सबद
vatsanurag.blogspot.com

अकेला मेला

अपनी बहुविधात्मक रचनाशीलता के लिए ख्यात रमेशचंद्र शाह की डायरी का पहला हिस्सा 'अकेला मेला' नाम से छप कर आया है। इसमें मुख्यतः १९८० से ८६ तक की इंट्रीज हैं। इस डायरी को पढ़ते हुए मुझे सहसा उनका यात्रा-संस्मरण 'एक लम्बी छांह याद' हो आया। इंग्लैंड और आयरलैंड के छवि-अंकन से बढ़कर वह पुस्तक एक बौद्धिक सहयात्रा का आनंद देती है। इस डायरी में भी वे अपने पाठक को वैसी ही यात्रा पर न्योत रहे हैं। जिस दौर में शाह ये डायरियां लिख रहे हैं, वह उनके लेखन-पठन के महत्वपूर्ण वर्ष हैं। तारीफ यह कि वे अपने लिखने की बात पर पढ़ने को तरजीह देते हैं, इसीलिए उनकी इंट्रीज में किसी लेखक या कृति के बारे में जगहें कहीं ज़्यादा है। यही वे जगहें हैं जो आलोचना के परम्परित बंधाव में आने से रह जाती हैं। शाह साब का आलोचक मन उसे हिसाब में लेता है और किसी कृति को पठनानुभव के इस धरातल पर खोलने में रमता-रमाता है। अहंलीन निजी ब्योरों से भरी डायरियों के बरक्स उनकी डायरी का यह गुण हिंदी में सिर्फ़ उनके सर्जक सखा मलयज की डायरियों में ही मिलता है। हालाँकि मलयज के यहाँ एक दुर्लभ गुण की तरह उनका 'निज' भी उपस्थित है। शाह साब ने इस डायरी में खुद को नेपथ्य में भले रखा हो, पर अज्ञेय या निर्मल वर्मा सरीखे लेखकों के संग-साथ और लेखन का उनके मन पर इन वर्षों में जो इम्प्रेशन रहा है, उसे बखूबी दर्ज किया है। इस डायरी को इसीलिए एक लेखक के सर्जनात्मक मन की तरह पढ़ा जाना चाहिए। एक मन जो इतना खुला और समावेशी है, जो लिखे हुए का प्रभाव ग्रहण करता है, उसकी व्याख्या करता है और उससे जब-तब जिरह कर कृतज्ञ भी होता है। शाह की डायरियों की अगले किस्त की प्रतीक्षा इसी कारण से मन में अभी से है।
****
4 comments:

usi ekant main ghar do jahan par sabhi aavein main na aun.....


akela mela....shayed y wo derpen hoga jo dikhayga...why one is lonely in the crowd...?


शाह साहब की डायरी का स्वागत....पर सोच रहा हूँ कि शाह साहब ने अगर डायरी में ख़ुद को नेपथ्य में रखा है तो फिर डायरी कैसी .....किताब ज़रूर देखूँगा.


एक cameraman जब कैमरे के पीछे होता है तब वो क्या करे ??
उसके पास director के instructions होते हैं,हीरो ,हेरोइने के होते हैं,लेखक के होते हैं,screenplay writer के होते hain,निर्माता के भी होते हैं और उसके काम के आगे एडिटर भी होता है !
और उससे कैमरे को एक आँख की तरह इस्तेमाल करना होता है...ऐसे समय में सबसे श्रेष्ठ उपाय, मेरी नज़र मे,ं कैमरे को दर्शक की आँख मान कर कैमरा घुमाना ही सर्वश्रेष्ठ होता है......

सर्वश्रेष्ठ इसलिए बोला की ये शब्द अच्छा ,बेहतर,बहुत अच्छा और श्रेष्ठ की श्रेणियों को भी गिन रहा है....cameraman और director और लेखक और screenplay writer और निर्माता जिसकी ये फिल्म है(इस संधर्भ में diary)वो नेपथ्य में रहे तो-सर्वश्रेष्ठ है /

बाकी किसी की diary में किसे क्या जानने की या पाने की आशा होती है,और किसे किस्मे आनंद आता है , वो तो है ही -निजी !!


सबद से जुड़ने की जगह :

सबद से जुड़ने की जगह :
[ अपडेट्स और सूचनाओं की जगह् ]

आग़ाज़


सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

पिछला बाक़ी

साखी


कुंवर नारायण / कृष्‍ण बलदेव वैद / विष्‍णु खरे / चंद्रकांत देवताले / राजी सेठ / मंगलेश डबराल / असद ज़ैदी / कुमार अंबुज / उदयन वाजपेयी / हृषिकेश सुलभ / लाल्‍टू / संजय खाती / पंकज चतुर्वेदी / आशुतोष दुबे / अजंता देव / यतींद्र मिश्र / पंकज मित्र / गीत चतुर्वेदी / व्‍योमेश शुक्‍ल / चन्दन पाण्डेय / कुणाल सिंह / मनोज कुमार झा / पंकज राग / नीलेश रघुवंशी / शिरीष कुमार मौर्य / संजय कुंदन / सुंदर चंद्र ठाकुर / अखिलेश / अरुण देव / समर्थ वाशिष्ठ / चंद्रभूषण / प्रत्‍यक्षा / मृत्युंजय / मनीषा कुलश्रेष्ठ / तुषार धवल / वंदना राग / पीयूष दईया / संगीता गुन्देचा / गिरिराज किराडू / महेश वर्मा / मोहन राणा / प्रभात रंजन / मृत्युंजय / आशुतोष भारद्वाज / हिमांशु पंड्या / शशिभूषण /
मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / ज़बिग्नियव हर्बर्ट / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / सबीर हका / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी