ज़बां उर्दू : ५ : इस्मत चुगताई
11:02 am
मैं...एक बच्चे को प्यार कर रही थी वालिद काफ़ी रौशनख़याल थे. बहुत-से हिंदू खानदानों से मेलजोल था, यानी एक ख़ास तबके के हिंदू-मुसलमान निहायत सलीके से घुले-मिले रहते थे. एक-दूसरे के जज़्बात का ख़याल रखते. हम काफ़ी छोटे थे जब ही एहसास होने लगा था कि हिंदू-मुसलमान एक दूसरे से कुछ न कुछ मुख्तलिफ़ ज़रूर हैं. ज़बानी भाईचारे के प्रचार के साथ-साथ एक तरह की एहतियात का एहसास होता था.
अगर कोई हिंदू आए तो गोश्त-वोश्त का नाम न लिया जाए, साथ बैठकर मेज़ पर खाते वक्त भी ख्याल रखा जाए कि उनकी कोई चीज़ न छू जाए. सारा खाना दूसरे नौकर लगायें, उनका खाना पड़ोस का महाराज लगाये. बर्तन भी वहीं से माँगा दिए जायें. अजब घुटन सी तारी हो जाती थी. बेहद ऊंची-ऊंची रौशनख़याली की बातें हो रही हैं. एक दूसरे की मुहब्बत और जाँनिसारी के किस्से दुहराए जा रहे हैं. अंग्रेजों को मुजरिम ठहराया जा रहा है. साथ-साथ सब बुजुर्ग लरज़ रहे हैं कि कहीं बच्चे छूटे बैल हैं, कोई ऐसी हरकत न कर बैठें कि धरम भ्रष्ट हो जाए.
'' क्या हिंदू आ रहे हैं ?'' पाबंदियां लगते देखकर हमलोग बोर होकर पूछते.
''ख़बरदार! चाचाजी और चाचीजी आ रहे हैं. बद्तमीज़ी की तो खाल खींचकर भूसा भर दिया जाएगा.''
और हम फ़ौरन समझ जाते कि चचाजान और चचिजान नहीं आ रहे हैं. जब वो आते हैं तो सीख़कबाब और मुर्ग़-मुसल्लम पकता है, लौकी का रायता और दही-बड़े नहीं बनते.ये पकने और बनने का फर्क भी बड़ा दिलचस्प है.
हमारे पड़ोस में एक लालाजी रहते थे. उनकी बेटी से मेरी दांत-काटी रोटी थी. एक उम्र तक बच्चों पर छूत की पाबंदी लाज़मी नहीं समझी जाती. सूशी हमारे यहाँ खाना भी खा लेती थी. फल, दालमोट, बिस्कुट में इतनी छूत नहीं होती, लेकिन चूँकि हमें मालूम था कि सूशी गोश्त नहीं खाती, इसलिए उसे धोखे से किसी तरह गोश्त खिलाके बड़ा इत्मीनान होता था. हालाँकि उसे पता नहीं चलता था, मगर हमारा न जाने कौन सा जज़्बा तसल्ली पा जाता था.
वैसे दिन भर एक दूसरे के घर में घुसे रहते थे मगर बकरीद के दिन सूशी ताले में बंद कर दी जाती थी. बकरे अहाते के पीछे टट्टी खड़ी करके काटे जाते. कई दिन तक गोश्त बंटता रहता. उन दिनों हमारे घर से लालाजी से नाता टूट जाता. उनके यहाँ भी जब कोई त्योहार होता तो हम पर पहरा बिठा दिया जाता.
लालाजी के यहाँ बड़ी धूमधाम से जश्न मनाया जा रहा था. जन्माष्टमी थी. एक तरफ़ कड़ाह चढ़ रहे थे और धड़ाधड़ पकवान तले जा रहे थे. बहार हम फ़कीरों की तरह खड़े हसरत से तक रहे थे. मिठाइयों की होशरुबा खुशबू अपनी तरफ खीच रही थी. सूशी ऐसे मौकों पर बड़ी मज़हबी बन जाया करती थी. वैसे तो हम दोनों बारहा एक ही अमरूद बारी-बारी दांत से काटकर खा चुके थे, मगर सबसे छुपकर.
''भागो यहाँ से,'' आते-जाते लोग हमें दुत्कार जाते. हम फिर खिसक आते. फूले पेट की पूरियां तलते देखने का किस बच्चे को शौक़ नहीं होता है.
''अदंर क्या है?'' मैंने शोखी से पूछा. सामने का कमरा फूल-पत्तों से दुल्हन की तरह सजा हुआ था. अदंर से घंटियाँ बजने की आवाजें आ रही थीं. जी में खुदबुद हो रही थी -हाय अल्ला, अदंर कौन है!
''वहां भगवान बिराजे हैं.'' सूशी ने गुरूर से गर्दन अकडाई.
