Thursday, March 25, 2010

स्वगत : ४ : व्योमेश शुक्ल


{ इस निबन्ध में पर्याप्त अराजकता है और ज्यादातर प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की गई हैं और प्रतिक्रियाएँ निष्कर्ष नहीं होतीं। ‘विषय’ के साथ भी एक मनमानापन यहाँ है। यह निबन्ध भूमण्डलीकरण के प्रभाव की व्याख्या करने की बजाय भूमण्डलीकरण के परिप्रेक्ष्य में कविता, और उसमें भी हिन्दी कविता और उसमें भी समसामयिक हिन्दी कविता की कुछेक उलझनों से मुखातिब है। ये सीमाएँ हैं। कहीं-कहीं कुछ भर्त्सना और टोकाटोकी का भाव भी है। इन्हें आत्मभर्त्सना या आत्महनन के ही एक प्रकार के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। }
- लेखक


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कविता लिखने की वजहें क्या होती हैं ? क्या वे संख्या में कविता न लिखने की वजहों से ज्यादा होती हैं ? या कम! क्या वजहों के बीच कोई मुकाबला कहीं चलता रहता है ? अगर चलता रहता है तो कहाँ ? भीतर कि बाहर! और ये मुकाबला जीत लेने वाला क्या करता है ? कविता लिखने लगता है या कलम तोड़कर कविता लिखना बंद कर देता है।

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क्या कविता हमेशा कविता न लिखने की वजहों के खिलाफ लिखी जाती है ? क्या कविता न लिखने की वजहें कविता का अनिवार्य प्रतिपक्ष हैं ? क्या कविता हरेक अवसर पर एक ‘निश्चित’, ‘स्थिर’ और ‘ज्ञात’ पक्ष है - जिसका कोई न कोई उतना ही ‘निश्चित’, ‘स्थिर’ और ‘ज्ञात’ प्रतिपक्ष होगा ही ? क्या पक्ष और प्रतिपक्ष के द्वैतों में सीमित होकर ही कविता संभव है ?

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जाहिर है कई जवाब हैं। बहुत सीधे, सपाट और सख्त जवाबों से लेकर अत्यन्त सूक्ष्म कलात्मक उत्तरों तक। कोई यहाँ तक भी बता सकता है कि पहले पूछे गये सवाल ही अपनी ‘प्रकृति’ में इतने ‘रेटरिकल’ हैं कि उन्हीं में उनके जवाब भी निहित हैं; याने पूछने वाले को खुद इनके जवाब पता हैं, इत्यादि-इत्यादि।

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खैर, हम पुनः कविता लिखने की वजहों की ओर लौटें! अतीत में कवियों के कविता लिखने की जो वजहें हमें मालूम हैं वे अक्सर अत्यन्त साधारण, सर्वथा अप्रत्याशित और निरायास हैं। वे कई बार हास्यास्पदता की हदों तक पहुँची हुई हैं और एक अच्छी कविता की ही तरह उलझन में डाल देती हैं। कविता लिखने के कारण और लिखी गयी कविता के वैचारिक-कलात्मक उत्कर्ष के बीच वहाँ कोई दूर का ही सम्बन्ध मुमकिन है। कविता के असर को कविता लिखने की वजहों में सामित करके देखने से धोखादेह और गलत नतीजे निकल सकते हैं। मसलन् एक प्रेमरत पक्षी युगल की हत्या से उत्पन्न शोक। बेशक, कविता लिखने की यह वजह हमारी निधि है, लेकिन इस वजह से आरम्भ होने वाली अपार महाकाव्यात्मकता हमारी ज्यादा बड़ी सम्पदा है और हम दोनों को - याने कविता लिखने की वजह और कविता को अलग-अलग और साथ-साथ पढ़ना जानते हैं।

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कविता लिखने की वजह एक तथ्य है, जैसे कविता का शीर्षक कविता का नाम एक तथ्य है लेकिन कविता सिर्फ तथ्य नहीं है। हो सकता है तथ्य की सतह पर भी वह मौजूद हो, लेकिन उसे महज नहीं देख पाना अपने पाठ को भी तथ्यात्मक और अन्ततः भ्रामक बना डालना है।

