Wednesday, January 06, 2010

क्योंकि यही सब तो है जीवन...यही सब प्यार...


उधार

सवेरे उठा तो धूप खिल कर छा गई थी
और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी।
मैंने धूप से कहा : मुझे थोड़ी गर्मी दोगी उधार ?
चिड़िया से कहा : थोड़ी मिठास उधार दोगी ?
मैंने घास की पत्ती से पूछा : तनिक हरियाली दोगी--
तिनके की नोक-भर ?
शंखपुष्पी से पूछा : उजास दोगी--
किरण की ओक-भर ?
मैंने हवा से माँगा : थोडा खुलापन--बस एक प्रश्वास,
लहर से : एक रोम की सिहरन भर उल्लास।
मैंने आकाश से माँगी
आँख की झपकी-भर असीमता--उधार।
सब से उधार माँगा, सब ने दिया।

यों मैं जिया और जीता हूँ
क्योंकि यही सब तो है जीवन--
गरमाई, मिठास, हरियाली, उजाला,
गन्धवाही मुक्त खुलापन,
लोच, उल्लास, लहरिल प्रवाह,
और बोध भव्य निर्व्यास निस्सीम का :
ये सब उधार पाये हुए द्रव्य।

रात के अकेले अंधकार में
सपने से जागा जिसमें
एक अनदेखे अरूप ने पुकार कर
मुझसे पूछा था : 'क्यों जी,
तुम्हारे इस जीवन के इतने विविध अनुभव हैं
इतने तुम धनी हो,
तो मुझे थोड़ा प्यार दोगे - उधार - जिसे मैं
सौ - गुने सूद के साथ लौटाऊँगा -
और वह भी सौ-सौ बार गिन के -
जब-जब मैं आऊँगा ?

मैंने कहा : प्यार ? उधार ?
स्वर अचकचाया था, क्योंकि मेरे
अनुभव से परे था ऐसा व्यवहार।
उस अनदेखे अरूप ने कहा : 'हाँ,
क्योंकि ये ही सब चीजें तो प्यार हैं -
यह अकेलापन, यह अकुलाहट,
यह असमंजस, अचकचाहट
आर्त अनुभव,
यह खोज, यह द्वैत, यह असहाय
विरह-व्यथा,
यह अंधकार में जाग कर सहसा पहचानना
कि जो मेरा है वही ममेतर है।
यह सब तुम्हारे पास है
तो थोड़ा मुझे दे दो - उधार - इस इक बार -
मुझे जो चरम आवश्यकता है।'

उस ने यह कहा,
पर रात के घुप अँधेरे में
मैं सहमा हुआ चुप रहा; अभी तक मौन हूं :
अनदेखे अरूप को
उधार देते मैं डरता हूं :
क्या जाने
यह याचक कौन है !
****

{ अज्ञेय की कविता}.
( तस्वीर मधुमिता दास के कैमरे से. )

7 comments:

कुश said...

साहित्य की बूंदे भिगो जाती है..

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!!

pallavi trivedi said...

बहुत सुन्दर कविता पढवाने के लिए शुक्रिया....

रजनी भार्गव said...

बहुत अच्छी कविता है। अज्ञेय मेरे मनपसंद कवि हैं। आभार।

श्याम कोरी 'उदय' said...

... उम्दा ब्लाग, प्रस्तुति प्रसंशनीय !!!!

nilm said...

a picture perfect.life,love,,passions,emotions,pining for what one s not having....mingled with a fear which remains unexplained....

अनिल कान्त : said...

आनंद आ गया पढ़कर