''भगवान !'' मुझे बेइंतिहा एहसासे-कमतरी सताने लगा. उनके भगवान क्या मज़े से आते हैं. एक हमारे अल्ला मियां हैं, न जाने कौन सी रग फडकी की फ़कीरों की सफ़ से खिसक के मैं बरामदे में पहुँच गई. घर के किसी फर्द की नज़र न पड़ी. मेरे मुंह पर मेरा मज़हब तो लिखा नहीं था. उधर से एक देवीजी आरती की थाली लिए सबके माथे पर चंदन-चावल चिपकाती आईं. मेरे माथे पर भी लगाती गुज़र गईं. मैंने फ़ौरन हथेली से टीका छुटाना चाहा, फिर मेरी बद्जाती आडे आ गई. सुनते थे, जहाँ टीका लगे उतना गोश्त जहन्नुम में जाता है. खैर मेरे पास गोश्त की फरावानी थी, इतना सा गोश्त चला गया जहन्नुम में तो कौन टोटा आ जायेगा. नौकरों की सोहबत में बड़ी होशियारियों आ जाती हैं. माथे पर सर्टिफिकेट लिए , मैं मज़े से उस कमरे में घुस गई जहाँ भगवान बिराज रहे थे.
बचपन की आँखें कैसे सुहाने ख्वाबों का जाल बुन लेती हैं. घी और लोबान की खुशबू से कमरा महक रहा था. बीच कमरे में एक चाँदी का पलना लटक रहा था. रेशम और गोटे के तकियों और गद्दों पर एक रुपहली बच्चा लेटा झूल रहा था. क्या नफीस और बारीक काम था. बाल-बाल खूबसूरती से तराशा गया था. गले में माला, सर पर मोरपंखी मुकुट.
और सूरत इस गज़ब की भोली! आँखें जैसे लहकते हुए दिए! जिद कर रहा है, मुझे गोदी में ले लो. हौले से मैंने बच्चे का नरम-नरम गाल छुआ. मेरा रोआं-रोआं मुस्करा दिया. मैंने बे-इख्तियार उसे उठा कर सीने से लगा लिया.
एकदम जैसे तूफ़ान फट पड़ा और बच्चा चीख मारकर मेरी गोद से उछलकर गिर पड़ा. सूशी की नानी का मुंह फटा हुआ था. हाजियानी कैफियत तारी थी जैसे मैंने रुपहले बच्चे को चूमकर उसके हलक में तीर पैवस्त कर दिया हो.
चाचीजी ने झपटकर मेरा हाथ पकडा, भागती हुई लाईं और दरवाज़े से बाहर मुझे मरी हुई छिपकली की तरह फेंक दिया. फ़ौरन मेरे घर शिकायत पहुंची कि मैं चाँदी के भगवान की मूर्ति चुरा रही थी. अम्मा ने सर पीट लिया और फिर मुझे भी पीटा. वह तो कहो, अपने लालाजी से ऐसे भाईचारेवाले मरासिम थे: इससे भी मामूली हादिसों पर आजकल आये दिन खूनखराबे होते रहते हैं. मुझे समझाया गया कि बुतपरस्ती गुनाह है. महमूद गज़नवी बुतशिकन था. मेरी ख़ाक समझ में न आया. मेरे दिल में उस वक़्त परस्तिश का अहसास भी पैदा न हुआ था.
मैं पूजा नहीं कर रही थी, एक बच्चे को प्यार कर रही थी.
****
( इस्मत चुगताई : उर्दू अदब में बड़ा नाम. कथाकार. आधुनिक उर्दू कथा को आकार देने में अहम रोल. यह अंश उनकी आत्मकथा ''कागज़ी है पैरहन'' से. इससे पहले इस स्तंभ में मिर्ज़ा हादी 'रूस्वा', ग़ालिब, फ़िराक़ और सफ़िया अख्तर की रचनाएं आप पढ़ चुके हैं. )
हमारे पड़ोस में एक लालाजी रहते थे. उनकी बेटी से मेरी दांत-काटी रोटी थी. एक उम्र तक बच्चों पर छूत की पाबंदी लाज़मी नहीं समझी जाती. सूशी हमारे यहाँ खाना भी खा लेती थी. फल, दालमोट, बिस्कुट में इतनी छूत नहीं होती, लेकिन चूँकि हमें मालूम था कि सूशी गोश्त नहीं खाती, इसलिए उसे धोखे से किसी तरह गोश्त खिलाके बड़ा इत्मीनान होता था. हालाँकि उसे पता नहीं चलता था, मगर हमारा न जाने कौन सा जज़्बा तसल्ली पा जाता था.
वैसे दिन भर एक दूसरे के घर में घुसे रहते थे मगर बकरीद के दिन सूशी ताले में बंद कर दी जाती थी. बकरे अहाते के पीछे टट्टी खड़ी करके काटे जाते. कई दिन तक गोश्त बंटता रहता. उन दिनों हमारे घर से लालाजी से नाता टूट जाता. उनके यहाँ भी जब कोई त्योहार होता तो हम पर पहरा बिठा दिया जाता.
