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कवि की संगत कविता के साथ : ७ : नीलेश रघुवंशी

{जब मैं नीलेश रघुवंशी की कविताएं पढ़ता हूं, तो मुझे ब्‍लैक एंड व्‍हाइट फिल्‍मों की याद आ जाती है, जहां कई सारे रंगों से नहीं, बल्कि किसी अपरिमेय छांव को साधने की कोशिश की जाती है. रंगों की महत्‍वाकांक्षा चौंध में तब्‍दील होना नहीं होता होगा, वे सब एक अपूर्व छांव बन जाना चाहते हैं. जैसा कि यहां है. सॉफ़्ट लेंस के प्रयोग से कुछ पैंसिव छवियों का निर्माण होता है, पानी उस जगह फूटकर निकलता है, जहां का पता ख़ुद नमी के पास नहीं होता. आसपास, घर-परिवार, जीवन-समाज के बारीक अनुभव और सादगी का आभास कराता एक बेहद सजग शिल्‍प-शब्‍द-विधान तो हैं ही, विलक्षण यह भी है कि यहां स्‍मृति बिना किसी सिंगार के आती है. यह कभी नहीं कहा जा सकता कि कविता अबूझ स्‍मृतियों के आगे प्रार्थना होती है या उन्‍हीं का एक अनुषंग, पर यहां स्‍मृति अपने खंडों-टुकड़ों में भी नैसर्गिक है. स्‍मृति का सहज नैसर्गिक होना-दिखना साधना की अनिवार्य मांग करता है, क्‍योंकि दोनों अमूमन अलग ध्रुवों पर रहते हैं. नीलेश की कविताएं इस साधना से निकलती हैं, किसी योगी-सी मुद्रा में नहीं, बल्कि इस समूचे प्रदेश की अपनी नागरिकता को याद रखते हुए. और यहीं उनकी अद्वितीयता के सूत्र हैं.}-- गीत चतुर्वेदी
वक्तव्य
कविता जनरल बोगी में यात्रा कर रहे यात्री की तरह है
नीलेश रघुवंशी
1.
मुझे इस पार या उस पार का जीवन अच्छा लगता है !

अपनी पूरी की पूरी दिनचर्या से कोफ्त होती है- कोफ्त होती है उस रास्ते से जिस पर मैं चल पड़ी हूँ ! एक मशीन में तब्दील हो गई हूँ और जाने कहाँ किसके पास मेरा रिमोट है ! क्या करूँ मैं और कैसे करूं ? ऐसी कैसी बैचेनी मेरे भीतर तक पैठ गई है जो मुझे निष्क्रिय किए दे रही है ! थक गई हूँ एक से ढर्रे का जीवन जीते जीते ! इसे तोड़ देना चाहती हूँ- पूरा का पूरा तहस-नहस कर देना चाहती हूँ और एक नया दिन, नया जीवन प्राप्त करना चाहती हूँ !

कभी एकदम पास और कभी एकदम दूर आकाश में उड़ती, आधी रात में जब टिटहरी बोलती है, तो लगता है वह मेरे मन की आवाजें निकाल रही हैं !

जी भर के आवारगी करना चाहती हूँ ! लेकिन कर नहीं पा रही हूँ ! जब आवारगी मेरे भीतर कुलाँचें भरने लगती है, जब प्यास से उसका कंठ सूखने लगता है ! तब मैं पेड़ों के पास चली जाती हूँ... उन्हें सहेजने लगती हूँ ! गड़ाई-खुदाई करने लगती हूँ ! बगीचे में पानी देने लगती हूँ ! खरपतवार को सहेजती हूँ ! फिर उसे धीरे-से पेड़ों से अलग करती हूँ ! बिल्कुल आवारगी की इच्छा की तरह ! आवारगी को खुद से दूर झटकती हूँ और दुनियादारी को गले लगाती हूँ ! इस तरह अपने अन्त की शुरूआत करती हूँ !

2.
जब भी कभी ट्रेन में जगह न मिल पाने के कारण लटक कर सफर करने वाले मजबूर यात्रियों को देखती हूँ तो बरबस ही अपने समय की कविता को उनमें देखने लगती हूँ ! समाज में जगह तलाशती कविता... जगह न मिल पाने के कारण कभी लटक कर, कभी छत पर चढ़कर, बिजली के तारों से जीवन बचाती, सफ़र तय करती हमारे समय की कविता---- तीसरे दरजे की यात्रा करती !

हमारे समय में कविता जनरल बोगी में यात्रा कर रहे यात्री की तरह है !

