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Showing posts from January, 2010

स्मिता पाटिल

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वह खड़ी थी, सीढ़ी के निचले तल पर, मुस्कुराती, मोड़ पर लड़की जिसकी प्रतिभा का प्रस्फुटन अभी होना है.

उसका नाम है स्मिता.

वह खड़ी थी, शर्माती, बम्बई दूरदर्शन स्टूडियो के गलियारे में, अपने आस-पास की दुनिया के शोरोगुल बरदाश्त करती.

फिर, हम उसका न्यूज़ पढना देखते हैं. उस युवती की छवि ने उन ब्यौरों को महत्वपूर्ण बना दिया कि हम चकित रह गए.

जल्द ही इसके बाद, हमने एक मौन अलिखित समझौता किया. ठंडी हवाएं आघात पहुंचा रही थीं...जो हमें आतंकित कर गईं कि हम धरा से अलग हो जायेंगे...लेकिन उस भरोसा था...जिसकी वजह से वह जुडी रही. ज़िन्दगी के अवास्तविक परदे पर सांस लेती रही.

उसका उत्साह कम नहीं होता जब सुबह की मासूम घड़ियों तक हम काम करते, चर्चाएँ करते...आप यही सोचते...कि उषा की पहली आश्चर्यचकित और ऊर्जस्वित करने वाली किरण की आप झलक पा रहे हैं.

यह मुझमें आश्चर्य भर देता, साहसिक काम की खोज में निकले बच्चे की तरह, हम कई बार अपनी माँ के ख़ज़ाने और उसकी निर्मिति को खंगालने की कोशिश करते...लेकिन जितना उससे लेते वह उतना ही अधिक देती.

मैं अत्यंत दुःख के साथ याद करता हूँ कि कैसे उसने अपने भीतर एक बच्चे को पलना चाहा. मैं उस…

अकेला मेला

अपनी बहुविधात्मक रचनाशीलता के लिए ख्यात रमेशचंद्र शाह की डायरी का पहला हिस्सा 'अकेला मेला' नाम से छप कर आया है। इसमें मुख्यतः १९८० से ८६ तक की इंट्रीज हैं। इस डायरी को पढ़ते हुए मुझे सहसा उनका यात्रा-संस्मरण 'एक लम्बी छांह याद' हो आया। इंग्लैंड और आयरलैंड के छवि-अंकन से बढ़कर वह पुस्तक एक बौद्धिक सहयात्रा का आनंद देती है। इस डायरी में भी वे अपने पाठक को वैसी ही यात्रा पर न्योत रहे हैं। जिस दौर में शाह ये डायरियां लिख रहे हैं, वह उनके लेखन-पठन के महत्वपूर्ण वर्ष हैं। तारीफ यह कि वे अपने लिखने की बात पर पढ़ने को तरजीह देते हैं, इसीलिए उनकी इंट्रीज में किसी लेखक या कृति के बारे में जगहें कहीं ज़्यादा है। यही वे जगहें हैं जो आलोचना के परम्परित बंधाव में आने से रह जाती हैं। शाह साब का आलोचक मन उसे हिसाब में लेता है और किसी कृति को पठनानुभव के इस धरातल पर खोलने में रमता-रमाता है। अहंलीन निजी ब्योरों से भरी डायरियों के बरक्स उनकी डायरी का यह गुण हिंदी में सिर्फ़ उनके सर्जक सखा मलयज की डायरियों में ही मिलता है। हालाँकि मलयज के यहाँ एक दुर्लभ गुण की तरह उनका 'निज' भी उपस्थ…

स्वगत : ३ : कुमार अंबुज

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{ साहित्य में कुछ सवाल चिरंतन होते हैं. हर युग में ये सवाल कवि-लेखकों के सामने उपस्थित हो जाते हैं. इनका सामना सब अपने-अपने ढंग से करते हैं. जैसे 'कविता क्या है' सरीखा सवाल ही हमेशा से एक ज़रूरी पड़ताल का विषय रहा है, उसी तरह 'समकालीनता' या 'प्रासंगिकता' जैसे प्रत्यय भी. कहना न होगा कि इन सबों का उत्तर युग-सापेक्ष अतः अनंतिम है. महत्वपूर्ण हिंदी कवि कुमार अंबुज ने समकालीनता के बारे में अपने विचार यहाँ प्रस्तुत किये हैं. अंबुज जी का कुछ और गद्य भी सबद पर प्रकाशित है. इस स्तंभ के अंतर्गत आप इससे पहले गीत चतुर्वेदी और व्योमेश शुक्ल को भी पढ़ चुके हैं. }