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तो कविता लिखने की वजहों से इनकार नहीं है। ये वजहें होती ही हैं। कभी घोषित, विज्ञापित, वाचाल होकर, कभी गोपनीय और चुपचाप तरीके से । वे लगातार अपना काम करती रहती हैं। कविता का जीवन इन्हीं वजहों से शुरू होता है, लेकिन इन्हीं वजहों पर आकर खत्म नहीं हो जाता। कविता ‘वजह’ नहीं हैं। वह अपनी शर्तों पर है, वजह की शर्त पर नहीं। वह स्वयंभू है और इसी स्तर पर उसका स्रष्टा निरंकुश है।

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इसलिए भूमण्डलीकरण या भूमण्डलीकरण जैसी किसी भी अवधारणा के साथ कविता के रिश्ते को हमेशा के लिए तय नहीं किया जा सकता। जब भी कविता किसी अवधारणा से नजदीकी या दूरी के तर्क से अपना जीवत्व और पोषण प्राप्त करने लगती है, वह इकहरी, बेलोच, अमौलिक और निष्कर्षवादी होने का खतरा उठा रही होती है। वह खुद को पूर्वनिर्धारित और पूर्वानुमेय और इस प्रकार कुछ कम कविता बना रही ह¨ती है। इस रास्ते पर चलकर किसी अवधारणा का बेहतर उदाहरण तो हुआ जा सकता है, बेहतर कविता नहीं। आखिर वह कविता ही क्या जो किसी बात का प्रमाण या किसी धारणा का उदाहरण बन जाए। कमलेश की एक कविता के शब्दों में कहें तो :

हलके-फुलके तमाम रंगों के घन-गुच्छों के पीछे
बार-बार अपना नीलापन बदलता हुआ आसमान
जो हर जगह का आसमान नहीं है
और इस आसमान में एक पतंग उड़ रही है
तमाम रंगों के घन-गुच्छों की छाया में
सुगन्धित चीड़ हैं आसमान को छूते हुए
पहाड़ी पर और भी वनस्पतियाँ हैं
फूलों से लदी हुईं
- इनका क्या नाम है ?
फूल ये अवश्य हैं पर, हर फूल नहीं हैं
और इस पहाड़ी पर, किसी शिखर पर से एक लड़का
यह पतंग उड़ा रहा है
कौन-सी पहाड़ी है यह - (जिले का गजेटियर इसका नाम नहीं देता) -
कोई भी हो - यह हर पहाड़ी नहीं है
झरने फूटते हैं-बहते हैं
जलधाराएँ बहती हैं हमेशा सपाट मैदान
की ओर
हम खड़े रहते हैं-एक चील को उड़ते देखते
हम पतंग क¨ देखते रहते हैं.
- गुलाबी रंग की पतंग
हमें डोर नहीं दिखती।
इस चोटी पर, इसका क्या नाम है?
इस पर जाने का रास्ता तो होगा?
- रास्ता जरूर को होगा, पर
वह हर रास्ता नहीं होगा।

एक और उदाहरण से बात शायद ज्यादा साफ हो। हिन्दी की समकालीन कविता का खासा बड़ा हिस्सा विरोध की कविता लिखता है। एक कवि के रूप में मैं इसी हिस्से का नागरिक हूँ। यहाँ कविता लिखने की वजह आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में हो रहे तमाम अन्यायों का विर¨ध करना है। लेकिन क्या जीवन में दमन और अन्याय के रूप इतने उल्लिखित, प्रकाशित और ज्यों के त्यों हैं कि उनके विरोध को एक स्थिर और स्थापित तथ्य के रूप में बरता जा सके ? उसे पेश किया जा सके ? उसे उसकी यथास्थिति में अहर्निश जारी रखा जा सके ? विरोध का एक पूर्वनिय¨जित घोषणापत्र तैयार हो सके ?