लालाजी के यहाँ बड़ी धूमधाम से जश्न मनाया जा रहा था. जन्माष्टमी थी. एक तरफ़ कड़ाह चढ़ रहे थे और धड़ाधड़ पकवान तले जा रहे थे. बहार हम फ़कीरों की तरह खड़े हसरत से तक रहे थे. मिठाइयों की होशरुबा खुशबू अपनी तरफ खीच रही थी. सूशी ऐसे मौकों पर बड़ी मज़हबी बन जाया करती थी. वैसे तो हम दोनों बारहा एक ही अमरूद बारी-बारी दांत से काटकर खा चुके थे, मगर सबसे छुपकर.
''भागो यहाँ से,'' आते-जाते लोग हमें दुत्कार जाते. हम फिर खिसक आते. फूले पेट की पूरियां तलते देखने का किस बच्चे को शौक़ नहीं होता है.
''अदंर क्या है?'' मैंने शोखी से पूछा. सामने का कमरा फूल-पत्तों से दुल्हन की तरह सजा हुआ था. अदंर से घंटियाँ बजने की आवाजें आ रही थीं. जी में खुदबुद हो रही थी -हाय अल्ला, अदंर कौन है!
''वहां भगवान बिराजे हैं.'' सूशी ने गुरूर से गर्दन अकडाई.
''भगवान !'' मुझे बेइंतिहा एहसासे-कमतरी सताने लगा. उनके भगवान क्या मज़े से आते हैं. एक हमारे अल्ला मियां हैं, न जाने कौन सी रग फडकी की फ़कीरों की सफ़ से खिसक के मैं बरामदे में पहुँच गई. घर के किसी फर्द की नज़र न पड़ी. मेरे मुंह पर मेरा मज़हब तो लिखा नहीं था. उधर से एक देवीजी आरती की थाली लिए सबके माथे पर चंदन-चावल चिपकाती आईं. मेरे माथे पर भी लगाती गुज़र गईं. मैंने फ़ौरन हथेली से टीका छुटाना चाहा, फिर मेरी बद्जाती आडे आ गई. सुनते थे, जहाँ टीका लगे उतना गोश्त जहन्नुम में जाता है. खैर मेरे पास गोश्त की फरावानी थी, इतना सा गोश्त चला गया जहन्नुम में तो कौन टोटा आ जायेगा. नौकरों की सोहबत में बड़ी होशियारियों आ जाती हैं. माथे पर सर्टिफिकेट लिए , मैं मज़े से उस कमरे में घुस गई जहाँ भगवान बिराज रहे थे.
बचपन की आँखें कैसे सुहाने ख्वाबों का जाल बुन लेती हैं. घी और लोबान की खुशबू से कमरा महक रहा था. बीच कमरे में एक चाँदी का पलना लटक रहा था. रेशम और गोटे के तकियों और गद्दों पर एक रुपहली बच्चा लेटा झूल रहा था. क्या नफीस और बारीक काम था. बाल-बाल खूबसूरती से तराशा गया था. गले में माला, सर पर मोरपंखी मुकुट.
और सूरत इस गज़ब की भोली! आँखें जैसे लहकते हुए दिए! जिद कर रहा है, मुझे गोदी में ले लो. हौले से मैंने बच्चे का नरम-नरम गाल छुआ. मेरा रोआं-रोआं मुस्करा दिया. मैंने बे-इख्तियार उसे उठा कर सीने से लगा लिया.
एकदम जैसे तूफ़ान फट पड़ा और बच्चा चीख मारकर मेरी गोद से उछलकर गिर पड़ा. सूशी की नानी का मुंह फटा हुआ था. हाजियानी कैफियत तारी थी जैसे मैंने रुपहले बच्चे को चूमकर उसके हलक में तीर पैवस्त कर दिया हो.
चाचीजी ने झपटकर मेरा हाथ पकडा, भागती हुई लाईं और दरवाज़े से बाहर मुझे मरी हुई छिपकली की तरह फेंक दिया. फ़ौरन मेरे घर शिकायत पहुंची कि मैं चाँदी के भगवान की मूर्ति चुरा रही थी. अम्मा ने सर पीट लिया और फिर मुझे भी पीटा. वह तो कहो, अपने लालाजी से ऐसे भाईचारेवाले मरासिम थे: इससे भी मामूली हादिसों पर आजकल आये दिन खूनखराबे होते रहते हैं. मुझे समझाया गया कि बुतपरस्ती गुनाह है. महमूद गज़नवी बुतशिकन था. मेरी ख़ाक समझ में न आया. मेरे दिल में उस वक़्त परस्तिश का अहसास भी पैदा न हुआ था.
मैं पूजा नहीं कर रही थी, एक बच्चे को प्यार कर रही थी.
