Sunday, April 04, 2010

सबद पुस्तिका : ३ : गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता



( हिंदी में उपलब्ध लंबी कविताओं की सूची में गीत चतुर्वेदी की इस लंबी कविता को सिर्फ आकार-प्रकार की वजह से शामिल कर उसके बने-बनाये निकष की सहायता से पढ़ना खासा असुविधाजनक होगा. इसमें ''एक साथ जाने कितने युग चल रहे हैं : पृष्ठ पर मुख्य युग का पाठ है : पृष्ठभूमि में कितने तो पढ़े हुए और भूल चुके भी पाठ हैं''. गीत इन युगीन सच्चाइयों को जिस असम्बद्ध किन्तु आतंरिक प्रयोजन से इस कविता में उपलब्ध करते हैं वह विशिष्ट है. अभिव्यक्ति के खतरों को उठाने की जो नेक सलाह मुक्तिबोध कवियों को दे गए हैं, गीत जैसे कवि उन पर गंभीरता से अमल करते रहे हैं. इस लिहाज से ये सब सगोत्रीय हैं. यह प्रसन्नता का विषय है कि सबद पर तुषार धवल और व्योमेश शुक्ल की पहली लंबी कविताएं छपने के बाद गीत की भी पहली लंबी कविता छप रही है. कलाकृति- हेलेना नेलसन रीड की है. यह कविता सबद-पुस्तिका की तीसरी प्रस्तुति है. इससे पहले विष्णु खरे और कुंवर नारायण का लेखन इस खंड में प्रकशित हो चुका है. )



उभयचर
(चेस्वाव मिवोश और विष्णु खरे के लिए)
1
दुख भरा था तुममें दुख से भरा यह जग था
इस जग का तुम मानते नहीं थे ख़ुद को फिर भी दुख था जो तुम्हें अपना मानता था
और इस जग को क्या फिकिर कि तुम उसे अपना मानो न मानो
सो दुख था बस जिसे तुम्हें मानना था अपना दुख से भरे इस जग में
सुख को छूना दरअसल नष्ट होना था नष्ट होने का सुख भी इतना प्रतिबंधित था
कि कठोर दंडों का प्रावधान था कि किसी भी वस्तु को पाने की इच्छा जाती रहे
इससे हुआ यह कि जो पास था उसका मोल जान लिया इससे
अपमान जो झेले थे उनको भूल जाने का संकोच नष्ट हुआ

2
ऊंची कूदों तेज़ जिरहों दौड़ती गाडिय़ों के बीच मैं घुस न सका गोलियों और गालियों के बीच ना पहुंच पाया
बल को प्रदर्शन चाहिए होता है हमेशा भुजाओं की मछलियों ने बताया मुझको
मेरे युग में सुख पोर-भर की दूरी पर थे पोर-भर भी डूबे जो उनमें वो धन्य हुए
पंद्रह साल पहले मैं चुपचाप करता था प्रेम आज चुपचाप करने पर प्रेम छूटता जान पड़ता
अब मैं बोलता बहुत बहुत बोलता फिर भी उनकी शिकायत है ये के
जैसे-जैसे दिन चढ़ता है मुझ पर चुप्पी चढ़ती जाती है
इस तरह बहुत बोलने को बहुत चुप रहने का समार्थी ही जाना उनने
हर वक़्त जानना चाहा कि कौन हूं मैं जो कभी उनके तंबुओं की तरफ़ नहीं आया
जब कहा उन्होंने सत्य के बहुत क़रीब मत जाओ सूर्य के भी रहो उन जीवों की तरह जो जाने किस ब्रह्मांड में रहते आए
भूख भय ख़ुशी प्रेम आवश्यकता नहीं शौक़ हों जिनके लिए
मैं ख़ौफ़ज़दा उनसे भागता छिपता फिरता रहा
यूं अपना क़बीला बचाया मैंने उनसे नूह की कश्ती में भरोसे की कहानी पढ़
सच कहूं क्या सच में बचा भी पाया कि यहां कोई आबादी नहीं दिखती मेरे पास
फिर भी जो बची वह निर्जनता है और जन की स्मृति भी जन को जनने में मददगार होगी ही
बस मैं डरता हूं कि मेरी स्मृति कब तक रहेगी मेरी ही
यह जो भय का छाता है यही मुझे बचाता है
और इसे पहचाने बिना मैं तुम्हें धन्यवाद करता रहा भगवन!

3
जो जीवन में सहा वह कहां कहा जो नहीं सहा उसकी इच्छा कर ली
संसार का सारा दुख मैं झेलूं यह कामना ही
घृणित है वैसी ही विश्वविजयी होने की कामना-सी
मैं उभयचर प्रेम और घृणा में रहता बराबर घृणित कामनाओं का प्रकाशपिंड भी
वह आलू खाता हूं जिसमें केकड़ों के गुणसूत्र भरे
चौवन साल बाद मेरी नस्लों में केकड़े होंगे जाने कब से केकड़ों को अपना भाई कहता आया मैं
इसी उम्मीद में क्या?
जब कहता हूं अठारहवीं सदी में मनुष्य के आकार की एक लिपि हुई थी
पढऩे में माहिर अंग्रेज़ भी जिसे पढ़ ना पाए थे
मेरे पढ़े-लिखे यार-दोस्त समझते हैं कुछ नया पढ़ा रहा हूं इन दिनों
तुम्हारी पीड़ा की कल्पना करना तुम्हें पीड़ा देने से बेहतर है
सुख भले दोनों में एक-सा हो सुख की परिभाषा तो कभी भी एक ही रही नहीं
फिर भी मैं कहता हूं हमारी कल्पनाशक्ति की सबसे बड़ी असफलता
है कि हम युद्ध करते हैं जब भी हमारा इस या उस तरफ़ होना होता है सज़ा देने वाला बनना होता है
एक ऐसी फ़सल का बोना होता है जिसमें बालियां नहीं होतीं सुंडियां ही बस
एक दिन मैं भूल जाऊंगा क्योंकि यही मेरी प्रकृति है लेकिन मैं क्षमा नहीं दूंगा
क्षमा देने से सत्ता बनती है समभाव नहीं
उदात्तता नहीं क्षुद्रता की स्थापना की राजनीति है यह
सो हम दोनों ही ग़लतियां करेंगे उसके लिए न लड़ेंगे न माफ़ ही करेंगे
कुछ यूं करेंगे एक-दूसरे का परिष्कार हम
इसीलिए जब भी मैं पीड़ा की बात करता हूं उसमें कल्पना भी मिलाता हूं
कुछ तो कम हो ही जाती है इससे ख़ालिस वह मेरी अपनी नहीं रह जाती
किस गुरु से सीखा मैंने यह उद्घोष:
पीड़ाओं को उनकी औक़ात बता दूंगा एक बार लिखकर उनको ख़त्म कर दूंगा