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मेरा यह खयाल है कि विरोध की कोई भी रणनीति अनेकांत, अनंतिम और असमाप्त होने को अभिशप्त है। तब हिन्दी साहित्य संसार में सक्रिय विरोध की क्रियाएँ, विरोध के संगठन और विरोध की सत्ताएँ इतनी आत्मविश्वस्त क्यों नजर आती हैं ? विरोध करने वाली सभी संज्ञाएँ और विशेषण इतने सुस्पष्ट कैसे है ? क्या विरोध की सभी सम्भावित जगहों, विरोध करने वाले नागरिकों-लेखकों-कलाकारों के नाम पहले से तय किये जा चुके हैं ? मैं विरोध की नीयत पर शक नहीं कर रहा हूँ। ऐसा कभी नहीं किया जा सकता। स्वप्न में भी नहीं। वह हमारा समवेत प्रतिफल है। लेकिन विरोध के ‘रिवाज’ और ‘प्रतिष्ठान’ में रूढ़ होते जाने की अफसोसनाक प्रक्रिया पर हम निरन्तर सवाल उठाते रहेंगे और विरोध के फैशन, विरोध के क्लिशे और विरोध की मुद्राओं की खातिर मौलिकता को हलाक नहीं होने देंगे क्योंकि विरोध के नव्यतम तौर-तरीकों के आविष्कार की कठिन राह में यही मुद्दे बार-बार बाधा बनकर हाजिर हो जाते हैं। हम जीवन और रचना के वृहत्तर परिसर में विरोध के अभिनव-अप्रत्याशित रूपों की तलाश करेंगे।

यों, हम प्रतिकार पर कुछ खास लोगों के एकाधिकार को भंग कर देंगे। विष्णु खरे की एक कविता के नैरेटर के मुताबिक ‘मैं अपने नियमों से अपना खेल अकेले ही खेल लूंगा।’

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फिलहाल भूमण्डलीकरण की अमानवीयताओं से लड़ने में हमारी समकालीन कविता की काफी ऊर्जा लगातार खर्च हो रही है। इस मश्क का भरसक आदर किया जाना चाहिए। लेकिन वस्तुस्थिति में पर्याप्त दुर्भाग्य घुसा हुआ है। जो कविता हमारे दृश्य में भूमण्डलीकरण का सर्वाधिक शाब्दिक विरोध कर रही है, उसके भीतर कई समस्याएं हैं। उन समस्याओं की प्रकृति और स्वयं भूमण्डलीकरण की प्रकृति में हैरतअंगेज नैसर्गिक साम्य है। हो सकता है समीक्षा की भाषा के स्तर पर इसे सिद्ध करना व्यापक अध्यवसाय और कठिन मेहनत की मांग कर रहा हो, लेकिन जो चीजें दुर्घटना की मानिन्द साफ-साफ दिखाई दे रही हैं उनकी पहचान में हमें क्यों प्रतीक्षा करनी चाहिए?

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मसलन्, भूमण्डलीकरण के वकीलों की आमतौर पर यह मान्यता है कि एक उदारतावादी लोकतंत्र ही अब एकमात्र विकल्प है। उनके मुताबिक वह बेहद फैले हुए राज्य को चलाने की एकमात्र पद्धति है। हो सकता है यह बात यूरोप के लिए सच हो, लेकिन क्या भारत समेत तीसरी दुनिया के देशों के लिए भी यह उतनी ही सार्थक है? शायद उदारतावादी लोकतंत्र भूमण्डलीकरण की पूरी प्रक्रिया से बिल्कुल अलग हो जाने के विकल्प को नामुमकिन बना देता है, कम से कम हमारे आस-पास का इतिहास तो इस धारणा का प्रमाण है, इसलिए उसे ही उम्मीद की अन्तिम और एकमात्र किरण की तरह पेश किया जा रहा है। इस उदारतावादी लोकतंत्र ने राजनीतिक बराबरी के चमकीले सिद्धांतों की ओट में कितनी बीहड़ आर्थिक-सामाजिक गैरबराबरी को पुख्ता किया है, यह किसी से छिपा नहीं है। यह भी कि इसने तीसरी दुनिया की अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जरूरतों के भीतर से निकलने वाले लोकतान्त्रिक रूपों को आत्यंतिक तरीके से हतोत्साहित किया है।