समकालीनता:अनुभव और आशा

कुमार अम्बुज

समकालीन कविता का अर्थ 'एक समय में लिख रहे कवियों की कविता भर से नहीं बल्कि अपने समय, काल की प्रमुख प्रवृत्तियों और यथार्थ को दर्ज करने के उपक्रम में' देखा जाना चाहिए। केवल शब्‍दकोशीय अर्थ लेकर हम साहित्य की समकालीनता को समझने में चूक कर सकते हैं। हर युग की समकालीन कविता की प्रवृत्तियाँ भी अलग होती हैं। रीतिकाल, भक्तिकाल या छायावादी समय की समकालीन कविता से हम उस युग के सामाजिक…

क्योंकि यही सब तो है जीवन...यही सब प्यार...

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उधार

सवेरे उठा तो धूप खिल कर छा गई थी
और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी।
मैंने धूप से कहा : मुझे थोड़ी गर्मी दोगी उधार ?
चिड़िया से कहा : थोड़ी मिठास उधार दोगी ?
मैंने घास की पत्ती से पूछा : तनिक हरियाली दोगी--
तिनके की नोक-भर ?
शंखपुष्पी से पूछा : उजास दोगी--
किरण की ओक-भर ?
मैंने हवा से माँगा : थोडा खुलापन--बस एक प्रश्वास,
लहर से : एक रोम की सिहरन भर उल्लास।
मैंने आकाश से माँगी
आँख की झपकी-भर असीमता--उधार।
सब से उधार माँगा, सब ने दिया।

यों मैं जिया और जीता हूँ
क्योंकि यही सब तो है जीवन--
गरमाई, मिठास, हरियाली, उजाला,
गन्धवाही मुक्त खुलापन,
लोच, उल्लास, लहरिल प्रवाह,
और बोध भव्य निर्व्यास निस्सीम का :
ये सब उधार पाये हुए द्रव्य।

रात के अकेले अंधकार में
सपने से जागा जिसमें
एक अनदेखे अरूप ने पुकार कर
मुझसे पूछा था : 'क्यों जी,
तुम्हारे इस जीवन के इतने विविध अनुभव हैं
इतने तुम धनी हो,
तो मुझे थोड़ा प्यार दोगे - उधार - जिसे मैं
सौ - गुने सूद के साथ लौटाऊँगा -
और वह भी सौ-सौ बार गिन के -
जब-जब मैं आऊँगा ?

मैंने कहा : प्यार ? उधार ?
स्वर अचकचाया था, क्योंकि मेरे
अनुभव से परे था ऐसा व्यवहार।
उस अनदेखे अरूप ने कहा :…

निर्मल वर्मा के पत्र

निर्मल वर्माके पत्रों की दूसरी और तीसरी किताब अब सामने है। पहली किताब ''प्रिय राम'' के नाम से चार बरस पहले आई थी। उसमें निर्मल अपने अग्रज, प्रतिष्ठित चित्रकार और कहानीकार, रामकुमार से मुखातिब हैं और इन दो पुस्तकों ( देहरी पर पत्र तथा चिट्ठियों के दिन ) में कहानीकार जयशंकर और रमेशचंद्र शाह एवं उनके लेखक परिवार से।

जयशंकर को लिखे पत्रों को पढ़ते हुए रह-रहकर रिल्के के उन पत्रों की याद आती है, जो उन्होंने युवा कवि को लिखे थे। पत्राचार की जिन वर्षों में शुरुआत होती है, वे जयशंकर के कथा-लेखन के आरंभिक वर्ष हैं और ज्यों-ज्यों बरस पर बरस बीतते हैं, संवाद में एक किस्म की गर्माहट और एक-दूसरे के पत्रों को पाने की चाहत बढ़ती जाती है। इसकी एक खास वजह है। जिस धरातल पर यह पत्राचार अनवरत चलता रहा है, वह अत्यंत उर्वर है। वह न सिर्फ सृजन का साझा धरातल है, बल्कि उसके इतर जो रुचियाँ हैं, खासकर पढ़ने और फ़िल्में देखने की, उस अनुभव को भी बांटने की आतुरता दुतरफा है। अपनी मृत्यु के कुछ दिन पहले तक लिखे गए कुल १६२ में कुछेक ही ऐसे पत्र हैं जिनमें निर्मल जी अपनी पढ़ी हुई किताब और जयशंकर की हालिया द…

प्रार्थना

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कमल के पत्ते-सा तुम्हारा मन हो जिस पर पानी की बूँद-सा दुःख गिरे जिसे मैं अपनी आँखों से चुन लूँ.

( उदयन वाजपेयी की कविता )