सबद
vatsanurag.blogspot.com

विष्‍णु खरे की नई कविता

{ मानव के नैतिक ह्रास के कारण अपरिहार्य, सृष्टि के अंत के लक्षणों और पूर्वसंकेतों का जैसा वर्णन और भविष्यवचन प्राचीन भारतीय परम्परा में है, वैसा शायद और कहीं नहीं है. बाइबिल के पूर्वार्ध 'ओल्ड टेस्टामेंट' में जेरेमियाह नामक एक संत-मसीहा हैं, जिन्होंने ऐसी ही दारुण भविष्यवाणियां की हैं और इस तरह उनके लिए 'जेरेमियाड' शब्द प्रदान किया है, लेकिन भारतीय चेतावनियों के लिए ऐसा कोई प्रत्यय संस्कृत में नहीं मिलता और मात्र 'अपशकुन' इनके लिए अपर्याप्त है. निस्संदेह ऐसी संकेतावलियों में हर युग और सभ्यता अपनी नैतिक अवनति और दुरावस्था का प्रतीकभास देखते आये हैं और भले ही मानव-जाति या सृष्टि का अंत अभी न हुआ हो, महर्षि वेदव्यास विरचित 'महाभारत' में वर्णित दुर्दांत अपशकुन, दु:स्वप्न और कुलक्षण इस इक्कीसवीं सदी में अधिक प्रासंगिक, आसन्न और अवश्यंभावी प्रतीत हो रहे हैं.
इस कविता को स्वीकृत, सुपरिचित अर्थों में पूर्णतः 'मौलिक' नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा अपने सुविख्यात मासिक 'कल्याण' के अगस्त १९४२ के विशेषांक के रूप में प्रकाशित महाभारत-अनुवाद 'संक्षिप्त महाभारतांक' से प्राप्त, उत्थापित, शोधित, उत्खनित, अन्वेषित तथा आविष्कृत ( प्रबुद्ध पाठक जो चाहें सो कह लें) है. कुछ अंश अवश्य प्रक्षिप्त किये गए हैं, किन्तु भगवान कृष्णद्वैपायन के विश्व-काव्य में ऐसे प्रक्षेपणों को एक आपराधिक प्रमाद ही कहा जायेगा. तब भी यह दुस्साहसिक विनम्रता में यहाँ प्रस्तुत है. } - कवि

प्रलय-संकेत
(तुभ्यमेव भगवंतं वेदव्यासं)

दिवस और रात्रि में कोई अंतर नहीं कर पाता मैं    दोनों समय ऐसे दीखते हैं जैसे सूर्य चन्द्र नक्षत्रों से ज्वालाएं उठती हों

दोनों संधिवेलाओं में देखता हूँ दिवाकर को घेरे हुए एक मृत शरीर जिसके सिर भुजा जंघाएं नहीं हैं
  धधकती हैं दोनों संध्याओं की दिशाएं

अंतरिक्ष में टकराते हैं धूमकेतु उल्काएं ग्रह उपग्रह तारागण   क्या गरजता है यह मेघों के बिना कौन-सी विद्युत् कौंधती है    रात में बरसते हैं रक्‍त मांस-मज्जा

नदियों के जल में लहू पीब भ्रूण बहते दीखते हैं    वे अपने उद्गमों को लौटने लगती हैं    कूपों तालाबों नालों से विषैले झाग उठते हैं

पर्वतों से कौन-सा भयानक नाद उठता है यह  उनके शिखर और शिलाएं रेत जैसे ध्वस्त होते हैं

सागर उफनते हैं भूकंप से अपने तट तोड़कर धरती को डुबोते हुए

दुर्गन्ध उठती है अग्नि से

कभी आकाश में सात सूर्य एक साथ उदित होते हैं    मुंड और कबंध की तरह राहु और केतु कभी जुड़ते कभी अलग दीखते हैं     चन्द्र के लुप्त होने पर कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष कब परिवर्तित होते हैं ज्ञात नहीं होता    

नष्ट हो गई हैं मेरी इन्द्रियों की क्षमताएं अपनी चेतना खो चूका हूँ मैं

वंध्या शाखाएं वर्णगंधहीन अवास्तव फलों से लद गई हैं जिन पर कोई नहीं मंडराता जिन्हें कोई नहीं खाता    हरे वृक्ष ठूंठ हो जाते हैं और जलने लगते हैं

कभी भी चलने लगते हैं डरावने बवंडर    उनसे बालुका नहीं पीसी हुई हड्डियों का चूर्ण बरसता है
मध्याह्न में अमावस्या की अर्धरात्रि का अंधकार छा जाता है

ज्येष्ठ और वैशाख में लुप्त सरिताएं नगरों को डुबो देती हैं    मरुस्थल में दिन में हिमपात होता है सरीसृपों को मारता हुआ

एक गरुड़ दीखता है जिसके माथे पर चोटी और सींग हैं उसके तीन पंजे हैं और चोंच के स्थान पर चार दाढ़ें हैं

वृक्षों पर बैठे गीध श्येन और चील शवों की घात में नीचे देखते हैं    कोकिलों शुकों मयूरों चातकों के कंठ से लपटें और चीत्कार निकलते हैं    वे ध्वजों पर बैठकर उन्हें नोचते हैं

रात में एक पक्षी मंडराता है जिसके एक आंख एक डैना एक पंजा है और जब वह क्रुद्ध होकर बोलता है तो ऐसे कि कोई रक्त वमन करता हो

गीध घरों में घुस आते हैं और जीवित मनुष्यों का मांस नोचते हैं आतंकित जो आर्तनाद तक नहीं कर पाते

आकाश कभी भी टिड्डियों से आच्छादित हो जाता है जो प्रत्येक हरित वनस्पति और जीवित प्राणियों को खाती हैं

गर्दभों को जनती हैं गायें हाथियों को खच्चरियां श्वानों को शूकरियां

तीन सींग चार नेत्र पांच पैर दो मूत्रेंद्रिय दो मस्तक दो पूँछ तथा अनेक दाढ़ों वाले अकल्पनीय पशु जन्म लेते हैं और वर्णनातीत भयावह वाणी में बोलते हैं

चूहे छछूंदर गोधिकाएं चीटे तिलचट्टे सोते हुए स्त्री-पुरुषों के नख केश उँगलियाँ कुतरकर खाते हैं और उन्हें भान नहीं होता

सियार लोमड़ियाँ और लकड़बग्घे भरी दोपहर झुण्ड बनाकर निकलते हैं और कुत्तों बिल्लियों बछड़ों का आखेट करते हैं

बंधे हुए पशु अचानक चौंकने बिदकने लगते हैं पसीना पसीना हो जाते हैं उनकी आँखों से आंसू और मूत्रेंद्रिय से रक्त बहता है

अट्टालिकाओं पूजास्थलियों वाहनों के ध्वज कांपते हैं जलने लगते हैं    मानवहीन रथ चलने लगते हैं
शस्त्रों से लपटें उठती हैं

पाकशालाओं की रसोई में कीड़े बिलबिलाते दिखाई देते हैं

जो इस पृथ्वी पर कहीं दिखाई नहीं देते ऐसे भीषण प्राणियों को जन्म देती हैं स्त्रियाँ जिनमें से कुछ एक साथ चार-चार पांच-पांच संतान उत्पन्न करती हैं जो जनमते ही नाचती गाती हंसती हैं

सारी मर्यादाएं तोड़कर समस्त नारियां समस्त पुरुष परस्पर सम्भोग करते हैं अहर्निश हर संभव पापाचार होता है

संग्राम से पलायन करते हैं अचानक नपुंसक हो गए नवयुवक धूर्तों दस्युओं वेश्यालयों के स्वामियों का क्रीतदास बनने के लिए जिनके समक्ष स्त्रियाँ स्वेच्छा से निश्शुल्क निर्वसन होती हैं

किस निद्रा किस मूर्च्छा में चल रहा हूँ मुझे ज्ञात नहीं    मैंने कब नखों केशों दूषित वस्त्रों से अशुद्ध हुआ जल पिया या उससे स्नान किया    अपने संज्ञान में मैंने नहीं किया किसी रजस्वला किसी अगम्या से सहवास    मुझसे नहीं हुई कोई ब्रह्महत्या तब कैसे पराभव हुआ मेरा

मेरे पास धनुष था किन्तु उसकी प्रत्यंचा तक न चढ़ा सका मैं     मेरी भुजाओं में जो बल था अब नहीं रहा   सभी बाण नष्ट हो चुके मेरे तूणीर में कोई सायक नहीं     अपने किसी मंत्रपूत अस्त्र का आह्वान नहीं कर सकता मैं     मेरा पराक्रम नष्ट हुआ मेरे वंश का नाश हुआ

कौन से महापातक हुए मुझसे किसी पाप किसी महासंहार को रोक न सका मैं

अश्रुतपूर्व महारोग फैलते हैं    अकल्पनीय अपराध होते हैं     माता पिता पुत्र पुत्री भ्रातृ भगिनी पति पत्नी परस्पर हत्याएं करते हैं     नर-मांस से कोई घृणा नहीं करता

मरीचिकाओं में दिखती है स्वर्णनगरियों कल्पवृक्षों अप्सराओं अट्टालिकाओं की अमरावती जिसकी दिशा में दौड़ते हैं नर-नारी वो फिर लौटकर नहीं आते

लोग सत्पुरुषों पूर्वजों पूज्यों हुतात्माओं से द्वेष और उनकी निंदा करते हैं    आराध्य और अवतारों का ही नहीं सत्गुरुओं का तिरस्कार होता है     गुरुकुलों में हत्याएं होती हैं

