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विष्णु खरे की नई कविता

नई रौशनी

( नागार्जुन भवानीप्रसाद मिश्र रघुवीर सहाय के क़दमों में )

अव्वल चाचा नेहरू आए..........................................जब राहुल दुल्हन लाएँगे
नई रौशनी वे ही लाए ............................................नई रौशनियाँ हम पाएंगे

इन्दू बिटिया उनके बाद.......................................बहन प्रियंका अलग सक्रिय हैं
नई रौशनी पाइंदाबाद ..........................................वड्रा जीजू सबके प्रिय हैं

हुए सहायक संजय भाई.........................................ये खुद तो हैं नई रौशनी
नई रौशनी जबरन आई .........................................इनकी भी हैं कई रौशनी

फिर आए भैया राजीव............................................यह जो पूरा खानदान है
डाली नई रौशनी की नींव.......................................राष्ट्रीय रोशनीदान है

आगे बढीं सोनिया गाँधी ........................................एकमात्र इसकी संतानें
पीछे नई रौशनी की आंधी .....................................नई रौशनी लाना जानें

सत्ता की वे नहीं लालची.................................क्या इसमें अब भी कुछ शक है
मनमोहन उनके मशालची ............................. नई रौशनी इसका ही हक है

राहुल ने तब तजा अनिश्चय..................................जब तक सूरज चाँद रहेगा
नई रौशनी की गूंजी जय ......................................यह न कभी भी मांद रहेगा

बीच बीच में नई रौशनी के आए दीगर सौदागर
लेकिन इस अंधियारे को ही वे कर गए दुबारा दूभर

हर दफा इसी कुनबे से गरचे है नई रौशनी सारी
फिर भी अन्धकार यह बार बार क्यों हो जाता है भारी ?

इनकी ऐसी नई रौशनी में जीवन जीना पड़ता है
यह क्लेश कलेजे में जंग-लगे कीले-सा हर पल गड़ता है

क्या हमीं नहीं मिलकर खींचें अपने हाथों की रेखाएं
पहचानें नित नई रौशनी सबकी, उसे खुद लेकर आएं ?
****
(कवि ने इसपर जोर दिया है क़ि यह रचना कापीराईट के तहत सुरक्षित है और इसका किसी भी अन्य जगह किसी भी अन्य तरह उपयोग वर्जित है.)
14 comments:

नागार्जुन ही याद आ गये...

इंदु जी, इंदु जी...क्या हुआ आपको...


वैसे तो रवायत नहीं है कि सबद पर प्रकाशित होने वाली खरे जी की कविताओं के संशोधन उन पर हुई (मिली) बहसों(टिप्पणियों) से प्रभावित हो जाएँ. मगर थोड़ी-बहुत गुंजाइश भी हो तो यह कहने का लोभ-संवरण नहीं हो पा रहा है कि वरुण गांधी छूट गए हैं.


भारत भाई, आप सही कह रहे हैं. मुझे भी हैरानी हुई वरुण और उसकी मां को इस फेहरिस्त में न पाकर. अगर यह कवि से अनजानेपन में हुआ तो हैरानी की बात है और उन्होंने सुविधा के तहत यह किया तो अलग बात. वैसे यह कवि के नाम के हिसाब से बेहद कमजोर और चलताऊ किस्म की तुकबाजी (तुकबाजी की कोशिश) भर है. अलबत्ता कवि का कोपीराईट का अंदाज दिलचस्प है.


chutki to bahut si baton par li ja sakti hai dhiresh bhai... maslan isi pr ki aisi chaltau kism ki tukbazi un kavion ne bhi ki hai jinhen yh kavita samrpit hai aur jo anyatha aapke aadrniay aur priy hain...is tukbazi ka kavyshastr aap unhen padhkar kuch gun lijiye to behtar...!!...shukr hai yahan aapko kuch janvirodhi ya sampradayik nahi dikha!!!...bharat aur aap jis tark se nai roshni ke dayre men varun aur menka ko na lane par kavi ko ''bhool-galti'' ka ahsaas kra rhe hain usse yah aur spasht ho gaya hai ki kavita ki padhat me aap donon kitne aasavdhan hain...savdhani se in panktiyon ko bannchiye mitr :

बीच बीच में नई रौशनी के आए दीगर सौदागर
लेकिन इस अंधियारे को ही वे कर गए दुबारा दूभर

aur inhen bhi :

हर दफा इसी कुनबे से गरचे है नई रौशनी सारी
फिर भी अन्धकार यह बार बार क्यों हो जाता है भारी ?

kahna vyarth hai ki nai roshni ke dayre me nehru-gandhi privar ke shakti-punj se door aur dhur virodhi kheme me rhnewale menka aur varun alag se sochniy vishay hain...in kavyarthon ko aap isi na-kuch si nitant tukbazi wali kavita me bhi alakshit kar gaye?


कर्पोरेट के तहत सुरक्षित ?... अब बाबा नागार्जुन भी अगर ऐसा कहते तो ?


