Wednesday, March 31, 2010

कवि की संगत कविता के साथ : ६ : विजय शंकर चतुर्वेदी

आत्मकथ्य

इससे
पहले इस तरह से कभी सोचा नहीं था. अब भी बड़ा अटपटा लग रहा है. अब सोच रहा हूँ तो सबसे पहले यही प्रश्न मन में उभर रहा है कि मैं कविता क्यों लिखता हूँ. अहसास होता है कि मैं 'स्वान्तः सुखाय' तो नहीं ही लिखता. चाहता हूँ कि मेरी बात, मेरे विचार परिष्कृत रूप में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचें, मेरी कविता जनजीवन में व्याप्त उदासी-निराशा-हताशा और राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक क्षरण से जूझने का एक नुस्खा बन सके, कविता की जीवनी शक्ति और सामाजिक चेतना द्वारा समाज के अंतःकरण तक पहुँच सकूं आदि-आदि. तुलसी बाबा ने भी 'स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा' कोई खुशी-खुशी नहीं लिखा था, बल्कि वह अपने विरुद्ध चतुर सुजानों के बनाए गए माहौल की एक साहित्यिक काट थी. लेकिन आजकल चंद लोग कविता लिखने को स्वान्तः सुखाय कहकर गुणी जनों का और अपना मनोरंजन किया करते हैं और 'बचे' रहते हैं.

आगे पाता हूँ कि मेरे आस-पास कविता का रेगिस्तान जैसा वायुमंडल है. कंपनी की जिस बस में घर से दफ्तर जाता हूँ, जिन सरकारी बसों में लोगों से मिलने-मिलाने निकलता हूँ, जिन ट्रेनों से लम्बी दूरी की जरूरी यात्राएं करता हूँ वहां कविता का कोई माहौल नहीं नज़र आता. किसी को मैंने किसी की कविता गुनगुनाते नहीं सुना. मित्रों से बातचीत में कविता का जिक्र नहीं आता. समकालीन कविता के एक महत्वपूर्ण कवि ने एक दिन कहा कि उसे तो कविता से बोरियत होने लगी है और कविता लिखने से कुछ नहीं बदलता. ऐसे में कविता को लेकर मन निराशा से भरने लगता है और सोचने लगता हूँ कि क्या कवि कर्म निरर्थक है! लेकिन तभी मुझे हमारे समय के एक बहुत बड़े कवि कुंवर नारायण जी की ये पंक्तियाँ संभाल लेती हैं-

“आदमी के आदमी होने की सबसे पक्की पहचान और लक्षण उसका साहित्य, कलाएं और विचारशीलता रहे हैं- पहले भी, और आज भी. कविता के हाथों में जीवन और विचार का सबसे सशक्त माध्यम भाषा है. कविता को चाहिए कि वह सामाजिक चेतना को सीधे संबोधित करे. लेकिन जीवन संभालने की सारी जिम्मेदारियां अगर कविता पर लाद कर उसकी सामर्थ्य को आंका जाएगा तो वह चरमरा कर बैठ जायेगी. वह 'बेचारी', 'बेबस' और 'असमर्थ' नज़र आयेगी.”

एक दिन मैं करता यह हूँ कि कंपनी की बस में अजनबी बने मशीनी मुद्रा में बैठे लोगों से साहित्य और प्रकारांतर से कविता का जिक्र छेड़ता हूँ. कुछ दिनों में ही सहजता आने लगती है. कुछ लोग बताते हैं कि उन्होंने कबीर को पढ़ा है, मीरा बाई को सुना है, सूर-तुलसी के पद और चौपाइयां रेडियो पर हर सुबह सुनते हैं, दिनकर को पढ़ा है, कुसुमाग्रज को पढ़ा है, पु.ल. देशपांडे के वे घनघोर प्रशंसक हैं, विंदा करंदीकर और नारायण सुर्वे का साक्षात काव्य पाठ उन्होंने सुना है. कंपनी के स्वास्थ्य बीमा विभाग का प्रमुख तो खुद अच्छा-खासा कवि निकल आता है.

