सबद
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विचारार्थ : २ : इस पुरस्कार के प्रायोजक हैं...

12:32 am
गुरुदेव की आड़ में अकादेमी का 'सामसुंग' साहित्य प्रायोजन

विष्णु खरे
संसार भर के लेखक और बुद्धिजीवी, वे वामपंथी हों या न हों, कथित 'खुलापन', 'उदारवाद', 'बाजारवाद', 'उपभोक्तावाद', 'विज्ञापनवाद', 'प्रयोजन्वाद' तथा बहुराष्ट्रीय व्यापार निगमों के विरुद्ध हैं। सामान्यतः राष्ट्रवाद और विशेषतः वामपंथ के कारण, भारतीय साहित्यकार, और उसमें भी हिन्दी के कवि-कथाकार-आलोचक, जो अधिकांशतः 'प्रतिबद्ध' विचारधारा में यकीन करते हैं, वर्तमान नव-पूंजीवाद के ख़िलाफ़ हैं। यहाँ तक कि वे कथित 'नक्सलवाद' की दिग्भ्रमित हिंसा का विरोध तो करते हैं लेकिन उसकी आधारभूत भावना के नैतिक-सैद्धांतिक समर्थक हैं। आज हिन्दी का शायद ही कोई आत्मसम्मानी लेखक हो जो आर्थिक और राजनीतिक नव-साम्राज्यवाद का विरोध अपनी विधा में न कर रहा हो- वह ईमानदारी और कला की शर्तों पर कितना खरा उतर रहा है, उसके पाठक उसे समझदारी और गंभीरता से ले रहे हैं या नहीं, यह अलग बहसों के विषय हैं। लेकिन ऐसी आशंका है कि भारत सरकार और उसके साहित्यिक प्रतिष्ठान या तो भारतीय लेखकों के इन रुझानों को जानते-समझते नहीं, या हैं भी तो उनकी परवाह नहीं करते, या यह जानने के लिए कि अपनी प्रतिबद्धता में साहित्यकार कहाँ तक जा सकते हैं, वे उन्हें उकसाने के लिए कोई अतिवादी हरकत कर बैठते हैं।

पिछले लगभग २५ वर्षों से साहित्य अकादेमी अपने उत्तरोत्तर पतन के कारण पर्याप्त कुख्याति अर्जित करती आ रही है और इस प्रक्रिया में उसने हिन्दी तथा शेष भारतीय साहित्यों और लेखकों को भी भ्रष्ट किया ही है, किंतु यदि उसने अपना ताज़ातरीन कारनामा अंजाम न दिया होता तो वह कल्पनातीत ही समझा जाता। साहित्य अकादेमी ने पिछले दिनों दक्षिण कोरिया के सबसे बड़े बहुराष्ट्रीय व्यापार निगम 'सामसुंग' के साथ एक समझौते पर दस्तखत किए हैं जिसके तहत वह चौबीस नए साहित्यिक पुरस्कार स्थापित करेगी जो यद्यपि 'रवींद्रनाथ ठाकुर पुरस्कार' के नाम से जाने जायेंगे, किंतु उनकी रकम और पुरस्कार-निर्णय-प्रक्रिया का खर्च 'सामसुंग' देगी।

हालाँकि अपने मोबाइल फ़ोनों, प्लाज्मा टेलीविज़नों, फ्रिजों और अन्य उपभोक्ता उत्पादों के कारण और उनकी बिक्री के लिए करोड़ों रुपयों के अपने विज्ञापनों के ज़रिये 'सामसुंग' अब 'शाइनिंग' और 'इन्क्रेडिबल इंडिया' के लिए कोई अपरिचित छाप-नाम (ब्रांड नेम) नहीं रहा, फिर भी उसके संबंध में कुछ तथ्य शायद उपयोगी हों। कोरियाई भाषा में उसके नाम का हिन्दी अर्थ 'त्रिनक्षत्र ' ( अंग्रेज़ी में 'थ्री-स्टार्स' ) होगा और ये तीन सितारे हैं, 'सामसुंग इलेक्ट्रानिक्स', 'सामसुंग हैवी इंडस्ट्रीज' तथा निर्माण कंपनी 'सैमसंग सी एंड टी'। पिछले वर्ष तक 'सामसुंग' की सकल संपत्ति २५ खरब, 2५ अरब अमेरिकी डॉलर थी, उसका मुनाफा एक खरब सात अरब डॉलर था। आज डॉलर का भाव करीब ४७ रुपये है। 'सामसुंग' दक्षिण कोरिया की सबसे बड़ी कंपनी है, अपने देश का २० प्रतिशत निर्यात करती है, संसार की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक है, 'सोनी' से भी बड़ी, और विश्व की सभी किस्म की कंपनियों में उसका स्थान १९ वां है। दक्षिण कोरिया को परिहास में 'सामसुंग गणराज्य' कहा जाता है और और स्वयं 'सामसुंग' को 'औपनिवेशिक साम्राज्य' और 'भूखा डायनासोर' कहकर पुकारा जाता है। जब वह ईमानदार राष्ट्रों में ही सरकारों को प्रभावित कर सकता है तो संसार के भ्रष्टतम देशों में वह किन व्यक्तियों और संस्थानों को नहीं खरीद सकता।

'सामसुंग' का दुस्साहस इतना बढ़ा हुआ है कि उसने चार वर्ष पहले अमेरिका में इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद ' डायनैमिक रैंडम एक्सैस मेमोरी' की कीमतों में हेराफेरी के ज़रिये कई बड़ी अमरीकी कंपनियों को नुक्सान पहुँचाने की कोशिश की लेकिन कानून के शिकंजे में आ गई। अमेरिका के न्याय मंत्रालय ने उस पर ३० करोड़ डॉलर का फौजदारी जुर्माना किया जो अमेरिका में इस तरह के अपराधों के लिए दूसरा सबसे बड़ा दंड है। 'सामसुंग' के तीन अधिकारीयों को, भले ही कुछ महीनों के लिए, लेकिन जेल जाना पड़ा।

