Sunday, April 11, 2010

पीयूष दईया की दो कविताएं

गीत चतुर्वेदी के लिए लिखी जा रही
एक काव्य-श्रृंखला से दो कविताएं


जब मैं कविताएं पढूं


देखना
जब मैं कविताएं पढूं
तब सभागृह में कोई न हो
जैसे भाषा या जीवन में

पढ़नेवाला
तो कत्तई नहीं
और सुननेवाला कल्पना तक से बाहर

और दर्शक भी
न रहे

आत्मा
जब मैं कविताएं पढूं

लिखता हुआ मिलूं
****
जाल जुलाहा

जाल जुलाहा
अकेला

जागा
अपने लिए

सारी आंख
जहां कोई पक्षी नहीं है

एक पिंजरा आकाश में
सीढ़ी है

गए फूलों से
वहां

या बारिश में गिर
एक बच रहा

है
जाल जुलाहा
****
( पीयूष दईया ने सबद पर इससे पूर्व भी हकु शाह के साथ अपनी बातचीत छपाई है. वह अब पुस्तकाकार ''मानुष'' नाम से आ चुकी है. इसके अलावा चित्रकार अखिलेश के साथ उनकी बातचीत ''अखिलेश : एक संवाद'' नाम से छपी है. वे लम्बे अरसे से कविताएं लिखते रहे हैं और उन्हें बहुत कम छपाया है. मेरे मालूमात में अब जाकर उनकी कविता पुस्तक ''चिह्न'''नाम से छप रही है. सबद पर शीघ्र ही उनकी लिखी हुई कथाएं छपेंगी. उन्हें हाल में कृष्ण बलदेव वैद फेलोशिप दी गई है, जिसके लिए बधाई! गीत चतुर्वेदी पर लिखी अपनी ये कविताएं उन्होंने गीत की एक अत्यंत श्रेष्ठ कविता ''उभयचर'' के सबद पर प्रकाशन के अगले ही दिन बड़े प्रेम-भाव से भेजी थी.)   

12 comments:

Suman said...

nice

Udan Tashtari said...

दोनों रचनाएँ पसंद आईं...

ssiddhant said...

pyaari kavitayen, pahli to aur bhi pyaari.
shubhkaamnayen.

Ssiddhant Mohan Tiwary
Varanasi.

alok putul said...

इन कविताओं में बारिश के-से अहसास हैं. कहीं गहरे तक भिगोती हुई. गीत जिंदाबाद. जिंदाबाद कि आपके बहाने यह कविता आई.

Anonymous said...

आत्मीयता के एहसास से भरपूर दोनों कविताएं अच्छी लगीं। गीत की लम्बी कविता भी पसंद आई।

-देवमणि पाण्डेय

Sadan Jha said...

एक बहुत गहरे एकांत की चाह लिये दोनो ही कविताओं में मुझे रिक्तता का बोध एक अजीब किस्‍म के फैलाव को लिये हुए मिला। अजीब इसलिये कि यहां शुन्‍यता कोई गणित जन्‍य नही, भाव-जन्‍य है। यह आश भी है और चुभन भी, संकुचन और विस्‍तार दोनो ही के साथ खेलता, दोनो ही को तलाशता।

Dadu said...

इन कविताओं ने पच्चीस साल पहले पढ़ी एक कविता की इन पंक्तियों को ताजा कर दिया।
" दार्जिलिंग के अपने होटल की खिड़की खोली तो मन मान से भर उठा, प्रकृति ने मेरे बिना ही यह आयोजन कर लिया! "
गंगानन्द

Rajendra Swarnkar said...

गहरे भाव बोध के साथ सधे शब्दो की कहन
पीयूषजी को बधाई !

सबद… परिवार केमित्रों से गुजारिश है
संभव हो तो
कृपया निम्न लिंक द्वारा सृजनगाथा पर
मेरी रचना इंतज़ार है …
पर आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया दे ।
http://www.srijangatha.com/Geet1-15Apr_2k10
आभार सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार

ओम पुरोहित'कागद' said...

bhai pius daiya,
jai ho!
geet chaturvedi ke liye likhi aapki dono kavitayen achhi lagi.mujhe aapka kavita shilp bahut ruchta hai.badhai ho!
aajkal kya karte ho?
kahan rehte ho?
mere blog par bhi padharo-
www.omkagad.blogspot.com

डॉ. मनोज मिश्र said...

दोनों पसंद आईं.....

हर्षिता said...

दोनों रचनाएं काफी अच्छी हैं।

शरद कोकास said...

अच्छी हैं ।