इसी तरह एक बार लम्बी दूरी की यात्रा के दौरान इलाहाबाद से चढ़ा यात्री हाल-चाल पूछने पर बात-बात में रामचरित मानस की चौपाइयों का हवाला देता है. एक अन्य यात्रा में पिपरिया का सहयात्री मौसम के मिजाज को घाघ-भड्डरी की उक्तियों से बयान करता है और दिल्ली से भोपाल आते समय मिले महफूज अली दुनिया के हर विषय पर मौजूं अश'आर का पिटारा खोल देते हैं.

ऐसे में कौन कह सकता है कि जीवन से कविता गायब हो चली है! गायब नहीं है, बस घनघोर ग्रीष्म के इस मौसम में कविता की धारा कृशकाय अवश्य है और वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति के शब्दों में कहूं तो-

'रेत के द्वीप पसर आये हैं गंगा के बीच तक....
...……
…..
मछलियों के पीछे-पीछे अपनी प्रसिद्ध सुस्त चाल से,
कितना तेज़ चलते हुए गुज़र गए कछुए...'.

मेरा मानना है कि कविता की सरस्वती हमारे दैनंदिन संघर्षों के ऐन बीच में विलुप्त होती जा रही है, हाथों से थोड़ा रेत इधर-उधर करने से हम उसे अंजुलियों में भर कर जीवन की प्यास बुझा सकते हैं.

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि यह किस तरह की कविता होगी जो मनुष्य का जीवन जल बन सकेगी. इसका कोई सीधा-सादा उत्तर मैं सोच नहीं पाता. मुझे लगता है कि हज़ारों साल पहले भी यह प्रश्न उपस्थित हुआ होगा और लोगों ने उसका उत्तर अपने-अपने ढंग से खोजा होगा. भूतकाल में ऐसा करने में जो लोग सक्षम हुए उन्हें ही हम वर्त्तमान में महाकवि माना करते हैं. वर्त्तमान काल की प्रकृति और एक प्रवृत्ति यह भी है कि उसमें काफी कुछ जान लिया गया होता है जबकि बहुत कुछ को अभी जाना और खोजा जाना होता है. यही बात कविता को लेकर सच है.

भविष्य की कविता अपरिमित और अज्ञात है. लेकिन कवि का समाजशास्त्री वाला रूप यहीं उसकी मदद करता है. तुलसीदास ने कलिकाल की जो महिमा गाई है वह किसी नजूमी, भाष्यकर्ता, भविष्यवक्ता, ज्योतिषी या त्रिकालदर्शी होने के नाते नहीं बल्कि अपने समाज के वर्त्तमान को गहराई से पढ़कर भविष्य का खाका खींच सकने की सामर्थ्य के कारण है. आमजन आज भी बात-बात पर कहते हैं कि देखो तुलसी बाबा ऐसा कह गए थे और वही आज हो रहा है! लेकिन ये जो पल-पल नया जन्म ले रहा है और अनंत गहराइयों में समाता जा रहा है, उसे महसूस कर पाना कठिन है और कविता में पकड़ पाना तो और भी दुष्कर है. आज के कवि के लिए यह एक बहुत बड़ी चुनौती है. इसके लिए मानव मन के भीतर गहरे पैठना तो अनिवार्य शर्त्त है ही, उसे विभिन्न विषयों का सम्यक अध्ययन करना होगा और समूचे वैश्विक घटनाक्रम पर पैनी नज़र बनाए रखना होगी.

आगे सोचना बंद करता हूँ तो पाता हूँ कि यही बातें हूबहू मेरे लिए भी सच हैं!
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तीन नई कवितायें

बात है कि

गोरे झरनों
और काली चट्टानों का
जंगल में एक साथ गुज़र है,
क्या शहर वालों को नहीं इसकी ख़बर है!
****
हम सबके दर्शक होते हैं

हम सबके दर्शक होते हैं
हम कोई सिनेमा या नाटक नहीं हैं
लेकिन दुनिया के रंगमंच पर पल-पल नजर रखी जाती है हमारे किरदार पर
अच्छे काम पर बजती हैं तालियाँ
बुरे काम पर गालियाँ पड़ती हैं
ये मनोरंजन के लिए जुटे दर्शक नहीं
खेद या सहानुभूति जताने आये इष्ट-मित्र भी नहीं
ये खुले सभागृह में उपस्थित सर्जक होते हैं.