दक्षिण कोरिया में तो 'सामसुंग' के स्वामी और प्रमुख ली कुन-ही स्वयं को देश का मालिक ही समझते थे लेकिन पिछले वर्ष उन्हें अप्रत्याशित सदमा तब पहुँचा जब टैक्स-चोरी और अन्य अपराधों के लिए सरकार ने उन पर ११ करोड़ ३० लाख डॉलर का जुर्माना किया। वे हवालात भी जा सकते थे लेकिन उससे कोरिआई अर्थव्यवस्था और स्वयं 'सामसुंग' कंपनी डांवाडोल हो जाती, इसलिए उनसे अपने पद से इस्तीफा देने को कहा गया। उनके उपाध्यक्ष ली हाक-सू और ख़ुद उनके बेटे ली जाए-योंग को भी त्यागपत्र देने पड़े। 'सामसुंग' के साथ एक ही हादसा हुआ है, जब पिछले दिनों दिल्ली के समीप नॉएडा में स्थित उसकी वाशिंग मशीन उत्पादन इकाई में जहरीली गैस रिसने से ५० से अधिक कर्मचारी भोपाल के यूनियन कार्बाइड कांड जैसी बीमारी के शिकार हो गए थे, उन्हें अस्पताल ले जन पड़ा था, लेकिन जिन छः लोगों की हालत गंभीर बताई जा रही थी उनका क्या हुआ यह अब तक साफ़ नहीं हुआ है।

संभव है भारत सरकार और साहित्य अकादेमी को 'सामसुंग' के इस हाल के इतिहास और रिकॉर्ड का कुछ पता न हो, हालाँकि आश्चर्य यह है कि किसी अज्ञात करणवश स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आजकल संस्कृति मंत्रालय का प्रभार भी संभाले हुए हैं और उनके पास उनका एक जागरूक मीडिया विभाग भी होगा ही। इतना तो मानकर ही चलना चाहिए कि साहित्य अकादेमी ने 'सामसुंग' के साथ यह करार यदि प्रधानमंत्री कि सहमति से नहीं तो उनके संज्ञान में तो किया ही होगा। वैसे हम जानते ही हैं कि भारत को नई विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ने का सेहरा हमारे प्रधानमंत्री के सर पर ही जाता है जब वे नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री थे और इस तरह यदि साहित्य अकादेमी ने संसार की एक सर्वाधिक ताक़तवर कंपनी से जुड़ने का फ़ैसला किया है तो संस्कृति मंत्रालय ने उसका सहर्ष अनुमोदन किया होगा।

लेकिन साहित्य अकादेमी के कुछ सूत्रों के से विचित्र बातें सुनाई दे रही हैं। कहते हैं कि अकादेमी की सर्वशक्तिमान कार्यकारिणी पर पिछले कुछ वर्षों से दबाव था कि वह अपने पुरस्कारों को बड़ी निजी कंपनियों से प्रायोजित करवाए लेकिन उसने ऐसे प्रयासों को ठुकरा दिया। यह मालूम नहीं पड़ रहा है कि यह दबाव संस्कृति मंत्रालय से आया और क्या यह सामान्य सैद्धांतिक दबाव था या एकमात्र 'सामसुंग' के लिए था? अब यह बताया जा रहा है कि दबाव असह्य और अपरिहार्य हो गया और अकादेमी को, जो ख़ुद को लगातार स्वायत्त कहते रही है, अपने पुरस्कारों को 'सैमसंग' को सौंपना पड़ा।

अकादेमी ने अपने संविधान और पुरस्कार-नियमों की हत्या करके ही यह निर्णय लिया है। उसका एक-एक रूपया केन्द्र सरकार से आता है और अब तक उसके नियमों में बाहरी पैसा लेने का कोई प्रावधान नहीं है। फिर उसके जो नियमित २४ पुरस्कार हैं वे ही 'अकादेमी पुरस्कार' के नाम से जाने जाते हैं और उनके दिए जाने की एक लिखित प्रक्रिया और नियमावली है। अनुवाद के लिए दिए जानेवाले पुरस्कारों का स्थान और प्रक्रिया अलग हैं। लेकिन अकादेमी साहित्य के लिए ही दूसरे पुरस्कार दे और उन्हें 'रवीन्द्र पुरस्कार' या 'टैगोर प्राइज़' कहे, यह न संविधानसम्मत है और न तर्कसम्मत।

अकादेमी अपनी मतिमंद्ता के जाल में फंसती जा रही है। वह कह रही है कि अपने द्वारा मान्य २४ भाषाओँ के नियमित, वार्षिक पुरस्कार तो वह देगी ही, उनमें से ८ भाषाओँ को प्रतिवर्ष वह 'सामसुंग रवीन्द्रनाथ पुरस्कार' भी देगी। पहले खेप की आठ भाषाएँ होंगी : बांग्ला, हिन्दी, गुजरती, कन्नड़, कश्मीरी, पंजाबी, तेलगु और बोडो। इनके बाद अगले वर्ष आठ और तीसरे वर्ष फिर आठ। चौथा वर्ष फिर भाषाओँ की पहली किश्त से शुरू होगा। 'सामसुंग' का नाम नहीं जाएगा, रवीन्द्रनाथ का जाएगा। गुरुदेव को जोतकर अकादेमी ने बांग्ला साहित्यकारों का तो मुंह शायद बंद कर दिया, ज़ाहिर है कि इसमें अकादेमी के उपाध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय ने भी अपना कहावती 'पाउंड -भर मांस' वसूला होगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या अन्य भारतीय भाषाओँ में महान साहित्यकार हैं ही नहीं कि सिर्फ़ नोबेल पुरस्कार के कारण भारतीय साहित्यों को चिरकाल तक मात्र रवीन्द्र-संगीत गाना पड़े? अकादेमी यह भी कह रही है कि इन 'सामसुंग पुरस्कारों' की रकम उसके नियमित पुरस्कारों से कम होगी। क्यों? क्या इसलिए कि वह इन पुरस्कारों को अभी से दोयम दर्जे का समझती है? या इसलिए कि उसे निर्धन 'सामसुंग' कंपनी को ज़्यादा आर्थिक संघात नहीं पहुँचाना है?