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ऐसी परिस्थिति में हमारी समसामयिक हिन्दी कविता का अधिकांश क्या करता है ? वह लोकतंत्र के वर्तमान रूप से रुष्ट होकर टीका-टिप्पणी और कोलाहल करता है। लेकिन इस शोर में से विकल्प की अंतर्वस्तु निकल कर नहीं आ पाती। क्या बार-बार यह कहने की इच्छा नहीं होती कि यह कविता अपनी आरंभिक प्रतिज्ञा में उपलब्ध उदारवादी लोकतंत्र का पहला और अंतिम और एकमात्र विकल्प मानकर चलती है और ज्यादा से ज्यादा उसी के भीतर कुछ संशोधन सुझाती रहती है। मै अपवादों की बात नहीं कर रहा हूँ, और अपवाद भी नियम को पुष्ट ही करते हैं। आप विरोध की समूची कविता को एकबारगी देख जाइये, वह उदारतावादी लोकतंत्र के पार नहीं जा पाती। हम विरोध करते हैं, लेकिन हमारी आलोचना में से विकल्प का नक्शा निकल कर नहीं आ पाता। हमारा सारा क्रोध और क्रन्दन, यों, कई बार, उसी विराट तन्त्र का हीनतर अनुषंग बन जाने को बाध्य है, जिसका वह विरोध करता रहता है।

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हिन्दी साहित्य संसार में इसी दिक्कत के भीतर से एक और दिक्कत पैदा होती है। वह है यथार्थ के सामने पराजित हो जाने की दिक्कत और जितनी पराजय वाकई हुई है, उससे कहीं ज्यादा पराजित दिखने की दिक्कत। व्यक्तिगत पराजय को समूह की हार के तौर पर ग्रहण करने की दिक्कत। कुछ बुजुर्ग कवि आवाजें यह कहती पाई जाती हैं कि 90 के बाद का भूमंडलीकृत यथार्थ इतना बीहड़, विस्तृत और असमाप्त किस्म का हो गया है कि वह टुकड़ा-टुकड़ा सर्जनात्मकता में ही उपलब्ध हो सकता है। अपनी किताब ‘एक कवि की नोटबुक’ में राजेश ज¨शी लिखते हैं - ‘हमारे समय का सच और उसका मेटाफर थोडा विश्रंृखलित और बँटा हुआ है। .....इसलिए आज के सच की शक्ल टुकड़ा-टुकड़ा जुड़कर ही तैयार हो सकती है। यह हमारी आज की कविता की सीमा भी है, गुण और अवगुण भी।’

मुझे लगता है कि इस वक्तव्य में समूह के साथ कुछ ज्यादती हो जा रही है। हो सकता है कि किसी को अपने सच की शक्ल इतनी छिन्न-भिन्न दिख रही हो, लेकिन यह भी तो सम्भव है कि उसी वक्त में किसी दूसरे आदमी को अपने हिस्से का सच इस कदर विश्रंृखलित न लगता हो। कम से कम ‘भूमण्डलीकरण’ का अपना सत्य तो बिल्कुल ठोस, रणनीतिसम्पन्न और जालिम तरीके से हम पर जाहिर हो रहा है। तो जब प्रतिपक्ष इतना तैयार और उदग्र हो तो युद्ध का कर्तव्य क्या है ? थकी-हारी बातें करके पलायन का माहौल बनाना या अपनी समूची आत्मवत्ता और अध्यवसाय और ईमान को एकाग्र करके सर्जनात्मकता के एक नये अध्याय की शुरूआत करना। हमें अपनी नीयत और सामर्थ्य के मुताबिक इन दोनों में से कोई एक विकल्प चुन लेना चाहिए।

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दरअसल समस्या यह भी है कि हम अंतिम चयन करने में झिझकते है या सहम जाते हैं। हम कई नावों की सवारी करना चाहते हैं। हम एक स्वीकार्य और सुपाच्य कविता लिखना चाहते हैं। हम लोकप्रियता से आगे के मकाम नहीं देखना चाहते। हम विश्लेषण की सुदीर्घ प्रक्रिया और उसकी परिणतियों से घबराते हैं, इसलिए वह हमारी कविता में हमेशा कम ही होता है। हमारा काम बहुत थोड़ी सुन्दरता से चल जाता है। शिल्प के स्तर पर हम संतोष या समझौता करना चाहते हैं और प्रायः उतने ही पैर फैलाते हैं जितनी लम्बी चादर हो।