आदरणीयों\पूजनीयों की तुकबंदी भी अगर चलताऊ हुई तो कहलाएगी 'चलताऊ' ही, अनुराग जी. और अन्यथा तो खरे जी भी प्रिय और आदरणीय हैं हम सबके.
वैसे पढ़त में बरती गई असावधानी की ओर ध्यान दिलाने के लिए शुक्रिया. कुछ ऐसी ही असावधानी (या अनवधान) आपने खरे जी की पिछली कविता पर आई बेनामी जी की टिप्पणियों की पढ़त में बरती थी.
खैर, अब आपसे गुज़ारिश है कि मेनका और वरुण वाले "अलग से सोचनीय विषय' पर खरे जी जब भी कविता लिखें तो उसे सबद पर छापियेगा ज़रूर.


अनुराग भाई, चुटकी लेने का तो इरादा कतई नहीं रहा. जैसा लगा बता दिया. रही बात जनविरोधी या साम्प्रदायिक देखने की तो क्या यह इन दिनों कोई बड़ा मसला नहीं रह गया लगता है. आदरणीय भी चेलों की देखा-देखी उनकी राह पर चल निकले हैं. उनका जो प्रेरक लेखन था, अपने लिए वो अब भी प्रेरक है और उनका वर्तमान जिन्हें सुहाता हो, उन्हें ही मुबारक. अपने-अपने कंसर्न और अपनी-अपनी प्राथमिकताएं हैं.
मेनका-वरुण की `धुर विरोधी खेमे` में हैसियत उस `खानदान` से सम्बन्ध के कारण ही है. संजय का बेटा होना ही वरुण की खासियत है. उसने जहर उगलकर साबित भी किया है कि वह इंदिरा का असली पोता और संजय का असली बेटा है.


सच कहूं तो बेहद कमज़ोर कविता है यह्…अर्जुन सिंह के यशोगान में लिखी कविता से भी कमज़ोर


dhiresh bhai ab aapko yah batana zaroori hai ki sahitya me sare sambandh barabri ke hote hain...'chela' wagairah na likhiye dost, yh bahut ashleel aarop hai...aap kavita par kuch dhang ki baat kahiye...tark me oone sabit hone par aap ninda ki parichit boliyan bolne lage hain....aapme hai naitik sahas to bataiye kaun hain chele vishnu khare ke ?...khamakhwaah ki gaflat paal kar logon ko bharmaiye mat...doosre aap jinke boodhe aur bimar kandhon par itna taras kha rahe hain we ab bhi bahut mazboot hain aur mujhe apni manyataon me utne hi driddh maloom pade hain jitne pahle, jab ve aapke pyare hua karte the...aapne ziddi dhun par jo kuch kaha use maine aapki hadabadahat ki badbadahat samjha tha...lekin ab aapki tipannion se yah sabit ho gaya hai ki aap me samjh ki yah roodhi ghar kar gai hai ki aap yah batayenge ki hindi ka kaun sa lekhak sampradyikta to lekar chintit hai aur kaun udaseen ya kisne uska chola pahna hua hai aur kisne utar fenka...HAD HAI YAR...aap yah sab dukandari kab se karne lage...ek avinash kafi nahi tha kya hamare liye...ab aap yah kijiye ki in baton ka isi shaili me koi thos tarkik jawab dhoondhiye/dhundhwaiye...


अनुराग जी,
अब चीज़ें ओब्जेक्टिविटी और सब्जेक्टिविटी के बीच झूल रही हैं. वैसे तो आप भी तो हमें बताते रहे हैं कि हिंदी का कौनसा कवि किसका 'सगोत्रीय' है और कौन किसके बरअक्स 'किशोर' और 'युवतर सखा' हैं.
'ठोस तार्किक' और 'उत्कृष्ट' शैली में आपके द्वारा ऊपर कही गई बातों का जवाब तो धीरेश सैनी भी क्या ही दे पाएंगे, पर मेरे विचार में उन जैसे व्यक्ति पर 'दुकानदारी' का आरोप लगाना भी अश्लील और निंदनीय है.
मैं अपना विरोध दर्ज करता हूँ!


और हाल ही में दी गई आपकी नसीहत के बावजूद इस बार आपकी टिप्पणी की पढ़त में भी असावधानी हो गई; 'ढुंढवाना' अलक्षित रह गया. अगर जवाब मुझसे 'ढुंढवाने' के लिए आपने धीरेश सैनी से इसरार किया है, तो मैं सार्वजनिक तौर पर ऐसा करने में अपनी 'अक्षमता' व्यक्त करता हूँ.
सॉरी यार, धीरेश भाई! 'ढुंढवाने' के लिए आप कोई और आदमी 'ढूंढिए'.


मैं यह फ़ैसला नहीं कर पा रहा कि आख़िर चेला और दुकानदारी में क्या ज़्यादा अश्लील है? साहित्य में सब बराबर होते हैं यह कहना वैसे ही है कि इस देश में सबको बराबर का हक़ है…सिद्धांततः सहीं पर व्यवहार में कहीं नहीं। काश कि ऐसा ही हो…


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