4
बहुत टूटकर प्रेम किया था मैंने एक बार। बाहर आया प्रेम के दिनों से तो पाया मेरे सिवाय कुछ न टूटा था। ठीक ऐसा ही कहा था उसने जिससे मैंने प्रेम किया था। टूटना ही अंतिम सत्य है यह जीवन का फ़लसफ़ा रहा नहीं फिर भी टूटने के बाद हम दोनों ने ही प्रेम को क्यों बुहार फेंका? मेरे घर के पुराने एक संदूक़ में पुरानी एक बहुत माला था टूटी हुई धागे से अलग। नानी ने उसे क़रीने से संभाल रखा था। जब भी संदूक़ से वह कोई सामान निकालतीं, माला के कुछ दाने गिर पड़ते थे ज़मीन पर, किसी साड़ी दुपट्टे शॉल या पुराने काग़ज़ में अटके हुए। उन्हें बीनते हुए नानी याद करती थीं उस माला को जिसके टूटने की कहानी उन्होंने कभी नहीं बताई, लेकिन यह बताया बार-बार कई बार सैकड़ों बार कि अगली बार हाट से वह मोटा धागा ले आएंगी, फिर इस माला को उस नए धागे में पिरो देंगी। इस तरह, अपनी तरह, नकार देंगी कि टूटना ही अंतिम सत्य है। यह ज़बर्दस्ती की कल्पना ही होगी, नज़ाकत के स्वांग से भरपूर कि वह माला नानी के किसी प्रेम की टूटन रही होगी। उनके मरने के काफ़ी समय बाद हमें याद आई थी वह माला, जो संदूक़ में नहीं थी। कहीं भी नहीं थी ऐसा तो नहीं कह सकते क्योंकि हमारी स्मृतियों में तो थी ही, और नानी की भी मृत्योपरांत स्मृतियों में जो उनकी जल चुकी अस्थियों की बुझ चुकी राख में से झरती किसी डेल्टा प्रदेश में किसी पेड़ या फ़सल की जड़ में जल के तंतुओं से चिपकी होगी। उस दिन मुझे लगा था कि नानी ने वह धागा पा लिया होगा। न भी पाया तो क्या सारे दानों को साथ ले गईं होंगी और जो कहीं फिर से बिखर गए दाने, तो कहां-कहां बीनती फिरेंगी वह उन्हें? मैंने अपनी मालाओं के दाने कभी नहीं सहेजे, इसीलिए जो छिटके हुए दिखते हैं मुझको कपड़ों से आलमारी से किताबों के बीच बिखरते, मैं अक्सर ख़ुद से कहता हूं ये मेरी नानी की टूटी माला के दाने हैं

5
दुर्भाग्य के दिनों में सुंदरता की फि़क्र करना कला से ज़्यादा जिजीविषा है
हमारे जीवन में ज्ञान का सबसे बड़ा योगदान कि वह हमारे दुखों में अकल्पनीय इज़ाफ़ा करता है
मुझसे छीनी गई पहली चीज़ थी मेरा आध्यात्मिक विवेक उसके बाद छिनी चीज़ों की फ़ेहरिस्त ही न बना पाया
फिर ऐसा कुछ भी न बचा बची जिसकी मुझमें इच्छा हो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ करता था जिसकी मुझमें इच्छा न रही
इतने बरसों से मैं ठीक वैसा ही हूं अपने आप जैसा इसका कोई अफ़सोस न रहा
कितने दिनों से अंदाज़ा नहीं कि मेरी पिंडलियां शरीर के किसी काम भी आती हैं
मैं एक प्रतिध्वनि बना रहा जिसे अपने उत्स का भान नहीं दीवारों पहाड़ों घाटियों से टकराता और दोगुना होने के भरम में आधा होता जाता
आंख के भीतर पानी वैसे ही छटपटाता है जैसे कट गए बकरे के अंग
अत्याचार सहने में कोई तजुर्बा काम नहीं आता
मैं ऐसे बताता अपना नाम जैसे अर्थी के पीछे कोई मरने वाले का नाम बता रहा हो

6
उसी भीड में वे औरतें भी थीं जिन्हें चंगेज़ ख़ान अपने साथ भगा ले गया था जिन्हें इल्तुतमिश ने नगर की सीमाओं से बाहर खदेड़ दिया था जो अखाड़े में लड़ता देख कृष्ण को रीझी थीं जो बैबल की लाइब्रेरी से किताबें चुरा रोटी ख़रीदा करती थीं जो सड़कों पर नंगी थीं और शयनकक्षों में भी जिन्हें सड़क किनारे पा ट्रकवाले पैंट की जि़प खोलकर दिखाया करते थे पोलियो की शिकार वह किशोरी भी जिसे उसके एक परिजन ने ही गर्भवती कर दिया था। वहां रेल की पटरियों के किनारे बैठ निपट रही थीं औरतें। जब तेज़ी से गुज़रती कोई लोकल धड़ाधड़, वे उठ तुरंत खड़ी हो जातीं। सिग्नल न मिलने पर कोई लोकल अगर वहीं खड़ी हो जाए कुछ देर, तो वे औरतें भी उसी तरह इंतज़ार में खड़ी रहतीं। दूर बिना किसी ओट के बैठे पुरुष कभी खड़े नहीं होते थे। जिनके सामने लेडीज़ कोच आकर लग जाता, वे शर्माते, यहां-वहां देखते, तुरंत निपटकर चले जाते, तो कोई ऐसा भी होता, जो रगड़-रगड़कर तान लेता अपना लिंग। मेरी ट्रेन ऐसी जगहों से भी गुज़री, जहां पटरी के किनारे बने थे वेश्यालय। द्वार पर बैठी वेश्याएं लोकल से लटके लौंडों के इशारे पढ़ा करतीं। एक बूढ़ी हो रही वेश्या गोद में बैठी एक जवान लड़की के बाल काढ़ रही होती। हाफ़ पैंट पहना दो साल का एक बच्चा पीछे मिट्टी में खेल रहा होता, दूसरा रो रहा होता और तीसरा बार-बार लोकल के पहियों की तरफ़ बढ़ जाता, जिसे दौड़कर पकड़ती हमेशा एक ही औरत। एक स्त्री और पुरुष हिंसक तरीक़े से लडऩे लग जाते। एक नौजवान मग्गे से पानी उंड़ेल मोटरसाइकिल का टायर धोता। वाटर सप्लाई की टूटी पाइप से निकलते पानी से नहा रही होती एक औरत, पूरे कपड़े पहन। मेरी ट्रेन वीटी पर जाकर ख़त्म हो गई, जहां से मुझे बाहर सड़क पर निकल जाना था। वहां फोर्ट की दुकानों के सामने सुंदर लड़कियां किसी का इंतज़ार कर रही थीं। दुकानवाले एक बार माल देख जाने को बुला रहे थे। मेरी एक दोस्त एक बार बहुत रोई थी, मैंने उसे वीटी के सामने इंतज़ार करने के लिए कह दिया था। वह आधा घंटा वहां खड़ी थी और उतने में तीन बार उससे पूछा था अलग-अलग लोगों ने- चलती क्या? रोते हुए कहा था उसने मुझसे- तुम्हें इंतज़ार कराने की जगह चुनने की भी तमीज़ नहीं! मैं ट्रेनों से बहुत थका हुआ उतरता, बहुत थका हुआ ही चढ़ता था ट्रेनों में। घर आकर बिस्तर पर पसर जाता। टीवी में एक औरत कपड़े उतारती, एक खंभा पकड़कर नाचती, एक अपने वक्षों को इतनी तेज़ी से हिलाती कि उनके टूटकर गिर जाने का डर लगता। जेनेसिस ने बताया मुझे कि ईश्वर ने मिट्टी से बनाया आदम का पुतला, उसके नथुनों में हवा फूंक प्राण दिया उसे, फिर उसकी एक पसली तोड़ी और उससे बनाई दुनिया की पहली औरत। किसी ने नहीं बताया मुझे कि ईश्वर के पास मिट्टी कम पड़ गई थी क्या ईव को बनाने के लिए?
प्लेटफ़ॉर्म पर किताबों में सिर गड़ाए बैठी हैं कुछ। ये कवियों के प्रेम की शिकार महिलाएं हैं जो ख़ूब किताबें पढ़ती हैं और रोते-रोते कवियों को गालियां दिया करती हैं।