बालक विकलांग होकर नाचते गाते अट्टहास करते हैं शस्त्रास्त्र लेकर वे मूर्तियाँ उकेरते और बनाते हैं परस्पर आक्रमण करते हैं कृत्रिम नगर बसाकर युद्ध करते हुए उन्हें वे नष्ट कर देते हैं

देवताओं की मूर्तियाँ कांपती अट्टहास करती रक्त उगलती खिन्न और ध्वस्त होती हैं आश्रम और पूजागृह धूलिसात हो जाते हैं

जब मंत्रोच्चार और जप किया जाता है तो ऐसा सुनाई देता है जैसे कुछ मानव-समूह आक्रमण कर रहे हों किन्तु कोई दिखाई नहीं पड़ता

किन्हीं दूसरे लोकों से आये राक्षसों जैसे प्राणी धन आभूषण छत्र कवच ध्वजा सहित नगरवासियों का भक्षण करते हैं

जब पूजा-अर्चना के वाद्य बजाए जाते हैं तो सूने घरों से घोर स्वर उठते हैं

जलते हुए खंडहर दिखाई देते हैं जिनसे दीन-हीनों अनाथों का विलाप सुनाई देता है

पुरातन यम और शाश्वत मृत्यु के स्थान पर यह कौन-सा नवीन यूं कैसी नूतन मृत्यु है यह जो न स्वर्ग ले जाते हैं और न नरक

लोग स्वप्नों में देखते हैं एक विकराल कृत्या जो अपने अस्थियों जैसे सफ़ेद दांत दिखाती हुई आई है और स्त्रियों के आभूषण लूटती हुई सारे नगर में दौड़ रही है

अपना काला और पीला सिर मुंडाए हुए काल प्रतिदिन नगर के मार्गों पर चक्कर लगाता है     भवनों प्रासादों अट्टालिकाओं उपवनों निवासियों नृपतियों को देर तक खड़ा देखता रहता है    कभी दीखता है
   कभी अदृश्य हो जाता है

फिर एक अट्टहास जो ब्रह्माण्ड के अंत तक जाता गूंजता है.
****
(चित्र-कृत : बारबरा सिमास)
32 comments:

अनुराग जी,

अब तो दो ही विकल्प बचते हैं मेरे पास. आत्महत्या या जिहाद. बताइए क्या करूँ! नैतिक ह्रास की बातें उतनी ही पुरानी ही हैं, जितने उससे लड़ने वाले हमारे हिन्दी के महारथी. उन्हें महाभारत का यह वीभत्स पतन-प्रसंग ही क्योंकर रास आने लगा है आजकल, ये सोच रहा हूँ.

रविकान्त


विष्णु खरे के यहाँ काव्यानुभूति उनके कर्त्तव्यबोध से भिन्न वस्तु नहीं है. वह एक कर्त्तव्यसंभवा कविता है, लेकिन, दिलचस्प है कि समसामयिकता के कर्त्तव्यों में सीमित नहीं है, उसमें बहुत सा व्यतीत वर्तमान है और ज़ाहिर है कि बहुत सारा वर्तमान भी. कविता में एक साथ कई समयों का यहाँ किया गया आह्वान उस काव्यरीति से बिलकुल अलग मुद्दा है जिसमे कविता के माध्यम से किसी प्राचीन कथा का ''आधुनिक'' भाष्य किया जाता है. परंपरा का आधुनिकता में अनुवाद. यह विष्णु खरे का रास्ता नहीं रहा. इसलिए कविता के मिथकेतर हिस्सों में भी वही गरिमा या वज़न है. अर्जेंसी तो एक नायाब चीज़ है ही, लेकिन उसके कारण कविता को प्राचीन-अर्वाचीन के द्वैतों में उलझाकर देखना शक्ति को सीमा में अवमूल्यित करने की हमारी कमजोरी होगी. ऐसी कविता से पुराने को देखना भी सीखा जाना चाहिए. यह कविता पढ़ते हुए कमलेश ( और उनके जरत्कारु ) की याद आती रही है. कभी वह भी सबद पर प्रकाशित हो.


सवाल यह है कि इस कविता का मकसद अगर प्राचीन कथा के माध्यम से आधुनिक का भाष्य करना नहीं था, तो यह ‘अपना होना’ कैसे सिद्ध करती है? कितना दिलचस्प है कि अपनी कठिनमति आलोचना से व्योमेश नें, इसमें अपने समय का भाष्य खोजने की सहज पाठकीय चेष्टाओं पर विराम लगा कर इसे, ‘पुराने को देखना सीखा जाना चाहिए’ की निरालम्ब प्रतिज्ञा से रचित सावित करने का अवान्तर प्रयत्न किया है। व्योमेश के अनुसार, परम्परा का आधुनिकता में अनुवाद अगर विष्णुखरे का रास्ता नहीं है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि विष्णु खरे यह मान चुके हैं कि अब हम हर तरह की सामाजिक-सांस्कृतिक हीनताओं से मुक्त एक ऐसे आत्मस्थ, समृद्ध,विडम्बनामुक्त और विश्रामावस्था को प्राप्त देश-समाज में पहुंच गये हैं, जहां अतीत के संदर्भो में अपने समय के प्रश्नों का समाधान खोजने की जरूरत समाप्त हो गई हैं। अतीत के आख्यान अब सिर्फ हमारी विस्मृति के विवर्त में सुप्त से पड़े हुए कुछ अप्रयोज्य प्रसंग है, जिन्हें हम याद तो करते हैं,या करना चाहते हैं, मगर किसी प्रयोजन से नहीं। सिर्फ स्मृति का सुख प्राप्त करने के लिए। गुजरे को चकित भाव से देख लेने के लिए। पूछना जरूरी है कि हम क्या अपने अतीत से सचमुच इतना दूर निकल आए हैं,या इतना समर्थ हो चुके हैं कि अतीत अब हमारी जरूरत नहीं रहा? क्या अब कविता में रचे गये मिथकीय वातावरण को उसी आनन्द भाव से पढ़ना चाहिए जैसा कि व्योमेश नें प्रस्तावित किया है? जाहिर है, यह प्रश्न, जो हमारे जैसे पाठक को परेशान कर रहा हेै,वह विष्णुखरे जी को भी, अगर उन्हें लगता है कि उनके समय में मिथकांे की जरूरत अभी खत्म नहीं हुई है, अवश्य ही परेशान कर रहा होगा। मेरा मानना है कि हम जिस समय और समाज में हैं,मिथक उसकी उर्जा का अजस्र स्रोत हेै। मिथक अभी हमारे लिए आनन्द और अचरज से पहले एक जरूरत है। इसलिए कहना गलत न होगा कि स्थूल सांसारिक प्रयोजनों जैसे कामो से बाहर निकाल कर कविता को आनन्द का स्रोत बनाने की सदिच्छा से प्रेरित व्योमेश की आलोचना-दृष्टि अपने आप में एक ऐसी भविष्यत दृष्टि है जो हमारे आज के समय में किसी मिथक से कम रोमांचक नहीं है किन्तु जिसके साकार होने की अभी तो सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है।
अच्छा हो कि कविताओं पौराणिक मिथकों से अपने समय का रूपक रचने में निष्णात विष्णु जी ही बताएं कि वे कविता में मिथक-प्रसंगों को किस तरह पढ़ा जाना पसंद करेंगे ।


एनानिमस चाहे जो भी हों बात पते की कही है।
मुझे यह कविता पढ़ते हुए अपनी रीढ़ की हड्डियों में एक सिहरन साफ़ महसूस हो रही है। हर नया पाठ उस वरिष्ठ ज़िम्मेदार कवि की निराशा और उद्विग्नता के नये आयाम खोलता हुआ। दरअसल, सच कहूं तो इसे पढ़ते हुए 'किसी पुराने को देखना सीखने' की ज़रूरत महसूस नहीं हुई यह मेरे लिये नये को करीब से देखने के लिये एक बेहतर लेंस जैसी लगी।


बहुत अदा बना बना के आलोचना लिखने के बजाए अगर यह कहा जाए कि यह हमारे समय की अंधा युग (भारती) से आगे की 'नैनो' व्याहख्या है जो पाठक को सुन्न कर देती है तो बात आसानी से समझ में नहीं आएगी ? दूसरा मिथकों की वर्तमान व्याख्या करते समय हम सभ्यता को अवि‍भाज्‍यता में भी देख रहे होते हैं. अगर ऐसा है तो अखिल चेतना (चेतन-अवचेतन, सभ्य‍ता-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान) का एवोल्यूशन हो रहा है या यह अपने अंत (जड़ता - एनर्शिया (?)) की ओर बढ़ रही है. यह बात काव्यालोचना के पाठ्यक्रम से बाहर प्रतीत हो सकती है, पर सोचें तो है नहीं. इसलिए इस नजर से भी विचार होना चाहिए.


कविता जितनी अद्भुत है .....चित्र भी उतना ही अद्भुत है .....


इस कविता को पढ़ते हुए मुझे ईशोपनिषद का एक श्‍लोक याद आता है-

यस्‍तु सर्वाणि भूतान्‍यात्‍मन्‍येवानुपश्‍यति
सर्वभूतेषु चात्‍मानं ततो न विजुगुप्‍सते

इसका अर्थ है कि जो व्‍यक्‍ित संपूर्ण भूतों (यानी जगत, प्राणियों, अस्तित्‍वों) को अपनी आत्‍मा में देखता है और फिर संपूर्ण भूतों में भी अपनी ही आत्‍मा देखता है, उसमें किसी से घृणा नहीं होती. इस श्‍लोक की डेढ़ पंक्तियां कविता को समझने में मेरी मदद करती हैं. यह सर्वात्‍मदर्शन-समरसता है, जो कविता को संभव, प्रासंगिक और रूपकार्थ देती है. भारतीय दर्शन की पौराणिक शब्‍दावली में ही कहें तो इसमें प्रत्‍यभिज्ञानदर्शन और सर्वात्‍मदर्शन दोनों ही हैं. स्‍व को सर्व में और सर्व को स्‍व में ले जाने का आचरण-अभ्‍यास. इसीलिए यह कविता एक साथ इतने समयों में, स्‍वयं आसानी से किंतु पाठक को किंचित मुश्किलें देती, विचरण करती है. अतीत में वर्तमान है, वर्तमान में भविष्‍य और अतीत, भविष्‍य में घटने वाला अतीत भी. इसे पढ़ने के लिए यह क़तई ज़रूरी नहीं कि आप वर्तमान (या सिर्फ़ वर्तमान या सिर्फ़ अतीत) की ड्योढ़ी पर ही बैठे हों. आप किसी एक समय को समझ या देख रहे हों. अपने विधान, विन्‍यास और कथा-उत्‍स में यह कविता ख़ुद मारक शब्‍द-शक्ति की तरह किसी ऐसे टीले या बेहतर कहें, ध्रुव पर बैठी हुई है, जहां से वह पूरी गोलाई में सब-कुछ को देख रही है. यहां उसे सत्‍य या समय के साथ जोड़ना पाठक को 'अर्थ पा लिया' के यूरेकाटाइप विजयोल्‍लास से अवश्‍य भर दे, कविता के पूर्ण-पाठ को सीमित कर देगा. यह बहुत सूक्ष्‍म स्‍तर पर 'काल और अवधि के दरमियान' घटित होती है, किसी अ-जाने अंडरवर्ल्‍ड में जो कि अंडर-वर्ल्‍ड भी नहीं. वह ध्रुव भी इसी काल और अवधि के बीच कहीं है. "पुरातन यम और शाश्वत मृत्यु के स्थान पर यह कौन-सा नवीन यूं कैसी नूतन मृत्यु है यह जो न स्वर्ग ले जाते हैं और न नरक" जैसी पंक्‍ित किस तीसरी जगह का संकेत है? कविता के अंत में आए हुए काल और कृत्‍या इसे किसी भी वर्तमान, किसी भी व्‍यतीत, किसी भी भविष्‍य से निरपेक्ष कर देते हैं. भारतीय दर्शन काल और कृत्‍या को समय व अवधि में बांधने से इंकार भी करता है.

इसके प्रतीकाभास व रूपकार्थों पर तो स्‍वयं कवि ने अपनी टिप्‍पणी में इशारा कर दिया है.

यह कविता कला-कविता-अध्‍यात्‍म-दर्शन-विज्ञान-अभिज्ञान की शुद्धता (या शुद्धि) पर आक्षेप करती है. पारंपरिक अर्थों की यह 'अशुद्धि' ही इसकी अभिव्‍यक्ति की सफलता भी है. इसकी एक और ख़ूबी है- यह अपनी भाषिकादि संरचना में सत्‍य की अवधारणाओं को (सत्‍य के हज़ार अर्थों में प्रलय, सर्वनाश, आर्मागेडॉन, एपोकैलीप्‍प्‍स भी हैं) किस क़दर देखने की कोशिश करती है कि यह अनुभूति के स्‍तर पर अध्‍यात्‍म व आशंका है, व्‍यंजना के धरातल पर कला है, अनुसंधान की प्रक्रिया में विज्ञान है, दर्शन के प्रांगण में तर्क है, कूटार्थ में ऐलीगरी है और गुह्यार्थ में पुन: अनुभूति.


कवि ने महाभारत का कई बार बखूबी उपयोग किया है. ऐसा भी होता है कि महाभारत कवि का उपयोग करने लगे.
...और व्योमेश शुक्ल जिस तरह इस कविता को देख-दिखा रहे हैं, इस समय यह उनसे स्वाभाविक रूप से अपेक्षित भी है.


अतीत हमेशा किसी भी भविष्य के लिये अनिवार्य है, उसकी वर्तमानता का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है? जो अनिवार्य है वह व्यतीत नही है (हालाँकि अनिवार्यता की वरीयता भी भिन्न ही होगी सबकी), उसे नया-पुराना या जो भी कहिए, जैसे महाभारत की कथा - बीते चार हज़ार बरसों में कभी भी, क्या वह कम प्रासंगिक रही है, और अगर कोई इस कविता से 'पुराने को देखना' नही सीखना चाहता तो कोई बात नही, वह नये को देखना सीख ले, लेकिन वाक्यों को ठीक उद्धृत करे. मेरा वाक्य है - " ऐसी कविता से पुराने को देखना भी सीखा जाना चाहिए.'' और मेरे मुंह में डाला गया वाक्य है - " ऐसी कविता से पुराने को देखना सीखा जाना चाहिए.'' अन्यथाकरण की हड़बड़ी में, वैसे, बहुतेरे 'भी' ग़ायब किये जाते रहे हैं. ख़ैर. सहजता का यहाँ कुछ ज़्यादा ही आग्रह है, इसलिए 'ऐतरेय ब्राह्मण' के वैसे ही सहज और प्रसिद्ध श्लोक का अर्थ बता रहा हूँ, जिसके मुताबिक़, '' सोने वाले का नाम कलि है, अंगड़ाई लेनेवाला द्वापर है, उठकर खडा होने वाला त्रेता है, और चलने वाला कृतयुगी होता है, इसलिये चलते रहो, चलते रहो.''(कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः / उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति कृतं सम्पद्यते चरन).तो क्या एक ही जीवन में सारे युग अंतर्भूत नहीं होते आए हैं? क्या सारे युगों की समांतरता का एक समुज्ज्वल अतीत नहीं रहा है जो मसलन इस कविता या ऐसी कविता के ज़रिये फिर से वर्तमान है?


व्योमेश किसी और के बारे में मै नहीं जानता पर अपने रिस्पांस में मैंने 'भी' का पूरा ध्यान रखा था…

आपको हर्ट करने का मेरा इरादा नहीं था।


अनुराग,
यहाँ व्योमेश से आंशिक असहमति व्यक्त करते हुए यह कहना चाहता हूँ की समय कई नहीं, एक ही होता है, या फिर, होता ही नहीं है. समय है ही नहीं. अगर कुछ है तो स्मृतियाँ हैं जिन्हें हम काल में बाँध देते हैं, यही हमारा समय होता है. खरे जी की इस कविता से मुझे बहुत कुछ मिला. आज कल मेरी भी मनः स्थिति प्रलय और भौतिक के अंत से आक्रांत है. कुछ शब्द, कुछ बिम्ब ऐसे थे जिन्होंने मुझे झिंझोड़ कर रख दिया. ऐसा लगा एक लगभग भागी हुई अभिव्यक्ति मिल गयी. छोटे अपने बड़ों से ऐसे ही सीखते हैं और फिर अपनी तरह से उसको संप्रेषित करते हैं. निश्चय ही यह कविता मेरे लिए भविष्य की कविताओं का द्वार खोलने वाली है. आज कल जो लिख रहा हूँ वह भी संभावित अंत की कल्पना में कब से खड़ी मानवता के आत्मान्वेषण पर ही कुछ है. आप सब से आशीर्वाद चाहता हूँ, भले ही हमारे प्रबुद्ध मित्रों को मेरी कविता vague लगे. इंशाल्लाह !
खरे जी को प्रणाम.
तुषार धवल


महान कविता . मैं ने हिन्दू ग्रंथ नहीं पढ़े हैं. न ही दर्शन जानता हूँ. लेकिन विष्णु खरे की कविताएं पढ़ कर मुझे बार बार मलाल होता है कि मैं ने महाभारत क्यों नहीं पढ़ा( संस्कृत क्यों न सीखी )? वैसे मेरी स्मृतियों में एक * मैत्रेय * हाहाकार मचाए रहता है. वह भविष्य का बुद्ध है. कुछ कुछ कल्कि कुछ मंतज़र जैसा. पर वह बिगल बजा कर अपनी प्रजा का उद्धार नहीं करेगा.... वह बौना ईश्वर सर्वनाश का संदेश ले कर आएगा. उग्र और हिंसक और वीभत्स होगा.भविष्य का यह मिथक मुझे जितना विचलित करता है,उतना ही आकर्षित भी.. खरे जी की कविताओं की तरह.और मैं क़तई नहीं चाहता कि वह भाई क्या नाम उस का..... काल या कृत्या या मैत्रेय कभी भी आए मेरी इस खोब्सूरत पृथ्वी पर ... लेकिन हम मिथकीय चेतना को हमेशा अतीत के साथ क्यों जोड़ देते हैं?क्या यह अनिवार्य है?


चलिए व्योमेश जी, ‘भी’ के लिए माफी मांग लिया। मगर इससे जो फर्क पड़ा, उससे आप क्या यह कहना चाहते हैं कि आप नें जो कहा है, वह मुख्य नहीं गौण बात है? यदि हां, तो भला यह गोैण बात कहने की ऐसी क्या आवश्यकता थी ? क्या यह अलग से बताने की जरूरत थी कि पुराने का आधुनिक भाष्य पुराने को देखना सीखे बिना सम्भव ही नहीं है? असल मे सारी मुश्किल की जड़ आप के उस विचार में है,जिसे आप ने अपनी दूसरी टिप्पणी में कोष्ठक में लिखा है: यह बिलकुल स्वाभाविक हैं कि अपनी अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप हर कोई कविता और समय के बीच संबंधों की अनिवार्यता तय होते देखना चाहता है। आप की वरीयता निश्चय ही वह नहीं प्रतीत होती जिसकी तरफ मैनें अपनी पहली टिप्पणी मंे ही इशारा कर दिया था। यह तो सर्वविदित ही है कि आत्मस्थ, सर्वथा, समृद्ध, बिडम्बनामुक्त और विश्रामावस्था को प्राप्त व्यक्ति या देश-समाज की वरीयता वह नहीं होगी जो हमारे समाज की बहुसंख्यक जनता की है। आप की वरीयता क्या है,इसे आप ही को स्पष्ट करना होगा। हम तो सिर्फ अनुमान ही कर सकते हैं। और अनुमान के गलत होने का अपराध मैं अपने सिर नहीं लेना चाहता।
पुनश्च: अपने लिखे को शब्दशः अकाट्य मानने का अहंकार जनता के कवियों और आलोचकों में कम ही देखने को मिलता है। जिन्हें भ्रम है कि वे वेद वाक्य लिख रहे हैं,दुर्भाग्य से मैं अभी उस महानता से बहुत बहुत दूर हूं। यह गलती उसी गवांरपने में हुई होगी। आप को वह पूर्णता प्राप्त हो चुकी है। बधाई!सापप
पुपुपुसामाजिक.सांस्कृतिक


यह कविता, अगर समझे जाने के लिए, पाठक के सामने अपनी ड्येाढ़ी छोड़ देने(गीत चतुर्वेदी) और किसी ध्रुव की ऊंचाई से पूरी कायनात को देख सकने की सर्वात्मवादी निरपेक्ष दृष्टि से सम्पन्न होने की शर्त रखती है, तो हिन्दी के पाठक को यह स्वीकार कर लेने में कोई शर्म नहीं होनी चाहिए कि वह ऐसे किसी सर्वात्मवाद में भरोसा नहीं करना चाहता। वह जिस वैर-भाव-ग्रस्त, विषम तथा स्वार्र्थी समाज में रहता है, वहां गीत चतुर्वैदी वाले उच्च आत्मिक धरातल से समाज को देखने की कल्पना किसी अश्लील आत्मछल से कम नहीं है। यह दीगर बात है कि एक निर्वैर समाज में जीना उसका भी स्वप्न है। मगर वह इस सचाई का क्या करे कि एक निर्वैर समय के निर्मण के लिए उसे हमेशा ही अनवरत संधर्ष की अनिवार्य परिस्थितियों में जीना और मरना पड़ता है। हिन्दी का पाठक हिन्दी की जनता से बाहर का प्राणी नहीं है। वह ऐसे कवियों और आलोचकों से ध्णा करता है जो इस समाज मे निर्वैरता के दर्शन का धुआं फैला कर लूट का कारोबार करने वाली शक्तियों का वैचारिक सांस्कृतिक ढाल बने हुए हैं और पाठकों को कविता के ललित भाव में डुबो देने की राजनीति कर रहे हैं। विष्णुखरे की कविता की समरसतावादी रहस्यात्मक व्याख्या देने वाले भी खूब जानते हैं कि कविता की मुक्ति जीवन और समाज से निरपेक्ष हो जाने में नहीं, बल्कि उसी में अपना अर्थ पा लेने में है। वे जिन्हें जीवन में जीने के संसाधन स्वतः प्राप्त हैं,या जो इस संघर्ष-चरण से बाहर निकल चुके हैं और जिन्हेांनें अपने ज्ञानात्मक संवेदन को शेष समाज से पृथक कर लेने का अभ्यास कर लिया है, वे इसी संसार में अपने निजी संसार की अभीप्साओं की पूर्ति के लिए कविता को एक नई भूमिका में उतारना चाहते हैं। कविता की दुनिया में दो संस्कृतियों के इस संघर्ष में गीत चतुर्वेदी और व्योमेश का अपना पक्ष है जो एक दम स्प्ष्ट है। दुख और क्षोभ तब होता है जब ये लोग जनसंस्कृति के पाले में आ कर अपना खेल खेलते हैं ।


यह अनाम महोदय मिस-रीडिंग, मिस-कोटिंग और मिस-अंडरस्‍टैंडिंग के न पहले अपवाद हैं और न अंतिम आखेट.
मैंने एक बार भी 'इस कविता को समझने के लिए किसी शर्त' जैसा नहीं कहा, बल्कि मेरा कहना है कि इस कविता को समझने के लिए किसी भी ड्योढ़ी पर बैठने की ज़रूरत नहीं. आप इसे कहीं से भी देख सकते हैं. (जिस ड्योढ़ी पर अनामेश बैठे हैं, वहां से भी.
) काल और समय से निरपेक्ष होना जीवन और समाज से निरपेक्ष हो जाना भी नहीं.
इन्‍हें कविता से ज़्यादा कविता पर हो रही टिप्‍पणियों में दिलचस्‍पी है, तभी उत्‍साह में या जल्‍दबाज़ी में ग़लत पढ़े जा रहे हैं.
आपकी बाक़ी बातें तो दरअसल आपकी ही बातें हैं, उन पर क्‍या कहना!


पता नहीं क्यूँ लेकिन फ़र्स्ट इंप्रेशन में यह कविता मुझे के सच्चिदानंदन की कविता -''दुनिया का अंत'' की याद दिला रही है...


गीत जी, अगर मैं कहूं कि आप हमें गलत समझ रहे हैं,या सच्चे मन से समझने का प्रयास नहीं कर रहे, तेा आप कहेंगे कि मैं आप की ही बात आप पर दुहरा रहा हूं । इसलिए अब तो लगता है कि आप से सीधी भाषा में बात करने से ही बात बनेगी। मैं पूछना चाहता हूं कि इस कविता को ही नहीं, किसी भी कविता या साहित्य को पढ़ने और समझने के लिए किसी ड्यौढ़ी पर बैठना जरूरी क्यों नहीं है? आप कहेंगे कि इससे आप का विरोध ही कहां है? ठीक। मगर आप यह न समझें कि मैं आप की बात या बात के पीछे का व्यंग्य नहीं समझ रहा। एक की जगह अनेक ड्योढ़ियों का विकल्प खुला रखने(या कई विकल्प गढ़ देने) का आप का प्रस्ताव समझ से परे नहीं है। अब तो आप से यह भी कहना पड़ेगा कि यह न सोचें कि अगर आप किसी प्रागैतिहासिक चेतना की ड्योढ़ी पर बैठ कर आज की कविता पढ़ने का प्रच्छन्न प्रस्ताव करेंगे तो इसके लिए वैचारिक वहुलतावाद के तर्क से आप की पीठ थपथपा दी जाएगी। अगर आप अपने वर्तमान के दायित्व से तनिक भी बंधा महसूस करते हैं (ओैर यह कोई सिर्फ माक्र्सवादी विचार नहीं है कि आप बिदकें), तो आप को अपनी ड्यौढ़ी तय करने के साथ साथ यह भी देखना पड़ेगा कि कोैन किस ड्योढ़ी पर बैठ कर, और किस तरह, किसी कविता को पढ़ने और देखने का कैसा प्रस्ताव कर रहा है। यह न समझें कि आप जैसे लोग शुद्ध ज्ञानमीमांसीय अथवा भाववादी दार्शनिकताओं का सहारा ले कर, साहित्य और संस्कृति के दायरों में, अपने भद्रवर्गीय दृष्टिकोण का प्रभाव निर्मित करते रहेंगे और पाठक उसे ही साहित्य और संस्कृति की दुनिया का सत्य मान लेगा। आप को क्या अलग से बताने की जरूरत है कि अगर हम किसी भी तरह से समाज से अपना सम्बन्ध महसूस करते हैं तो साहित्य को समझने के लिए हमें उसी ड्योढ़ी पर जाना होगा जहां से हमारी वर्तमान की समझ खुल सकती हो, या जहां से वर्तमान की बिडम्बनाओं से बाहर निकलने का रास्ता दिखता हो ? क्या यह स्पष्ट नहीं है कि हम जिस वर्तमान की जकड़ में हैं, उसमें धंस कर ही उसका अतिक्रमण किया जा सकता है?
इसके आगे भी देखें....