जिस समाज में कहने को उसे पाँव धरने की जगह नहीं, उसी समाज में वह जगह बनाती बड़ी ठसक से अपनी यात्रा में है ! इस यात्रा में जोखि़म है और पहले-दूसरे दरजे की यात्रा-सा सुख-आराम नहीं, लेकिन उसके एकदम पास है जीवन !

कुछ कविताएँ बिना टिकिट हैं वो भी डंके की चोट पर..! कुछ दुनिया भर का बोझा उठाए चल रही हैं तो कुछ जमाने को ठोकर मारतीं अपनी ही चाल में !
ऐसा नहीं है कि बिना टिकिट यात्रा करती कविताएँ सिर्फ जनरल बोगी में हैं ! बल्कि वे सैकण्ड एसी, थर्ड एसी में भी हैं ! यह और बात है कि उन्हें टीसी एलीट की आड़ में पकड़ नहीं पाता ! वे वैभव का, श्रेष्ठि वर्ग का, आभिजात्य का ऐसा ताना-बाना रचती हैं कि खुद चोरी करते हुए चोर किसी और को ठहरा देती हैं !

3.
इस समय हमें चिड़िया की आँख नहीं देखना है बल्कि इस दुनिया को, इस समय को चिड़िया की आँख से देखना है ! एक कवि होने के नाते बहुत गहराई से यह महसूस करती हूँ कि इस दुनिया को देखने का नज़रिया हमें बदलना ही होगा ! हमें आँख चाहिए वो भी चिड़िया की..! इस दुनिया की, समय की भीतरी अन्दरूनी परतें हमें दिखाई नहीं दे रहीं या ओझल हैं हमसे ! आखिर क्यों? चीज़ों/जीवन को समझने में हमसे चूक होती गई और होती जा रही है !

ऐसा नहीं कि सिर्फ दुनिया और समय को देखने के लिए ही चिड़िया की आँख चाहिए बल्कि खुद को देखने परखने के लिए भी चिड़िया की आँख चाहिए ! आज के समय में कविता कवि से आत्मालोचना की माँग कर रही है! घनीभूत पीड़ा के संग कवि से कह रही है...
आत्मालोचना-- आत्मालोचना-- आत्मालोचना !
आत्मसंघर्ष-- आत्मसंघर्ष-- आत्मसंघर्ष !
___________

कविताएं


चोरी

जब भी बहनें आतीं ससुराल से
वे दो-चार दिनों तक सोती रहतीं
उलाँकते हुए उनके कान में जोर की कूँक मारते
एक बार तो लँगड़ी भी खेली हमने उन पर
वे हमें मारने दौड़ीं
हम भागकर पिता से चिपक गए
नींद से भरी वे फिर सो गईं वहीं पिता के पास...!

पिता के न होने पर
नहीं सोईं एक भी भरी दोपहरी में
क्या उनकी नींद जाग गई पिता के सोते ही.... ?
सब घेरकर बैठी रहीं उसी जगह को
जहाँ अक्सर बैठते थे पिता और लेटे थे अपने अंतिम दिनों में....!
पिता का तकिया जिस पर सर रखने को लेकर
पूरे तेरह दिन रूआँसे हुए हम सब कई बार
बाँटते भी कैसे
एक दो तीन नहीं हम तो पूरे नौ हैं........!

इसी बीच सबकी आँख बचाकर
मैंने पिता की छड़ी पार कर दी
उन्होंने देख लिया शायद मुझे
मारे डर के वैसे ही लिपटी छड़ी से
लिपटी थी जैसे पहली बार
पिता की सुपारी चुराने पर पिता से..!
****
पेड़ों का शहर

कल रात स्वप्न में
एक पेड़ से लिपटकर बहुत रोई
हिचकियाँ लेते रुंधे गले से बोली
मैं जीना चाहती हूँ और जीवन बहुत दूर है मुझसे
पेड़ ने कहा
मेरे साथ चलो तुम मेरे शहर
रोते हुए आँखें चमक गईं मेरी
पेड़ों का शहर..?
चमकती हुई रात में
अचानक हम ट्रैफिक में घिर गए
बीच चौराहे पर एक हरा-भरा पेड़
सब ओर खुशी की बूँदें छा गयीं
पेड़ के होने से
चौराहे की खूबसूरती में चार चाँद लग गए....!
स्वप्न ने करवट बदली
भयानक शोर भारी-भरकम क्रेन
पेड़ शिफ्टिंग करने वालों का काफिला
सबसे ऊँची टहनी पर बैठी मैं
पेड़ के संग हवा में लहराने लगी
क्रेन हमारे पास बहुत पास आ रही थी
चौराहे पर लोगों का जबरदस्त हुजूम
भय और आश्‍चर्य से भरी आवाजें
इसी अफरा-तफरी और हो हल्ले में
पेड़ अपने शहर का रास्ता भूल गया
पेड़ों का शहर......
एक लम्बी सिसकारी भरी मैंने नींद में!
****
उलटबाँसी