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एक ही अर्थ है भय और इच्छा का
समय आने पर दोनों दग़ाबाज़ हो जाते हैं
बीस अक्षर तक ख़र्च नहीं हुए बीस सदियां बीतने में
यहां किसी ज्ञान को प्रवेश की अनुमति नहीं गूगल के ज्ञान को चुनौती की गुंजाइश नहीं
शब्दों पर उंगली रखें उनका उभार महसूस करने के लिए नहीं उनके अर्थ को देने दिशा
शरारती शब्दकोश हैं जो यह भाषा अपने पैरों पर नहीं चलती कितौ उनकी शरारत है जो हमेशा दूसरे के पैरों पर चलते
ओ मेरी भाषा, तू गए-गुज़रों की, घृणित तबक़ों की, लुच्चे-लंपटों की है
और वे अपनी किसी चीज़ से प्यार नहीं करते
वे भी नहीं जिन्हें नमक का निबंध कहता आया मैं अमूर्तन के अपने अनगिन क्षणों में असहाय बोली-बानी में
मिले को तजने और न मिले को भोगने की इच्छाओं से मजबूर मानता हुआ

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मैं आपको 1810 की एक कहानी सुनाता हूं: इसे लंदन के पास एक गांव से हिंदुस्तान आए एक अंग्रेज़ पादरी ने 1838 में छपी एक किताब में लिखा है: वह पादरी यहां ईसाइयत का प्रचार करने और उससे पहले उसका एक रोडमैप बनाने आया था: पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक गांव में एक पंडित जी सौ साल की उम्र पूरी कर मर गए: उनके गांव में शोक था: घर में नाती-पोते-परपोते तक थे: उनकी पत्नी बरसों पहले मर चुकी थी: उनकी चिता के साथ जलने वाला कोई न था: उनके बेटों ने, पड़ोसियों ने, गांव वालों ने, जवार वालों ने उनकी मौत की ख़बर दूर-दूर तक पहुंचाई: जाने कहां-कहां से औरतें घूंघट में आईं: अपना चेहरा तक न देखने दिया उनने किसी को: एक औरत कूद गई उनकी चिता में: जलती-तड़पती वह सती हो गई: फिर दूसरी: फिर तीसरी: चार दिन तक जलती रही पंडित जी की चिता: चार दिन में सती हुईं चालीस से ज़्यादा औरतें: वे सब उस बुज़ुर्ग मृतक की पत्नियां जो सौ साल के जीवन की उसकी गुप्त आय की मानिंद थीं: जिनके बारे में कोई जानता तक न था: वे ख़ुद भी एक-दूसरे से अनभिज्ञ थीं: शको-शुबहा तो यूं भी हुआ करता है: उन पर कोई बंदिश न थी सती हो जाने की: फिर भी जो जलकर अपना जीवन ख़त्म कर बैठीं: यह 19वीं सदी के शुरुआत के उत्तर प्रदेश में महिलाओं के मुक्त होने की गाथा है या स्थानीय भाषा न जानने की अंग्रेज़ पादरी की सीमा या जयदेव की गोपियां गीत-गोविंद की किसी जर्जर पांडुलिपि से निकल वहां दौड़ी आई थीं : आप यह न समझ लें कि मैं सती-प्रथा के समर्थन में हूं: पर चार दिन में चालीस महिलाएं जब एक साथ सती होती हैं तो मिलकर चालीस नहीं बस एक सवाल खड़ा करती हैं: वे चाहतीं तो कोई जान भी न पाता उनके और बुज़ुर्ग पंडित के संबंधों के बारे में: फिर क्या आया एक साथ उन सबके भीतर ऐसा: कि वे एक पल को भी न झिझकीं सार्वजनिक जल-मरकर पंडित के प्रति अपने प्रेम की इस तरह घोषणा करने से?

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उसके मुख का तेज उसका नहीं है उसकी पतली कमर उसकी नहीं है उसकी लंबी टांगें उसकी नहीं हैं उसके देह की लोच भी उसकी नहीं वह ख़ुद नहीं जानती कि वह किसकी है फिर भी मदोन्मत्त कैसे चल रही है चली आ रही उसे नहीं पता वह खाई जाएगी या अधखाई फिंका जाएगी शोकेस में सजाई जाएगी या पताका-सी लहराई जाएगी उसको अपने मन का कर लेने दो क्योंकि उसे नहीं पता कि जिस मन को वह अपना मानती आ रही वह भी दरअसल उसका है नहीं और मानना तो सिर्फ़ एक अवधारणा होता है और अवधारणाओं की उत्पत्ति अनुपस्थितियों पर व्यापक ऐतबार के लिए होती हैं मसलन यही एक अवधारणा कि दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है और मैं बहुत ख़ुश हूं और वह लेखक इसलिए महान है कि उसे पढ़कर दुनिया की ख़ूबसूरती पर यक़ीन हो जाता है

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जो सहज है वही प्रकृति है जो अहसज वह ज्ञान
अच्छे-बुरे का ज्ञान ही हमारे जीवन का विष है
ईश्वर ने मेरे सबसे पुराने पुरखों को इसी दोष का दंड ही तो दिया था
मैं दंड से डरता हूं इस भेद को भूल चाने की चाह से भरा
भूलना ही सबसे प्राकृतिक क्रिया है याद रखने को कितने करतब करने पड़ते हैं
स्मृति का एक खंड इस काम के लिए सुरक्षित कि धीरे-धीरे सब कुछ भूल जाना है सज़ाएं ही क्यों मिलती हैं भूलने पर लेकिन
मैं हमेशा तुरपाइयों के पुल पर चलता रहा वस्त्रों के अंतरंग में प्रविष्ट होने का अरमानी
और ताउम्र खुले दरवाज़ों पर दस्तक देता रहा जिन मकानों को लोग छोडऩा नहीं चाहते थे लेकिन जान बचाने के लिए जो
बिना ताला लगाए भागे थे और फिर वहां कोई रहने नहीं आया
हम घर पहुंचने का जितना इंतज़ार करते हैं उससे कहीं ज़्यादा घर हमारा इंतज़ार करता है
तभी तो हमारी जगह कोई और आकर रहने लगे तो उसे अपनी उदास आवाज़ों से डराता है
दीवार और दरवाज़े और खिड़कियों के पल्लों में क्या बातें होती हैं कभी सुना है किसी ने
मेरे कुरते पर कलफ़ की तरह लगी हैं जीवन की दुर्घटनाएं
शर्ट का जो हिस्सा पैंट के भीतर रहता है उसके पास भी सुनाने को कई कहानियां हैं
मैं चेलो हूं वायलिन की भीड़ में अकेला रखा गया है मुझे
इसीलिए जब भी बोलता हूं बहुत गहरे से भर्रा कर बोलता हूं और संकोच में अपनी गूंज फैलने नहीं देता
बाख़ से लेकर विवाल्दी तक मोत्सार्ट से फिलिप ग्लास तक
जब भी मुझ पर उंगली रखी जाती है लगता है कोई छोटा बच्चा मेरे कपड़े खींचकर अपनी आवाज़ सुनाना चाहता है मुझे
नियति पर तो ख़ैर मुझे भी नहीं नीयत पर लेकिन सब ही को है संदेह
मैं जल में रहता हूं तो दुख की पूर्णता में और थल पर भी मैं वैसा ही हूं
रात को जिन पतंगों की आवाज़ आती है वे एक साथ मुझे दिलासा दे रहे होते हैं दरअसल