'सामसुंग' की तो यह घोषित नीति है कि वह अपने छाप-नाम के प्रचार और प्रतिष्ठा के लिए प्रायोजन करेगी। वह कई फुटबाल क्लबों, कर-रेसिंग प्रतियोगिताओं, शीत-ओलंपिकों और नियमित ओलंपिकों की प्रायोजक है। वह भारत की क्रिकेट प्रतियोगिता में भी प्रवेश करनेवाली है। शिक्षा, मीडिया आदि क्षेत्रों में भी उसकी गहरी घुसपैठ है। इसके लिए अरबों डॉलर नियोजित कर देना उसके लिए सुबह के नाश्ते के बराबर है। भारत सर्कार, संस्कृति मंत्रालय और साहित्य अकादेमी ने तो अपनी बौद्धिक का परिचय दिया है कि उसे इतने सस्ते में भारतीय साहित्य और रवीन्द्रनाथ ठाकुर को बेच दिया।

शायद 'सामसुंग', उसके लिए साहित्य अकादेमी पर कथित दबाव डालने वाले अधिकारी और मंत्रालय, तथा स्वयं साहित्य अकादेमी का वर्तमान तंत्र यह जानते हों कि विश्वव्यापी नई अर्थव्यवस्था तथा बहुराष्ट्रीय व्यापारिक निगमों का जैसा-जितना भी प्रतिरोध कर रहे हैं वे प्रबुद्ध भारतीय लेखक ही हैं। साहित्य अकादेमी की साधारण सभा में विभिन्न साहित्यों के सौ के करीब प्रतिनिधि होते हैं जिनमें वरिष्ट सरकारी अधिकारी भी पड़ें नामित किये जाते हैं। उनमें से कार्यकारणी चुनी जाती है। अब ये सब 'सामसुंग' के समर्थक हो ही चुके और उनके माध्यम से सैंकड़ों अन्य लेखक, जिसमें भावी 'सामसुंग' विजेता भी होंगे, खुलेपन, उदारता, उपभोक्तावाद, बहुराष्ट्रीय निगमों के लाभ भी देख पाएंगे। ज़ाहिर है कि उनका वामपंथ और नाक्सालवाद आदि से मोहभंग हो सकगा। बहुत सस्ते में बहुत बड़ा काम हो जायेगा।

'सामसुंग' प्रयोजन के दूरगामी प्रभाव होंगे। ललित कला अकादेमी और संगीत नाटक अकादेमी, जिनका बाज़ार से सामीप्य साहित्य से कई गुना ज्यादा है, अब अपने पुरस्कार, आयोजन, प्रदर्शनियां आदि देशी-विदेशी महकम्पनियों से प्रायोजित करवाने को स्वतंत्र हैं। चित्रकारों, नर्तकों और गायकों-वादकों की अब और बन आएगी। उनकी इन संस्थाओं को सदेबी, कृष्टि, निजी गैलरियां, विदेशी कम्पनियाँ खुलकर प्रायोजित कर सकेंगी। राज्यों की बीसियों ऐसी अकदेमियां और उनके पुरस्कार, स्वयं सरोकारों द्वारा सीधे दिए जानेवालों पुरस्कार, कंपनियों द्वारा 'फंड' किये जायेंगे। जितनी ज्यादा विदेशी कम्पनियाँ दाखिल होंगी उतने ही अधिक विदेशी लाभ होंगे। अन्याय, अत्याचार, गैर-बराबरी, शोषण, अपराध, भ्रष्टाचार आदि के खिलाफ बोलना उतना ही कम होता जायेगा। जनवादी संघर्षों के लिए समर्थन लुप्त होने लगेगा. एक राष्ट्रव्यापी सांस्कृतिक सलवा जुडूम तैयार होगा।

एक ज़माना था जब वामपंथी, जनवादी, प्रगतिवादी ही नहीं, सामान्य प्रबुद्ध लेखक भी 'कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम' के खिलाफ सच्चे-झूठे खड़े होते थे। फिर एक दौर 'सी.आई.ए.' के छिपे हाथ का आया। अब कभी-कभार इस बात का विरोध होता है कि कोई लेखक किसी फासिस्ट महंत के मंच पर कैसे पहुँच गया, किसी ने भाजपा सरकारों के विज्ञापन क्यों ले लिए या कोई युवा कवि क्योंकर ताक़तवर पत्रिकाओं को अपनी किसी जेबी संस्था के माध्यम से फोर्ड फाउंडेशन की रिश्वतें देता पकड़ा गया। 'सोवियत लैंड नेहरु साहित्य पुरस्कारों' के ज़रिये शायद सोवियत संघ की 'केजीबी' ने भी कुछ किया होगा। उनमें तो मुफ्त रूस-यात्रा भी होती थी। लेकिन इस क्षेत्र में 'सामसुंग' की आमद, वह भी सरकारी रूप से, खुल्लमखुल्ला, एक बिलकुल अनूठे युग की शुरुआत है। यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रगतिशील, जनवादी तथा जन संस्कृति मोर्चा लेखक संगठनों के हमारे मित्र जिनमें सर्वश्री ज्ञानेंद्रपति, लीलाधर जगूड़ी, राजेश जोशी, अरुण कमल, विरेन डंगवाल तथा मंगलेश डबराल जैसे मनसा-वाचा-कर्मणा नई आर्थिक व्यवस्था और नव-साम्राज्यवाद के सक्रिय विरोधी हैं, जो उनके काव्य और गद्य तथा सक्रियता में स्पष्ट दीखता है, उस साहित्य अकादेमी के इस प्रायोज्य 'सामसुंग रवीन्द्रनाथ साहित्य पुरस्कार' के बारे में क्या सोचेंगे जिसने उन्हें अपने नियमित पुरस्कार से कभी सम्मानित किया था।
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( विचारार्थ स्तंभ की यह दूसरी कड़ी है. यह महत्वपूर्ण लेख जनसत्ता में छपने के साथ-साथ सबद के लिए विष्णुजी के मार्फ़त मिला था. उनका अत्यंत आभार! )
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विचारार्थ : १ : इयुजेनियो मोन्ताले

11:18 am

वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक और पर्याप्त शर्त नहीं है

नया मनुष्य बहुत बूढा पैदा हुआ है. वह नई दुनिया को झेल नहीं सकता.जीवन की मौजूदा स्थितियों ने अब तक अतीत के चिह्नों को मिटाया नहीं है. हम बहुत तेजी से दौड़ते हैं, पर फिर भी कहीं पहुँचते नहीं. दुसरे शब्दों में, नया मनुष्य एक प्रयोगात्मक अवस्था में है. वह देखता है पर विचार करने में असमर्थ है.
*
सड़क पर चलते आदमी को भी विशिष्ट होने का अधिकार है. वह भी अपने बारे में यह भ्रम रख सकता है कि सच्चाई को जिस तरह वह जानता है, वह तमाम बुद्धिजीवियों की उपलब्धियों से ज्यादा मौलिक है. पर भीड़ का मनुष्य भीड़ की तमाम बुराइयों का शिकार है. हममें से कोई इससे बचा नहीं है.
*
कलाकार का अलग-थलग पड़ जाना ( अक्सर यह स्थिति प्रचार पाने की एक बेहया प्रदर्शनप्रियता में भी बदल जाती है ) एक ऐसे समय में लाजमी है जब कर्म और ज्ञान दो विपरीत दिशाओं के यात्री हैं और कभी-कभार केवल संयोग से ही मिलते हैं.