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जबकि कविता के लिए पहला रास्ता तो यह हो सकता है कि वह इस भूमण्डलीकृत यथार्थ के पारा-पारा रूपों की अधुनातन जाँच-परख करे। वह अभिनव औजार से सम्पन्न होकर पूँजीवादी साम्राज्यवाद के इस नये संस्करण के निर्माणों, मिथकों और काम करने की शैलियों को बेहद वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण तरीके से विखंडित कर दे। वह पूँजी, हिंसा, सत्ता, समूह, एन.जी.ओ., कारपोरेशन्स, चंचलता, घटनाओं के बेसम्भाल प्रवाह और मुख्यधारा की सतह के भीतर घुस जाए और एक विलक्षण सैद्धान्तिक अखाड़ेबाजी वहीं पर सम्भव कर दे। वह गद्यात्मकता और पद्यात्मकता सरीखा घरेलू और प्रापंचिक आरोपों को कुचलकर नए विजन के लिए बड़ा साहित्यिक-सांस्कृतिक उत्पात करे। देवी प्रसाद मिश्र की कविताएँ इस रास्ते का श्रेष्ठ उदाहरण हैं।

और एक रास्ता कविता का यह हो सकता है कि भूमंडलीकरण और उसके समस्त विकारों को एकबारगी अपदस्थ कर डालने वाले एक अत्यन्त सम्पन्न सौन्दर्यलोक का आविष्कार अपनी कल्पनाशक्ति से कर दे। लेकिन याद रहे, यह काम फुटकर किस्म की सुन्दर्ताओं और एकाध बिम्बमालिकाओं से नहीं होगा, छिटपुट कौशल से भी नहीं। उस वैकल्पिक सौन्दर्यलोक को इस उपलब्ध बाजारवादी मायालोक से कहीं ज्यादा प्रगाढ़ और स्थायी और दिव्य कल्पनाशक्ति की दरकार होगी। उसके भीतर एक पूरा संसार विन्यस्त होगा। मसलन उदयन वाजपेयी की कविता।

मैंने दो कवियों के उदाहरण दिये हैं। ये अंतिम उदाहरण नहीं हैं। लेकिन यहाँ से आगाज किया जा सकता है, इसमें .जरा भी शक नहीं। और भी रचनाकार हैं - शक्ति और सौंदर्य की अभिनवता के प्रमाण। इस सभागार में ही गीत चतुर्वेदी और नीलेश रघुवंशी बैठे हुए हैं। इन दोनों रचनाकारों की पोजीशंस हिन्दी के ‘पोलेमिकल’ पर्यावरण में पर्याप्त भिन्न-भिन्न हैं। लेकिन अपने रचनात्मक अभियानों को लेकर दोनों द्वारा अर्जित आत्मविश्वास से वह जगह - वह कामन स्पेस निर्मित होती है जहाँ खड़े होकर हम कविता की चुनौतियों को लेकर एक निर्णायक, समावेशी और स्वप्नमय संवाद का आरम्भ कर सकते हैं।
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( भारत भवन द्वारा ‘भूमंडलीकरण और कविता की चुनौतियाँ ' शीर्षक विषय पर आयोजित संगोष्ठी में पढे गये निबंध का लगभग अविकल रूप )

1 comment:

सुशीला पुरी said...

आपके आलेख को पढ़कर बेहद सुखद लगा ...इस तरह की बातें ब्लॉग पर बहुत कम लोग लिखते हैं ...सवाल तो कोई करता ही नही ...बस लिख लिखकर आत्ममुग्ध होते रहते हैं ...कविता के बारे मे आप जैसे जरूरी कवि की प्रतिक्रिया मायने रखती है ...अभी दोबारा भी पढ़ना है .