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जो अमृत पिया उन्होंने उसका असर देह पर होता है और स्मृतियों पर
स्मृतियां बग़ीचों में रहती हैं और तहख़ानों में और नाबदानों में और दस्तानों में देह जबकि कहीं नहीं रहती सिवाय पिंड और ख़ुद-ख़ानों में
उनकी देह वैसी ही रही जैसी वे चाहते थे और स्मृतियां अक्षुण्ण
हर ब्रह्मांड में ग्यारह शिव होते हैं इतने ही विष्णु इतने ही ब्रह्मा
और छोटे देवी-देवता मिडिल मैनेजरों की तरह इफ़रात में
मृत्यु ब्रह्मा की बेटी है स्मृति भी दोनों ने क्षमा किया इन सबको फिर भी क्षमा न किया
कुछ अभिशाप छद्म-वर होते हैं जैसे कुछ वर होते हैं छद्म-अभिशाप
यानी मृत्यु इन सबकी होती रहती है कल्पांत में बस मरने के बाद ये फिर जी जाते हैं ठीक वही देह पाते हैं
और इनकी स्मृतियां भी विलुप्त नहीं होतीं पूर्वजन्मों की
इतने जन्मों के बाद भी शिव भूल पाते होंगे विष्णु के हाथों अपनी पराजय और मोहिनी के पीछे की अपनी लालसा से गतिवान दौड़
विष्णु अपने अवतारों के सभी कामों का स्पष्टीकरण ख़ुद से दे पाते होंगे या क्षीरसागर के दुर्लभ एकांत में शर्मिंदा होते होंगे
न भूल पाने के अभिशाप से ग्रस्त ये अमर देव रुआंसे कभी झुकते होंगे ब्रह्मा की बेटी स्मृति के चरणों में
और कहते होंगे- लौट जा ओ स्मृति, अब तो महापराक्रमी मेरे शारंग धनुष ने भी अपनी टंकारों को भूलना शुरू कर दिया
चेयरमैनों-मैनेजिंग डायरेक्टरों-राष्ट्राध्यक्षों की तरह काम से ज़्यादा मनोरंजनों में व्यस्त लगातार
अदना कर्मचारियों को उनके पहले नाम से पुकारते याद के ये धनवान
उन वादों को हमेशा भूल जाते जो उन कर्मचारियों से किए थे उन्होंने मंझोले देवों से निरीह भक्तों से आस में डूबी शाकों से
सुनसान में हज़ारों बरसों से खड़े पेड़ों से जो अपनी बेनूरी में भी हरे से भरे हैं
हिंदी के पो-बिज़ में हमेशा दुत्कारे जाने को अभिशप्त कुछ विषयों बिम्बों रेटरिक जैसे
उनके वादों को क़दमताल पर गुनगुनाना छोड़ो वे हारे हुए अपनी अमरता से
पेड़ो, सावधान हो जाओ तुम्हें हरा रखने की जि़म्मेदारी अब कॉर्पोरेट्स ने ले ली है

12
उसको इस तरह देखना कि फिर वह मुझे ही देखती रहे बार-बार
इस तरह पलटना हज़ार सफ़ों की किताब जैसे हज़ार परों वाला परिंदा उडऩे को टालता
बड़ी सावधानी से सीढिय़ां चढऩा उसे तरक़्क़ी मानना
पानी कहते ही ठंडक का आभास होना न ही अपनी-पराई प्यास का
ख़ुद को सीमित रखना एक ही ईश्वर एक ही साथी एक ही विश्वास एक ही विचार एक ही अवस्था तक
निष्ठा की एकरसता में बहुलता की ध्वनि नहीं होती
अभय-अरण्य में भय का अभिशाप
मुझमें अर्थ मत खोजना मैं किसी प्रतीक में प्रविष्ट हो नष्ट नहीं होना चाहता
यह भी एक ग़लती ही ऐसी कोई ग़लती बची नहीं जो मैंने न की हो
जीवन को फिर से जीने की शर्त बदी तो विशाल शुद्धिपत्रों को बांचते बर्बाद हो जाएंगे स्वर्ग के मुंशी
ऐसी दुनिया हो कम से कम वह जहां ज़रूरी हो किताबों को ख़र्रों को गट्ठरों को पुलिंदों को ईंटों की तरह एक-दूसरे पर लदे इंसानों को पूरा पूरा पढऩा
अंतरिक्ष के जिस हिस्से में रहता आया मैं वहां किताबों का और बाक़ी सब ही कु़छ का अधूरा होना उनके गौरव की महती शहतीर-सा रहा
पूरा होने का स्वप्न जो मिला मुझको उसे पूरा का पूरा स्थानांतरित कर दिया तुम सबमें
यह भी बस एक रिवायत के तहत
समस्त द्वीपों पर मैं ही रहता आया इस तरह अकेलापन ख़त्म हुआ द्वीपों का मेरा भी
मेरा नाम इतिहास है और इसी तरह लिखूंगा मैं आत्मकथा

13
वह देखो बैठा है अतीत का थॉमस रो अतीत के जहांगीर के दरबार में बैठा हो जैसे आज का आज के दरबार में
कैसे आंखें फाड़े देखता है बादशाह के कमर में सोने का पट्टा है गले में क़ीमती मालाएं और बांह पर बंधा याक़ूत
जो मुर्गी़ के अंडे से भी बड़ा है जिसकी चमक के आगे ओटोमान का सुल्तान भी शरमा जाए
कैसे शरमा रहा है जहांगीर इस तरह पराये एक मर्द को देखते अपनी ओर आंखें फाड़े लालसा में
कितना अमीर है यह बादशाह ख़ुद बादशाह को बादशाह से नीचे कुछ मंज़ूर नहीं
और हैरत है कि जो बादशाह नहीं वह भी कभी रिआया नहीं बनना चाहता
तू भी बादशाह मैं भी बादशाह आह रे बादशाह तेरी धन्य है उदारता
जब वह दुआ करता है हम सबका विनोद होता है
देखिए न, सारे लोग आईना हो गए हैं जिसको देखता हूं ख़ुद मेरे जैसा पाता हूं
यह मेरा भ्रम नहीं होमोजेनाइज़ेशन है यह कॉन्स्टीपेशन का ग्लोबलाइज़ेशन है

14
वह क्या अपराध था जो राजा बिक्रम से हो गया था जब वह लड़कपन में था जवानी में या प्रौढ़
किसी गुरुकुल में था जहां गुरु के प्रवचनों के बीच वह उठा था झपट मारा था उसने एक हाथ और
बग़ल से गुज़रते मेढक को दबोच निचोड़ दिया था
बित्ते-भर की मछली की पूंछ में ऐसा भारी कंकड़ बांध दिया था कि वह दस क़दम भी तैर न पाई तड़प तड़प डूब गई
या किसी सर्प की देह में कील ठोंक उल्टा टांग दिया था वृक्ष से और बेबसी भूल पक्षियों ने नोंचा था उसका मांस
क्या गुरु नाराज़ हुए थे इस पर दे दिया था शाप?
या जवानी में किसी युवती से किया था प्रेम तमाम वादों के बाद गया था भूल भूल को मानने से इंकार कर दिया था
बरसों करती रही वह युवती इंतज़ार भटकती रही जंगलों में वनों-उपवनों में नगरों में गुज़ारती दिन रात नगरपथ की धूल में लोट जाती अवसन्न
अंधेरे में किसी रथ के नीचे कुचला था उसका हाथ उसकी चोट से वह मरी थी तो क्या आह निकली थी उसके मुंह से
जो रथ चालक को न लगी सीधे बिक्रम को जा धंसी जबकि वह कहीं नहीं था चोट से मिली मृत्यु के विधान का साझीदार?
पड़ोसी राजाओं, अय्यारों, विषबालाओं, नगरवधुओं का किया टोना था या उसी युवती की आह या गुरु का शाप
कि अपने वैभव के वर्तमान में रहता राजा एक दिन सारा वर्तमान, सारा भविष्य तज देता है
और सिर्फ़ अतीत में रहने लगता है?
कौन था वह बेताल जो सिर्फ़ अतीत की बातें करता था?
क्या था बिक्रम का अतीत जो उसे हमेशा अपनी पीठ पर टांगे रहता?
क्या उन सारी कहानियों का नायक-दोषी ख़ुद बिक्रम था
या अतीत के उस समय में उसे नहीं सूझे थे उन सवालों के जवाब
जो वह एक सुदूर भविष्य में पीठ पर लदे अतीत को देता गुन लेता था
समय का पहिया सवालों के पहिए से धीमा चलता है
तो समय ख़ुद क्यों सवालों से जूझने को मचलता है?

