Tuesday, January 19, 2010

अकेला मेला

अपनी बहुविधात्मक रचनाशीलता के लिए ख्यात रमेशचंद्र शाह की डायरी का पहला हिस्सा 'अकेला मेला' नाम से छप कर आया है। इसमें मुख्यतः १९८० से ८६ तक की इंट्रीज हैं। इस डायरी को पढ़ते हुए मुझे सहसा उनका यात्रा-संस्मरण 'एक लम्बी छांह याद' हो आया। इंग्लैंड और आयरलैंड के छवि-अंकन से बढ़कर वह पुस्तक एक बौद्धिक सहयात्रा का आनंद देती है। इस डायरी में भी वे अपने पाठक को वैसी ही यात्रा पर न्योत रहे हैं। जिस दौर में शाह ये डायरियां लिख रहे हैं, वह उनके लेखन-पठन के महत्वपूर्ण वर्ष हैं। तारीफ यह कि वे अपने लिखने की बात पर पढ़ने को तरजीह देते हैं, इसीलिए उनकी इंट्रीज में किसी लेखक या कृति के बारे में जगहें कहीं ज़्यादा है। यही वे जगहें हैं जो आलोचना के परम्परित बंधाव में आने से रह जाती हैं। शाह साब का आलोचक मन उसे हिसाब में लेता है और किसी कृति को पठनानुभव के इस धरातल पर खोलने में रमता-रमाता है। अहंलीन निजी ब्योरों से भरी डायरियों के बरक्स उनकी डायरी का यह गुण हिंदी में सिर्फ़ उनके सर्जक सखा मलयज की डायरियों में ही मिलता है। हालाँकि मलयज के यहाँ एक दुर्लभ गुण की तरह उनका 'निज' भी उपस्थित है। शाह साब ने इस डायरी में खुद को नेपथ्य में भले रखा हो, पर अज्ञेय या निर्मल वर्मा सरीखे लेखकों के संग-साथ और लेखन का उनके मन पर इन वर्षों में जो इम्प्रेशन रहा है, उसे बखूबी दर्ज किया है। इस डायरी को इसीलिए एक लेखक के सर्जनात्मक मन की तरह पढ़ा जाना चाहिए। एक मन जो इतना खुला और समावेशी है, जो लिखे हुए का प्रभाव ग्रहण करता है, उसकी व्याख्या करता है और उससे जब-तब जिरह कर कृतज्ञ भी होता है। शाह की डायरियों की अगले किस्त की प्रतीक्षा इसी कारण से मन में अभी से है।
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4 comments:

दर्शन said...

usi ekant main ghar do jahan par sabhi aavein main na aun.....

nilm said...

akela mela....shayed y wo derpen hoga jo dikhayga...why one is lonely in the crowd...?

शिरीष कुमार मौर्य said...

शाह साहब की डायरी का स्वागत....पर सोच रहा हूँ कि शाह साहब ने अगर डायरी में ख़ुद को नेपथ्य में रखा है तो फिर डायरी कैसी .....किताब ज़रूर देखूँगा.

abcd said...

एक cameraman जब कैमरे के पीछे होता है तब वो क्या करे ??
उसके पास director के instructions होते हैं,हीरो ,हेरोइने के होते हैं,लेखक के होते हैं,screenplay writer के होते hain,निर्माता के भी होते हैं और उसके काम के आगे एडिटर भी होता है !
और उससे कैमरे को एक आँख की तरह इस्तेमाल करना होता है...ऐसे समय में सबसे श्रेष्ठ उपाय, मेरी नज़र मे,ं कैमरे को दर्शक की आँख मान कर कैमरा घुमाना ही सर्वश्रेष्ठ होता है......

सर्वश्रेष्ठ इसलिए बोला की ये शब्द अच्छा ,बेहतर,बहुत अच्छा और श्रेष्ठ की श्रेणियों को भी गिन रहा है....cameraman और director और लेखक और screenplay writer और निर्माता जिसकी ये फिल्म है(इस संधर्भ में diary)वो नेपथ्य में रहे तो-सर्वश्रेष्ठ है /

बाकी किसी की diary में किसे क्या जानने की या पाने की आशा होती है,और किसे किस्मे आनंद आता है , वो तो है ही -निजी !!