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विष्णु खरे की कविता का संशोधित प्रारूप

( आगे दी जा रही कविता पिछली पोस्ट में छपी विष्णु खरे की कविता का ही संशोधित और अंतिम प्रारूप है। कवि ने इसे भेजते हुए यह स्पष्ट किया है कि संशोधन का कविता पर हुई पिछली बहसों से कतई संबंध नहीं है। इसे नई पोस्ट में देने के पीछे इन बदलावों को ही लक्षित करना है। जिन बंधुओं ने बहस में शिरकत की उनमें से अधिकांश ने कविता पर मूल्यवान विचार व्यक्त किये। उनका आभार। बेनामी बंधुओं ने कविता के अलावा भी बहुत से मुद्दों पर बहस की। हालाँकि ऐसा करते हुए उनके तर्क बहुधा व्यक्तिगत आक्षेपों तक पहुँच गए। यह शोभनीय नहीं। )

कल्पांत
(तुभ्यमेव भगवंतं कृष्णद्वैपायनं)

दिवस और रात्रि में कोई अंतर नहीं कर पाता मैं      दोनों समय ऐसे दीखते हैं जैसे सूर्य चन्द्र नक्षत्रों से ज्वालाएं उठती हों

दोनों संधिवेलाओं में देखता हूँ एक मृत शरीर दिवाकर को घेरे हुए जिसके सिर भुजा जंघाएं नहीं हैं       धधकती हैं दोनों संध्याओं की दिशाएं

अंतरिक्ष में टकराते हैं धूमकेतु उल्काएं ग्रह उपग्रह तारागण       क्या गरजता है यह       मेघों के बिना कौन-सी विद्युत् कौंधती है रात में बरसते हैं रक्‍त मांस-मज्जा

नदियों के जल में लहू पीब भ्रूण बहते हैं      वे अपने उद्गमों को लौटने लगती हैं      कूपों तड़ागों नालों से विषैले फेन उठते हैं

पर्वतों से कौन-सा भयानक नाद उठता है यह       उनके शिखर और शिलाएं रेत जैसे ध्वस्त होते हैं

सागर उफनते हैं भूडोल से अपने तट तोड़कर धरती को डुबोते हुए

दुर्गन्ध उठती है अग्नि से

कभी आकाश में सात सूर्य एक साथ उदित होते हैं       राहु और केतु मुंड और कबंध की तरह कभी जुड़ते कभी विलग दीखते हैं        लोप हो चुका है चन्द्र का कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष कब परिवर्तित होते हैं ज्ञात नहीं होता

नष्ट हो गई हैं मेरी इन्द्रियों की क्षमताएं        अपनी चेतना खो चुका हूँ मैं

वंध्या शाखाएं वर्णगंधहीन अवास्तव फलों से लद गई हैं जिन पर कुछ नहीं मंडराता जिन्हें कोई नहीं खाता        हरे वृक्ष स्वतः कट जाते हैं ठूंठ हो जाते हैं जलने लगते हैं

कभी भी चलने लगते हैं डरावने बवंडर       उनसे बालुका नहीं पीसी हुई हड्डियों का चूर्ण बरसता है        मध्याह्न में अमावस्या की अर्धरात्रि का तमस छा जाता है

लुप्त सरिताएं ज्येष्ठ और वैशाख में नगरों को डुबो देती हैं        मरुप्रदेश में दिन के समय हिमपात होता है सरीसृपों को नष्ट करता हुआ

एक गरुड़ दीखता है जिसके माथे पर शिखा और सींग हैं उसके तीन पंजे हैं और चोंच के स्थान पर चार दाढ़ें हैं

वृक्षों पर बैठे गीध श्येन और चील शवों की घात में नीचे देखते हैं        कोकिलों शुकों मयूरों चातकों के कंठ से लपटें और चीत्कार निकलते हैं         ध्वजों पर बैठकर वे उन्हें डालते हैं

रात में एक पक्षी मंडराता है जिसके एक आंख एक डैना एक पंजा है और जब वह क्रुद्ध होकर बोलता है तो ऐसे कि कोई रक्त वमन करता हो

गीध घरों में घुस आते हैं और जीवित मनुष्यों का मांस नोचते हैं आतंकित जो आर्तनाद तक नहीं कर पाते

आकाश कभी भी टिड्डियों से आच्छादित हो जाता है जो प्रत्येक हरित वनस्पति और जीवित प्राणियों को खाती हैं

गर्दभों को जनती हैं गायें हाथियों को खच्चरियां श्वानों को शूकरियां

दो मस्तक चार नेत्र तीन सींग अनेक दाढ़ों पांच पैर दो मूत्रेंद्रिय तथा दो पूँछ वाले अकल्पनीय पशु जन्म लेते हैं और भयावह अश्रव्य वाणी में बोलते हैं

चूहे छछूंदर गोधिकाएं चीटे तिलचट्टे सोते हुए स्त्री-पुरुषों के नख केश उँगलियाँ कुतरकर खाते हैं और उन्हें भान नहीं होता

