Thursday, February 18, 2010

विष्‍णु खरे की नई कविता

{ मानव के नैतिक ह्रास के कारण अपरिहार्य, सृष्टि के अंत के लक्षणों और पूर्वसंकेतों का जैसा वर्णन और भविष्यवचन प्राचीन भारतीय परम्परा में है, वैसा शायद और कहीं नहीं है. बाइबिल के पूर्वार्ध 'ओल्ड टेस्टामेंट' में जेरेमियाह नामक एक संत-मसीहा हैं, जिन्होंने ऐसी ही दारुण भविष्यवाणियां की हैं और इस तरह उनके लिए 'जेरेमियाड' शब्द प्रदान किया है, लेकिन भारतीय चेतावनियों के लिए ऐसा कोई प्रत्यय संस्कृत में नहीं मिलता और मात्र 'अपशकुन' इनके लिए अपर्याप्त है. निस्संदेह ऐसी संकेतावलियों में हर युग और सभ्यता अपनी नैतिक अवनति और दुरावस्था का प्रतीकभास देखते आये हैं और भले ही मानव-जाति या सृष्टि का अंत अभी न हुआ हो, महर्षि वेदव्यास विरचित 'महाभारत' में वर्णित दुर्दांत अपशकुन, दु:स्वप्न और कुलक्षण इस इक्कीसवीं सदी में अधिक प्रासंगिक, आसन्न और अवश्यंभावी प्रतीत हो रहे हैं.
इस कविता को स्वीकृत, सुपरिचित अर्थों में पूर्णतः 'मौलिक' नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा अपने सुविख्यात मासिक 'कल्याण' के अगस्त १९४२ के विशेषांक के रूप में प्रकाशित महाभारत-अनुवाद 'संक्षिप्त महाभारतांक' से प्राप्त, उत्थापित, शोधित, उत्खनित, अन्वेषित तथा आविष्कृत ( प्रबुद्ध पाठक जो चाहें सो कह लें) है. कुछ अंश अवश्य प्रक्षिप्त किये गए हैं, किन्तु भगवान कृष्णद्वैपायन के विश्व-काव्य में ऐसे प्रक्षेपणों को एक आपराधिक प्रमाद ही कहा जायेगा. तब भी यह दुस्साहसिक विनम्रता में यहाँ प्रस्तुत है. } - कवि

प्रलय-संकेत
(तुभ्यमेव भगवंतं वेदव्यासं)

दिवस और रात्रि में कोई अंतर नहीं कर पाता मैं    दोनों समय ऐसे दीखते हैं जैसे सूर्य चन्द्र नक्षत्रों से ज्वालाएं उठती हों

दोनों संधिवेलाओं में देखता हूँ दिवाकर को घेरे हुए एक मृत शरीर जिसके सिर भुजा जंघाएं नहीं हैं
  धधकती हैं दोनों संध्याओं की दिशाएं

अंतरिक्ष में टकराते हैं धूमकेतु उल्काएं ग्रह उपग्रह तारागण   क्या गरजता है यह मेघों के बिना कौन-सी विद्युत् कौंधती है    रात में बरसते हैं रक्‍त मांस-मज्जा

नदियों के जल में लहू पीब भ्रूण बहते दीखते हैं    वे अपने उद्गमों को लौटने लगती हैं    कूपों तालाबों नालों से विषैले झाग उठते हैं

पर्वतों से कौन-सा भयानक नाद उठता है यह  उनके शिखर और शिलाएं रेत जैसे ध्वस्त होते हैं

सागर उफनते हैं भूकंप से अपने तट तोड़कर धरती को डुबोते हुए

दुर्गन्ध उठती है अग्नि से

कभी आकाश में सात सूर्य एक साथ उदित होते हैं    मुंड और कबंध की तरह राहु और केतु कभी जुड़ते कभी अलग दीखते हैं     चन्द्र के लुप्त होने पर कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष कब परिवर्तित होते हैं ज्ञात नहीं होता    

नष्ट हो गई हैं मेरी इन्द्रियों की क्षमताएं अपनी चेतना खो चूका हूँ मैं

वंध्या शाखाएं वर्णगंधहीन अवास्तव फलों से लद गई हैं जिन पर कोई नहीं मंडराता जिन्हें कोई नहीं खाता    हरे वृक्ष ठूंठ हो जाते हैं और जलने लगते हैं

कभी भी चलने लगते हैं डरावने बवंडर    उनसे बालुका नहीं पीसी हुई हड्डियों का चूर्ण बरसता है
मध्याह्न में अमावस्या की अर्धरात्रि का अंधकार छा जाता है

ज्येष्ठ और वैशाख में लुप्त सरिताएं नगरों को डुबो देती हैं    मरुस्थल में दिन में हिमपात होता है सरीसृपों को मारता हुआ

एक गरुड़ दीखता है जिसके माथे पर चोटी और सींग हैं उसके तीन पंजे हैं और चोंच के स्थान पर चार दाढ़ें हैं

वृक्षों पर बैठे गीध श्येन और चील शवों की घात में नीचे देखते हैं    कोकिलों शुकों मयूरों चातकों के कंठ से लपटें और चीत्कार निकलते हैं    वे ध्वजों पर बैठकर उन्हें नोचते हैं

रात में एक पक्षी मंडराता है जिसके एक आंख एक डैना एक पंजा है और जब वह क्रुद्ध होकर बोलता है तो ऐसे कि कोई रक्त वमन करता हो

गीध घरों में घुस आते हैं और जीवित मनुष्यों का मांस नोचते हैं आतंकित जो आर्तनाद तक नहीं कर पाते

आकाश कभी भी टिड्डियों से आच्छादित हो जाता है जो प्रत्येक हरित वनस्पति और जीवित प्राणियों को खाती हैं

गर्दभों को जनती हैं गायें हाथियों को खच्चरियां श्वानों को शूकरियां

तीन सींग चार नेत्र पांच पैर दो मूत्रेंद्रिय दो मस्तक दो पूँछ तथा अनेक दाढ़ों वाले अकल्पनीय पशु जन्म लेते हैं और वर्णनातीत भयावह वाणी में बोलते हैं

चूहे छछूंदर गोधिकाएं चीटे तिलचट्टे सोते हुए स्त्री-पुरुषों के नख केश उँगलियाँ कुतरकर खाते हैं और उन्हें भान नहीं होता

सियार लोमड़ियाँ और लकड़बग्घे भरी दोपहर झुण्ड बनाकर निकलते हैं और कुत्तों बिल्लियों बछड़ों का आखेट करते हैं

बंधे हुए पशु अचानक चौंकने बिदकने लगते हैं पसीना पसीना हो जाते हैं उनकी आँखों से आंसू और मूत्रेंद्रिय से रक्त बहता है

अट्टालिकाओं पूजास्थलियों वाहनों के ध्वज कांपते हैं जलने लगते हैं    मानवहीन रथ चलने लगते हैं
शस्त्रों से लपटें उठती हैं

पाकशालाओं की रसोई में कीड़े बिलबिलाते दिखाई देते हैं

जो इस पृथ्वी पर कहीं दिखाई नहीं देते ऐसे भीषण प्राणियों को जन्म देती हैं स्त्रियाँ जिनमें से कुछ एक साथ चार-चार पांच-पांच संतान उत्पन्न करती हैं जो जनमते ही नाचती गाती हंसती हैं

सारी मर्यादाएं तोड़कर समस्त नारियां समस्त पुरुष परस्पर सम्भोग करते हैं अहर्निश हर संभव पापाचार होता है

संग्राम से पलायन करते हैं अचानक नपुंसक हो गए नवयुवक धूर्तों दस्युओं वेश्यालयों के स्वामियों का क्रीतदास बनने के लिए जिनके समक्ष स्त्रियाँ स्वेच्छा से निश्शुल्क निर्वसन होती हैं

किस निद्रा किस मूर्च्छा में चल रहा हूँ मुझे ज्ञात नहीं    मैंने कब नखों केशों दूषित वस्त्रों से अशुद्ध हुआ जल पिया या उससे स्नान किया    अपने संज्ञान में मैंने नहीं किया किसी रजस्वला किसी अगम्या से सहवास    मुझसे नहीं हुई कोई ब्रह्महत्या तब कैसे पराभव हुआ मेरा

मेरे पास धनुष था किन्तु उसकी प्रत्यंचा तक न चढ़ा सका मैं     मेरी भुजाओं में जो बल था अब नहीं रहा   सभी बाण नष्ट हो चुके मेरे तूणीर में कोई सायक नहीं     अपने किसी मंत्रपूत अस्त्र का आह्वान नहीं कर सकता मैं     मेरा पराक्रम नष्ट हुआ मेरे वंश का नाश हुआ