कुछ होते हैं हमारे मूकदर्शक, कुछ प्रशंसक
कुछ अनचीन्हे आलोचक तो कुछ उदार समालोचक
इनकी नज़र में अक्सर बदलती रहती है हमारी तस्वीर
कभी वह हो जाती है सफ़ेद तो कभी स्याह
कभी स्याह-सफ़ेद हो जाती है जाने-अनजाने
इन दर्शकों को रिश्वत देकर बरगलाया नहीं जा सकता
कोई एजेंसी नहीं चमका सकती हमारी दागदार छवि
हमारी चमक को धूमिल भी नहीं किया जा सकता इनकी नज़र में.
कन्धों पर बैठे कथित जय और विजय की तरह
ये रखते हैं हमारे धतकरमों का पूरा लेखा-जोखा.

जब हम निकलते हैं घर से
तो हमें निहारते हैं पेड़ अपने हज़ार-हज़ार फूलों-पत्तियों की आँखों से
इमारतें हमारी चौकसी करती हैं चुपके से खिड़कियाँ खोलकर
सड़क पर आते-जाते वाहन हमें घूरते हुए चलते हैं
दफ़्तर में हम पर नज़र रखती हैं मेज़ और कुर्सियां
सर पर चक्कर काटता पंखा गौर करता है हम पर विहंगम दृष्टि से
दराज़ों में पड़ी फ़ाइलें ताकती रहती हैं हमारे हाथों की तरफ टुकुर-टुकुर
दीवार पर टंगे कैलेण्डर और परदे
हमारे धतकरम देखकर भी शर्म से आँखें नहीं मूंदते.

हमें अहसास भी नहीं हो पाता
कि हमें किस नज़र से देख रही है दुनिया
यह पलकों के झपकने की तरह होता रहता है अनायास
और हमें लगातार देखा जाता है
हमारा अवलोकन करते रहते हैं हमारे विचार
कि आज का दिन कैसे जिया
किसका अच्छा किसका बुरा किया
जब हम सो रहे होते हैं
तब भी हमारा ख़ामोश नज़ारा करती रहती है हवा
और सपनों को हमारी नींद में आने का रास्ता दिखाती है.

हम अपने दर्शकों को देख नहीं पाते
लेकिन उनके होने से इनकार करना
अपनी हस्ती मिटाने से कम नहीं
वे हमारे आसपास ही मौजूद रहते हैं
और कच्चे घड़े की तरह हमारा व्यक्तित्व गढ़ा करते हैं.
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नफ़रत से नफ़रत

नफ़रत किधर से आती है
नफ़रत किधर को जाती है
क्या यह किसी से किसी को प्यार करना भी सिखाती है?
प्यार के लिए कितने लोगों ने जान गवांई होगी बूझो तो?
लेकिन नफ़रत से हुई मौतों के आंकड़े कोई पहेली नहीं हैं.

नफ़रत बिल्लियों की तरह कहीं भी आ-जा सकती है बेरोकटोक
तुम उस पर पहली नजर में शक नहीं कर सकते
रीढ़ की हड्डी में नागिन की तरह कुण्डली मारे बैठी रह सकती है बरसों बरस
वह कलम की स्याही बनकर झर सकती है मीठे-मीठे शब्दों की आड़ में
नफ़रत को झटक दो कि वह तुमको तुमसे ही बेदखल कर रही है

नफ़रत हर ख़ास-ओ-आम में मिल जाएगी
किसी पैमाने से उसे मापा नहीं जा सकता
खिड़की बंद करके उसे रोका नहीं जा सकता
नफ़रत हवाओं में उड़ती है विमानों के साथ-साथ
पानियों में घुलकर एक से दूसरे देश निकल जाती है
हर दरवाजे पर दस्तक देती फिरती है नफ़रत
कई बार वह आती है किताबों के पन्नों में दबी हुई
लच्छेदार बातों की शक्ल में तैरती हुई पहुँचती है तुम तक
गिरफ्त में ले लेती है विश्वामित्र की मेनका बनकर
नफ़रत एक नशा है जो आत्मा को फाड़ देती है दूध की तरह