सियार लोमड़ियाँ और लकड़बग्घे भरी दोपहर झुण्ड बनाकर निकलते हैं और कुत्तों बिल्लियों बछड़ों का आखेट करते हैं

बंधे हुए पशु अचानक चौंकने बिदकने लगते हैं पसीना पसीना हो जाते हैं उनकी आँखों से आंसू मूत्रेंद्रिय से रक्त बहता है

गायों का आखेट और भक्षण करते हैं मृग         मार्जारों की वाणी बोलते हैं सिंह दिन में गरुड़ाकार उलूक भवनों की मुंडेरों से मंत्रोच्चार-सा करते हैं

अट्टालिकाओं पूजास्थलियों वाहनों के ध्वज कांपते हैं जलने लगते हैं       मानवहीन रथ चलने लगते हैं        शस्त्रों से लपटें उठती हैं

पाकशालाओं के भोजन में कीड़े बिलबिलाते दिखाई देते हैं

जिन्हें इस पृथ्वी पर कभी सुना नहीं गया ऐसे भीषण प्राणियों को जन्म देती हैं स्त्रियाँ जिनमें से कुछ एक साथ चार-चार पांच-पांच संतान उत्पन्न करती हैं जो जनमते ही नाचती गाती हंसती हैं

सारी मर्यादाएं तोड़कर समस्त नारियां समस्त पुरुष पशुओं जैसे मैथुन करते हैं हर असंभव कदाचार होता है         गणिकाएँ बनना चाहती हैं कन्याएँ सतियाँ साध्वियाँ

संग्राम से पलायन करते हैं सहसा नपुंसक हो गए नवयुवक धूर्तों लम्पटों दस्युओं वेश्यालयों के स्वामियों का क्रीतदास बनने के लिए जिनके समक्ष महत्वाकांक्षी ललनाएँ स्वेच्छा से निश्शुल्क निर्वसन होती हैं

किस निद्रा किस मूर्च्छा में चल रहा हूँ मैं        कब पिया मैंने नखों केशों अपवित्र वस्त्रों से दूषित जल उससे स्नान किया        किसी रजस्वला किसी अगम्या से सहवास बलात्कार का अपराधी नहीं मैं       असहायों उत्पीड़ितों निष्पापों की हत्या नहीं हुई मुझसे        तब पराभव कैसे हुआ मेरा

श्वास में इतनी शक्ति नहीं कि शंखनाद कर सकूँ       भुजाओं में जो बल था अब नहीं रहा       मेरा सारथी और मैं परस्पर रक्षक न रह सके      धनुष था किन्तु उसकी प्रत्यंचा तक न चढ़ा सका मैं         सारे बाण व्यर्थ हो चुके मेरे       तूणीर में कोई सायक शेष नहीं        अपने किसी मंत्रपूत अस्त्र का आह्वान नहीं कर सकता मैं        नष्ट हुआ मेरा यत्किंचित पुण्य मेरा पराक्रम        निर्मूल हुआ वंश

कौन से महापातक हुए मुझसे        किसी अपकार्य अधर्म को रोक न सका मैं

कैसे अश्रुतपूर्व महारोग फैलते हैं यह         अकल्पनीय अपराध होते हैं जो किसी स्मृति किसी संहिता में नहीं         माता-पिता पुत्र-पुत्री भ्राता-भगिनी पति-पत्नी परस्पर वध करते हैं          नर-मांस से कोई घृणा नहीं करता

मरीचिकाओं में दीखती है अट्टालिकाओं पण्यवीथियों द्यूतशालाओं कामदवनों क्रीड़ास्थलों स्वर्णगिरियों कल्पवृक्षों अप्सराओं की मयनगरी अमरावती जिसकी दिशा में दौड़ते हैं आबालवृद्ध नर-नारी जो कभी नहीं लौटते

दुराचरण और अन्याय की कोई सीमायें नहीं जानते सुधर्मा-सभा में प्रतिष्ठापित राजवंश अमात्य दंडाधिकारी       ऋषि मनीषी विद्वज्जन निबाहते हैं सूतों बंदियों किन्करों के कर्त्तव्य

सत्पुरुषों तपस्वियों पूर्वजों हुतात्माओं से द्वेष और परिहास करते हैं  लोग उनकी निंदा करते हैं                आराध्यों अवतारों द्रष्टाओं का तिरस्कार होता है        आश्रमों गुरुकुलों में हत्याएं की जाती हैं           ग्रन्थ जलाये जाते हैं

बालक विकलांग विकलमस्तिष्क होकर नाचते गाते अट्टहास करते हैं          शस्त्रास्त्र लेकर वे वीभत्स आकृतियाँ उकेरते गढ़ते हैं        परस्पर आक्रमण करते हैं       कृत्रिम नगर बसाकर युद्ध करते हुए उन्हें वे नष्ट कर देते हैं