कौन से महापातक हुए मुझसे किसी पाप किसी महासंहार को रोक न सका मैं

अश्रुतपूर्व महारोग फैलते हैं    अकल्पनीय अपराध होते हैं     माता पिता पुत्र पुत्री भ्रातृ भगिनी पति पत्नी परस्पर हत्याएं करते हैं     नर-मांस से कोई घृणा नहीं करता

मरीचिकाओं में दिखती है स्वर्णनगरियों कल्पवृक्षों अप्सराओं अट्टालिकाओं की अमरावती जिसकी दिशा में दौड़ते हैं नर-नारी वो फिर लौटकर नहीं आते

लोग सत्पुरुषों पूर्वजों पूज्यों हुतात्माओं से द्वेष और उनकी निंदा करते हैं    आराध्य और अवतारों का ही नहीं सत्गुरुओं का तिरस्कार होता है     गुरुकुलों में हत्याएं होती हैं

बालक विकलांग होकर नाचते गाते अट्टहास करते हैं शस्त्रास्त्र लेकर वे मूर्तियाँ उकेरते और बनाते हैं परस्पर आक्रमण करते हैं कृत्रिम नगर बसाकर युद्ध करते हुए उन्हें वे नष्ट कर देते हैं

देवताओं की मूर्तियाँ कांपती अट्टहास करती रक्त उगलती खिन्न और ध्वस्त होती हैं आश्रम और पूजागृह धूलिसात हो जाते हैं

जब मंत्रोच्चार और जप किया जाता है तो ऐसा सुनाई देता है जैसे कुछ मानव-समूह आक्रमण कर रहे हों किन्तु कोई दिखाई नहीं पड़ता

किन्हीं दूसरे लोकों से आये राक्षसों जैसे प्राणी धन आभूषण छत्र कवच ध्वजा सहित नगरवासियों का भक्षण करते हैं

जब पूजा-अर्चना के वाद्य बजाए जाते हैं तो सूने घरों से घोर स्वर उठते हैं

जलते हुए खंडहर दिखाई देते हैं जिनसे दीन-हीनों अनाथों का विलाप सुनाई देता है

पुरातन यम और शाश्वत मृत्यु के स्थान पर यह कौन-सा नवीन यूं कैसी नूतन मृत्यु है यह जो न स्वर्ग ले जाते हैं और न नरक

लोग स्वप्नों में देखते हैं एक विकराल कृत्या जो अपने अस्थियों जैसे सफ़ेद दांत दिखाती हुई आई है और स्त्रियों के आभूषण लूटती हुई सारे नगर में दौड़ रही है

अपना काला और पीला सिर मुंडाए हुए काल प्रतिदिन नगर के मार्गों पर चक्कर लगाता है     भवनों प्रासादों अट्टालिकाओं उपवनों निवासियों नृपतियों को देर तक खड़ा देखता रहता है    कभी दीखता है
   कभी अदृश्य हो जाता है

फिर एक अट्टहास जो ब्रह्माण्ड के अंत तक जाता गूंजता है.
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(चित्र-कृत : बारबरा सिमास)

Sunday, February 14, 2010

आवाज़ भी एक जगह है...


लड़के ने उसे चेखव की 'दि लेडी विद दि डॉग' पढ़कर नहीं सुनाया था जो उसे केट विंस्लेट की 'दि रीडर' देख उसकी याद आती। उसने निर्मल की 'लवर्स' पढ़ी थी। फ़ोन पर। बहुत से लफ़्ज़ों का अंग्रेजी तर्जुमा करके। वह, 'ओके...देन...आई सी...रियली...ओह...इट्स सो सैड!' कहते हुए कहानी में घुलती जाती। लड़के ने उससे वह सब पहले ही कह रखा था जो शेर, कविताओं या कहानियों के ज़रिये घुमा-फिराकर कहने का पुराना रिवाज़ था। इसलिए इस रीडिंग का कोई दूसरा मतलब था ही नहीं। १९७ के रिचार्ज पर हज़ार कॉल करने की सहूलियत ने उनके बीच बातचीत के लमहों को वसी कर दिया था। एक-दूसरे की आवाज़ को तब उन्होंने दोहराऊ-उबाऊ प्रेम-प्रलापों से ही नहीं, ऐसी कहानियों से भी भरा था।
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उनके लिए आवाज़ सचमुच एक जगह थी। वहां वे मिल सकते थे। वे मिलते थे। कभी-कभी वह लड़के के इसरार पर कुछ गुनगुनाती थी। वह उसे रिकॉर्ड कर लेता था। मुलाकात के दिनों में उसे सुनाता तो लड़की अपनी पेटेंट गाली से उसे नवाजती, 'यू बिच', फिर ' मैं कितना ख़राब गाती हूँ। डोंट इमबैरेस मी।' लड़का उसके कहे के बाहर मुस्कराता :-)
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मोबाइल के रिकॉर्डर में लड़की के छुपकर फ़ोन करने से पकड़े जाने का डर शामिल है। जैसे कि उस डर में एक मधुर कंठ। और उस कंठ में लड़के के लिए एक धुन, जो अब भी उसकी सबसे मुकम्मल जगह है।
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{ चित्र-कृति मार्क शागाल की }