{ एक उदाहरण : Just 24 hrs. left to return to my beloved country...but I'm sad inside...scared of those power-centers who might have planned something again to put my life in a state of unwelcome nomad.... Can't there be an end to such 'games' by just a few ? Can I only see a bird singing a welcome song for an author who simply needed a sleep, peace and love....in my land..?
यह उक्ति उदय प्रकाश जी की है जो उन्होंने २४ नवम्बर को अपने
फेसबुक वाल पर लिख छोड़ा है. प्रदर्शनप्रियता के किसी और बेहतर उदाहरण के अभाव में ही उदय जी की उक्ति वहां से साभार ली गई है. बहरहाल!}
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एक जीवंत काव्य-रचना के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक और पर्याप्त शर्त नहीं है, और न ही वह स्वयं में कोई नकारात्मक स्थिति है. हर सच्चे कवि की अपने तरीके से एक प्रतिबद्धता होती है...हाँ, यह स्वाभाविक है कि पेशेवर कवियों ने अक्सर अपने संरक्षकों, युवराजों और अभयदाताओं के प्रति अपने उदगार व्यक्त किये हैं, पर फिर भी कविता का इतिहास ऐसी महान रचनाओं का इतिहास भी है जिन्होंने किसी भी किस्म की निरंकुशता को स्वीकार नहीं किया है. कोई भी कविता अपने समय में प्रचलित प्रतिबद्धता के अर्थ को पूरा करे या न करे पर वह अपने समय का प्रत्युत्तर ज़रूर होती है.
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कविता आज की कला में बखूबी अंट सकती है पर आज के समाज में कवियों की स्थिति? सामान्यतया वह बहुत अच्छी नहीं है. कुछ कवि भूखे मर जाते हैं, कुछ जो दूसरा कुछ काम करते रहते हैं, वे बेहतर जीवन यापन कर लेते हैं. कुछ कवि निर्वासन में चले जाते हैं, कुछ अपने पीछे बिना कोई निशानी छोड़े अदृश्य हो जाते हैं. बाबेल और मान्देल्स्ताम कहाँ चले गए? ब्लाक और मायकोवस्की यदि खुद को ख़त्म न कर लेते तो क्या करते ? ( यह सूची और भी लम्बी हो सकती है.)...और दूसरे अनेक कवियों की वजह से हमें वह अपकीर्ति भी समझ में आती है --वह खंदक जिसमें आकर आधुनिक कविता का पशु गिर पड़ा है. यह केवल समाज की गलती नहीं है, एक बड़ी हद तक इसमें कवियों का भी दोष है!
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( उपरोक्त विचार इतालवी कवि इयुजेनियो मोन्ताले के हैं. कविता और विचार पर केन्द्रित कवि-आलोचक विजय कुमार के संपादन में निकले उद्भावना के कवितांक में मोन्ताले का निबंध पढ़ा था. ये विचार-बिंदु वहीं से साभार लिए गए हैं. सबद पर मोन्ताले के साथ ही विचारार्थ नामक स्तंभ शुरू किया जा रहा है. इसके दायरे में ज़ाहिर है, सिर्फ साहित्य नहीं होगा, हालाँकि उसका होना अनिवार्य होगा. )
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सबद पुस्तिका : २ : कुंवर नारायण

12:25 pm



( कुंवरजी का यह ताज़ा लेख पहलेपहल सबद पुस्तिका के रूप में यहाँ छप रहा है। ८२ की उम्र में भी उनकी मेधा, चिंतन-प्रक्रिया और कवि-कर्म में कोई शैथिल्य नहीं आया है। इस बात की पुष्टि जितना आगे दिया जा रहा यह लेख करता है, उतना ही उनका नवीनतम काव्य-संग्रह 'हाशिए का गवाह' भी। कविता-संग्रह से कुछ कविताएं भी इस पुस्तिका की संगिनी हैं। साथ में दी गई तस्वीर हेनरी मतीस की। )

खंड
: क


साहित्य और आज का समाज

इक्कीसवीं सदी का पहला दशक अब लगभग समाप्ति पर है। पिछले दस वर्षों में हुए परिवर्तनों पर एक उड़ती नज़र डालें तो कुछ ख़ास बातें सामने आती हैं जिनका समाज और साहित्य दोनों के लिए परिवर्तनकारी महत्वा रहा है। जैसे, आर्थिक, राजनीतिक और भाषाई दृष्टियों से एशियाई देशों - ख़ासकर भारत और चीन - का विश्व-शक्तियों के रूप में उभारना। हिन्दी साहित्य और समाज से सम्बंधित ऐसे कुछ सवालों की ओर ध्यान जाता है जो उपरोक्त तीनों विषयों से अलग रख कर नहीं सोचे जा सकते।

यह तथ्य कि हिन्दी इस समय संसार की प्रमुख भाषाओँ में से है, देश की आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों से अनिवार्यतः जुड़ा है। हिन्दी भाषा के विस्तार के पीछे मुख्यतः व्यावसायिक और राजनीतिक कारण हैं, तथा मीडिया और प्रचार-प्रसार की टेक्नोलॉजी में विकास ने हिन्दी भाषा को नई तरह की ज़रूरतों से जोड़ा है। भाषा की क्षमता बढ़ी है। वह एक ज़्यादा बड़े हिन्दी-भाषी समुदाय तक पंहुच रही है। उसके द्वारा जनमानस तक क्या संदेसा पंहुच रहा है- इसके गहरे अध्ययन से समाज के लिए आज साहित्य की उपयोगिता का प्रश्न जुड़ा है। इस संदेशे के पीछे किस तरह के अंदेशे और उद्देश्य काम कर रहे हैं इस पर ही, बहुत कुछ, समाज में साहित्य जैसी चेष्टाओं का महत्व निर्भर है।

