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Showing posts from December, 2009

सबद विशेष : ९ : मिक्लोश रादनोती

( मिक्लोश रादनोती हंगरी के किसी कवि का नाम है और उनकी कवितायें हिंदी में उपलब्ध हैं और यह सिवाय उन कविताओं के अनुवादक के किसी को ध्यान तक नहीं कि कवि का यह जन्म शताब्दी वर्ष है! इन्हीं तथ्यों से प्रेरित है सबद की यह विशेषपोस्ट. विष्णु खरे कविता और आलोचना लिखने के बाद जिस काम को बहुत श्रम और सुरुचि से अनेक वर्षों से करते आ रहे हैं उनमें अनुवाद भी है. और हमें उनका ऋणी होना चाहिए कि उन्होंने हिंदी में विश्व की अनेक भाषाओं से इतने विपुल अनुवाद किये हैं. रादनोती के ये अनुवाद और उन पर लेख छब्बीस बरस पहले उन्होंने पुस्तकाकार किये/लिखे थे. बत्तीस पृष्ठों की वह पुस्तक एक लम्बे अरसे से अप्राप्य है. मुझे संयोग से उसकी एक प्रति विष्णुजी की स्टडी में मिल गई थी और कवितायें पढने के फ़ौरन बाद मैं उसे ले उड़ा. क्यों,यह आप आगे पढ़कर जानिए. विष्णुजी का सहयोग के लिए आभार. )
खंड : क : कवितायें
यहाँ इतनी कारें

बहन, तुम देखती हो कितने सारे भिखारी
और अभागे, और कितने सारे भलेमानस चीथड़े बीनने वाले
सिर्फ़ हम दो हैं : मुट्ठी बंधे भिखारी
और गूंगे अभागे

बहन, अपना हाथ मुझे पकडाओ, यहाँ इतनी कारें
और इतने सारे ब…

निधन : दिलीप चित्रे

ज़िन्दा रहने के साहस की एक अनिवार्य मुद्रा

दिलीप चित्रेकैंसर से पीड़ित थे. लेकिन इतने जिंदादिल कि आप उनसे मुखातिब होकर यह अंदाज़ तक नहीं लगा सकते थे. वो आपसे प्रसन्न गप्प लगाते थे. वो कविताओं के बारे में बात करते थे. राजनीति पर भी. जब राज ठाकरे ने अपनी बदमाशियां शुरू की थी, खासकर हिंदी पट्टी के लोगों को मुंबई में अपनी गुंडई से परेशान करना शुरू किया था, दिलीप ने मेरे आग्रह पर नवभारत टाइम्स में ''राज-नीति'' का प्रतिवाद करते हुए एक बड़ा लेख लिखा था. दिलीप छोटों को मान देना जानते थे. उससे पहले उन्होंने सबद के लिए अपनी कविताएं दी थी, जिसे युवा कवि तुषार धवल ने अनूदित किया था. हालाँकि दिलीप की कविताओं से मेरा परिचय उस दुबली-सी कविता-पुस्तक से हुआ था, जिसे चंद्रकांत देवताले ने मराठी से अनूदित किया था. कविताओं के अनुवाद में राजेंद्र धोड़पकर ने भी सहयोग किया था जिनसे बाद में उनकी कविता पर बात करने के अनेक अवसर आए. दिलीप अंग्रेजी और मराठी में लिखते हुए भी हिंदी के लिए अजाने नहीं थे. हिंदी में उन्हें पसंद करनेवाले, उनसे निकटता महसूस करनेवालों का एक बड़ा जागरूक समाज है, और इस समाज…

सबद विशेष : ८ : व्योमेश शुक्ल की लम्बी कविता

(अपने पहले संग्रह की सत्तावन कविताओं के बाद व्योमेश किस तरफ रुख करते हैं, इसका हम कविता-प्रेमी पाठकों को बेसब्री से इंतजार था. उनकी इस ५८ वीं कविता से, जो सबद के साथ-साथ रंग-प्रसंग के नवीनतम अंक की भी शोभा है, यह बात पुष्ट होती है कि वे अपनी कविता का एक सफल चक्र पूरा कर उसे दुहराने की बजाए अभी कुछ और पाने का दुर्लभ यत्न कर रहे हैं और उनकी अब तक की प्राप्ति को उनके रहबर चंद दूसरे कवियों की कविताओं के साथ मिलाकर देखें तो इधर की कविता पर इतरा लेने की पर्याप्त वजहें हमें आसानी से मिल जायेंगीं. व्योमेश के यहाँ शिल्प, भाषा और कथ्य के स्तर पर निरंतर सजगता बरती गई है और यह सजगता ही 'लीलामय' जैसी कविता संभव करती है. इसका विन्यास धोखेबाज़ है. विस्तार हैरत में डालनेवाला. आज और आज से पहले व्योमेश की अन्य कविताओं की तरह यहाँ भी अनिवार्य सन्दर्भ-बिंदु हैं और इनके '' बीच लीला लगातार होती रही - भले ही कुछ दूरी पर, याने जिन घटनाओं, लोगों, परिस्थितियों के ज़रिये इतिहास ख़ुद को घटित कर रहा था या कर रहा है, लीला उनके समानान्तर रहकर हो रही थी या हो रही है - शायद उनसे दूर रहकर ही या उनसे द…

बही- खाता : ९ : जयशंकर

(हिंदी के जाने-माने कथाकार जयशंकर के अब तक चार कहानी-संग्रह छप चुके हैं. मरुस्थल नामक उनका संग्रह अत्यंत चर्चित रहा था और बारिश, इश्वर तथा मृत्यु शीर्षक उनका नवीनतम संग्रह बिना किसी हो-हल्ले के हिंदी का बेस्ट-सेलर है, मेरे जाने पिछले पांच वर्ष में आया सबसे अच्छा कहानी-संग्रह भी. जयशंकर आमला जैसी छोटी जगह में रहकर लिखते हैं, यह लेखक-परिचय पढने में दिलचस्पी रखने के अलावा शायद ही कोई जानता हो. स्वयं जयशंकर के संज्ञान में लेखक संगठन या गुट वगैरह नहीं, उनसे सम्बन्ध तो दूर की बात है. ऐसे लेखकों के प्रति मन में एक सम्मान का भाव जगता है. जयशंकर ने कहानियों के अलावा समय-समय पर पत्रिकाओं में अपने जर्नल्स भी प्रकाशित कराये हैं. यह बही-खाता उनमें से ही कुछ वाक्यों का थीमैटिक चयन है. यों बही-खातास्तंभ की यह नौवीं प्रस्तुति है. बाद में जयशंकर के जर्नल्स की दूसरी झलकियाँ भी पेश की जाएंगी. )
लिखने के बारे में

लिख नहीं पाने की अपनी हार और हताशा, शर्म और पीड़ा से मुंह चुराने के लिए आप अपने रैक से कोई पुस्तक निकालकर पढ़ना शुरू करते हैं। अगर आपके दुर्भाग्य से वह किताब सचमुच की किताब रही तब पढ़ते हुए भी आप…