और भी साफ शब्दों में सुन सकते हों, तो कहना चाहूंगा कि इस देश-काल का संवेदनशील नागरिक होने के कारण भी हमारा धर्म बनता है कि हम अपने समय (की कविता) को किसी समयातीत भाव से नहीं,बल्कि समय में ही ( भी नहीं) रह कर देखें और देखना सीखें। मगर यह तो तब संभव होगा जब आप अपने समय की उत्पादन शक्तियों के साथ किसी किस्म का संवेदनशील रिश्ता महसूस करते होंगे। अन्यथा तो निरपेक्षवादियों के लिए ‘मोक्ष’ और ‘निर्वाण’ का अध्यात्म-मार्ग हमारे यहां मौजूद ही है। यह तो स्पष्ट ही हेै कि सर्वात्म-दर्शन,जो आप को विष्णु खरे की कविता का अर्थ करने का रास्ता दिखाता है,वही आप की ड्योढ़ी है। मेरा विरोध यह नहीं है कि आप उस ड्योैढ़ी पर क्यों हैं। हम सब लोग भी इसी उम्मीद में हैं कि एक ऐसा समाज बने जब साहित्य पर अपने समय में बंधे रहने की बाध्यता नहीं रह जाय और देशकालातीत चिंतन में रमने का अवकाश हो। अगर कोई ऐसा समाज कभी बना तो यकीन मानिये कि हमारे जैसे लोग भी उसी ड्योढ़ी से साहित्य को पढेंगे जहां से आप आज से ही पढ़ रहे हैं। मैं तो सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि आप जिस कालातीत भाव से कविता को देख रहे हैं, वह अपने वर्तमान से दायित्वपूर्ण सम्बन्ध अनुभव करने वाले किसी शासित या प्रशासित नागरिक की ड्योढ़ी नहीं है। अपनी मूल टिप्पणी में आप ने कहा है कि ‘‘इसे पढ़ने के लिए कतई जरूरी नहीं कि आप वर्तमान (या सिर्फ वर्तमान या सिर्फ अतीत) की ड्योढ़ी पर ही बैठे हों’’,। मगर मेरे विरूद्ध प्रतिक्रिया में लिखी बाद वाली अपनी टिप्पणी में आप का विचार बदल कर कुछ यूं हो गया है: ‘‘इस कविता को समझने के लिए किसी भी ड्योढ़ी पर बैठने की जरूरत नहीं।’’ मैं आप के इस हास्यास्पद वैचारिक प्रस्थान पर एक शब्द न कहूंगा। यह आप की नही,ं उस विचार-दर्शन की बिडम्बना है जिससे आप परिचालित हैं। मजेदार बात तो यह कि व्याख्या के नाम पर लिखी गई आप की टिप्पणी में विष्णु खरे की कविता की वर्तमानता पर एक शब्द नहीं है। वह तो सीधे ईशोपनिषद के श्लोक से शुरू होती है। मेरा विरोध यह नहीं कि यह श्लोक क्यों। मगर वहां कविता का वर्तमान से सम्बन्ध खोजने की कोई तो चेष्टा होनी ही चाहिए थी! चलिए,यह भी मान लिया कि आप नें उसे वर्तमान से जोड़ कर देखना जरूरी नहीं समझा ।
आगे भी....


मगर क्या आप बताएंगे कि आप नें क्यों इस कविता को अपने समय के सत्य के साथ जोड़ कर देखने की किसी भी पाठकीय कोशिश को ‘यूरेका टाईप’ आदि कह कर मजाक मजाक में उड़ा दिया है ? फिर आप कैसे कह सकते हैं कि आप नें ‘‘इस कविता को समझनें के लिए किसी शर्त जैसी बात नहीं की है’’ ? क्या यह दूसरे केे मुकाबले अपनी ड्योढ़ी को अधिक सुसंगत बताने, बल्कि उसे ही एक मात्र ड्यांढ़ी बताना बताना नहीं है ? अगर मान ही लें कि आप नें सीधे सीधे ऐसा कुछ नहीं कहा है, तब भी पूछना चाहूंगा कि आप क्यों इस कविता को वर्तमान के अलावा किसी अन्य ड्योढ़ी से भी ( अतीत या भविष्य) पढ़ने की प्रस्तावना करना चाहते हैं ? इस कविता का अपने वर्तमान से सम्बन्ध क्या इतना ज्यादा खुला और स्पष्ट है कि उसपर बात करने की जरूरत ही नहीं है? या यह कविता क्या अपने वर्तमान से इतनी निरपेक्ष है,या होना चाहती है, या कालातीत होने की अभीप्सा से भरी हुई है कि उसे महान और साथर््ाक साबित करने के लिए उसमें कालातीत होने का तत्व खोजना इतना अनिवार्य हो जाता है कि आप जैसे व्याख्याकार उसका वर्तमानकालिक अर्थ करने की बजाय सीधे उसे कालातीत ही सिद्ध कर डालना चाहते हैं ? आप यह न समझें कि आप जिस भाषा और भावप्रणाली से इस कविता को देख रहे हैं,वह हिन्दी के आम (आप के शब्दों में यूरेका टाइप) पाठक के बस की बात नहीं है। यह भी न समझें कि इस कविता की व्याख्या करने का आप का ढंग बड़ा निगूढ़, और उच्चप्रबोध का प्रमाण है। आप जिन दार्शनिक पदों की मदद से इस कविता को अधिलौकिक अर्थो तक उठा देने की बौद्धिकता दिखा रहे है, वैसा प्रवचन तो हमारे देश में तमाम आशाराम बापू मार्का कथावाचक गलीकूचों में पाण्डाल लगा कर रोज ही करते रहते हैं। आप की तर्कशील आधुनिक समझ का असली कमाल तो तब होता जब आप शुद्ध अध्यात्मिक-धार्मिक प्रत्ययों से रची गई कविताओं की भी समकालिक व्याख्या कर के रोमांचित कर देते। मगर आप के ज्ञान का रोमांच तो वस्तु को ही भाव सिद्ध कर देने में है।
जहां तक ‘मिसरीडिंग’,‘मिसकोटिंग’ और ‘मिसअण्डरस्टैण्डिंग’ की बात है, तो कहना यह है कि हिन्दी का नवसिखुआ पाठक भी इतना तो जानता ही है कि ऐसे जुमलों से किसी की बात हवा मे उड़ाने की युक्ति कबकी पिट चुकी है। वह यह भी जानता है कि शब्दों का अर्थ सिर्फ शब्दों के भीतर ही नही,ं उसके आगे या पीछे भी होता है। इसलिए वह आप के शब्दों में व्यक्त मत को ही नहीं,मंतव्य को भी पढ़ता है। आप इतने भेाले तो न बनें कि आप नहीं जानते कि आप जो कहना चाहेते हैं वह किसी की समझ में न आएगा और हर कोई आप के शब्दों को शब्दशः शिरोधार्य कर लेगा। बाइ द वे, क्या आप सचमुच मानते हैं कि इस कविता की सर्वात्मवादी व्याख्या करते हुए ड्योढ़ी वाली बात आप नें अनायास ही कह दी थी ? आप का व्यंग्य इतना बारीक तो न था कि समझना ही मुश्किल था? सच तो यह हैै कि इस एक शब्द नें आप के मंतव्यों का खुलासा कर दिया है और अब आप कुछ भी कहें, बात तो कही जा चुकी है।
अंतिम से पहले की एक बात यह कि आप की बिडम्बना यह है कि आप साहित्य और विचार की एक ऐसी निरापद दुनिया में रहना चाहते हैं, जो कि विषमताओं से भरे इस समाज मे नसीब होने से रही। यह तो आप जानते ही होंगे कि निरापद विचारों का ‘होना’ किसी निरापद समाज में ही संभव है। समस्याओं अैार स्वार्थेा के रहते भला यह कैसे संभव है कि यह समाज आप जो कहें उसे आप का निजी विचार मान कर सुन ले और उसके निहितार्थों की छान बीन न करे। ओैर अंतिम बात यह कि विष्णु खरे की जिस कविता पर यह चर्चा हो रही है,यह क्या कविता की व्याख्या नहीं हैं ? व्याख्या से पहले व्याख्या की नीति पर चर्चा की ही जानी चाहिए। विचारों में निर्वंधता की पैरवी का जो नया दौर शुरू हुआ है, वह बहुतेरे युवाओं को उत्साहित कर रहा है। लेकिन इसकी सीमाएं भी स्पष्ट हैं। जेैसे आप की टिप्पणी में ही।


कोई भी यह सोचकर कविता नहीं पढ़ता होगा कि पढ़ने के बाद जो राय बनेगी वह मुख्य होगी कि गौण. हमारे लिये मुद्दा यह है कि किसी कवि-व्यक्तित्व को समझने की जो परिपाटियाँ साहित्यिक संस्कृति में रूढ़ हो गई हैं, उनमें सुधार और फ़ेरबदल की पेशकश की जा सकती है या नहीं. ऐसी पेशकश मुख्य भी हो सकती है और गौण भी, याने किसी के लिये मुख्य, किसी के लिये गौण. यह और बात है कि ख़ुद पेशकश मुख्य और गौण की कशमकश से स्वायत्त होती है.


व्योमश जी,
पहली बात ,आप सिर्फ इतना बताएं कि किसी कविता की व्याख्या, जो आप करते हैं, वह अन्यों द्वारा की गई व्याख्या की तुलना में, खुद आप की निगाह में मुख्य होती है या गौण। यही बात कुछ इस तरह से भी पूछी जा सकती हेै- क्या आप ऐसी व्याख्या भी करते हैं जो स्वयं आप की निगाह में गौण हो ?
दूसरी बात, क्या व्याख्या की कोई भी पेशकश मुख्य या गौण की कश्मकश से स्वायत्त हो सकती है?
तीसरी बात, कोई भी वैकल्पिक या गौण व्याख्या, अगर वह हमारे व्यक्ति, समाज या समय के लिए अर्थवान नहीं बनती तो उस पर विचार क्यों किया जाना चाहिए ? क्या सिर्फ इसलिए कि वह एक दम ताजी, चकित करदेने वाली और अपूर्व है?
मैं नहीं जानता कि स्वायत्त क्या होता है। क्या बताएंगे ?