शुरू में ही 'सामजिक यथार्थ' और सामजिक चेतना' के बीच एक बारीक, किंतु आवश्यक, फ़र्क करते हुए अपनी बात कहना चाहता हूँ।

भारत का सामाजिक यथार्थ अत्यन्त जटिल, बहुस्तरीय और रूढिबद्ध है। वह बदल रहा है, लेकिन इतनी तेज़ी से नहीं कि वह 'सामाजिक चेतना' को बदल दे। इससे पहले, और इससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से, वे शक्तियां सामाजिक चेतना को बदल रही हैं जिन्हें आज साफ़-साफ़ बाजारवाद और उपभोक्ता संस्कृति के रूप में पहचाना जा सकता है। उनका अपना तिजारती तंत्र है जो अच्छी तरह जानता है कि नई-नई चीजों के लिए आदमी की भूख को कैसे बढ़ाया जाए। वह तंत्र अत्यन्त विक्सित मनोवैज्ञानिक और तकनीकी तरीकों से भौतिक सुख सुविधाओं के प्रति हमारी स्वाभाविक आसक्ति को पुष्ट करता रहता है।

मेरी बात से यह नकारात्मक निष्कर्ष निकलने की जल्दी न की जाए कि मैं औधोगिक प्रगति को एक सिरे से खारिज कर रहा हूँ। उसके लाभ भी सब तक पंहुच रहे हैं जिन्हें नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता- लाभ जो हमें एक बेहतर ज़िन्दगी दे रहे हैं। मेरी कोशिश सिर्फ़ उस असंतुलन की ओर ध्यान खींचना है जो आज के समाज में, सारी प्रगति के बावजूद, एक गहरा असंतोष, विसंगति और विषमता भी पैदा कर रहा है।

साहित्य एक शाब्दिक-कला है, भाषा से अनिवार्यतः जुड़ी हुई। वह सामजिक-चेतना को सीधे संबोधित करती है, किसी अन्य विषय की भाषा और व्याख्या के मार्फ़तनहीं। वह जीवन की भाषा है- सच्ची और बेबाक़। अपनी तरह विभिन्न विषयों से संपर्क रखते हुए भी वह अपनी बात कहती है। उसका यह अधिकार आज भी सुरक्षित है, लेकिन उसकी आवाज़ जिन कानों तक पहुंचनी चाहिए उन्हें एक ऐसे शोरगुल ने घेर रखा है कि साहित्य, ख़ासकर कविता, जैसी कोशिशों की उपस्थिति ही महसूस नहीं होती। संक्षेप में, सामजिक-चेतना से साहित्यिक-चेतना का सीधा संवाद सम्भव नहीं हो पता रहा। क्या यह सिर्फ़ साहित्य के लिए एक चुनौती है ? या एक शिक्षित समाज के लिए भी कि वह, जाने-अनजाने, मानव-समाज की एक अत्यन्त समृद्ध सांस्कृतिक चेष्टा से वंचित होता न चला जाए ?

थोड़ा आत्मचिंतन साहित्य, विशेषतः कविता, की ओर से भी ज़रूरी है। बीसवीं सदी की काव्यचेतना ने जिन कुछ बीज-शब्दों और सन्दर्भ-पदों के आधार पर अपनी एक अलग 'पहचान' बनाई उन पर भी थोड़ा गौर अब ज़्यादा प्रासंगिक जान पड़ता है। या शायद, अब अधिक प्रासंगिक हो गया है। ध्यान देन कि अधिकांश शब्द उन विषयों से लिए हुए शब्द थे जो साहित्य से बहार के विषय थे। 'आधुनिकता' शब्द इतना आधुनिक भी नहीं था जितना हम समझ रहे थे- लगभग ५०० वर्ष पुराना इतिहास है उसका। बोद्लेअर जैसे फ्रेंच कवि ने बहुत पहले ही उसके छिछले आशयों से सावधान रहने की चेतावनी दी थी। 'क्रांति' राजनीति का शब्द था : फ्रेंच और रूसी क्रांतियों से निकला शब्द, जिसके बरक्स 'औद्योगिक क्रांतियों' और गाँधी की 'नैतिक क्रांति' के भी उदाहरण थे। हम सब चाहते थे कि दुनिया बदले : वह बदलती रही, और अब भी बदल रही है- लेकिन उस तरह नहीं जैसे हम चाहते थे : वह कुछ इस तरह बदली कि उसने हमें बदल दिया।

'परिवर्तन' का जूनून चढ़ता उतरता रहा। 'प्रगति' शब्द, ख़ासतौर पर उद्योग-धंधों की दुनिया का शब्द, मानव-समाज में मानो एक नई मशीन की तरह आया, कुछ दिन तेज़ी से चला, फ़िर बराबर मरम्मत मांगता रहा। 'प्रयोग', सीधे किसी वैज्ञानिक प्रयोगशाला से उठाया हुआ शब्द। आकर्षक, लेकिन ज़ल्दी ही किसी 'नए' प्रयोग की ज़रूरत के सामने खारिज हो गया ! इस भीड़ में 'नया' शब्द सबसे निरीह लगता है जिसे देखते-देखते बाज़ारवाद ने और उपभोक्तावाद ने समूचा हड़प लिया ! मानो अब उसका कोई मतलब साहित्य के काम का न हो, सिर्फ़ बाज़ार के मतलब का हो।

कविता में 'तकनीक' और 'शिल्प' वगैरह की पदावली आज की हर क्षेत्र में विकसित टेक्नोलॉजी के सामने फ़ुटनोट की तरह लगती है। नए का मतलब नई-नई चीजें ! 'नई' का 'कविता' के साथ कोई योग नहीं बैठता ! नया कुछ चाहिए तो हम बाज़ार की तरफ़ देखते हैं, नई कविता की तरफ़ नहीं।

तो फिर ऐसी कविता, जिसके सारे संदर्भ-साधन छिन चुके, क्या दे सकती है समाज को ? या अभी ऐसा कुछ बचा है, कविता और समाज के बीच, जो दोनों के लिए बेहद ज़रूरी है ? हम नई कोई चीज़ चाहते हैं तो बाज़ार की ओर दौड़ते हैं, लेकिन आत्मिक कुछ चाहते हैं तो कविता की ओर देखते हैं। प्रेम में, दुःख में, उदासी में, अकेलेपन में, मुश्किलों में, बेबसी में, भावुक क्षणों में क्यों हमें अनायास याद आती हैं कविताएं ? वह अजीब-सा, रहस्यमय 'कुछ' जो हमें मिलता है सिर्फ़ कविता से, क्या वह हमें मिल सकता है बाज़ार से ?