तुम मेरा प्रथम प्रेम तो नहीं
लेकिन तुम्हारे प्रेम की व्याकुलता
प्रथम प्रेम की व्याकुलता-सी है !
हर शाम तुम्हारी याद आती है
तुम्हारी याद को शाम
करेला और नीम चढ़ा बना देती है !
अगर पेड़ न होते तो जाने क्या होता
दगा तो सूर्य और चन्द्रमा करते हैं
सूर्य अपनी लालिमा बिखेरकर
तुम्हारी याद में तपा देता है !
चाँद बजाए शीतलता देने के
ऐसे छिपता है जैसे छोटे शहरों के
प्रेमी युगल अपने प्रेम को छिपाते फिरते
मारे डर के एक-दूसरे को राखी बाँध देते हैं !
यही उलटबाँसी चाँद की हर दिन चलती है
सबसे ज्यादा तब-
जब मुझे तम्हारी घनघोर याद आती है !
****
एफ. आई. आर.

खुद को चोर होने से रोक सकती हूँ
मेरे घर में चोरी न हो
यह भला कैसे रोक सकती हूँ !
खुद को चोर होने से रोका
कोई बड़ी बात नहीं
चोर को चोर होने से रोक सकती
तो कुछ बात बनती
घर में ताला लगाकर चाभी चोर के यहाँ रखती
इस तरह
किसी और युग में न जाकर
किसी और ग्रह को न ताककर
चोर के संग
एफ. आई. आर के रजिस्टर के पुरजे पुरजे कर
यहीं धरती पर पानी की नाव बनाती...!
****
पच्चीस दिन
तुम्हें गए आज पूरे पच्चीस दिन हो गए
पच्चीस जनम की तरह गुजरे
ये पच्चीस दिन
कैसे गुजरेगी अब ये बची-खुची जिंदगी !
यह भी तो नहीं कह सकती
तुम्हारी जगह मैं चली जाती
फिर तुम कैसे गुजारते अपने बचे-खुचे बरस !
पच्चीस दिन बाद आज लौटी काम पर
धूल की मोटी परत टेबिल पर
कुर्सी पर कबूतरों की भरपूर बीट
बिखरे पड़े हैं पच्चीस दिन के अखबार
कितने चाव से पढ़ते थे तुम इन्हें
ओ मेरे पिता
क्यों चले गए तुम....
इन अखबारों के बीच मुझे छोड़कर !
****
आत्मकथ्य

मेरे प्राण मेरी कमीज़ के बाहर
आधी उधड़ चुकी जेब में लटके हैं
मेरी जेब में उसका फोटो है
रोपा जा रहा है जिसके दिल में
फूल विस्मरण का....!
झूठ फरेबी चार सौ बीसी
जाने कितने मामले दर्ज़ हैं मेरे ऊपर
इस भ्रष्ट और अंधे तंत्र से
लड़ने का कारगर हथियार नहीं मेरे पास
घृणा आततायी को जन्म देती है
आततायी निरंकुषता को
प्रेम किसको जन्म देता है....?
अपना सूखा कंठ लिए रोता हूँ फूट फूटकर
मेरी जेब में तुम्हारा फोटो है
कर गए चस्पा उसी पर
नोटिस गुमशुदा की तलाश का......!

एक बूढ़ी औरत का बयान

मथुरा की परकम्मा करने गए थे हम
वहीं रेलवे स्टेशन पे भैया.......
(रोओ मत ! पहले बात पूरी करो फिर रोना जी भर के)
साब भीड़ में हाथ छूट गए हमारे
पूरे दो दिन स्टेशन पर बैठी रही मानो वे नहीं मिले
ढूँढत ढूँढत आँखें पथरा गई भैया मेरी
अब आप ही कुछ दया करम करो बाबूजी
(दो चार दिन और इंतज़ार करो बाई आ जाएँगे खुद ब खुद !)
नहीं आ पाएँगे बेटा वे पूरो एक महीना और पन्द्रह दिन हो गए
वे सुन नहीं पाते और दिखता भी नहीं उन्हें अच्छे से !
(बुढ़ापे में चैन से बैठते नहीं बनता घर में ! जाओ और करो परकम्मा..
कहाँ की रहने वाली हो ?)
अशोक नगर के !
(घर में और कोई नहीं है क्या ?)
हैं ! नाती पोता सब हैं भैया !
(फिर तुम अकेली क्यों आती हो ?
लड़कों को भेजना चाहिए था न रिपोर्ट लिखाने....)
वे नहीं आ रहे न वे ढूँढ रहे
कहते हैं....
तुम्हीं गुमा के आई हो सो तुम्हीं ढूँढो !
लाल सुर्ख साड़ी में एकदम जवान
दद्दा के साथ कितनी खूबसूरत बूढ़ी औरत
इसी फोटो पर चस्पा
नोटिस गुमशुदा की तलाश का..
****
आम आदमी

इन दिनों मुश्किल में है आम आदमी
हर कोई उसी की बात करता है
सबसे ज्यादा वो
जो जानता भी नहीं आम आदमी को
हर अच्छा बुरा काम हो रहा है उसी के नाम पर
हद हो गई अब तो
चप्पल घसीटते कंधे उचकाते
साधारण का स्वाँग भरते
पहन रहे हैं चोला साधारणता का विशिष्ट जन
जानते नहीं ये लोग
घिसटने से जल्दी टूट जाती है चप्पल
और-- कंधे
बोझ ढोने के लिए हैं उचकाने के लिए नहीं
साँस फँस रही है गले में आम आदमी की
विशिष्ट जन आ रहे हैं उसकी गली में
माँग रहे हैं
मोटी रोटी और कुटी लाल मिर्च की चटनी
कैसे बचेगा अब आम आदमी
कैसे बचेगी अब साधारणता.......!
साधारणता को बचाना है तंगहाली को दूर करना है
हवा में उड़ती लाल मिर्च
जाने किसकी आँख को बताने उड़ती जाती दूर तक
****
एक बार फिर अकाल

दौड़ो दौड़ो दौड़ो
तुम्हारा जन्म ही दौड़ने के लिए हुआ
मत देखना कभी पीछे मुड़कर
कहीं तुम्हारे अपने तुम्हें आवाज न दे दें
अकाल अकाल अकाल प्रेम का अकाल !
महानगर बनने की कगार पर इसी शहर की
एक पॉश कॉलोनी में
संभव को असंभव और असंभव को संभव बनाती
ये बात कि
एक भले मानुष के विदेश में बसे
बड़े बेटे ने सारी सम्पत्ति
छोटे भाई को देने की गुहार की पिता से
सम्पत्ति के संग पिता को भी किया भाई के हिस्से !
जीवन अपनी गति से चल रहा था कि
कुएँ बावड़ी नदी पोखर सब सूखने लगे
पशुओं ने चरना और पक्षियों ने उड़ना किया बंद
बहुत बुरा हाल लोगों का
वे न जी पा रहे न मर पा रहे !
बुजुर्ग अपने ही घर में पराए हो गए
हुआ ये कि एक दिन
शाम की सैर से लौटे तो देखा
उनका कमरा अब उनका नहीं रहा
गेस्ट हाऊस के छोटे-से कमरे में
शिफ्ट कर दिया गया तिस पर
बढ़ती मँहगाई के नाम पर सारी कटौती उनके हिस्से !
होनी को अनहोनी और अनहोनी को होनी बनाते
बुजुर्ग सज्जन ने अपना सब कुछ बेच दिया
दिन तो क्या कई महीने गुजर गए
विश्‍व भ्रमण से
सुखी परिवार जब वापस आया तो
अपने ही घर में किसी अजनबी को देख हकबका गया
प्रेम के अकाल को बगल में दबाए बुजुर्ग
कुछ भी कह सुन लिखकर नहीं गए
प्रेम के अकाल को
सम्पत्ति और बैंक-बैलेंस के अकाल में बदलते
वे चले गए..!
****
एक घूँट पानी

हम पहले कभी नहीं मिले फिर कभी मिलेंगे
इसका अंदेशा दूर-दूर तक न था !
वो बात कम करती हँसती ज्यादा
उसकी हँसी मूँगफली बनकर
सब दूर अपने छिलके बिखेर रही थी कि
इसी बीच मुझे प्यास लगी
थोड़ा सा पानी पिया मैंने और थोड़ा सा बचा लिया
मारे गरमी के गला सूख रहा है.....
उसने बॉटल की ओर हाथ बढ़ाया
नहीं नहीं जूठा है.....
एक घूँट पानी के लिए भी मना कर देते हैं मुझ जैसे लोग !
हमारे बीच अब
बोतल के पानी का सूखा लहराने लगा
जिसने उसकी बातों की फसल को अपनी चपेट में ले लिया
धड़धड़ाती ट्रेन पुल से गुजरी
वो झाँककर नदी को देखने लगी
मिनरल वाटर की बॉटल को सबसे बचाते
हँसी और बातों से कन्नी काट
सोने का स्वाँग करते हुए आँखें मूँद ली मैंने अपनी !
****
रंज

अगर मैं
किसी दुख से दुखी न होऊँ
किसी सुख की चाह न करूँ
रोग भय और क्रोध से पा जाऊँ छुटकारा
तो क्या और कैसा होगा ?
जीवन कितना उबाऊ और नीरस होगा !

जिया नहीं जिसने जीवन को
पिया नहीं उसने मृत्यु को.....!

मृत्यु से छुटकारा और जीवन से राग
सुख को देहरी का जलता दिया बनाया
दुख को जलाया खेत में कूड़े के संग
सुख को पकड़ा दुख को छोड़ा
ईमान छोड़ा अपनों को छोड़ा खुद को न छोड़ा
बीत गया आधा जीवन कोई न पहचाना
ये रंज मेरे भीतर तक पैठ गया है !
****
घनघोर आत्मीय क्षण

जब जब हारी खुद से आई तुम्हारे पास
मेरे जीवन का चौराहा तुम
रास्ते निकले जिससे कई कई !
वो कौन सी फाँस है चुभती है जो जब तब
डरती हूँ अब तुमसे मिलने और बतियाने से
मिलेंगे जब हम करेंगे बहुत सारी बातें
धीरे धीरे जब हम
घनघोर आत्मीय क्षणों में प्रवेश कर जाएँगे
तब सकुचाते हुए पश्‍चाताप करते हुए
तुम सच बोलोगे
छल हँसेगा तब कितना
कपट नाचेगा ईर्ष्या करेगी सोलह शृंगार
मैं तुम्हें प्यार करती हूँ तुम मुझे छलते हो
भोले प्यारे कपटी इंसान
प्यार और छल रह नहीं सकते एक साथ
क्यों छला तुमने मुझे इतना
कि
तुम्हारा ही कलेजा छलनी हो गया !
___________
('घर-निकासी', 'पानी का स्‍वाद', 'अंतिम पंक्ति में', तीन कविता-संग्रहों की कवि नीलेश रघुवंशी की ये ताज़ा कविताएं हैं, जो उन्‍होंने सबद के आग्रह पर ख़ासतौर पर भेजी हैं. आपको बता दें कि यह हिंदी की ब्‍लॉग-दुनिया में नीलेश की पहली उपस्थिति है.)
8 comments:

अकविता के इस दौर में इन कविताओं ने गले तक रोमांचित कर दिया.


सही और सार्थक विवेचना के लिए आपका धन्यवाद /


बेहद नाज़ुक कविताएं...

एक अर्से बाद कविताएं पढ़ने को मिली...

क्या गज़ब की दृष्टि है...


नीलेशजी का ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है..
नीलेशजी को प्रस्‍तुत कर आपने एक बहुत महत्‍वपूर्ण कार्य किया है...
उनकी कविताएं मुझे हमेशा से अपील करती रही है. समकालीन युवा पीढ़ी के कवियों में उनकी एक विशिष्‍ट पहचान है. प्रस्‍तुत कविताओं के लिए भी बधाई...


fan of ur writing maam. :) aman


नीलेश जी ..मै.सिर्फ एक समर्पित पाठक और आपकी प्रशंशक...भोपाल की ....पर ''कुछ नहीं''होने के बावजूद एक स्त्री होने के नाते गर्व तो शायद कर ही सकती हूँ ...कवितायेँ यदि स्वयं को हमारे ज़ेहन कि संवेदनाओं/आक्रोश के साथ साझा करती हैं, पढते हुए यदि द्रष्टा की हैसियत से सम्पूर्ण घटनाक्रम आंख से होता हुआ दिल तक ठहर जाता है , पात्रों के बीच कहीं खुद को टहलता हुआ-सा पाते हैं निरंतर,..तो ऐसी कविताओं के लिए ''प्रशसनीय ''शब्द थोडा हल्का लगता है मुझे...ये कविता नहीं सिर्फ कुछ शब्द हैं जिन्हें निचोडकर आत्मा को भिगोने का जतन ,,''अच्छा बुरा ''कि परिधि से इतर...
वंदना


क्या कहूँ .................निह्शब्द हूँ ........वहीं पहुंच गयी हूँ जहां से नीलेश ये भाव कागज़ पर उतारे हैं


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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सम्‍मुख - 1

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