Tuesday, February 02, 2010

व्योमेश शुक्ल की दो नई कविताएं



मैं हूँ और वे हैं


इस बीच कई बार बार धूप खिली. अचार के मर्तबान से गुप्ताजी के सिर तक तक फैलकर उसने मनमाने चित्र बनाये. बहुत दिनों बाद देखकर खुश हो जाऊं, ऐसे आई थी वह. समय के बीतने के साथ उसका कोई सम्बन्ध है ज़रूर. वह आती है और हर याद स्मृति हो जाती है.

वे बिलकुल अभी के स्पंदन, स्पर्श, उल्लास, क्रोध, विरोध और झटके थे. वे मैं थे. मैं वे था. और अब, अब ये धूप है और मैं हूँ और वे हैं.

वे स्पंदन वहीं हैं. उसी बिंदु पर स्थिर और गतिमान क्योंकि गति का यह मतलब नहीं है कि वह हर बार मुझ पर, मेरे वक़्त पर गुज़रे या 'अभी' में हो. वह अभी भी हो सकती है और कभी हो सकती है. जो हुई थीं, वे बातें भी अभी हो रही हैं. बस हम उनमें जा नहीं पा रहे. जो होने वाली हैं वे भी हो रही हैं. हम उनमें जा सकेंगे शायद.

एक साइकिल एक पतंग गालियां बकता हुआ एक बद्तमीज़ तोता, ऐसी ही चीज़ों से बना था संसार. समोसा भी था उसमें - छोटा और सनसनीखेज़ जीवन जीता हुआ, मौत के कुएं में बेतहाशा मोटरसाइकिल चलाता हुआ, नुकीला और अनिवार्य. ठीक है कि एक दुनियादार गड़प है उसकी नियति, लेकिन हिम्मत देखिये जनाब. कल फिर हाज़िर.

मन्ना डे इमरती बना रहे हैं. ये वही नहीं हैं, याने दादा साहब फाल्के वाले. अलग हैं. ये उन जैसे हैं और उन जैसे न भी होते तो भी इनका नाम मन्ना डे होता. बल्कि जो मनुष्य सामने खड़ा इमरती का इंतज़ार कर रहा है उसका भी नाम मन्ना डे होता. कोई भी मन्ना डे होता. किसी को भी मन्ना डे होने का हक़ है. कुछ देर में जो लोग मुर्दा फूँककर आएंगें और इमरती की बजाए भचर-भचर पूड़ी-सब्जी खाने लगेंगे, वे भी होते मन्ना डे. वे भी होंगे मन्ना डे.
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अंगूर
( अप्रतिम कवि उदयन वाजपेयी के लिए)

और जिस दिन तुम्हें पाता चला कि संज्ञाएं सम्प्रेषण की सुविधा के अलावा कुछ नहीं हैं, तुम स्कूटर चला रहे थे. जिस क्षण यह ख़याल ब्रह्माण्ड को तुम्हारे लिए पुनर्विन्यस्त कर रहा था - वह - इस दुनिया की साधारणता का एक महान क्षण - जब तुम अपने आविष्कार को दे दिए गए थे, तुम्हारे हमसफ़र ने कहा - 'बेबी दी के यहाँ से अंगूर लेने थे...'. लेकिन औदात्य देखो कि यह दुनियादार प्रतिक्रिया अब उसी खोज का हिस्सा है और उसी सफ़र का जिसमें तुम अपने हमसफ़र के साथ कहीं के लिए निकले थे और फ़िलहाल बेबी दी के घर से आगे चले आये हो.
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{ कवि की अन्य कविताएं यहां.... तस्वीर मधुमिता दास के कैमरे से }