मैं उस कविता-बराबर ज़रा-से 'कुछ' को परिभाषित नहीं करना चाहता- चाहूँ भी तो नहीं कर सकूँगा। पर इतना जानता हूँ कि वह हमारी प्राणवायु की तरह सूक्ष्म है। उसके बिना हम जी नहीं सकते। वह एक सीमारहित, अपरिभाषित दुनिया है। उसकी अपनी शर्तें हैं। हम उसमें जाते हैं हमेशा ही कुछ पाने के लिए नहीं ; कभी-कभी अनायास उसमें खो जाने के लिए - कहीं भी, किसी भी समय में। भाषा में संभव इस अद्भुत कला को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहूँगा। जिगर साहब के इस शेर को अक्सर याद करता हूँ :

ज़रा-सा दिल है लेकिन कम नहीं है
इसी में कौन-सा आलम नहीं है

आज के समाज में मैं कविता की ज़रूरत और उसकी उपस्थिति को कुछ इस तरह सोचता हूँ कि वह मुख्यतः एक 'सूचनापरक' विधा नहीं है। इस माने में वह साहित्य की अन्य विधाओं से बहुत भिन्न है। वह मूलतः अत्यन्त उदार और उदात्त अर्थों में, 'आत्मचिंतन' की भाषा है। आत्मचिंतन को संकुचित करके 'आत्म-केंद्रित' के अर्थों में न लें : निहायत वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक भाषा भी बिल्कुल स्वार्थी अर्थों में आत्म-केंद्रित हो सकती है। कविता जितना कुछ जीवन के बारे में कहती है, उससे कहीं अधिक उस भाषा को ही एक सार्थक रचनात्मक अनुभव बना कर कहती है जिस भाषा में वह काव्य-रचना करती है। इसीलिए कविता हमेशा ही अपने को परिसीमित करनेवाले सन्दर्भ-पदों और शब्दावली का उल्लंघन और अतिक्रमण करने के लिए बाध्य है।

रचनात्मक ऊर्जा विस्फोटक होती है। अस्तित्व में आने के बाद ही उसकी 'पहचान' और 'नियम' बन पाते हैं। इसीलिए उसकी पारिभाषिक शब्दावली कभी भी उसके स्वरुप-निर्धारण में पर्याप्त नहीं ठहरती। जिस तरह भाषा, व्याकरण के नियमों को तोड़ते हुए, जीवन के साथ-साथ चलते हुए बदलती और विकसित होती है, उसी तरह भाषा में बसी कविता भी, जीवन के 'साथ' चलती है। इस 'साथ-चलने' के अर्थ को विस्तृत करके इस तरह समझें कि वह अपने समय के जीवन के साथ लगातार एक अत्यन्त संवेदनशील संवाद है जिसमें केवल सहमतियाँ ही नहीं प्रतिरोधों की भी पूरी गुंजाइश है।

इस अंतरंग संवाद से छन कर जो काव्यविवेक निकलता है उसके पीछे केवल 'तात्कालिक' और 'स्थानिक' सन्दर्भ नहीं होते, एक व्यापक और सर्वकालिक जीवनानुभव से निकली हुई वे ध्वनियाँ और अंतर्ध्वनियां भी होती हैं जिनसे एक सुसभ्य और न्यायप्रिय मानव-समाज की चेतना बनती है। इसे जीवित रखना ज़रूरी है। कविता इसे जीवित रखने की एक विनम्र कोशिश है।

( रचना तिथि : ५ नवम्बर, २००९ )
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खंड : ख

प्यार की भाषाएँ

मैंने कई भाषाओँ में प्यार किया है
पहला प्यार
ममत्व की तुतलाती मातृभाषा में...
कुछ ही वर्ष रही वह जीवन में :

दूसरा प्यार
बहन की कोमल छाया में
एक सेनेटोरियम की उदासी तक :

फिर नासमझी की भाषा में
एक लौ को पकड़ने की कोशिश में
जला बैठा था अपनी उंगुलियां :

एक परदे के दूसरी तरफ़
खिली धुप में खिलता गुलाब
बेचैन शब्द
जिन्हें होठों पर लाना भी गुनाह था

धीरे धीरे जाना
प्यार की और भी भाषाएँ हैं दुनिया में
देशी-विदेशी

और विश्वास किया कि प्यार की भाषा
सब जगह एक ही है
लेकिन जल्दी ही जाना
कि वर्जनाओं की भाषा भी एक ही है :

एक-से घरों में रहते हैं
तरह-तरह के लोग
जिनसे बनते हैं
दूरियों के भूगोल...

अगला प्यार
भूली बिसरी यादों की
ऐसी भाषा में जिसमें शब्द नहीं होते
केवल कुछ अधमिटे अक्षर
कुछ अस्फुट ध्वनियाँ भर बचती हैं
जिन्हें किसी तरह जोड़कर
हम बनाते हैं
प्यार की भाषा
****

उजास


तब तक इजिप्ट के पिरामिड नहीं बने थे
जब दुनिया में
पहले प्यार का जन्म हुआ

तब तक आत्मा की खोज भी नहीं हुई थी,
शरीर ही सब कुछ था

काफ़ी बाद विचारों का जन्म हुआ
मनुष्य के मष्तिष्क से

अनुभवों से उत्पन्न हुई स्मृतियाँ
और जन्म-जन्मांतर तक
खिंचती चली गईं

माना गया कि आत्मा का बैभव
वह जीवन है जो कभी नहीं मरता

प्यार ने
शरीर में छिपी इसी आत्मा के
उजास को जीना चाहा.

एक आदिम देह में
लौटती रहती है वह अमर इच्छा
रोज़ अँधेरा होते ही
डूब जाती है वह
अँधेरे के प्रलय में

और हर सुबह निकलती है
एक ताजी वैदिक भोर की तरह
पार करती है
सदियों के अन्तराल और आपात दूरियां
अपने उस अर्धांग तक पहुँचने क लिए
जिसके बार बार लौटने की कथाएँ
एक देह से लिपटी हैं
****

मामूली ज़िन्दगी जीते हुए

जानता हूँ कि मैं
दुनिया को बदल नहीं सकता,
न लड़ कर
उससे जीत ही सकता हूँ

हाँ लड़ते-लड़ते शहीद हो सकता हूँ
और उससे आगे
एक शहीद का मकबरा
या एक अदाकार की तरह मशहूर...

लेकिन शहीद होना
एक बिलकुल फ़र्क तरह का मामला है

बिलकुल मामूली ज़िन्दगी जीते हुए भी
लोग चुपचाप शहीद होते देखे गए हैं
****

मैं कहीं और भी होता हूँ

मैं कहीं और भी होता हूँ
जब कविता लिखता

कुछ भी करते हुए
कहीं और भी होना
धीरे-धीरे मेरी आदत-सी बन चुकी है

हर वक़्त बस वहीं होना
जहाँ कुछ कर रहा हूँ
एक तरह की कम-समझी है
जो मुझे सीमित करती है

ज़िन्दगी बेहद जगह मांगती है
फैलने के लिए

इसे फैसले को ज़रूरी समझता हूँ
और अपनी मजबूरी भी
पहुंचना चाहता हूँ अन्तरिक्ष तक
फिर लौटना चाहता हूँ सब तक
जैसे लौटती हैं
किसी उपग्रह को छूकर
जीवन की असंख्य तरंगें...
****

उदासी के रंग

उदासी भी
एक पक्का रंग है जीवन का

उदासी के भी तमाम रंग होते हैं
जैसे
फक्कड़ जोगिया
पतझड़ी भूरा
फीका मटमैला
आसमानी नीला
वीरान हरा
बर्फीला सफ़ेद
बुझता लाल
बीमार पीला

कभी-कभी धोखा होता
उल्लास के इन्द्रधनुषी रंगों से खेलते वक़्त
कि कहीं वे
किन्हीं उदासियों से ही
छीने हुए रंग तो नहीं ?
****

नई किताबें

नई
नई किताबें पहले तो

दूर
से देखती हैं
मुझे
शरमाती हुईं

फिर संकोच छोड़ कर
बैठ
जाती हैं फैल कर

मेरे
सामने मेरी पढ़ने की मेज़ पर

उनसे पहला परिचय...स्पर्श
हाथ
मिलाने जैसी रोमांचक

एक
शुरुआत...


धीरे
धीरे खुलती हैं वे

पृष्ठ
दर पृष्ठ

घनिष्ठतर
निकटता

कुछ
से मित्रता

कुछ
से गहरी मित्रता

कुछ
अनायास ही छू लेतीं मेरे मन को

कुछ
मेरे चिंतन की अंग बन जातीं

कुछ
पूरे परिवार की पसंद

ज़्यादातर
ऐसी जिनसे कुछ न कुछ मिल जाता


फिर
भी

अपने
लिए हमेशा खोजता रहता हूँ

किताबों
की इतनी बड़ी दुनिया में
एक जीवन-संगिनी
थोडी
अल्हड़-चुलबुली-सुंदर

आत्मीय
किताब

जिसके
सामने मैं भी खुल सकूँ

एक
किताब की तरह पन्ना पन्ना

और
वह मुझे भी

प्यार
से मन लगा कर पढ़े..

****

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स्वगत : २ : गीत चतुर्वेदी

3:12 pm
( हिंदी के युवा कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी ने  कहानी पर अपनी बातें यहाँ एक अलग लहजे में कही हैं. बिना लाग-लपेट के. एक विरल साफगोई और पैनेपन के साथ. परम्परित जार्गन से मुक्त और विमर्श के बेमतलबी होने के खतरे से पूरी तरह बाखबर. आज की हिंदी कहानी के लिए यह शुभ है. लेखक के बही-खाते से एक बार फिर से चीजें निकल रही हैं और उनमें कहानी की तरह ही एक टटकापन है. आश्वस्ति से ज़्यादा विनम्र संदेह. खुद पर और उस पर भी जो कथा के नाम पर पेश्तर दे दिया गया है. अस्तु. स्वगत शीर्षक से यह सबद की दूसरी प्रस्तुति है.  )


संदेह - दृष्टि

बोर्हेस ने ‘द रिडल ऑफ पोएट्री’ में कहा है- ‘सत्तर साल साहित्य में गुज़ारने के बाद मेरे पास आपको देने के लिए सिवाय संदेहों के और कुछ नहीं।‘ मैं बोर्हेस की इस बात को इस तरह लेता हूं कि संदेह करना कलाकार के बुनियादी गुणों में होना चाहिए। संदेह और उससे उपजे हुए सवालों से ही कथा की कलाकृतियों की रचना होती है। इक्कीसवीं सदी के इन बरसों में जब विश्वास मनुष्य के बजाय बाज़ार के एक मूल्य के रूप में स्थापित है, संदेह की महत्ता कहीं अधिक बढ़ जाती है। एक कलाकार को, निश्चित ही एक कथाकार को भी, अपनी पूरी परंपरा, इतिहास, मिथिहास, वर्तमान, कला के रूपों, औज़ारों और अपनी क्षमताओं को भी संदेह की दृष्टि से देखना चाहिए।

अपनी बात को स्पष्ट करते हुए एक सूत्र तक पहुंचाने के लिए मैं फिर एक बार बोर्हेस को ही कोट करूंगा। उनकी एक कहानी है- ‘द रोज़ ऑफ़ पैरासेल्‍सस’, जिसमें एक किरदार राख से गुलाब बनाता है। जब एक व्यक्ति उससे यह हुनर सीखने आता है, तो वह मना कर देता है कि उसके पास ऐसी कोई चमत्कारी शक्ति नहीं है। उस व्यक्ति के जाते ही पैरासेल्‍सस नाम का वह किरदार फिर चमत्कार करते हुए राख से गुलाब बना देता है। बोर्हेस की यह कहानी अपने मेटाफि़जि़कल और मेटाहिस्टॉरिक अर्थों में बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन इंटर-टेक्स्चुअल रीडिंग से ज़रा खेलते हुए मैं बोर्हेस की इस कहानी को हिंदी फि़क्शन के संदर्भ में मेटाकॉमिक तरीक़े से देखता हूं।

कुछ लोग हिंदी कहानी से इसी कि़स्म के राख से गुलाब बना देने वाले चमत्कार का दावा करते हैं, लेकिन अपने किस अकेलेपन में वह यह चमत्कार कर रही है? जैसे ही वह पाठक के सामने जाती है, पैरासेल्‍सस की तरह चमत्कार से इंकार कर देती है, अपना वांछित या प्रोजेक्टेड असर तक नहीं छोड़ती, जबकि बार-बार कहा जा रहा है कि वह चमत्कारी है, तो फिर यह चमत्कार किस निर्जनता या नीरवता में है?

