे बेहतर घोंटने को वह दुबारा साबुन लगा रहा है
औरत को बटरा बाँधने का मौका मिल गया है
साठ रूपए वह पहले ही रखवा चुकी थी पर पोलके में नाऊ का हाथ माँसपिंड के अलावा भी कुछ खोज रहा है

‘इते हमने आँखिरी दान दओ एक घुसा के और उते पइसे भी हमाए हाथ में आ गए’ -कहता हुआ नाऊ अब
फिटकरी रगड़ रहा है मुझे ख़ाली होती जगह पर बैठने का इशारा करता हुआ

मैं उससे ख़ुश नहीं हूँ और पान थूकने के बहाने खिसक जाना चाहता हूँ वहाँ से
पर वह मेरी खिन्नता भाँप गया है और लड़के के जाते ही बड़ी मासूमियत से बोल रहा है
- अरे ऐंसो कछु नई करो बड़े भइया हमने !
जे तो सेठ जी को मोड़ा इ मग्घा है, बाहे बातन में तर करनो पड़त है !
तनक हमाइ भी समझो आप !

पान थूकने के बाद मैं कहीं न जाकर वापस दुकान में आ गया हूँ
बाल बिखर रहे हैं इधर-उधर
सेठ जी के मग्घा मोड़े की कहानी के बीच कभी-कभी बोतल से निकली पानी की फुहार है
मेरे बालों को मुलायम बनाती हुई
नाऊ दुकान से कुछ ही देर पहले बाइज़्ज़त विदा हुए पूंजीवाद का प्रतीकात्मक विरोध करता
उसे अब आढ़त के कलूटे मजूर की औलाद बता रहा है
जो सेठ जी के नाम पर फल रही है

कन्याशाला से निकली लड़कियाँ कब की घर पहुँच गई हैं
बटरा छील रहीं दाल पका रही हैं
किशोर भी अब हाथ जोड़कर माता मंदिर की आरती में खड़े कुछ असम्भव सम्भ्रांत औरतों में सम्भावनाएँ खोज रहे हैं

साइनबोर्ड के अक्षर ट्यूबलाइट की रोशनी से खिसककर गली के अँधेरे में जा रहे हैं
उधर ही मेरे घर का छोटा रास्ता है
हालाँकि ज़िन्दग़ी में कोई रास्ता छोटा नहीं होता यह प्रकाश केश कर्तनालय का बल्लू नाऊ मुफ़त में मुझे बता रहा है
उसके बताने में अनुभव है
एक आँचलिक दार्शनिकता है
मैं देख रहा हूँ उसके बाल गरदन के पीछे बेतरतीब बढ़े हैं
समूचे सिर में ख़िजाब के नीचे सफ़ेदी की एक दयनीय परत है उसमें गरिमा नहीं है
अधपकी दाढ़ी भी किंचित बढ़ आयी है
चेहरा हड़ीला
जाहिर मुस्कान के पीछे एक रूदन है और बिलखने की कोई सूरत नहीं

वह मेरे बाल काट रहा है
मैं बहुत संजीदा बैठा हूँ आईने के सामने
कैंची में अब किसी इच्छा की ध्वनि नहीं है
धातु की ध्वनि है
और कटते हुए बालों की ध्वनि है जो फैलती जाती है

बरसों पहले गुज़र चुके
अतिभव्य उदात्त दादाजी के अतिशय दबदबे वाले इस क़स्बे में
मैं अब बस दाल के बारे में सोच पा रहा हूँ
और बटरा के बारे में
जिसे मैं मटर कहकर अपनी ज़िम्मेदारी से कभी बच नहीं पाऊँगा।
****
( शिरीष कुमार मौर्य की इस अप्रकाशित कविता की ओर ध्यानाकर्षण भी व्योमेश की ही तरफ से. इसे छापने की स्वीकृति देने के लिए कवि का आभार.)  

14 comments:

piyush daiya said...

शिरीष जी की कविता बांचते हुए गिरिराज (किशोर नहीं) का गढ़ा नामकरण मौजूं लगता रहा : "काव्य-कथा".
---पीयूष

प्रभात रंजन said...

shirish ki kavita bahut jeevant lagti hai. kam hi kavi itni jeevant kavita likh pate hain.

शरद कोकास said...

बढ़िया कविता है शिरीष । मज़ा आ गया ।

रवि कुमार, रावतभाटा said...

उफ़...क्या कविता है...
एकदम नया अनुभव...नया अंदाज़...मुझे तो ऐसा ही लगा...

सुशीला पुरी said...

पूरी कहानी !!!!!!!!!!सुंदर ...

sanjay vyas said...

"यह कहानी की आवाज़ में कविता की ख़ामोशी की पेशकश है."
मन की बात कही व्योमेश जी ने.
अद्भुत है कविता, अद्भुत ही किस्सागोई के बीच.

naveen kumar naithani said...

भाषा शब्द के किंचित अतिरेकपूर्ण इस्तेमाल के बावजूद बल्लू केश-कर्तक का बहु-बिम्बी चरित्र अच्छा लगा. कविता तो खैर पसन्द आयी है.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

कई बार बस पढ़-पढ़ के लौट गया…इस बार भी बस इतना ही…'हैट्स आफ़ शिरीष भाई'

अजेय said...

कल फोन पे तुषार धवल ने इधर का इशारा किया था. *स्वादिष्ठ* कविता, शिरीष. हिन्दी का पाठक इधर की कविता मे ऐसा कुछ पढ़ने के लिए तरस गया हुआ है. अभिभूत हूँ.

Rathi ji said...

शिरीष की कविताओ में पिपरिया की सुगंध आ रही है l प्रकाश केश कर्तनालय, पिपरिया, (मध्य प्रदेश ) के बल्लू नाऊ को केंद्र बनाकर लिखी गई इस कविता में बुन्देली (पिपरिया के आसपास बोली जाने वाले बोली) के संवादों का प्रयोग जबरदस्त है l बल्लू नाऊ जैसे पात्रो की किस्सा गोई के बहाने समाज के अंतरविरोधो को टटोलने का यह प्रयास प्रशसनीय है l शिरीष का बहुत बहुत धन्यवाद l

Nityanand Gayen said...

बहुत सुंदर कविता मौर्या जी ,

chanyal pc said...

good sir very good 'batre' ko aur nyaya dijiye sir.........

idharsedekho said...

bahut dinon baad shirish ki kavita padhi. bhaashaa kaa bahaav bilkul husain sahab ki lakeer saa aatm vishvaas lie hai.
bhasha me gunjaaish ki talaash me hi shaayad is tarah kaa sahaj ve chamatkaari srijan ho sakta hai.
shabd mere hisse me nahi hai par unhe lakiron or uske flow ki tarah dekhta padhataa hun.
jabardast chitra banaa hai shirish ki kavitaa me .mujhe vaise bhi vah kavita adhik chuti he loaded na ho,

shrikant ji ki yah kavita share kar raha hu-------------

nadi ke kinaare koi aasmaan dho rahaa hai.
dopahar he mahue kaa ped so raha hai.
thanx sabad

Omprakash Pawar said...

खूसूरत रचना :)