****
( इस्मत चुगताई : उर्दू अदब में बड़ा नाम. कथाकार. आधुनिक उर्दू कथा को आकार देने में अहम रोल. यह अंश उनकी आत्मकथा ''कागज़ी है पैरहन'' से. इससे पहले इस स्तंभ में मिर्ज़ा हादी 'रूस्वा', ग़ालिब, फ़िराक़ और सफ़िया अख्तर की रचनाएं आप पढ़ चुके हैं. )
विपिन कुमार शर्मा की चार कवितायें
9:27 pm
{ कविता मेरे लिए न शौक की चीज़ है, न सामर्थ्य की, यह मेरे अन्दर छुपे एक क्षुब्ध व्यक्ति का प्र
तिरोध है. मैं प्रायः तभी लिखता हूँ जब देश या समाज के समानांतर मेरे मस्तिष्क में बन रही स्थितियां बर्दाश्त के बहार हो जाती हैं. मैं महज अपनी मुक्ति के लिए नहीं लिखता, जो लोग मेरे सोच के दायरे में हैं, उन सबकी मुक्ति-आकांक्षा को अपनी मुक्ति से जोड़कर लिखता हूँ. यही वजह है की लिखने के बाद भी मेरे अन्दर की छटपटाहट कभी समाप्त नही होती. कविता मेरे लिए वाग्जाल नहीं, बल्कि हर तरह के जाल को काटनेवाला खंजर है. अपनी कविता में मैं बातों को उलझाना नहीं, बल्कि सुलझाना चाहता हूँ. इसीलिए सहजता को चुनौती की तरह लेता हूँ- कवि. }
कवि
श्लथ क़दमों से
लौटता है घर
कवि
धीरे-धीरे
भरके निकला था सुबह
कविताओं की टोकरी
बिकीं एक भी नहीं
वापिस लौटा है
लेकर,
भूख-प्यास
कुंठा-त्रास
और वही रोज़ की चिख-चिख
नंगे-अधनंगे बच्चे
हर सम्भव जगह
पिता पर झूल जाते हैं
उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए
परम संतोषी हैं
लेकिन कवि कुछ चाहता है
अपने बच्चों से
उन्हीं की भांति उमगती -विहंसती कवितायें
और गदबदे भी
( उनकी तरह कुपोषित नहीं)
पर बच्चों के पास कवितायें कहाँ !
न ही मालूम है किकैसे बनती हैं कवितायें
फटे बिवाइयों वाले
निरीह से पाँव
जाने कब से चुभ रहे हैं
कवि की आंखों में
दबे कन्धों और झुकी आंखों से
देख रहा है पत्नी की रोनी सूरत
आजिज़ होकर उठता है
बच्चों को धूल-गर्द की भांति
बदन से झाड़ते हुए
और पत्नी के होठों को
दोनों हाथों की उँगलियों से
निर्ममतापूर्वक खींचकर
कहता है -
'' हंसती रहो भाग्यवान !
संपादकों को
अब हास्य कवितायें चाहिए।''
हे मेरी तुम
अनेक दुखों के भार से
बेजार हुई जा रही, इन दिनों
'' हे मेरी तुम !''
मैं जानना चाहता हूँ
की हज़ार मुश्किलों के बीच
एकदम से मुस्करा पड़ने की
मजबूरी क्या है ?
मैंने तुमसे, तुम्हारी
हँसी तो नहीं मांगी थी
यह और बात, कि
लाचारी भी नहीं मांगी थी
ऐसा नहीं कि तुमसे सुख न चाहा
शायद ! ऐसा भी नहीं
कि तुमने मेरे सुख को समझा ही नहीं !
ख़ुद को टुकड़ा-टुकड़ा करके
बारी-बारी देती गईं तुम
और मैं संकोचवश यह न कह सका
कि मैं तुम्हारा पूरा चाहता हूँ
न ही यह, कि मैं
तुम्हें टुकड़ा होते नहीं देख सकता।
गाँधी के देश में
हमारे गाल पर
नहीं मारता अब तमाचा कोई
कि हम
तपाक से दूसरा गाल बढ़ा दें
अब तो चुभते हैं
उनके पीने दांत
खच्च से हमारी गर्दन पर
और उनकी सहस्त्र जिह्वाएँ
लपलपा उठते हैं
फ़व्वारे की तरह चीत्कार करते खून पर
गाँधी के इस देश में
हमें
ज़्यादा से ज़्यादा स्वस्थ होना होगा
ताकि हम उनकी खून की हवस बुझा सकें
या यह भी
कि उनकी यह आदत ही छुड़ा सकें
आदत
कभी भट्ठी में पिघलता लोहा भी
मनमानी पर उतर आता है
बन्दूक के बदले
हँसिया में ढल जाता है
मगर
खून पीने की आदत
बदल नहीं पाता है
****
( ऊपर दी गई पेंटिंग ''पोट्रेट ऑफ़ अ पोएट'' वेन कोस्तुरानोव की है।)
तिरोध है. मैं प्रायः तभी लिखता हूँ जब देश या समाज के समानांतर मेरे मस्तिष्क में बन रही स्थितियां बर्दाश्त के बहार हो जाती हैं. मैं महज अपनी मुक्ति के लिए नहीं लिखता, जो लोग मेरे सोच के दायरे में हैं, उन सबकी मुक्ति-आकांक्षा को अपनी मुक्ति से जोड़कर लिखता हूँ. यही वजह है की लिखने के बाद भी मेरे अन्दर की छटपटाहट कभी समाप्त नही होती. कविता मेरे लिए वाग्जाल नहीं, बल्कि हर तरह के जाल को काटनेवाला खंजर है. अपनी कविता में मैं बातों को उलझाना नहीं, बल्कि सुलझाना चाहता हूँ. इसीलिए सहजता को चुनौती की तरह लेता हूँ- कवि. }कवि
श्लथ क़दमों से
लौटता है घर
कवि
धीरे-धीरे
भरके निकला था सुबह
कविताओं की टोकरी
बिकीं एक भी नहीं
वापिस लौटा है
लेकर,
भूख-प्यास
कुंठा-त्रास
और वही रोज़ की चिख-चिख
नंगे-अधनंगे बच्चे
हर सम्भव जगह
पिता पर झूल जाते हैं
उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए
परम संतोषी हैं
लेकिन कवि कुछ चाहता है
अपने बच्चों से
उन्हीं की भांति उमगती -विहंसती कवितायें
और गदबदे भी
( उनकी तरह कुपोषित नहीं)
पर बच्चों के पास कवितायें कहाँ !
