Monday, January 04, 2010

निर्मल वर्मा के पत्र

निर्मल वर्मा के पत्रों की दूसरी और तीसरी किताब अब सामने है। पहली किताब ''प्रिय राम'' के नाम से चार बरस पहले आई थी। उसमें निर्मल अपने अग्रज, प्रतिष्ठित चित्रकार और कहानीकार, रामकुमार से मुखातिब हैं और इन दो पुस्तकों ( देहरी पर पत्र तथा चिट्ठियों के दिन ) में कहानीकार जयशंकर और रमेशचंद्र शाह एवं उनके लेखक परिवार से।

जयशंकर को लिखे पत्रों को पढ़ते हुए रह-रहकर रिल्के के उन पत्रों की याद आती है, जो उन्होंने युवा कवि को लिखे थे। पत्राचार की जिन वर्षों में शुरुआत होती है, वे जयशंकर के कथा-लेखन के आरंभिक वर्ष हैं और ज्यों-ज्यों बरस पर बरस बीतते हैं, संवाद में एक किस्म की गर्माहट और एक-दूसरे के पत्रों को पाने की चाहत बढ़ती जाती है। इसकी एक खास वजह है। जिस धरातल पर यह पत्राचार अनवरत चलता रहा है, वह अत्यंत उर्वर है। वह न सिर्फ सृजन का साझा धरातल है, बल्कि उसके इतर जो रुचियाँ हैं, खासकर पढ़ने और फ़िल्में देखने की, उस अनुभव को भी बांटने की आतुरता दुतरफा है। अपनी मृत्यु के कुछ दिन पहले तक लिखे गए कुल १६२ में कुछेक ही ऐसे पत्र हैं जिनमें निर्मल जी अपनी पढ़ी हुई किताब और जयशंकर की हालिया देखी गई फिल्मों के बारे में नहीं बताते-पूछते। कई पत्रों में इसी पूछ-बात के बीच निर्मल जी ने अंतर्दृष्टिसंपन्न टीपें भी दी हैं जिनको पढ़ते हुए किसी कृति या लेखक का एक सर्वथा अजाना अर्थ खुलता है। निर्मल जी जयशंकर को बतौर कहानीकार बहुत मान देते थे, पर यह महज स्नेह-सौजन्यवश नहीं था। जयशंकर को पत्रों में उनकी सख्त हिदायतों से भी अक्सर दो-चार होना पड़ा है, जो एक फन का उस्ताद अपने शागिर्द को बिना लाग-लपेट के देता है। जयशंकर की कहानियों और जर्नल्स पर निर्मल की राय को इस लिहाज से पढना उपयोगी होगा क्योंकि हिंदी के बीमार आलोचक अध्यवसाय किये बिना उन्हें महज निर्मल-स्कूल का विद्यार्थी कहकर आगे बढ़ते रहे हैं।