देवताओं की मूर्तियाँ कांपती अट्टहास करती रक्त उगलती खिन्न और खंडित होती हैं        पूजागृह ध्वस्त हो जाते हैं

जब मंत्रोच्चार और जप किया जाता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि अज्ञात भाषाएँ बोलते हुए बर्बर समूह आक्रमण कर रहे हों किन्तु कोई दिखाई नहीं देता

किन्हीं दूसरे लोकों से आये राक्षसों जैसे प्राणी धन आभूषण छत्र कवच ध्वजा सहित नगरवासियों का भक्षण करते हैं

जब पूजा-अर्चना के वाद्य बजाए जाते हैं तो सूने घरों से घोर स्वर उठते हैं

जलते हुए खंडहर दिखाई देते हैं जिनसे दीन-हीनों अनाथों का विलाप सुनाई देता है

शाश्वत मृत्यु और आद्य यम के स्थान पर यह कौन-सी नूतन मृत्यु कैसा अभिनव यम है यह जो न स्वर्ग ले जाते हैं और न रौरव

लोग स्वप्नों में देखते हैं एक विकराल कृत्या जो अपने अस्थियों जैसे सफ़ेद दांत दिखाती हंसती हुई आई है और स्त्रियों के चूड़े सिन्दूर मंगलसूत्र लूटती हुई सारे नगर में दौड़ रही है

हाथ में पाश लिए अपना काला और पीला सिर मुंडाए हुए काल अहर्निश नगर के मार्गों पर चक्कर लगाता है        भवनों प्रासादों अट्टालिकाओं उपवनों यज्ञस्थलियों निवासियों नृपतियों को देर तक खड़ा ताकता रहता है        कभी दीखता है         कभी अदृश्य हो जाता है

फिर एक आग्नेय अट्टहास जो ब्रह्माण्ड के अंत तक टकराता गूंजता है
****
7 comments:

अद्भुत्त! अद्भुत्त!! बेहद अच्छी कविता है।


विष्णु जी की कविता पर मैं साहित्यिक तर्क या विचार रखने योग्य तो नहीं हूं, लेकिन यह कविता अद्भुत है। विचार भी।


awe aspiring ....all devils,evils and unexplained sins around and within us here, on this planet unique..hell might be wearing a deserted look ....


कवि को शतशः धन्यवाद, यह स्पष्ट करने के लिए कि संशोधन का कविता को लेकर हुई बहस से कोई सम्बन्ध नहीं. और यह बात हम पाठकों तक पहुँचाने के लिए आपका आभार, अनुराग जी!
जवाब देने के लिए ही सही पर थोड़ा-बहुत व्यक्तिगत आक्षेप तो गीत जी ने भी किया था. फिर शोभनीयता की नसीहत सिर्फ बेनामी बंधुओं को क्यों?


अनुराग भाई, पिछली पोस्ट पर जो बहस हुई थी, उसका लुत्फ़ आप उदासीन बने लेते रहे. और अब जब नई बल्कि संशोधित पोस्ट लगी और उस पर विष्णु खरे की पुरलुत्फ टिप्पणी भी तो उसमें एक टीप आपकी अपनी भी (शायद आपकी अपनी ही) है तो आश्चर्य हुआ. मेरा आशय आपकी इस टिप्पणी से है : `बेनामी बंधुओं ने कविता के अलावा भी बहुत से मुद्दों पर बहस की। हालाँकि ऐसा करते हुए उनके तर्क बहुधा व्यक्तिगत आक्षेपों तक पहुँच गए। यह शोभनीय नहीं। )
बेनामी कौन हैं, यह जानने में अपनी कोई अपवित्र जिज्ञासा नहीं है पर जो भी हैं, काफी शिक्षित और तर्कशील और विचारवान मनुष्य हैं. मुझे लगता है कि यह शोभनीय नहीं है कि आपको सिर्फ वे बहुधा व्यक्तिगत आक्षेपों तक पहुँचते लगे. मुझे तो लगता है कि कई बार उनकी बातों का जवाब बेहद बौखलाहट और गुस्से में देने की कोशिश की गयी. आप पिछली पोस्ट में बहस में हिस्सा लेते तो और अच्छा लगता. अब अचानक इस इकहरी फ़तवानुमा टिप्पणी से लगा कि यह अपने किसी दबाव में तो नहीं लिखी (हालाँकि आपने ऐसा किया नहीं होगा और अचानक आपकी अंतरात्मा ने दबाव बना दिया होगा.) .


anurag ji achhi kavita ...yah sanshodhit roop samajh me nhi aya?teer ek bar nikal gya to gaya...loutega to fool to nhi barsayega...kavita to maan ki upaj hai koi sochi samajhi kriya to hoti nhi pr ha kuch log hai bhi...


Kamal ka likha hai lekhak ne. Bas maza aa gaya... yesa laga jaise dilodimag taza ho gaya ho. etni achhi rachnawon se ru-ba-ru


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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