15
मैं यहां बुद्धू जैसे एक शब्द के बारे में सोचता हूं : मैं यानी गीत चतुर्वेदी नहीं : मैं यानी तुम यानी वह यानी वे यानी हम यानी सब कुछ यानी कुछ नहीं यानी निरपेक्षता यानी सापेक्षता यानी काल यानी अ-काल यानी समय के हिसाब से बदलता अर्थ यानी अर्थ के हिसाब से बदलता समय : यानी बुद्धू : यानी बुद्धिमान : यानी यह शब्द जब बना था, तो उस आदमी का सिंगार था, जिसने बुद्ध की परंपरा में खड़े हो बुद्ध के शतांश से भी कम यानी बहुत कम यानी कम से कम बुद्धि के सम पर इतना तो ज्ञान पा लिया था कि पास-पड़ोस की दुनिया में बुद्धिमान कहलाया था : यानी बुद्धू उपनाम पाया था : और यह कोई नई रिवायत नहीं कि : उपहासों का सबसे आसान शिकार मूर्खताएं नहीं, ज्ञान हुआ करता है : तो जो बुद्धू था, उसे पास-पड़ोस वालों का उपहास झेलना पड़ा : और चूंकि ज्ञान में पलटवार करने की क्षमता नहीं होती, वह पहला बुद्धू चुप ही रहा : और भी लोग जो बुद्धू हुए तो पास-पड़ोस वाले डरने लगे उनसे : कि सारी दुनिया ही बुद्धू हो गई तो उस पवित्र धार्मिक ईश्वरीय संतुलन का क्या होगा : सो एक साथ कहा सबने : चलो जी हटो, बुद्धू न बनाओ : और इस तरह सदियों तक अलग-अलग अंदाज़ में कहा गया यह संवाद : जिससे बिल्कुल उलटा हो गया इसका अर्थ : यानी निरा बुद्धू : यानी काल यानी अ-काल यानी ख़तरों की सुंदरता को नष्ट कर दो यानी सुंदरता के ख़तरों को नष्ट कर दो यानी सुंदरता को नष्ट करके ख़तरनाक बना दो यानी ख़तरनाक को ऐसा सुंदर बना दो कि बुद्धू होकर उनमें घुसा व्यक्ति बुद्धू बनकर बाहर आए

16
बुरा भी था बहुत मैं कि चुप न रह पाता था सो भला न हो पाया किसी का वास्ते किसी के
जब भी टोकता था कि तुम ग़लत हो वे फ़ौरन वह नीतिकथा सुना देते
कि टोकने का अधिकार उसी को है जिसने कभी पाप न किया हो
इस तरह कोई टोक न पाता जो टोकता भी सो सुना न जाता इस तरह
अनवरत चलता रहा पाप का व्यवहार
मैं खोजता फिरता उस चतुर सुजान व्यापारी को जिसने बनाई होगी यह नीतिकथा
और रणनीति की तरह किसी संत के नाम पर बेच दी होगी
(यह खोजना भी तभी जायज़ जब मैंने कभी नीति की रणनीति बनाई न हो?)
मुझे यह देश बिल्कुल पसंद नहीं
और ऐसे किसी काम में मेरी साझेदारी नहीं जिससे रातोंरात मेरी पसंद का बनता जाए यह देश हो भी रहे हों ऐसे और संभव है कि मैं शामिल भी हूं
एक दिन इसे छोड़कर चला जाऊंगा ऐसा तो पता नहीं पता है यह ज़रूर मुझे छोड़ चुका है यह देश छोड़ता और हर रोज़ धीरे-धीरे तेज़तर
अगर मैं विरोधाभासों से भरा हूं तो भरा हूं
कम से कम भरा तो हूं
अपने में हूं और तुममें नहीं तो कम से कम हूं तो नहीं भी तो हूं ही

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मुझे नहीं पता कौन गा रहा था
मैं सुरों आलाप ठेके और ताल के बीच अनियमित पदचाप सुन रहा था
जैसे काफ़्का को घबराहट होती थी प्राग की ज़मीन के नीचे कोई चलता रहता है लगातार
और चीज़ों से टकराता है उसका पैर तो ख़तरनाक आवाज़ होती है
मैं मेड़ों पर चुपचाप चल रहा था
गाने की आवाज़ सदियों पुराने एक अतीत से आ रही थी
यही अहसास क्या कम सुखद था कि अतीत में गाना भी था
यह एक दिन मेड़ों पर चुपचाप चलते हुए जाना मैंने
क्या फ़र्क़ पड़ता है कि कौन गा रहा था फ़र्क़ इससे है कि गाना था

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पवित्रता का आग्रह हिंसा से भरा है सत्य और मौलिकता का आग्रह भी
अभिनय एक गुण-सा गुणसूत्रों में विकसित हुआ तो
हिंसा की संभावनाओं को न्यूनतम बनाने के वास्ते ही
मैं हिंदू हूं और अन्याय सहना मेरी ऐतिहासिक आदत है
जैसे 20वीं सदी में यहूदी होना पाप था 21वीं में मुसलमान
मध्ययुग की सदियों का पाप मैं इक़बालियों बयानों और तोहमत लगाने की अर्जी़ अग्रिम नामंज़ूर है जिसकी
एक अन्यमनस्क त्रिज्या अपने कोणों का बहिष्कार कर केंद्र से हटती है और अपने प्रतिरोध में गौरवान्वित जिस भी बिंदु पर टिकती है
उसे एक नए केंद्र में तब्दील कर देती है बजाए अपने त्रिज्या होने को तब्दील कर देने के

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अभी-अभी सुबह हुई है यह समय सुबह से बहुत दूर है
अभी-अभी घर पहुंचा हूं यह जगह घर से बहुत दूर है
अभी जो सपना देख रहा हूं वह उन सपनों की संतान है जो अभी-अभी मरे हैं
सपनों के वैधव्य का विलाप है जिसमें रुंध जाती है कहीं पहुंचने की मेरी गति सुनने की शक्ति
जिसका शरीर 19वीं सदी के रूसी उपन्यासों की तरह था
वह औरत बरसों पहले मर चुकी है जिसे खोजता मैं यहां तक आया
वह अभी-अभी यहीं एक बच्चे की उंगली पकड़ सड़क पार करना सिखा रही थी
यह उस औरत ने बताया अभी-अभी जो यहां थी ही नहीं कभी
दूसरों से आदमी होने की उम्मीद वही करता है जो ख़ुद कभी आदमी नहीं हो पाया
लगातार इसके क्षोभ में रहता है
मनुष्य होने के लिए कलाओं की ज़रूरत नहीं जितनी अ-मनुष्य होने से बचने के लिए
उसने कहा तुम जैसे हो वैसे ही रहो मुझे आज तक समझ नहीं आया क्या और कैसा हूं मैं तो कैसे रहूं किस तरह
सिर्फ़ इतना कह सकता हूं
तुम्हारे लिए जो कविताएं नहीं लिखीं मैंने वे कविताओं से ज़्यादा हैं
जो संगीत नहीं रचा मैंने वह संगीत से ज़्यादा है
जो वचन मैंने नहीं निभाए सो इसलिए कि हमारे बीच सब कुछ ख़त्म न हो जाए
तुम तकाज़ा करती रहो और गुंजाइशें बची रहें