नफ़रत कब तलब बन जाती है यह पता भी नहीं चलता
हम रोज सुबह पछताते हैं कि अब से नहीं करेंगे नफ़रत
लेकिन नफ़रत के माहौल में करते हैं सुबह से शाम तक नफ़रत
हम भुलाते जाते हैं सब कुछ नफ़रत की पिनक में
फिर वह ऐसा सब कुछ भुला देती है जो जरूरी है इंसान के हक़ में

वैसे सही जगह की जाए तो नफ़रत भी बुरी चीज़ नहीं
पर यह क्या कि दुनिया की हर चीज़ से नफ़रत की जाए!
नफ़रत करो तो ऐसी कि जैसे नेवला साँप से करता है
शिकार शिकारी से करता है
बकिया मिसालों के लिए अपने आस पास ख़ुद ढूँढ़ो
कि कौन किससे किस कदर और क्यों करता है नफ़रत

वैसे भी प्यार का रास्ता आम रास्ता नहीं है
इसलिए नफ़रत से जमकर नफ़रत करो
कि नफ़रत हमारे और तुम्हारे बीच नफ़रत बनकर खड़ी है
****
( इस स्तंभ के तहत अब तक आप चंद्रकांत देवताले, असद जैदी, गीत चतुर्वेदी, लाल्टू तथा सुन्दर चन्द ठाकुर को पढ़ चुके हैं.)

5 comments:

अजित वडनेरकर said...

बेहतरी बेहतरीन बेहतरीन
बतर्ज
आफ़रीन आफ़रीन आफ़रीन

nilm said...

umeda kavitayan behtreen swal .... zrno aur chattano s ubhra mdhur swer shehr ke shor main lupt hai prantu usk hon ko nkara nhi ja skata... kavita ka astitav bhi jivan main usi trah ahi....

डॉ .अनुराग said...

लेकिन जीवन संभालने की सारी जिम्मेदारियां अगर कविता पर लाद कर उसकी सामर्थ्य को आंका जाएगा तो वह चरमरा कर बैठ जायेगी. वह 'बेचारी', 'बेबस' और 'असमर्थ' नज़र आयेगी.”

सच कहा शायद हम कविता पर जाने अनजाने ज्यादा बोझ डाल देते है ......पर हम कविता को विशिष्ट लोगो के बीच ही क्यों रखे .....क्यों नहीं हम ये भी स्वीकारे के गुलज़ार की कोई नज़्म गुनगुनाते हुए अपने फ़िल्मी संस्करण के बावजूद .. कविता की शायद जुड़वाँ बहन को रिप्रेसेन्ट करती है .....यानी किसी न किसी बहाने कविता आम लोगो के बीच जीवित है ....
कविता .को जीवित रखना महज़ कवि की जिम्मेवारी भर नहीं इसमें समाज की भी एक अप्रत्यक्ष भूमिका है ...जिसे उसे इस टेक्नोलोजी युग में निभाने में वो चूक रहा है ...तो कवि को ओर अधिक मुखर होना पड़ेगा ......
"हम सबके दर्शक होते है ....." बेहतरीन पञ्च है ......हम सबो के लिए.......
नफरत वाली कविता पढ़कर अशोक वाजपेयी जी की एक कविता याद आती है ....."किससे कितनी नफरत मै करूँ "

शिरीष कुमार मौर्य said...

विजयशंकर चतुर्वेदी जी की कविता और आत्मकथ्य बढ़िया हैं. यक़ीन होता है कि सबद का कैनवास बहुत बड़ा है और उसमें हर आकृति और रंग के लिए जगह है.

kahana hai kuch aur said...

sach kavita ko lekar is tarah ki koshish ki ja sakati hai. jeevan se gayab hoti ja rahi kavita haavi hota bajar, tab kavita par baat humahre aas-pass se hi shuru ki jana chahiye