इस समय हिंदी कहानी में जिस तथाकथित रचनात्मक विस्फोट की बात की जाती है, उसे देखकर बरबस मुझे ‘पोएटिक्स ऑफ़ डीफैमिलियराइज़ेशन’ की याद आ जाती है। यह कला का एक सिद्धांत या प्रविधि है, जिसे पुराने ज़माने के रूसी लेखकों ने और बीसवीं सदी की शुरुआत के अमेरिकी लेखकों ने ख़ासा इस्तेमाल किया था। इसमें नैरेटर किसी जानी-पहचानी साधारण-सी चीज़ को इस क़दर नाटकीय और हल्लेदार बनाकर प्रस्तुत करता था कि देखने वाले को यह अहसास हो जाए कि दरअसल वह पहली बार ही उस चीज़ को देख रहा है। इस चौंक के कलात्मक लाभ और छौंकदार हासिल को वह फिक्शन मान लेता था। हिंदी कहानी से ज़्यादा उसका परिदृश्य इस समय उसी पोएटिक्स को एन्ज्वॉय करता जान पड़ता है।

इसके पीछे बहुधा मुझे हिंदी कहानी के विकास की सरणियों के पेचो-ख़म दिखाई देते हैं। हिंदी कथा साहित्य का विकास और हिंदी सिनेमा का विकास कुछ बरसों के आगे-पीछे में ही होता है। दोनों स्टोरी-टेलिंग की दो विधाएं हैं, लेकिन इस विकास में मुझे हिंदी सिनेमा की लोकप्रिय कथ्य-धारा अत्यधिक हावी होती दिखाई देती है। सिनेमा ने साहित्य को समृद्धि ही दी है, ऐसा हम दुनिया के कई बड़े लेखकों का आत्मकथ्य पढ़कर जान पाते हैं, लेकिन हिंदी में सिनेमा के लोकप्रिय कथानक-कथात्मक दबाव ने, कुछ ख़ास अर्थों में भारतीय-हिंदी समाज की संरचना ने भी, हिंदी कथा-साहित्य को चीज़ों को ब्लैक एंड व्हाइट में देखने का जो अत्यंत सरल, सुपाच्य कि़स्म का फॉर्मूला दिया है कि वह आज भी हमारे कथाकारों, किंचित पाठकों और अधिकतर आलोचकों से छुड़ाए नहीं छूट रहा। हमने नैरेशन की चेखोवियन शैली को तो अपना लिया, लेकिन अंतर्वस्तु की चेखोवियन जटिलताओं को ख़ुद से दूर ही रखा। आज भी हम तथाकथित पोस्ट-मॉडर्न नैरेटिव से उसी कि़स्म के सरलीकृत, लेकिन हाहाकारजनित नतीजे ही निकाल रहे हैं।

क्या इसके पीछे कहीं ये कारण तो नहीं कि हम शुरू से ही, हिंदी कथा के परिक्षेत्र में, डेमी-गॉड्स और लेसर-गॉड्स को पूजते आ रहे हैं? क्या हिंदी कहानी लगातार रॉन्ग्ड पैट्रन्स के हाथों में रही है? क्यों ऐसा होता है कि मुझे हिंदी कहानी के शिखर पुरुष हिंदी से बाहर कहीं दिखाई ही नहीं देते? और दुनिया के आला दरजे के फिक्शन का एक हिस्सा पढ़ लेने के बाद अपने इन लेसर-गॉड्स की कहानियों में मेरी कोई दिलचस्पी रह ही नहीं पाती? हां, उनकी कथेतर साहित्यिक-सामाजिक तिकड़में, शरारतें, बदमाशियां मुझे उनकी कहानी से ज़्यादा आकर्षित करती हैं। फिक्शन का अगर कोई मानचित्र हो, तो उसमें हमारी पोजीशनिंग कहां है? यक़ीनन, कहीं नहीं। हम साहित्य में रणजी ट्रॉफ़ी मुक़ाबलों से ही अंतरराष्ट्रीय विजय-प्राप्ति का आनंद भोग ले रहे हैं।

नहीं, यह न सोचा जाए कि इसके पीछे कोई पश्चिमपरस्त मानसिकता है, अपने जातीय-भाषाई स्‍वभावगत विशेष सरलीकृत तुरत-फुरत आरोप-निष्पादन की फेहरिस्त में इज़ाफ़ा करते हुए यह न कह दिया जाए कि कुछ लोगों को विदेशी चीज़ों में ही आनंद आता है, बल्कि यह एक कड़वी सचाई है, जिसे कम से कम ब्लैक एंड व्हाइट में न देखा जाए। तो वह चमत्कार जो उस कहानी में पैरासेल्‍सस कर रहा है और हमारे परिदृश्य में हिंदी कहानी कर रही है, उसे जांच लिया जाए। स्ट्रैटजिक टाइमिंग्स के सहारे नहीं, बल्कि साहित्य की गुणवत्ता को मानदंड बनाकर। हम डीफैमिलियराइज्ड की आत्मरति से बाज़ आएं, लेसर-गॉड्स के होलसेल प्रोडक्‍शन से भी.

मैं यहां किसी कि़स्म के सामाजिक यथार्थ, वर्तमान की चुनौतियां, समकालीन हिंदी कहानी का संकट, यथार्थ और विभ्रम, 90 के पहले और बाद का यथार्थ, दशा और दिशा जैसे सेमिनारी क्लीशे में नहीं जाना चाहता, क्योंकि एक ख़ास, सीमित दबाव डालने के अलावा इन सारी बातों का आर्ट ऑफ द फि़क्शन से कोई लेना-देना भी नहीं होता, लेकिन फिर भी मैं यहां पहले पैराग्राफ़ की बात को दोहराते हुए महज़ इतना कहना चाहूंगा कि हम इतिहास के साथ-साथ अपनी पूरी कथा-परंपरा को भी संशयग्रस्त होकर देखें।

(30 अक्‍टूबर 2009 को रामगढ़, नैनीताल में हिंदी कहानी पर आयोजित सेमिनार में कुछ ज़बानी जोड़ के साथ पढ़ा गया आलेख.)
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गोष्ठी : १ : स्मृति

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गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

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लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

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अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

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मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी