Tuesday, February 02, 2010

व्योमेश शुक्ल की दो नई कविताएं



मैं हूँ और वे हैं


इस बीच कई बार बार धूप खिली. अचार के मर्तबान से गुप्ताजी के सिर तक तक फैलकर उसने मनमाने चित्र बनाये. बहुत दिनों बाद देखकर खुश हो जाऊं, ऐसे आई थी वह. समय के बीतने के साथ उसका कोई सम्बन्ध है ज़रूर. वह आती है और हर याद स्मृति हो जाती है.

वे बिलकुल अभी के स्पंदन, स्पर्श, उल्लास, क्रोध, विरोध और झटके थे. वे मैं थे. मैं वे था. और अब, अब ये धूप है और मैं हूँ और वे हैं.

वे स्पंदन वहीं हैं. उसी बिंदु पर स्थिर और गतिमान क्योंकि गति का यह मतलब नहीं है कि वह हर बार मुझ पर, मेरे वक़्त पर गुज़रे या 'अभी' में हो. वह अभी भी हो सकती है और कभी हो सकती है. जो हुई थीं, वे बातें भी अभी हो रही हैं. बस हम उनमें जा नहीं पा रहे. जो होने वाली हैं वे भी हो रही हैं. हम उनमें जा सकेंगे शायद.

एक साइकिल एक पतंग गालियां बकता हुआ एक बद्तमीज़ तोता, ऐसी ही चीज़ों से बना था संसार. समोसा भी था उसमें - छोटा और सनसनीखेज़ जीवन जीता हुआ, मौत के कुएं में बेतहाशा मोटरसाइकिल चलाता हुआ, नुकीला और अनिवार्य. ठीक है कि एक दुनियादार गड़प है उसकी नियति, लेकिन हिम्मत देखिये जनाब. कल फिर हाज़िर.

मन्ना डे इमरती बना रहे हैं. ये वही नहीं हैं, याने दादा साहब फाल्के वाले. अलग हैं. ये उन जैसे हैं और उन जैसे न भी होते तो भी इनका नाम मन्ना डे होता. बल्कि जो मनुष्य सामने खड़ा इमरती का इंतज़ार कर रहा है उसका भी नाम मन्ना डे होता. कोई भी मन्ना डे होता. किसी को भी मन्ना डे होने का हक़ है. कुछ देर में जो लोग मुर्दा फूँककर आएंगें और इमरती की बजाए भचर-भचर पूड़ी-सब्जी खाने लगेंगे, वे भी होते मन्ना डे. वे भी होंगे मन्ना डे.
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अंगूर
( अप्रतिम कवि उदयन वाजपेयी के लिए)

और जिस दिन तुम्हें पाता चला कि संज्ञाएं सम्प्रेषण की सुविधा के अलावा कुछ नहीं हैं, तुम स्कूटर चला रहे थे. जिस क्षण यह ख़याल ब्रह्माण्ड को तुम्हारे लिए पुनर्विन्यस्त कर रहा था - वह - इस दुनिया की साधारणता का एक महान क्षण - जब तुम अपने आविष्कार को दे दिए गए थे, तुम्हारे हमसफ़र ने कहा - 'बेबी दी के यहाँ से अंगूर लेने थे...'. लेकिन औदात्य देखो कि यह दुनियादार प्रतिक्रिया अब उसी खोज का हिस्सा है और उसी सफ़र का जिसमें तुम अपने हमसफ़र के साथ कहीं के लिए निकले थे और फ़िलहाल बेबी दी के घर से आगे चले आये हो.
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{ कवि की अन्य कविताएं यहां.... तस्वीर मधुमिता दास के कैमरे से }

5 comments:

गिरिराज किराड़ू said...

जन संस्कृति मंच महासचिव "प्रणय कृष्ण के लिये" से "अप्रतिम कवि उदयन वाजपेयी के लिये"तक - व्योमेश के संसार का विस्तार हो रहा है। व्योमेश को रज़ा फाउन्डेशन की अशोक वाजपेयी द्वारा स्थापित प्रतिष्ठित पत्रिका समास के सम्पादन की बधाई देना आप भूल गये, अनुरागजी। जनसत्ता में ख़बर थी आज।

रवि कुमार, रावतभाटा said...

गज़ब है...बेहतर...

संजय भास्कर said...

BEHTREEN RACHNAA...

कुश said...

महसूस कर पा रहा हूँ..

Tushar Dhawal Singh said...

व्योमेश की कविताओं में जो विलक्षण बात मुझे नज़र आती है वह इस कविता में भी दिखी. वे प्रायः time और space से खेलते नज़र आते हैं. शब्दों से खिलंदरी तो वे करते ही हैं लेकिन इसी में कुछ नए अर्थ वे पैदा कर देते हैं. बधाई. और हाँ, गिरिराज ने तो मुबारक बाद दे ही दिया है, मेरी तरफ से भी बधाई कबूल करें.
तुषार धवल