लेखक
-आलोचक रमेशचंद्र शाह से निर्मल के पत्राचार हालाँकि अनेक स्तरों पर चलते हैं, और उसमें कुछ-कुछ हिंदी के लेखकों-बौद्धिकों का चरित्र भी उजागर होता है, पर ये पत्र भी अंततः सर्जना के बिन्दुओं पर दो सर्जक व्यक्तित्वों के आत्मिक जुड़ाव की ही कथा कहते हैं। इस जुड़ाव में शाह का सर्जक परिवार ( पत्नी ज्योत्स्ना मिलन और बेटियां शम्पा और राजुला शाह) भी बराबर योग करता है। शाह परिवार से निर्मल जी की निकटता उनके भोपाल प्रवास के दौरान हुई थी जो अंत तक बनी रही। शाह साब से संवाद करते हुए उन्होंने अपने लेखन के बारे में बहुत-सी सूचनाएँ दी हैं। जिसे 'अ वर्क इन प्रोग्रेस' कहते हैं, उसके बारे में, और उसके लेखक के आंतरिक उहापोहों के बारे में जानना एक विशिष्ट अनुभव के साक्षात होना है। शाह साब को लिखे पत्रों के जरिये निर्मल जी के सर्जक मन से ऐसा साक्षात्कार आद्योपांत होता है। अलावा इसके भोपाल, अशोक वाजपेयी, उनका सृजनपीठ और सृजनपीठ प्रमुख होने के एवजी अपेक्षाओं का भी इन पत्रों में निर्मल जी ने अच्छा खुलासा किया है। आलोचना संपादक नामवर सिंह का दुर्भावना से प्रेरित निर्मल-केन्द्रित अंक निकलना भी नुक्तेनज़र की खामियों के साथ यहाँ दर्ज है। सबसे बड़ी बात यह है कि ये तमाम बातें एक गरिमामय ढंग से कही गईं हैं। बहुत निजी और मैत्री के स्तर पर संप्रेषित हैं। ऐसी ग्रेसफुल जगहें लेखकों के पत्रों में दुर्लभ है। निर्मल के पत्रों में इसकी व्याप्ति उनके प्रति हमें कुछ और श्रद्धावनत करता है।

गगन गिल ने पिछले पत्र-संकलन की तरह इन संकलनों को भी अपनी संक्षिप्त भूमिका और संपादन के साथ प्रस्तुत किया है। निर्मल-प्रेमियों के लिए ख़ुशी की बात है कि २००५ में उनके देहावसान के बाद से गगन उनका लिखा-अनछपा हम सबके लिए धीरे-धीरे ही सही, उपलब्ध करा रही हैं।
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( पहला पत्र-संकलन प्रिय राम, ज्ञानपीठ से जबकि बाद के दोनों संकलन वाणी प्रकाशन से छपकर आये हैं.)

8 comments:

vinay vaidya said...

Good and timely information.
Thanks.

डॉ .अनुराग said...

एक ओर मोती !!

anita said...

nirmal ji ke patr wali pehli book mujhe tumse he padhne ko mili the....tumhara lekh padhkar sabra nahi ho raha hai.jaldi se khareedkar padhne ka man kar raha hai....achi aur sahi bato se avgat karane ke liye dhnyawaad....

vatsvandana blogspot.com said...

really good post and i think it will helpful to analyse the book to other's also.

Amit said...

पत्र लेखन भी एक कला लगती है..आज की पोस्ट पढ़ कर एक पुराना प्ले याद आ गया-"तुम्हारी अमृता " फारूख शेख और शबाना आज़मी थे उसमे/
स्टेज पर केवल दो कुर्सी टेबल / पुरे हॉल और स्टेज पर अँधेरा और केवल उन दो कुर्सी टेबल पर लाइट्स /
पत्र भी अपने आप में एक कहानी से बढकर नहीं , तो कम भी नहीं होते..अंदाज़े के लिए भी ढेर सारी जगह छोड़ते है...हर दो पत्रों के बीच की कहानी सुनने/पढने वाले को खुद सोचनी होती है ....कई बार कडिया जुड़ जाती हैं ....और कई बार....जैसे किसी ३० बरस के आदमी की पंद्रह अलग अलग सालों की फोटो दे दी जाए ...औरउनकी मदद से बचे पंद्रह सालों के लिए अंदाजा लगाने के लिए कहा जाए की वो कैसा दीखता होगा....... !!:-)

Anonymous said...

nirmal ji ki priye ram padhi thi aab post ko padhne ke baad unki book ko padhna aur bhi achha lagega.

Priyankar said...

sukhad soochanaa .

nilm said...

khat ke intzar ki becheni,pa ker ped lene ki sukhad anubhutee aur phir senjo ker rekhene ka huner....seb gey jmane ki baten legti hain.per jo khat kitab ho gey wo az bhi mano kehte se legtay hai.."hamin ped lo n"..........