विष्णुखरे की कविता को उपनिषदों आदि से जोड़कर देखने और इसे उन्हीं दायरों में समझनें से आप का क्या तात्पर्य है ? महाभारत पर आधारित यह कविता विष्णु खरे जी ने लिखा। क्या इसीलिए कि इसकी लोैकिकता का पारलौकिक पाठ किया जाएगा ? किसी रूढ़ि या परिपाटी के विकल्प में आप ने व्याख्या को जो मार्ग चुना उसकी सामाजिकता क्या है, क्या बताएंगे ?


continued II part
चैथी बात, किसी रूढ़ि को खत्म कर देने के संधर्ष में उतरने के लिए जरूरी है कि पहले आप के पास एक ऐसे उच्चतर वैकल्पिक विचार, परिपाटी या पद्धति की परिकल्पना हो, जो उस रूढ़ि का स्थान लेगी। पंूजीवाद समाज के लिए जब एक रूढ़ि बना तो समाजवाद की परिकल्पना प्रस्तावित हुई। माक्र्सवाद,समाजवाद या लोकतंत्र आदि के जो विचार हैं, वे पूंजीवाद के वैकल्पिक विचार हैं जो अभी हमारे समाज की जरूरत बने हुए हैं। अपनी कविता-कहानी- और राजनीति में इन्हें हम तबतक दुहराते रहेंगे, जबतक ये हमारे व्यावहारिक जीवन की उन्नति की हमारी आकांक्षा का पाथेय बने रहेंगे। ये हमारे लिए काम के विचार है। इसलिए इन्हें हम अपने जीवन की परिपाटी में शामिल करना चाहते हैं। इन्हीं विचार सरणियों को हम अपने जीवन में बार बार याद करते और दुहराते हैं। हम इन्हें अपना जीवन-मूल्य बनाना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि ये हमारे समाज के संस्कार का हिस्सा बन जायं। तेा हमारा ऐसा चाहना क्या रूढ़ि-प्रेम हैं ? इसे क्या एक ही परिपाटी की अनुगामिता कह कर खारिज कर देंगे? क्या इसे बहुज्ञात और पुराना विचार कह कर सामाजिक-चेतना से बाहर कर देंगे ?
यह कहना मेरी मजबूरी है कि आप का ‘स्वायत्त-प्रेम’ उत्तरआधुनिक विमर्शों से अनुप्राणित है। इसीलिए आप के इस नवीनता-प्रेम की न कोई सीमा है न कोई तर्क। जिसकी बौद्धिकता जितनी स्वच्छंद होगी, उसमें नवीनता का आग्रह उतना ही क्षिप्र और प्रबल होगा। ध्यान से सोचें तो इस प्रवृत्ति का समबन्ध समय और समाज से हमारी प्रतिबद्धता ओैर सरोकार लगतार खत्म होते जाने से जुड़ा दिखेगा। रूढ़ि और परिपाटी भंजन के बहाने से अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाली यह एक ऐसी इच्छा है, जो हर समय नये, अद्भुत, अपूर्व और सद्यः की व्यग्रता से ग्रस्त रहती है। ‘विचार’ और ‘विमर्श’ में यही फर्क है। अकारण नहीं कि उत्तरआधुनिकों नें विचार या विचारधाराओं की जगह विमर्श जैसा पद ईजाद कर दिया। ‘विचार’ एक ऐसा पद है जो समय के साथ हमारे सम्बन्ध को टूटने नहीं देता बल्कि समय की जरूरतों के संदर्भ में खुद को सार्थक बनाए रखने की चिंता से परिचालित होता है। अतः रूढ़ियों को तोड़ना एक बात है, और किसी ‘मुक्त-रूढि’़ समय या समाज में रहने की कल्पना करना बिलकुल दूसरी बात। हम किसी रूढ़ि के विरूद्ध संघर्ष करते हैं-मगर ‘मुक्त-रूढ़ि’ होे जाने के लिए नही। किसी उच्चतर रूढि की रचना करने के लिए। अतः परिपाटी या सिद्धान्त या संस्कृति या विचारधारा या पद्धति भी यदि आप की नजर में रूढ़ि है, तो कहना पड़ेगा कि हम ऐसी रूढ़ियों को तबतक दुहराना चाहेगे जबतक कि वे हमारे लिए बाधक नहीं साधक बनी हुई हैं।


अब जरा यहां से सोचें कि जिन परिपाटियों में आप को रूढ़ि दिख रही है वह रूढ़ि उस परिपाटी में है या उस परिपाटी से आप के वैचारिक सम्बन्ध की प्रकृति में।
हिन्दी साहित्य में, साहित्य को समाज और समय के खास परिप्रेक्ष्य में रख कर देखने-परखने को मोटी बुद्धि का काम समझने वाली एक पूरी धारा है, जो जिस समाज में रहती है, उसी से ऊबी है, और साहित्य को अपनी ऊब मिटाने का साधन मानती है। जिसे हर क्षण कुछ न कुछ नया चाहिए,उसमें और आप की सोच मे क्या अंतर है ?


अगर यह बहस यहीं ख़त्म हो रही हो तो भी प्रतिभागियों को यहाँ आ कर कबूल करना चाहिए , ya इसे आगे बढ़ाना चाहिए. बहस ही आलोचना को मृत्युंजय बनाती है.


Kya kubool karana chahiye? apani haar ya jeet kubool kar lene se kya hoga? Kya yah bahas khatm hojayegi ? Aap is bahas ko tatasth bhaav se dekh rahey hain. chupchap. kripaya hastkchhep karen. ham readers aap ke vichar bhi janan chahate hain.


हस्तक्शेप शब्द के इस्तेमाल से.......शस्त्रार्थ के नीयम जानने का वक्त आ गया है !!


1

ओह द सुप्रीम गॉड ऑफ मिसरीडिंग, 'ही' और 'भी' को छोड़कर जो आप कर रहे हैं, वह यही बताता है कि आप आर्ट ऑफ मिस-रीडिंग के पुराने माहिर हैं. आपकी महारत को नमन !

आप बार-बार जानना चाहते हैं कि मैंने कविता के वर्तमान-संबंधों पर कुछ क्‍यों नहीं कहा, (कोई बात नहीं, आप स्‍वयं क्‍यों नहीं कह देते, पूरी ऊर्जा और विस्‍तार के साथ), पर फिर आपकी मिस-रीडिंग का एक प्रमाण मैं दिए देता हूं- मैंने अपनी पहली टिप्‍पणी में एक सिंगल-लाइन पैरा ही यही लिखा है- '' इसके प्रतीकाभास व रूपकार्थों पर तो स्‍वयं कवि ने अपनी टिप्‍पणी में इशारा कर दिया है.'' आपकी समझ के लिए इस पंक्ति का विस्‍तार कर दूं, ताकि आपकी चिंचियाहट का अवसान हो सके- खरे कविता पर अपनी टिप्‍पणी में कहते हैं - '' निस्संदेह ऐसी संकेतावलियों में हर युग और सभ्यता अपनी नैतिक अवनति और दुरावस्था का प्रतीकभास देखते आये हैं और भले ही मानव-जाति या सृष्टि का अंत अभी न हुआ हो, महर्षि वेदव्यास विरचित 'महाभारत' में वर्णित दुर्दांत अपशकुन, दु:स्वप्न और कुलक्षण इस इक्कीसवीं सदी में अधिक प्रासंगिक, आसन्न और अवश्यंभावी प्रतीत हो रहे हैं. '' तो कविता को आप जिस तरह वर्तमान से जोड़कर देखना चाहते हैं, वह तो स्‍वयं कवि की यह पंक्तियां पूरी तरह स्‍पष्‍ट कर देती हैं. यह इक्‍कीसवीं सदी यानी इधर के दस बरस (जिन्‍हें मोटे तौर पर आप 'वर्तमान' या 'आज' कहना चाहते होंगे) के हालात से किस क़दर जुड़ जाती है, आपका आकांक्षित समाज-साहित्‍य समझ-संबंध परिभाषित हो जाता है, कवि के संकेतों से यह क्रिस्‍टल-क्‍लीयर है. जब कोई चीज़ ख़ुद कवि की तरफ़ से इतनी साफ़ हो कि वह कविता को समझने की एक पूरी एवेन्‍यू खोल दे, तो उस पर बात करना मेरी दिलचस्‍पी में नहीं है. आप विस्‍तार करते रहें इस बात का. मैं उन्‍हें नहीं दुहराना चाहता, इसीलिए एक पंक्ति में यह बात कह दी. अब चूंकि आपको कविता का एक यही अर्थ समझ में आ रहा है, जिस पर भी मुझे संदेह है कि आ भी रहा है, तो आप इसी से जोड़ने का मल्‍ल कर रहे हैं. साफ़ जुड़ती है. और जब जुड़ती है, तो क्‍यों दोहराना ? देखिए न, बिना मेरे बताए भी आप इस खुले अर्थ के क़रीब पहुंच रहे हैं, फिर क्‍यों श्रम करूं मैं ? पर दूसरे-तीसरे-चौथे अर्थों तक तो जाना ही होगा. अनंत अर्थों की एक कविता श्रम करवाती ही है. और वह पाठक को भरमाती भी है.

तो जो चीज़ साफ़ है, उससे अलग भी कुछ अ-साफ़ पहलू भी इस कविता के हैं, और आप जैसे वायुयानी व्‍याख्‍याकारों की उपस्थिति में यह आशंका हमेशा रहेगी कि कविता के उस पक्ष को कभी देखा ही न जाए. आपकी कुछ बातों का जवाब मैं दिए दे रहा हूं, और आपकी प्रतिभा जो आपके अनाम संदेशों से बहक-बहक टपक रही है, लपक-लपक मुझे झकझोर कह रही है कि आई शप्‍पथ, मैं समझने वाला नहीं, क्‍योंकि आपका गतिवान मति-प्रदर्शन, बिना किसी नाम के, यही बता रहा है कि 'हम तो ऊहि-ऊहि मुद्दे पर जबरिया बहस लिखबो, कोई हमरा का करबो, छुपा तो हूं ही, रुस्‍तम भले कोई न माने.' फिर भी कुछ बातों का जवाब. कुछ ही, क्‍योंकि दुहरा दूं, बाक़ी सारी बातें आपकी अपनी बातें हैं, जो आप मुझ पर डाल रहे हैं. यक़ीनन, इस प्रवृत्ति का श्रेय आपकी गति और मति को है.

मैं कविता को समझने के लिए अपनी ड्योढ़ी पर बैठूंगा, वह आपके द्वारा निर्धारित नहीं होगी. कविता को समझने की मेरी अपनी विधियां हैं, जो आपकी विधि से संचालित नहीं होगी. यदि वह संचालित होती है, तो वह मेरे लिए शर्मनाक होगा, क्‍योंकि मुझे पता है कि आपकी विधियां रद्दी, पुरानी, एकांगी, दृष्टिशून्‍य और फूहड़ हो चुकी हैं. ये आपकी टिप्‍पणियों से भी साफ़ ज़ाहिर है.


3

यह आपकी मिस-रीडिंग ही है जो आप अर्थों को समझने के बजाय नीयतों की छान-बीन कर रहे हैं.

मेरी टिप्‍पणी में यह कहीं से भी आभासित नहीं कि मैं एक निर्वैर-निरापद समाज में रह रहा हूं (यह आपकी मिस-रीडिंग का एक और प्रमाण), इस कविता पर छोटा-सा विचार भी निरापद नहीं, क्‍योंकि हम बिल्‍कुल निरापद समय में नहीं हैं. आप जैसे विचारवंत-ज्ञानेश जबरिया ग़लत अर्थ लगाकर, चुन्‍नटें गिनने के व्‍यस्‍त प्रमोद से भरी अपनी तंग-मोरी-पाजामा दृष्टि लेकर तोंद बजाते हाजि़र हो जाएंगे और उचक-उचक पूछेंगे कि बताते क्‍यों नहीं, सीता किसका बाप था? धन्‍य हैं आप. यह सब लिखने के बाद भी मुझे विश्‍वास है कि आपको कुछ भी संपट न पड़ा होगा, दरअसल, आपकी स्‍पून-फीडिंग भी संभव नहीं, क्‍योंकि आप मुंह के बजाय नाक को चम्‍मच की राह में अड़ा देंगे. (फिर सुड़क के बाद खांसते रहें, गरियाते हुए.)

चाओ.


2

आप कविता से वर्तमान की विडंबनाओं से बाहर निकलने का रास्‍ता खोज रहे हैं-- यहीं मैं आपको बता दूं कि आपका वर्तमान बोध क्षणिक-क्षणभंगुर-कुछ बरसों का- वर्तमान बोध से अधिक नहीं दिखता. यह रास्‍ता खोजने की कोशिश ही आपके मति-भ्रम को पूर्णत: उजागर कर देती है और बेचारी कविता पर आपका गजकाय अतिरिक्‍त बोझ डाल देती है. आपको अपने बेसिक्‍स चेक कर लेने चाहिए, वरना हमेशा अपनी जगहंसाई कराते रहेंगे, भले कितना भी अनाम हो जाएं. क्‍या आपको यह बताना पड़ेगा कि अच्‍छा साहित्‍य कभी सिर्फ़ वर्तमान की विडंबनाओं से नहीं जूझता. वर्तमान की समझ खुलना इतना सरलीकृत सवाल नहीं कि वह आपकी बताई मात्र एक ड्योढ़ी से संभव हो जाए. आपका वर्तमान इतना जटिल व प्रश्‍नों-भुलभुलैयाओं से भरा हुआ है कि आपको उसे समझने के लिए वर्तमान की सीमा से ही ऊपर उठना होगा. यहीं पर यह ज़रूरी हो जाता है यह जानना कि आपने अपने लिए वर्तमान की सीमा क्‍या निर्धारित की है ? क्‍या उस वर्तमान में रीसेंट अतीत या सुदूर अतीत शामिल है ? क्‍या उसमें सुदूर भविष्‍य भी है ? नहीं, आपके वर्तमान में वह नहीं है, जो अन-जिया है, वह तो बिल्‍कुल नहीं, चाहे अतीत का, चाहे भविष्‍य का. किसी भी किस्‍म का वृहत-वर्तमान आपकी कल्‍पनाओं से भी कोसो दूर है. मैं फिर इस कविता पर आऊं कि इसका वर्तमान किसी भी सीमित वर्तमान की कल्‍पना नहीं करता, इसीलिए यह मोटे वर्तमान (आपकी मोटी बुद्धि के लिए मोटा शब्‍द जोड़ दिया है, ताकि आपको इस वर्तमान का फ़र्क़ समझ आ जाए) को पार कर जाती है. यहीं दरअसल, वह उस निरपेक्षता को प्राप्‍त करती है, जो सापेक्षता के लिए बहुत ज़रूरी है. (उड़ गई आपके कपार से यह बात?) यह अपने वर्तमान को इतना स्‍ट्रेच करती है कि मिथिहास जितने पुराने अतीत तक जाती है, वहां से कुछ संकेत-स्थितियां ले आती है और उसे जेनेटिकली मॉडी‍फ़ाइड भविष्‍य (जीएम फ़सलों की तर्ज़ पर बनने वाले जीएम मानव की परिकल्‍पना तक, जिसके विकृत होने की तमाम आशंकाएं हॉलीवुड की फि़ल्‍में आपको दिखा चुकी हैं) तक ले जाती है. एक कविता में समय की संधियों को ऐसे लांघना अपूर्व है. यहां वर्तमान महज़ कुछ बरसों का वर्तमान नहीं रह जाता, यहां आशंकाएं मनुष्‍य की पराजय के रूप में दिखती हैं, जो संभवत: मनुष्‍यता के लिए सबसे बड़ा संकट है. यहां अर्जुन के पराजय-प्रायश्चित बोध में मनुष्‍यता का पराजय-बोध है और चाहे इसे मार्क्‍सवादी शब्‍दों में कह लें या आपके अपने संदिग्‍ध्वादी शब्‍दों में, यह इस कविता द्वारा उठाया गया एक बड़ा मुद्दा है. इसकी हर पंक्ति ऐसे संकेत देती चलती है. और यह निरपेक्ष होना देश-काल से दूर हो जाना नहीं, बल्कि उसे समझने का एक ऐसा प्रयास है, जो देश-काल की सीमाओं का अतिक्रमण करके उपस्थित हो सकता है. यही काल-चेतना और विश्‍व-चेतना है.


यह रहा मनुष्‍यता का संकट. आपका संकट यह है कि आपके लिए कविता का अध्‍यात्‍म, आपकी छद्म-गुप्‍त क्रांतिकारिता में, धर्म-मोक्ष-निर्वाण-आसाराम तक सीमित है. मैं आपको वायुयानी कहा, क्‍योंकि जब वह बादलों से ऊपर उड़ता है, तो बैठे कुछ लोग अपनी असहजता में बादलों को ज़मीन मान लेते हैं. आपका संकट भी यही है. और यह कोई नया नहीं है. हिंदी में बीसवीं सदी आप जैसों से भरी रही है और ख़ूब कल्‍याण करती रही है. कविता का अध्‍यात्‍म मेरे लिए एक किस्‍म का मेटा-कॉन्‍शस है, जो हर बड़ी कविता में ज़रूरी होता है. जो कि पारंपरिक जॉर्गन से अलग होता है. सर्वात्‍म-दर्शन इस कविता का एक गुण है, जिसे आप जैसे लोग कभी नहीं पकड़ना चाहेंगे, क्‍योंकि आपके लिए कविता में मेटा-कॉन्‍शस का कोई स्‍थान ही नहीं होता. (उसकी जगह आप मोटा-कॉन्‍शस प्रिफ़र करते हैं.) और जब आपके लिए इसका कोई स्‍थान ही नहीं है, तो आपको समझाने का क्‍या श्रम करना. जिसे समझना होगा, वह ख़ुद पहुंच जाएगा यहां तक. यहीं पुन: वर्तमान की व्‍याख्‍या की आवश्‍यकता पड़ती है और चूंकि आपकी व्‍याख्‍या सीमित वर्तमान की है, सो आप इसके वर्तमान-संबंध को उतना ही परिभाषित कर पाएंगे, जितना कि कवि ने, ऑलरेडी, कर दिया है. पाठक के रूप में कविता में अपने हिस्‍से का काम करने से आप चूक रहे हैं.