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जब मैं कहता हूं कि अठारहवीं सदी में मनुष्य के आकार की एक लिपि हुई थी जिसे लोग तीतू मियां कहते थे : तो पढऩे-लिखने के शौक़ीन मेरे दोस्त मानते हैं : कि कुछ नया पढ़ा रहा हूं इन दिनों : मैं उसे नहीं जानता आप भी नहीं जानते और हद है कि साला गूगल भी नहीं जानता : इंटरनेट पर मैं जैसे बैठता हूं ठीक वैसे ही अपनी लाइब्रेरी में कभी बैठते होंगे बोर्हेस : और इसी तरह मनुष्य के आकार की लिपियों को पढऩे की कोशिश में खो दी होगी उन्होंने दृष्टि : बायोग्राफिए बताते हैं कि उनके पिता ने भी वैसे ही खोई थी : उनके पिता भी कुछ वैसी ही गुप्त कोशिश कर रहे थे शायद : कुछ कोशिशों की आनुवंशिकता मिटाए नहीं मिटती : जैसे मेरा एक पुरखा रीवा की रियासत में फ़ारसी में शेर पढ़ता था : मेरा परदादा संस्कृत में श्लोक बुना करता था : मेरा दादा फि़ल्मों में गीत लिखने के लिए भागकर मुंबई पहुंचा था : मेरे पिता फाउंटेन पेन से लिखी कविताओं की कापी में पानी से फैल गए अक्षरों को याद करने का प्रयास करते हैं : मैं अपनी कविताओं को खोने से बचाने के लिए हार्ड डिस्क पर नहीं रखता, ई-मेल पर अपलोड कर देता हूं : इस तरह हम सब कविता की एक आनुवंशिक कोशिश में रहे : और हम सब असफलता की आनुवंशिकता को प्रसारित करते रहे : और असफलता ही मात्र ऐसी वस्तु है जीवन में जिसे चुना नहीं जा सकता : तीतू मियां भी नहीं चुना करते थे : यह 1790 के आसपास का चरित्र है जो बंगाल का एक मशहूर पहलवान था : ज़मींदारों के बीच उठना-बैठना प्यारा शग़ल था : और ज़मींदारों में अक्सर झगड़े होते थे : जिस तरफ़ हो जाते तीतू मियां उसका जीतना तय था : तो जीत के लिए उन्हें अपनी ओर करने की भरपूर कोशिश की जाती और कई बार तो झगड़ा ही इसी कोशिश के कारण होता : ऐसे ही अदला-बदली के एक खेल में उन्हें जेल हो गई : जेल से छूटकर आए तो उन्होंने ख़ुद को बहुत बूढ़ा महसूस किया और हज पर चले गए : लौटते हुए वहाबियों से उनकी मुलाक़ात हो गई और 1857 से भी साठ साल पहले उन्होंने अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ विद्रोह कर दिया : वह चाहते थे कि उनके पुराने ज़मींदार साथी भी उनकी तरफ़ हो जाएं लेकिन उनका विद्रोह धीरे-धीरे किसान विद्रोह में परिवर्तित हो गया : और ज़मींदारों की संभावित दिलचस्पी जाती रही : सो वे ज़मींदार जो उनके इस या उस तरफ़ होने-भर से लड़ाइयां हार जाया करते थे : इस बार मिल-जुलकर उनके खि़लाफ़ हो गए और सिर्फ़ अपने इधर या उधर हो जाने-भर से लड़ाइयां जीत लेने वाले तीतू मियां जब किसानों की तरफ़ हुए तो लड़ाई हार गए : इतिहास हमेशा भाग्यवाद की उत्पत्ति करता है और इतिहास दरअसल ख़ुद भाग्यवाद के सिवाय कुछ नहीं होता : तो तीतू मियां की जीतें जिनका कोई ख़ास जि़क्र इतिहास में नहीं मिलता वे भाग्य की उत्पत्ति मानी जाती थीं : और जो उनकी हार थी जिसका कोई ख़ास जि़क्र इतिहास में नहीं मिलता वह उनकी भाग्यविधाता बन गई : हारने के बाद तीतू मियां किस ओर हुए : और जिस ओर हुए क्या उस ओर की जीत हुई थी : ऐसा कोई सवाल गूंजता ही नहीं क्योंकि उस आखि़री हार ने उनका मिथक तोड़ दिया था : जिस उम्र में यहां या वहां हो सकते थे उस उम्र को उन्होंने मौज में उड़ा दिया : और एक तरफ़ होने का उनका आखि़री फ़ैसला कितनी देर से आया उनके जीवन में : तीतू मियां ख़ुद किस आनुवंशिकता से आए यह नहीं पता : लेकिन वे सारे लोग जो देर से जागते हैं वे सब तीतू मियां की आनुवंशिकता के उत्तराधिकारी हैं यह बात शिद्दत से महसूस होती है मुझे : जो यह नहीं समझ पाते कि टूटना मिथ की नियति होती है : एक मिथ हज़ार दूसरे मिथों की रचना करता है :

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मैं किसी प्रतिस्पर्धा में रहा नहीं इसीलिए सबसे आगे रहा
अकेला भी क्योंकि उन दिशाओं की ओर जाना नितांत अकेला होना था
मेरी भाषा में उत्साह का अर्थ हमेशा निद्रानिमग्न मुस्कान था
जागृत गतिशील हड़बड़ाहट को मैं उत्साह के नाम से कभी पहचान न पाया
मेरे सीने पर हाथ रख सांस को महसूस करने में धर्मभ्रष्ट होता था उनका
सो दूर से ही देखकर उन्होंने घोषणा कर दी
यह एक मुस्कराती लाश है जिसमें सोई हुई हड़बड़ी तक नहीं
भुरभुरी मिट्टी के नीचे दब जाने की या महीन जल की धारा में बह जाने की
रह जाने की इस रहनशील दुनिया में रहना है तो सहना है इसीलिए रहन-सहन जैसा युग्म बना
जहां जीने के लिए उत्साह ज़रूरी माना जाता असल में ज़रूरी क्या था
यह वे भी न बता पाए जिन्हें किताबों के ब्लर्ब में सबसे ज़रूरी कहा गया
जो कहा गया था उसमें यक़ीन किया भी नहीं मैंने मसलन बुज़ुर्गों का सम्मान करो
बार-बार कही गई यह बात
बात मानो उनकी जो तुमसे प्रेम करते हैं
गोकि यह शर्त थी न मानने पर जिसे प्रेम ख़त्म हो जाता
तो हो जाए वह प्रेम ही क्या जो तुला हो अपनी बात मनवाने पर
मैं मानता न मानता पर सब मुझे हतोत्साहित लाश मान चुके थे
मुझे गाड़ा गया तब भी मेरे चेहरे पर उत्साह थिरक रहा था
जब मैं नींद में होता हूं अपना चेहरा देख सकता हूं

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अच्छी चीज़ों से जुड़ा सबसे बड़ा विकार है कि उन्हें इतनी बार दुहराया जाता है
कि उनका होना एक मामूली होना हो जाता है कि उनकी अच्छाई एक उबाऊ अच्छाई में बदल जाती है
इस तरह एक दिन उनके अच्छा होने को मानना इंकार कर दिया जाता है
जो बार-बार सुनना चाहते हैं कि मैं अच्छा आदमी हूं, वे दरअसल अच्छेपन की परिधि से बाहर बैठते हैं
मैं अपनी नींद के सिरहाने बैठ स्वप्न लिखता उनकी वर्तनियां दुरुस्त करता व्याकरण को जांचता खुला छोड़ता
और मुंह में फूंक मार उनमें जीवन भरता
सारे स्वप्न जीवन थे और सारा जीवन स्वप्न था
सारी प्रज्ञाएं दरअसल विशाल प्रकाशपिंडों से फूटती अंधेरे की किरणें थीं
मेरे स्वप्नों की मृत्यु हो गई है मेरी रातें विधवाओं-सा विलाप करती हैं
मेरी इच्छाओं को लगभग पंगु बनाते हुए
मेरे भीतर भय की पुस्तिकाएं हैं वायु का खंड-काव्य खंडित काव्य
जल का श्लोक निर्जलता का शोक
उस लाश की आंखें खुली थीं जैसे कोई कंप्यूटर को शटडाउन करना भूल गया हो
दुख का प्रपात अवसाद का बोगनवीलिया थोड़ा गुल था थोड़ा आब
जाने कौन-सा वायरस है जो उदासी में घुसता है उदासीन बना देता है
वे फूल जिनकी प्रजातियां लुप्त हो गईं इसलिए कि हमने उनके जैसा होने की कामना बंद कर दी थी

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नहीं यह कोई परिकथा नहीं थी
उसका धड़ घोड़े का था पूंछ श्वानों-सी लिंग था विशालकाय और दूध से भरा थन भी लटका हुआ था
वह ऐसा उभयलिंगी ख़ुद ही नर था मादा भी महान काम-क्षम वह पतली कटि का सुंदरी
वह कर्म-भीम हज़ार हाथों का काम अकेले करता दौड़ता सरपट सुपर सोनिक विमानों से तेज़ उड़ता
वह अपनी प्रजाति का पहला था जिसकी व्यापक उत्पत्ति के लिए सरकार की मंज़ूरी दरकार थी
तब तक वह एक तस्वीर में हर दीवार पर टंगा हर कंप्यूटर पर स्क्रीनसेवर बन टहलता प्रतीक्षारत
वह बीटी मानव था जेनेटिकली मॉडीफाइड मानव-प्रजाति जिसमें
सैकड़ों अनुसंधानों के बाद जीन्स की सही मात्रा मिलाई गई थी बीसियों पशुओं से निकाल
नहीं यह कोई परिकथा नहीं थी फंतासी भी नहीं विज्ञान का चमत्कार था
मनुष्यता जगाने के बजाय मेरी पशुताओं को ही जगा रहा विज्ञान और-और पशुओं को मिला रहा मुझमें
ऐसा कहूं तो क्या यह मेरा पिछड़ा हुआ ज्ञान?
फिर भी कहता हूं यह पहले से था
यह हमारी फूहड़ अभिलाषाओं की दमित प्रजाति सिर उठा मंज़ूरी मांगती प्रतीक्षारत
मैं जितना नकारता वह उतना हुंकारता

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मेरी कार के समांतर वह लड़का ऐसी रफ़्तार से चला रहा था साइकल जैसे कार को पछाड़ देगा : मैं ब्रेक दबा गाड़ी को धीमा और धीमा करता रहा : सरसराकर आगे निकल गया वह लड़का : रहम की मेहर से खिसियाया हुआ झुक कर सुस्ताने लगा : तभी मैंने रेज़ दे दी सर्रर्र से आगे निकल आया : उसे दुबारा सांस संभालने में एक और शीत-युद्ध बीत चुका होगा : कार के भीतर शोस्ताकोविच की सिंफनी थी : कार से बाहर बीथोफ़न का बहरापन

25
इतना आसान नहीं था सीता को त्यागने का निर्णय जितना लंका को जीतना था
जिस तरह दो सीताएं थीं एक अग्नि में छिपी हुई
उसी तरह दो राम हुए हों
और चूंकि राम की अग्नि परीक्षा कभी हुई ही नहीं
सो कभी लौट ही न पाया हो अग्नि में छुपा दूसरा राम
ऐसे ही मैं जो यहां बैठा हूं दरअसल मैं हूं ही नहीं एक और मैं था जो किसी समय जाकर आग में छुप गया
और अब बुलाने पर भी आ नहीं रहा
ऐसे ही यह जो युग है वह युग है ही नहीं जिसे होना था वह तो कहीं आग में जा पड़ा हुआ
सो इस राम इस मैं इस युग के जो फ़ैसले हैं उस राम उस मैं उस युग के भी होते कोई ज़रूरी तो नहीं
पर यह कैसे पता करें कि उस राम उस मैं उस युग को पीड़ा होती होगी इस इस इस के फ़ैसले सुनकर
आग की ओट से झांक कर देखते हुए राज़ खुल जाने के भय से सावधान

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एक साथ न जाने कितने युग चल रहे हैं : पृष्ठ पर मुख्य युग का पाठ है : पृष्ठभूमि में कितने तो पढ़े हुए और भूल चुके भी पाठ हैं : मैं मुख्य युग को पढ़ता और दूसरी लाइन पर लगे एस्टेरिस्क को देख फुटनोट पर बसे दूसरे युग में पहुंच जाता : फुटनोट में भी एस्टेरिस्क लगे हैं : जिन्हें खोजता मैं अनुषंगिका में चला जाता : वहां से कालक्रम और समय-निर्देशिकाओं में : फिर कोई एस्टेरिस्क पहुंचा देता अनुक्रमणिका तक : वहां से लौटता यह सोचते हुए कि किस युग में था मैं : कहां से शुरू किया था युगों के पाठ का यह सफ़र : जो तय है कि ऐसे ही चलेगा : तो बताओ, ऐसा, कैसे चलेगा

27
हम आपातकाल की संतान हैं सन 75 से 77 के बीच जन्मे हम उभयचर जो
निरंकुशता का अमूर्तन अपने भीतर ले चलते रहे सदा अराजक घोड़ों की तरह ज़मीन के उबडख़ाबड़पन को नकारते
जितना विरोध करते समझौतों के लिए भी उतना ही ख़ुद को उपलब्ध बता देते
सफलताओं का निषेध कर हम असफलता की कामना करते
और एक दिन अपनी कला में व्यवहार में प्रश्नों में जीवन में उत्तर-जीवन में घर में परिवार में बाज़ार और व्यापार में
ख़ुद को असफल घोषित कर देते
उस क्षण कोई हमें याद न दिला पाता हमने जिसकी कामना की उसे पा लिया यह सफलता से अलग और क्या है
जब हम कहते दुख है हमें हमारे भीतर आग की कई लघुकथाएं हैं जो उपन्यास बनने से इंकार करतीं लगातार
वह कौन-सी नस बंद कर दी थी कि बच्चे तो पैदा हो रहे थे जो
बरसों बाद भी जब साथ आते मुट्ठी जैसी उपस्थिति न बना पाते
विभिन्न समयों में करते रहे लोलक की तरह दोलन आंदोलन की आवश्यकता को दुहराते बुज़ुर्गों संग
हमें कोई बता नहीं पाता कि नसबंदी के तमाम अभियानों के बावजूद
अपने परिवार में पांचवीं-छठी संतान थे हम
हमारा गर्भाधान बार-बार दुहराई एक भूल के तहत हुआ था या एक सुनियोजित उत्तेजक राजनीतिक विरोध के कारण?
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10 comments:

गिरिराज किराडू/Giriraj Kiradoo said...

दिलचस्प टैक्स्ट है।

vinay vaidya said...

वाह !

कुमार अम्‍बुज said...

तो मिवोश के विष्‍णु जी के अनुवादों ने तुम पर सकारात्‍मक और सर्जनात्‍मक प्रभाव डाल ही दिया।
मुझे खुशी है।

Ek ziddi dhun said...

अनूठी कविता है. और पूरी कविता में बहुत कुछ ऐसा है जो बांधे रखता है. ऐसी बहुत सी पंक्तियाँ हैं जो सूक्तियों की तरह या किसी सादे और पुरअसर शेर की तरह सम्मोहित किये रहती हैं. वाकई ये बाकमाल कविता है और बेशक इसके हुनर पर ज्यादा कुछ तो कवि और आलोचक ही कहेंगे. मेरी हैरानी तो इसमें कई बार छलकने वाले प्रतिक्रियावाद या जनविरोध से है. मसलन : `मैं आपको 1810 की एक कहानी सुनाता हूं: इसे लंदन के पास एक गांव से हिंदुस्तान आए एक अंग्रेज़ पादरी ने 1838 में छपी एक किताब में लिखा है: वह पादरी यहां ईसाइयत का प्रचार करने और उससे पहले उसका एक रोडमैप बनाने आया था: पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक गांव में एक पंडित जी सौ साल की उम्र पूरी कर मर गए: उनके गांव में शोक था: घर में नाती-पोते-परपोते तक थे: उनकी पत्नी बरसों पहले मर चुकी थी: उनकी चिता के साथ जलने वाला कोई न था: उनके बेटों ने, पड़ोसियों ने, गांव वालों ने, जवार वालों ने उनकी मौत की ख़बर दूर-दूर तक पहुंचाई: जाने कहां-कहां से औरतें घूंघट में आईं: अपना चेहरा तक न देखने दिया उनने किसी को: एक औरत कूद गई उनकी चिता में: जलती-तड़पती वह सती हो गई: फिर दूसरी: फिर तीसरी: चार दिन तक जलती रही पंडित जी की चिता: चार दिन में सती हुईं चालीस से ज़्यादा औरतें: वे सब उस बुज़ुर्ग मृतक की पत्नियां जो सौ साल के जीवन की उसकी गुप्त आय की मानिंद थीं: जिनके बारे में कोई जानता तक न था: वे ख़ुद भी एक-दूसरे से अनभिज्ञ थीं: शको-शुबहा तो यूं भी हुआ करता है: उन पर कोई बंदिश न थी सती हो जाने की: फिर भी जो जलकर अपना जीवन ख़त्म कर बैठीं: यह 19वीं सदी के शुरुआत के उत्तर प्रदेश में महिलाओं के मुक्त होने की गाथा है या स्थानीय भाषा न जानने की अंग्रेज़ पादरी की सीमा या जयदेव की गोपियां गीत-गोविंद की किसी जर्जर पांडुलिपि से निकल वहां दौड़ी आई थीं : आप यह न समझ लें कि मैं सती-प्रथा के समर्थन में हूं: पर चार दिन में चालीस महिलाएं जब एक साथ सती होती हैं तो मिलकर चालीस नहीं बस एक सवाल खड़ा करती हैं: वे चाहतीं तो कोई जान भी न पाता उनके और बुज़ुर्ग पंडित के संबंधों के बारे में: फिर क्या आया एक साथ उन सबके भीतर ऐसा: कि वे एक पल को भी न झिझकीं सार्वजनिक जल-मरकर पंडित के प्रति अपने प्रेम की इस तरह घोषणा करने से?` चलिए, कवि के कहे मुताबिक हम उन्हें सती प्रथा समर्थक नहीं समझते लेकिन फिर क्या आया उनके भीतर ऐसा कि वे इस सार्वजानिक महिमामंडन का लोभ संवरण न कर सके. कम से कम इस स्टेंज़ा के आधार पर कवि को मुक्तिबोध का सगोत्रीय कहना ज्यादती ही है, बल्कि वे प्रभाष जोषी के सगोत्रीय ही नज़र आते हैं.

शरद कोकास said...

अद्भुत कविता है भाई ।

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

अब कविता का मूल्यांकन करने के लिए सचमुच नए-नए औजारों की तलाश करना होगी.

राहुल राजेश said...

प्रिय गीत,
तुम्हारी लंबी कविता पढ़ी.
इतनी लंबी कविता पढ़ने का धैर्य नहीं मुझमें. फिर भी पढ़ी.
बहुत बड़ा फलक है कविता का. ढेर सारे आख्यान, उप-आख्यान, कई कथाएँ, उपकथाएँ.
कविता मन को छूती है, एक सम्मोहन पैदा करती है.
पर कविता कई बार अति गद्य का शिकार भी होती है.
एक ही कैनवास पर एक ही साथ एक ही बार में ढेर सारे रंग और शेडों का प्रयोग करने से तसवीर धुंधली भी हो जाती है.
ढेर सारे संदर्भों , सूचनाओं के समावेश से कविताई करिशमा के बावजूद कविता में बोझिलता आ जाती है
और कविता पढ़ने के बाद मन, चित्त और दिलो-दिमाग पर बस कुछ सूत्र वाक्य ही तैरते बच जाते हैं
और कविता फिसल जाती है.

हाँ, खंड १ से लेकर ५, ६ भी, ९, १० , १२ , १६, १७, २१, २२, २४ और २६ मुझे पसंद आए.
खंड १,२, ४,५, १६,१९ और २१ बहुत सुंदर खंड हैं.
खंड २६ में भाषा का सुंदर प्रयोग है.

बधाई. बहुत दिनों बाद तुम्हारी नई कविता पढ़ी.
इसे मैं कमेंट बाक्स में भी पोस्ट कर रहा हूँ.

तुम्हरा
राहुल.

बाबुषा said...

जब पहली बार मैंने यह पढ़ा..मैं लगभग बेहोश हो गयी थी..पानी पी के दुबारा पढ़ी..पर पूरी नहीं हो सकी..! उसके बाद कई बार पढ़ी..हर बार नए मायने के साथ ..! इधर देख रही हूँ कि इसे बार-बार पढ़ने में वैसा ही मज़ा आ रहा है ..जैसे अपनी पसंद की मिठाई खाने में..(चाहे कितनी ही बार मिले ! )

गीत की इस लम्बी कविता को एक छोटी आत्मकथा माना जा सकता है मेरे ख़याल से ! the shortest biography.

वंदना शुक्ला said...

गीत जी
आपकी कृतियों को पढ़ जाना शुरू से आखिर तक और समझ पाना ,ना सिर्फ एक चुनौती बल्कि एक बौद्धिक उपलब्धि और अच्छी खासी दिमागी कसरत होती है क्यूँ कि ये मस्तिष्क में प्रवेश कर जाने वाली सीधी-सपाट सड़क नहीं हैं बल्कि इसकी गूढता (गहराई)बाकायदा मस्तिष्क को खंगालती हैं कभी लहरों से उतार चढाव,कभी चट्टानों सी दुष्कर,कभी हवा सी तरल...!यद्यपि स्थापित लेखकों के विचार पढ़ने के बाद मुझे अपनी बात कहने में थोडा संकोच हो रहा है ,उसकी वजह यह भी मान सकते हैं कि कुछ जगह कविता समझ से परे खिसक गई,(दीर्घता इसके लिए निस्संदेह दोषी नहीं,)बावजूद इसके ,जितनी समझ की सीमा में रही बहुत अच्छी लगी गद्यांश बेहतरीन ....शुक्रिया अनुराग जी ...

mithilesh kumar ray said...

kavita padhate huye ek drishya me gum ho jata hun...