सबद
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आवाज़ भी एक जगह है...


लड़के ने उसे चेखव की 'दि लेडी विद दि डॉग' पढ़कर नहीं सुनाया था जो उसे केट विंस्लेट की 'दि रीडर' देख उसकी याद आती। उसने निर्मल की 'लवर्स' पढ़ी थी। फ़ोन पर। बहुत से लफ़्ज़ों का अंग्रेजी तर्जुमा करके। वह, 'ओके...देन...आई सी...रियली...ओह...इट्स सो सैड!' कहते हुए कहानी में घुलती जाती। लड़के ने उससे वह सब पहले ही कह रखा था जो शेर, कविताओं या कहानियों के ज़रिये घुमा-फिराकर कहने का पुराना रिवाज़ था। इसलिए इस रीडिंग का कोई दूसरा मतलब था ही नहीं। १९७ के रिचार्ज पर हज़ार कॉल करने की सहूलियत ने उनके बीच बातचीत के लमहों को वसी कर दिया था। एक-दूसरे की आवाज़ को तब उन्होंने दोहराऊ-उबाऊ प्रेम-प्रलापों से ही नहीं, ऐसी कहानियों से भी भरा था।
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उनके लिए आवाज़ सचमुच एक जगह थी। वहां वे मिल सकते थे। वे मिलते थे। कभी-कभी वह लड़के के इसरार पर कुछ गुनगुनाती थी। वह उसे रिकॉर्ड कर लेता था। मुलाकात के दिनों में उसे सुनाता तो लड़की अपनी पेटेंट गाली से उसे नवाजती, 'यू बिच', फिर ' मैं कितना ख़राब गाती हूँ। डोंट इमबैरेस मी।' लड़का उसके कहे के बाहर मुस्कराता :-)
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मोबाइल के रिकॉर्डर में लड़की के छुपकर फ़ोन करने से पकड़े जाने का डर शामिल है। जैसे कि उस डर में एक मधुर कंठ। और उस कंठ में लड़के के लिए एक धुन, जो अब भी उसकी सबसे मुकम्मल जगह है।
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{ चित्र-कृति मार्क शागाल की }
15 comments:

सुंदर शब्‍दचि‍त्रण। अच्‍छी है।


kiss and tell,format hai bhai sa'ab :-)


sachmuch aawaj hai thikana pyar ka...bahut pyara likha aapne. Badhai!


बढि़या. उसकी धुन में रहना
ख़ुद में रहना है.


stree-purush ke sambandho ka manovishleshan
achha, kam se kam pyaar mein baar2 milne ki bandish to nahi hai yahan, ladki aur ladki ek dusre ki awaaz mein hi apni jagah talaash lete hain,


shabdon ka bahut achha tana bana buna gaya hai...


achhi kahani.naye dhang ki.multilingual iski khubi.choti lekin lucid.

jawed akhtar


shbdon ke taz phulon s mehkti awaz ki dunya akser yun hi avad hua krti hai....bahri dunya k bhed yahn tik bhi nhi patay..


Nicely written love tale..


सुंदर अभिव्यक्ति समकालीन बदलते परिवेश में प्रेम कहानियों के बदलते स्वरुप .... मोबाइल फ़ोन और अर्धमिश्रित सांस्कृतिक सामाजिक और आर्थिक मूल्यों को अच्छे तरीके से उकेरा है आपने ....


bahut sundar dhyan dilaya.


अनुराग,
शायद यह रमैनी का हिस्सा था ! बढ़िया था !!
तुम्हारी भाषा में मुझे नए ज़माने की आवाज़, उसकी निखर, उसकी पहचान दीखती है.
शब्दों से उलझे हुवे आज कल मेरी भी यही कोशिश है कि किस तरह कविता में कुछ भी ना कहते हुवे इस ज़माने का भाव बिना व्यक्त किये हुए भी पा सकूं.
कुछ सिखा सको तो ज़रूर सिखाना.
बहुत प्यार तुम्हारे लिए,
तुषार धवल


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

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