यह तो सौ फीसदी सच है कि आप की बात मेंरे कपार से ऊपर निकल गई। कारण कि आप का ‘वृहत्वर्तमान’ इतिहास और वर्तमान के ऐतिहासिक द्वंद्वात्मक सम्बन्ध से परे की कोई ऐसी अवधारणा है जो वर्तमान और वृहत्वर्तमान में एक काल्पनिक ही सही, मगर विभाजन रेखा खीचती नजर आती है। यह वह काल्पनिक रेखा है जहां से (बकौल आप के) ‘मेरे मोटे वर्तमान’ से ‘आप का वृहत्वर्तमान’ अलग हो जाता है और ‘सापेक्षता’, ‘निरपेक्षता’ की सीमा में प्रवेश कर जाती है। वर्तमान से निरपेक्ष हो जाने का आप का यह वृहद्विचार सचमुच ही मेरे कपार में घुसने से रहा। निरपेक्ष अंतरिक्ष में आप क्या खोजते हैं, किसलिए खोजते हैं, जो खोजते हैं, वह हमारे वर्तमान के किस काम आता है, निरपेक्ष से सापेक्ष में लौटने,या सापेक्ष से निरपेक्ष में आने जाने की प्रक्रिया कैसे संभव होती है, यह सब भला मेरा कपार यदि न झेल पाए तो इसमें कपार क्या दोष ? हां, वर्तमान और अतीत के संबंध की यह व्याख्या रोचक जरूर है। ठीक उतनी ही रोचक जितनी कि जीव और ईश्वर के सम्बन्ध की अवधारणा। स्थूल और सूक्ष्म का आध्यात्मिक विचार। सापेक्षता-निरपेक्षता का जो खेल आप ने रचा है,उसका जवाब क्या दें। संक्षेप में इतना जानें कि जो अपने वर्तमान में अतीत की धड़कोनों को शामिल नहीं मानता,या यह नहीं मानता कि इतिहास या भविष्य के सारे विचार हमारे वर्तमान से जुड़ कर ही विचार कहे जाने की योग्यता पाते हैं,वह विस्तृतीकरण के नाम पर वर्तमान केा इतिहास के रूपकों से सजाने का धंधा करता है। जिस कविता की छांव में बैठ कर आप अपना ज्ञान बघार रहे हैं,वह एक क्षण के लिए भी अपने वर्तमान से निरपेक्ष होने का अवसर नहीं देती। मगर आप की दयनीयता तब उजागर होती है, जब आप बीच बीच में कविता की उंगली पकड़ कर अपना बचाव करते दिखते हैं। मेरी शिकायत कविता से तो थी ही नहीं। न है। थी तो आप लोगों द्वारा उसके रहस्यीकरण की कसरतों केा लेकर। आप नें वर्तमान की चर्चा न करने का जो तर्क दिया उसकी मासूमियत पर सिर्फ ठटठा मार कर हंसा ही जा सकता है। विष्णुखरे नें अपनी टिप्पणी में वर्तमान की बात कह दी थी,इसलिए आप नें उसे नही दुहराया।मतलब कि उनकी टिप्पणी में कहने से रह गई बातों तक ही अपनी बात केन्द्रित रखी। विष्णु खरे की टिप्प्णी कविता और वर्तमान की सापेक्षता के तथ्य के स्वीकार से प्रेरित है। आप नें उसे निरपेक्षता में ले जाना जरूरी समझा । आप का यही निरपेक्षता-प्रेम आप की भाववादी समझ का मूल है जिसे आप अपना मौलिक समझ बैठे हैं। भूल तो मुझसे हुई कि स्वयं कवि की टिप्पणी को ही पर्याप्त मान लेने की जगह आप की व्याख्या को भी कविता की स्वतंत्र व्याख्या का प्रयास मान बैठा।
खैर, अब और आप को परेशान नहीं करूंगा। आप की भाषा से स्पष्ट है कि आप अपना आपा खो चुके हैं और सभ्यता की ओढ़ी हुई खाल बस उतार फेंकने ही वाले हैं। मैं आप को गुस्से में नंगा हो कर नाचते देखना या दिखाना नहीं चाहता। जो हो, आप एक कवि हैं और एक कवि की लाज-रक्षा मेरा भी धर्म बनता है। बस एक बात चलते चलते-
निराला नें कहा है,‘‘ तमाम आर्य-साहित्य का मूल रहस्यवाद है। अतः साहित्य-प्रेमी तथा साहित्यिक जन को चाहिए कि रूपकों का मोह छोड़ कर ज्ञान का ग्रहण करें। अन्यथा वे रूपकों का अर्थ समझा न सकेंगे।’’ अब सवाल सिर्फ यह है कि आप ज्ञान मानते किसे हैं ?
मेरे इस प्रश्न के उत्तर मंे आप चाहें तो तुलसी की यह पंक्ति उद्धृत करके लोक की अदालत में हमें निरूत्तर कर सकते हैं-- ज्ञानहिं भक्तिहिं नहिं कछु भेदा।
गावंहि श्रुति पुराण अरू वेदा।।

अब आप चाहे जितना ज्ञान पोंकना चाहें, पोंकते रहें। मुझे अब आप से कुछ नहीं कहना। चाहें तो आप इसे मेरी हार मान कर खुश हो सकते हैं।


गीत जी मेरा काम पूरा हुआ। अब आप पूरे रौ में अपने ‘ज्ञान’ का बम-वर्षण कर रहे हैं। मगर मेरे लिए आप के इस विषाक्त ज्ञान का रचनात्मक पहलू यह है कि इससे स्पष्ट हो गया कि आप मिथितिहास के जिस अंतरिक्ष में परिक्रमा कर रहे हैं, वहां से पृथ्वी या तो दिखती ही नहीं,, या दिखती भी है तो क्षणांश मात्र के लिए। अतः इसमें आप का क्या दोष यदि आप अपनी मेधा का पराक्रम पृथ्वी की अपेक्षा अंतरिक्ष के सत्यों पर ज्यादा बरबाद रहे हैं।
खैर, मुझे खुशी है तो इस बात की कि आप ने मेरी बातों को संज्ञान में लिया और वर्तमान पर भी अपना अमूल्य विचार व्यक्त करने की कृपा की। रह गई क्षणिक और वृहत्वर्तमान की बात, तो कृपया हमें इतना तो न हीं समझावें कि जिसे आप वृहत्वर्तमान कह रहे हैं वह और कुछ नही,ं बल्कि हमारे निकट से लेकर सुदूर तक का वह इतिहास है, जिससे वर्तमान की नाल जुड़ी रहती है। यह जुड़ाव इतने गहरे में रचा होता है कि चाहें तो हम वर्तमान में अनन्त सुदूर की धड़कनें तक सुन सकते हैं, यह कौन नहीं जानता ? मैं आप को मोटी बुद्धि का तो कतई न कहूंगा क्योंकि मैं जानता हूं कि आप में वर्तमान को अतीत से जोड़ कर देखनें की अक्ल है। मगर इस अक्ल के लिए आप इतने गृरूर से भरे होंगे और इतने से ज्ञान के बदौलत अपने आप को परम चरम ज्ञानी मान बैठे होगे, यह देख कर हंसी आती है। आप हमें जिस वृहत्वर्तमान को समझने का उपदेशामृत पिला रहे हैं,वह कोई आप की खोज नहीं है। यह भला कौन नहीं जानता कि वर्तमान अपने अतीत से निरपेक्ष नहीं है। मगर आप कहें चाहे जो कुछ मगर मानते तो यहीं हंै। आप के इस भ्रम का मैं क्या करूं कि आप अपने ही ज्ञान को अपूर्व मान चुके हैं। इसमें भी आप का दोष नहीं। हर अनुभववादी अपनी ज्ञान-प्रणाली की विडम्बनाओं से जकड़ा होता है। सवाल यह नहीं है कि मैं सिर्फ सीमित वर्तमान में जीता हूं और आप का वर्तमान वृहत् है। सवाल यह है कि आप वर्तमान को वृहत् तो मानते हैं,किन्तु आप की चर्चा से यह नहीं पता चलता कि आप को यह भी पता है कि हमारा वर्तमान अनन्त समय की निरंतरता का एक विशिष्ट उत्पाद या प्रतिफल है,जिसका वैशिष्ट्य इस बात में है कि इतिहास हमारे वर्तमान को समझनें और आगे ले जाने का उपकरण है। अब सवाल यह है कि इस इतिहास को वर्तमान की सापेक्षता में पढ़ना चाहते हैं या इतिहास में वर्तमान को अंतर्भुक्त कर देना चाहते हैं।


Anonymous जी अब आप कृपा कर यह भेद खोल ही दें कि आप कौन हैं । कविता के पाठ का अनन्द तो अपनी जगह है ही लेकिन इस कविता से अधिक आनन्द तो इस विमर्ष मे आ गया ।


सबद से जुड़ने की जगह :

सबद से जुड़ने की जगह :
[ अपडेट्स और सूचनाओं की जगह् ]

आग़ाज़


सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

पिछला बाक़ी

साखी


कुंवर नारायण / कृष्‍ण बलदेव वैद / विष्‍णु खरे / चंद्रकांत देवताले / राजी सेठ / मंगलेश डबराल / असद ज़ैदी / कुमार अंबुज / उदयन वाजपेयी / हृषिकेश सुलभ / लाल्‍टू / संजय खाती / पंकज चतुर्वेदी / आशुतोष दुबे / अजंता देव / यतींद्र मिश्र / पंकज मित्र / गीत चतुर्वेदी / व्‍योमेश शुक्‍ल / चन्दन पाण्डेय / कुणाल सिंह / मनोज कुमार झा / पंकज राग / नीलेश रघुवंशी / शिरीष कुमार मौर्य / संजय कुंदन / सुंदर चंद्र ठाकुर / अखिलेश / अरुण देव / समर्थ वाशिष्ठ / चंद्रभूषण / प्रत्‍यक्षा / मृत्युंजय / मनीषा कुलश्रेष्ठ / तुषार धवल / वंदना राग / पीयूष दईया / संगीता गुन्देचा / गिरिराज किराडू / महेश वर्मा / मोहन राणा / प्रभात रंजन / मृत्युंजय / आशुतोष भारद्वाज / हिमांशु पंड्या / शशिभूषण /
मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / ज़बिग्नियव हर्बर्ट / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / सबीर हका / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी