Skip to main content

व्योमेश शुक्ल की दो नई कविताएं



मैं हूँ और वे हैं


इस बीच कई बार बार धूप खिली. अचार के मर्तबान से गुप्ताजी के सिर तक तक फैलकर उसने मनमाने चित्र बनाये. बहुत दिनों बाद देखकर खुश हो जाऊं, ऐसे आई थी वह. समय के बीतने के साथ उसका कोई सम्बन्ध है ज़रूर. वह आती है और हर याद स्मृति हो जाती है.

वे बिलकुल अभी के स्पंदन, स्पर्श, उल्लास, क्रोध, विरोध और झटके थे. वे मैं थे. मैं वे था. और अब, अब ये धूप है और मैं हूँ और वे हैं.

वे स्पंदन वहीं हैं. उसी बिंदु पर स्थिर और गतिमान क्योंकि गति का यह मतलब नहीं है कि वह हर बार मुझ पर, मेरे वक़्त पर गुज़रे या 'अभी' में हो. वह अभी भी हो सकती है और कभी हो सकती है. जो हुई थीं, वे बातें भी अभी हो रही हैं. बस हम उनमें जा नहीं पा रहे. जो होने वाली हैं वे भी हो रही हैं. हम उनमें जा सकेंगे शायद.

एक साइकिल एक पतंग गालियां बकता हुआ एक बद्तमीज़ तोता, ऐसी ही चीज़ों से बना था संसार. समोसा भी था उसमें - छोटा और सनसनीखेज़ जीवन जीता हुआ, मौत के कुएं में बेतहाशा मोटरसाइकिल चलाता हुआ, नुकीला और अनिवार्य. ठीक है कि एक दुनियादार गड़प है उसकी नियति, लेकिन हिम्मत देखिये जनाब. कल फिर हाज़िर.

मन्ना डे इमरती बना रहे हैं. ये वही नहीं हैं, याने दादा साहब फाल्के वाले. अलग हैं. ये उन जैसे हैं और उन जैसे न भी होते तो भी इनका नाम मन्ना डे होता. बल्कि जो मनुष्य सामने खड़ा इमरती का इंतज़ार कर रहा है उसका भी नाम मन्ना डे होता. कोई भी मन्ना डे होता. किसी को भी मन्ना डे होने का हक़ है. कुछ देर में जो लोग मुर्दा फूँककर आएंगें और इमरती की बजाए भचर-भचर पूड़ी-सब्जी खाने लगेंगे, वे भी होते मन्ना डे. वे भी होंगे मन्ना डे.
****

अंगूर
( अप्रतिम कवि उदयन वाजपेयी के लिए)

और जिस दिन तुम्हें पाता चला कि संज्ञाएं सम्प्रेषण की सुविधा के अलावा कुछ नहीं हैं, तुम स्कूटर चला रहे थे. जिस क्षण यह ख़याल ब्रह्माण्ड को तुम्हारे लिए पुनर्विन्यस्त कर रहा था - वह - इस दुनिया की साधारणता का एक महान क्षण - जब तुम अपने आविष्कार को दे दिए गए थे, तुम्हारे हमसफ़र ने कहा - 'बेबी दी के यहाँ से अंगूर लेने थे...'. लेकिन औदात्य देखो कि यह दुनियादार प्रतिक्रिया अब उसी खोज का हिस्सा है और उसी सफ़र का जिसमें तुम अपने हमसफ़र के साथ कहीं के लिए निकले थे और फ़िलहाल बेबी दी के घर से आगे चले आये हो.
****
{ कवि की अन्य कविताएं यहां.... तस्वीर मधुमिता दास के कैमरे से }

Comments

जन संस्कृति मंच महासचिव "प्रणय कृष्ण के लिये" से "अप्रतिम कवि उदयन वाजपेयी के लिये"तक - व्योमेश के संसार का विस्तार हो रहा है। व्योमेश को रज़ा फाउन्डेशन की अशोक वाजपेयी द्वारा स्थापित प्रतिष्ठित पत्रिका समास के सम्पादन की बधाई देना आप भूल गये, अनुरागजी। जनसत्ता में ख़बर थी आज।
कुश said…
महसूस कर पा रहा हूँ..
व्योमेश की कविताओं में जो विलक्षण बात मुझे नज़र आती है वह इस कविता में भी दिखी. वे प्रायः time और space से खेलते नज़र आते हैं. शब्दों से खिलंदरी तो वे करते ही हैं लेकिन इसी में कुछ नए अर्थ वे पैदा कर देते हैं. बधाई. और हाँ, गिरिराज ने तो मुबारक बाद दे ही दिया है, मेरी तरफ से भी बधाई कबूल करें.
तुषार धवल

Popular posts from this blog

गीत चतुर्वेदी : दिल के क़िस्से कहां नहीं होते

(अब से 'सबद' पर हर पंद्रह दिन में कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी का यह कॉलम प्रकाशित होगा.)



जब से मैंने लिखने की शुरुआत की है, अक्सर मैंने लोगों को यह कहते सुना है, 'गीत, तुममें लेखन की नैसर्गिक प्रतिभा है।' ज़ाहिर है, यह सुनकर मुझे ख़ुशी होती थी। मैं शुरू से ही काफ़ी पढ़ता था। बातचीत में पढ़ाई के ये संदर्भ अक्सर ही झलक जाते थे। मेरा आवागमन कई भाषाओं में रहा है। मैंने यह बहुत क़रीब से देखा है कि हमारे देश की कई भाषाओं में, उनके साहित्यिक माहौल में अधिक किताबें पढ़ने को अच्छा नहीं माना जाता। अतीत में, मुझसे कई अच्छे कवियों ने यह कहा है कि ज़्यादा पढ़ने से तुम अपनी मौलिकता खो दोगे, तुम दूसरे लेखकों से प्रभावित हो जाओगे। मैं उनकी बातों से न तब सहमत था, न अब।


बरसों बाद मेरी मुलाक़ात एक बौद्धिक युवती से हुई। उसने मेरा लिखा न के बराबर पढ़ा था, लेकिन वह मेरी प्रसिद्धि से परिचित थी और उसी नाते, हममें रोज़ बातें होने लगीं। हम लगभग रोज़ ही साथ लंच करते थे। कला, समाज और साहित्य पर तीखी बहसें करते थे। एक रोज़ उसने मुझसे कहा, 'तुम्हारी पूरी प्रतिभा, पूरा ज्ञान एक्वायर्ड है। तुम्हारा ज्…

ईरानी कविता : सबीर हका : अनुवाद - गीत चतुर्वेदी

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 10 : भुजंग, मेरा दोस्त

कई दिनों की लगन के बाद आज मैंने सौ साल पुराना वह फ्रेंच उपन्यास पढ़कर पूरा कर दिया। किताब का पूरा होना एक छोटी मृत्यु जैसा है। जीवन से ज़्यादा बहुरूपिया मृत्यु होती है। हम सबके पैदा होने का तरीक़ा एक है, लेकिन हमारे मरने के तरीक़े अलग-अलग होते हैं। इसीलिए किताब का पूरा होना हम सबको अलग-अलग अनुभूति से भरता है। मेरा मन अक्सर दुख की एक चादर ओढ़ लेता है। सोचता हूँ, किस बात का दुख होता है? किताब के पूरा होने का दुख? अपने बचे रह जाने का दुख? जिन चरित्रों से मैंने एक मैत्री कर ली, उनके पीछे छूट जाने का दुख? कथा का दुख? या मेरे भीतर सोये मेरे अपने दुख, जिन्हें किताब जगा देती है?
इंदुमति के मृत्यु-शोक से अज रोया था। उसे लिखनेवाले कालिदास रोये थे। उसे पढ़कर मैं क्यों रोता हूँ? क्या मेरे भीतर अज रहता है? कालिदास की कविता रहती है? मृत्यु का शोक रहता है?
हाँ, ये सब रहते हैं। इसीलिए तो, पढ़े व लिखे हुए शब्द, मेरी मिट्‌टी पर उगते हैं।
हमारा हृदय एक पिरामिड है। मरे हुए लोग अपने पूरे साज़ो-सामान के साथ इसमें सुरक्षित रहते हैं- उनके चेहरे नहीं बदलते, उनके कपड़े, गहने, किताबें, उनकी बातें, आदतें, उनके ठह…