न ही मालूम है किकैसे बनती हैं कवितायें
फटे बिवाइयों वाले
निरीह से पाँव
जाने कब से चुभ रहे हैं
कवि की आंखों में
दबे कन्धों और झुकी आंखों से
देख रहा है पत्नी की रोनी सूरत
आजिज़ होकर उठता है
बच्चों को धूल-गर्द की भांति
बदन से झाड़ते हुए
और पत्नी के होठों को
दोनों हाथों की उँगलियों से
निर्ममतापूर्वक खींचकर
कहता है -
'' हंसती रहो भाग्यवान !
संपादकों को
अब हास्य कवितायें चाहिए।''
हे मेरी तुम
अनेक दुखों के भार से
बेजार हुई जा रही, इन दिनों
'' हे मेरी तुम !''
मैं जानना चाहता हूँ
की हज़ार मुश्किलों के बीच
एकदम से मुस्करा पड़ने की
मजबूरी क्या है ?
मैंने तुमसे, तुम्हारी
हँसी तो नहीं मांगी थी
यह और बात, कि
लाचारी भी नहीं मांगी थी
ऐसा नहीं कि तुमसे सुख न चाहा
शायद ! ऐसा भी नहीं
कि तुमने मेरे सुख को समझा ही नहीं !
ख़ुद को टुकड़ा-टुकड़ा करके
बारी-बारी देती गईं तुम
और मैं संकोचवश यह न कह सका
कि मैं तुम्हारा पूरा चाहता हूँ
न ही यह, कि मैं
तुम्हें टुकड़ा होते नहीं देख सकता।
गाँधी के देश में
हमारे गाल पर
नहीं मारता अब तमाचा कोई
कि हम
तपाक से दूसरा गाल बढ़ा दें
अब तो चुभते हैं
उनके पीने दांत
खच्च से हमारी गर्दन पर
और उनकी सहस्त्र जिह्वाएँ
लपलपा उठते हैं
फ़व्वारे की तरह चीत्कार करते खून पर
गाँधी के इस देश में
हमें
ज़्यादा से ज़्यादा स्वस्थ होना होगा
ताकि हम उनकी खून की हवस बुझा सकें
या यह भी
कि उनकी यह आदत ही छुड़ा सकें
आदत
कभी भट्ठी में पिघलता लोहा भी
मनमानी पर उतर आता है
बन्दूक के बदले
हँसिया में ढल जाता है
मगर
खून पीने की आदत
बदल नहीं पाता है
****
( ऊपर दी गई पेंटिंग ''पोट्रेट ऑफ़ अ पोएट'' वेन कोस्तुरानोव की है।)
गिरिराज किराड़ू की सात कवितायें
6:43 pm( शिव कुमार गाँधी की चित्र-कृति A Woman with a Scenario . प्रतिलिपि से साभार )
संगतराश
शायद एक वही सब कुछ पहले से जानता था सब कुछ पहले से तराश रखा था उसने
वह हमेशा वीराने में रहता था और एक दिन अचानक उसके वीराने में जो बहार चली आयेगी
उसकी आँखें ग़ज़ब की होंगी जब दूसरे ख्वाब देख रहे होंगे वह बस अपनी आँखें देखेगी
वो हकीकत ही क्या जिसे मुजुस्तमा न बनाया जा सके वह बहार से कहेगा और बेतहाशा हंसने लगेगा
अभिव्यक्त
नीम का अर्थ पीपल था पीपल का बरगद बरगद का तुलसी इसी तरह कमल का गुलाब गुलाब का बेला बेला का बोगेनवीलिया पर शुक्र है पेड़ का अर्थ कोई पेड़ फूल का कोई फूल ही था इतना रहता था मैं मनुष्यों के बीच फिर भी कबीर का अर्थ घनानंद मीरां का अर्थ महादेवी नहीं था मेरी सारी गफ़लत उन के बारे में थी जो मनुष्य नहीं थे मैं उन दिनों की बात कर रहा हूँ जब मेरा अर्थ तुम हो जातीं अगर मैं अपना अर्थ रह गया होता मैं उन दिनों की बात कर रहा हूँ जब पेड़ों से झूल रही थीं लाशें हर तरफ और कई दिनों से विनोद कुमार शुक्ल की कोई कविता नहीं थी जीवन में
बादशाह मैकबैथ
(कवि अरूण कमल के लिये)
क्या हुआ बैंको के बेटे का शेक्सपीयर हमें नहीं बताता – कुछ समझे बादशाह?
उसकी कोई दिलचस्पी नहीं चुड़ैलों के बताये भविष्य में,
तुम्हें कुछ ख़बर भी है कौन बनेगा बादशाह तुम्हारे बाद?
जिस खंज़र ने डरा दिया था तुम्हें उसकी मूठ बर्नम की लकड़ी से तो नहीं बनी थी?
गौर से देखा था तुमने जब हवा में लहरा रहा था वह?
देखो, बादशाह देखो, तुम्हारी त्रासदी मृतक लिख रहे हैं
हिरण चुराने वाला शेक्सपीयर तो उनका लिपिक भर है
डॉन किख़ोते का रचयिता, पियरे मेनार्ड
पियरे मेनार्ड एक किताब लिखना चाहता है पर पहली मुश्किल तो यही कि वो खुद कोई नहीं उसकी जीवनी तो शायद है कोई जीवन नहीं दूसरी यह कि वह एक लिखी हुई किताब को किसी नये तरीके से नहीं लिखना चाहता ऐसा तो सभी लेखक करते ही हैं वह शताब्दियों में हजारों लाखों के पढ़ी हुई किताब को शब्द दर शब्द वैसे ही लिखना चाहता है और बेचारा पियरे उसकी तीसरी मुश्किल यह कि वो सोचता है शताब्दियों में हजारों लाखों के पढ़ी हुई किताब को शब्द दर शब्द लिख कर ही वो मौलिक लेखक हो पायेगा कि इसी तरह जैसा सभी लेखक नहीं करते वैसा करके ही वह एक लेखक हो पायेगा
कितना खुशनसीब है पियरे मेनार्ड बस यही तीन मुश्किलें हैं उसकी जान को
पर इतनी आसान किताब भी जिसमें उसे शताब्दियों में हजारों लाखों के पढ़ी हुई किताब को शब्द दर शब्द फिर से लिखना भर है वह कभी पूरी नहीं लिख पायेगा किताबों की भूलभूलैया में घूमते हुए वह शताब्दियों में हजारों लाखों के पढ़ी हुई किताब के लेखक से टकरा जायेगा और कहेगा मेरी किताब को मुझसे पहले लिखकर आप मैं हो गये आपकी किताब को लिखते लिखते मैं आप हो गया हूँ क्या मिला आपको यह करके मैं कितना मजें में था बिना जीवन के अब चैन पड़ गया आपकी आत्मा को जी में आता है आपको दरिया में डुबा दूँ और किनारे बैठकर मुजरा करूँ आपके डूब मरने का इधर आप डूब मरते रहें उधर मैं खूब सारी बीयर पीता रहूँ
दो अर्थ का भय
अपमान बेहद था होने का रक्त के दरिया में दौड़ते घुड़सवार थे किसी और से नहीं
अपने आप से थी शर्मिंदगी हर साँस में हर शब्द का एक अर्थ दुख दूसरा मज़ाक था – जीवन में
कल्पना में पर नहीं था इनमें से कुछ भी
यही मेरा गुनाह कल्पना में सुखी था मैं
मादाम बोवारी से क्षमा
वह मादाम बोवारी का अभिनय कर रही है
बिल्कुल अंतिम दृश्य है विष उसके शरीर में फैल रहा है वह क्षमा माँगती है
यह देखते हुए मैं उसके पति की भूमिका में हूँ
मैं भी उससे क्षमा माँगता हूँ –
क्षमा करो प्रिये, मैं इस कथा से अभी विदा नहीं ले सकता
तुम्हारा अंतिम संस्कार मेरा अंतिम संस्कार नहीं है
मैं तुम्हारा समाधिलेख नहीं हूँ
मैं जीवन का आज्ञाकारी पालतू हूँ
मुझे तुम्हारी याद की ही नहीं कब्र की भी देखभाल करनी है
क्षमा करो, प्रिये, क्षमा
कहानी के फेर में
हिरामन तीन कसमें खाता है
फिर किसी कहानी का सुपात्र नहीं बनूंगा
फिर किसी कहानीकार को अपने बारे में नहीं लिखने दूंगा
फिर किसी कहानी में अपना ही पार्ट नहीं करुंगा –
रेणु थोड़ा उदास हो कर उसे देखते हैं फिर तनिक हंसकर कहते हैं
जा रे जमाना, तू भी आ गया मेरी कहानी के फेर में!
****
सबद पुस्तिका : १ : विष्णु खरे
5:49 pm
(आगे दिए जा रहे लेख को विष्णुजी ने हमारे आग्रह पर यहाँ पुस्तिका स्वरुप छापने की अनुमति दी है. हम उनके आभारी हैं. यह लेख यों भूमिकास्वरुप कुछ संशोधनों के साथ राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार पर केंद्रित पुस्तक ‘उर्वर प्रदेश’ में छपा है. इस नाते लेख के अविकल छापने का आग्रह ज़ाहिर है दुतरफा रहा है. याद नहीं आता कि हिंदी में किसी प्रतिष्ठित पुरस्कार के निर्णायक मंडल में रहते हुए उसके औचित्य, चयन-प्रक्रिया, निर्णायक और प्राप्तकर्ता के बारे में इससे पहले किसी ने इतना निर्भीक, तार्किक और ज़रूरी मूल्यांकन का यत्न किया है. इसमें दूसरों पर लिखते हुए खुद के निर्णयों को बख्शने की सलाहियत नहीं है और न ही यह एक लोकप्रिय विवाद को जन्म देकर उसमें केन्द्रीयता हासिल कर लेने की अपरिपक्व सोच की ही उपज है. इन मायनों में सत्तर के करीब विष्णु सौभाग्यवश अपने उन समकालीन और बुजुर्गवार लेखकों से भिन्न हैं जो कुछ ठोस लिखने की बजाए धौलधप्पा खेल हमें इंगेज रखने की लज्जाजनक कोशिश कर रहे हैं। साथ में दी गई पेंटिंग गोया की 'मेन रीडिंग' सीरीज से। )
एक पुरस्कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्पद जायज़ा
विष्णु खरे
कोई ऐसा वार्षिक पुरस्कार, जिसे सरकारें या साहित्यिक-ग़ैर-साहित्यिक संस्थान प्रयोजित न कर रहे हों बल्कि एक कवि की स्मृति में उसके परिजनों ने स्थापित किया हो, जिसकी राशि लुभाने वाली न हो, जो 'पिछले वर्ष' प्रकाशित 35 साल की आयु से कम के किसी कवि की सिर्फ़ एक कविता पर दिया जाता हो, जिसका निर्णय पांच लेखक प्रति वर्ष बारी-बारी से स्वतंत्र रूप से करते हों, जो 1980 से लगातार दिया जा रहा हो और इस तरह 2009 में अपने तीस वर्ष पूरे कर चुका हो, आश्चर्य, हर्ष और अभिनंदन की भावनाएं जगाता है. इसमें संदेह नहीं कि भारतभूषण अग्रवाल स्मृति कविता पुरस्कार 'तार सप्तक' के यशस्वी कवि दिवंगत भारत जी की स्मृति को बनाए रखने के अपने मौलिक उद्देश्य में सफल रहा है.लेकिन किसी भी पुरस्कार को मात्र उसके प्राथमिक लक्ष्य की कामयाबी या असफलता पर नहीं आंका जाता. वह उसकी प्रतिज्ञाओं, उसके निर्वाह और उससे उत्पन्न परिणामों और प्रतिघातों पर परखा जाएगा. कुछ बहसें तो ऐसी होंगी, जिनका कोई हल होगा ही नहीं – मसलन क्या चर्चाधीन पुरस्कार के सारे निर्णायक इस योग्य और पूर्वग्रहमुक्त हैं कि वे पात्र कवि की 'पिछले वर्ष' की 'श्रेष्ठ' कविता जान और चुन सकें, क्या वे वाक़ई सारी वांछनीय कविताएं पढ़ चुके होते हैं, क्या सारे निर्णायक और हिंदी कविता के सभी कि़स्म के पाठक सचमुच सहमत हो पाते हैं कि पुरस्कृत कविता विचाराधीन वर्ष की श्रेष्ठ कविता है? प्रारंभिक भलाई यही मानकर चलने में है कि संसार का कोई भी पुरस्कार मतभेद और विवाद से परे हो नहीं सकता- यदि उसमें दिलचस्पी रखने वालों का जैसा-तैसा प्रबुद्ध बहुमत उसके पक्ष्ा में प्रतीत हो तो उसे वैध मानना होगा.
यदि समसामयिक हिंदी कविता में आपकी दिलचस्पी सामान्य से अधिक है या उसमें आपकी किसी भी कि़स्म की सक्रिय भागीदारी है तो पुरस्कार पर निर्णय देने के आपके मापदंड और जटिल होते जाएंगे. पहला सवाल यही किया जा सकता है कि क्या भारतजी इतने महत्वपूर्ण कवि और लेखक थे कि उनकी स्मृति को बनाए रखने के लिए कोई पुरस्कार स्थापित किया जाता? यह इसलिए कि जब हम आज के 'निजी' या 'पारिवारिक' पुरस्कारों पर नज़र डालते हैं तो दुर्भाग्यवश यह पाते हैं कि उनमें से कई ऐसे अज्ञातकुलशील दिवंगतों के नाम पर हैं जो नितांत साहित्यसंगीतकलाहीन थे - यद्यपि वैसा होना कोई अपराध नहीं – और उनके समर्थ वंशजों, शुभचिंतकों या मातहतों ने परस्पर अमरत्व तथा निजी प्रभाव-क्षेत्र और साख प्राप्त करने के लिए स्मृति पुरस्कार स्थापित कर डाले. भारतजी 'तार सप्तक' और उसके पहले और बाद की अपनी कविताओं के कारण ही नहीं, हिंदी उपन्यास पर अपने मौलिक शोध और साहित्य अकादेमी में भारतीय साहित्यों और हिंदी के लिए किए गए ठोस काम, अपने कुछ अप्रतिम अनुवादों और वाक़ई युवा प्रतिभाओं को सक्रिय प्रोत्साहन देने के लिए साहित्य में चिरस्थायी स्थान बना चुके हैं. उनके परिवार को न तो उनके लिए और न अपने लिए हिंदी या किसी भी अन्य क्षेत्र में किसी स्वार्थ-सिद्धि के लिए इस पुरस्कार का इस्तेमाल करना है. हिंदी में इतने असंदिग्ध औचित्य वाले पुरस्कार बहुत कम हैं.
समस्या निर्णायकों को लेकर हो सकती है. तीस वर्षों में निर्णायकों में से एक ही नाम बदला है- नेमिचंद्र जैन के देहावसान के बाद उनके स्थान पर इसी पुरस्कार के पहले विजेता और अब सुपरिचित प्रौढ़ कवि अरुण कमल को निर्णायक बनाया गया है वर्ना नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे और अशोक वाजपेयी 1980 से निर्णायक हैं. यह भी एक अच्छा संयोग है कि तीसवें पुरस्कार के निर्णायक अरुण कमल हैं, जो उनका प्रवेश-निर्णय है. जिस वर्ष (1979) में निर्णायक-मंडल तय हुआ है तब उसके युवतम सदस्य विष्णु खरे (39 वर्ष) और अशोक वाजपेयी (38 वर्ष) थे और उन्हें युवा ही कहा जाएगा. अशोक वाजपेयी अपने लेखन और सांस्कृतिक गतिविधियों से तभी पर्याप्त ख्याति अर्जित कर चुके थे यद्यपि विष्णु खरे का उस समय से लेकर अब तक साहित्य में तो क्या, कहीं भी क्या स्थान है यह कहना कठिन है. 'तार सप्तक' योजना के जन्मदाता और उसकी पांडुलिपि के मूल संयोजक-संपादक नेमिचंद्र जैन, जो स्वयं उसमें कवि के रूप में उपस्थित हैं और भारतभूषण अग्रवाल के आजीवन मित्र और विवाह के बाद हमज़ुल्फ़ रहे, निर्णायक मंडल के वरिष्ठतम सदस्य थे. हिंदी के अनेक लेखकों की अनेक असहमतियां नेमिजी से हो सकती थीं किंतु उन जैसा कठोर साहित्यिक और व्यक्तिगत नैतिकता वाला, अपने विचारों, अवधारणाओं, मूल्यांकनों-निर्णयों पर अटल कवि-आलोचक-अनुवादक-सम्पादक, 'नो नॉन्सैंस' स्पष्टवादी बुद्धिजीवी हिंदी में शायद ही कोई दूसरा हो. उन्होंने हिंदी की सतत् पतनशील दुनिया में कभी इतना लोकप्रिय नहीं होना चाहा कि कोई पुरस्कारप्रार्थी उनके नज़दीक भी फटक सके. उनकी साहित्यिक पसंद-नापसंद से असहमत होना हमेशा संभव था, उनकी नीयत और ईमानदारी पर लेशमात्र भी संदेह करना कुफ़्र ही समझा जाएगा. उनके कुछ अभिमतों को आप दुर्भाग्यपूर्ण कह सकते थे, दुरभिसंधि-प्रेरित नहीं.
यहां नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी की आलोचनात्मक साहित्यिक जीवनियों ('क्रिटिकल लिटरेरी बाइऑग्राफ़ी') के खुलासों में जाने का न अवकाश है और न औचित्य, किंतु यह सच है कि हिंदी की अकादमिक दुनिया में कुछ अर्से तक सत्त-सम्पन्न रहने के बावजूद केदारनाथ सिंह हिंदी प्रतिष्ठान के संदिग्ध व्यक्तित्व कभी नहीं बन पाए. निस्संदेह हिंदी साहित्य में उनकी छवि एक अजातशत्रु भले व्यक्ति की है और एक कवि के रूप में अकादमिक-ग़ैर-अकादमिक तथा साहित्यिक-ग़ैर-साहित्यिक हलक़ों में उन्हें असाधारण प्रतिष्ठा और लोकप्रियता हासिल है. वे मिलनसार, सामाजिक तथा अपने मित्रों और प्रशंसकों के हितैषी और प्रोत्साहक रहे हैं. उन्हें 'मृदूनि कुसुमादपि' माना जाता है. आलोचक के रूप में नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी की, और कवि के रूप में मात्र अशोक वाजपेयी की, आज जो भी प्रतिष्ठा बच रही हो, हिंदी साहित्य जगत में दोनों के विराट, प्रतियोगी प्रभाव-मंडल और 'क्लाउट' हैं. दोनों की विचारधाराएं, यदि उन्हें यह नाम दिया जा सकता हो तो, प्रतिद्वंद्वी हैं और दोनों के भक्त, अनुयायी और कृपापात्र 'ए गर्ल इन एवरी पोर्ट' की तरह हर क़स्बे, शहर, महानगर में बिछे पड़े हैं. यदि नामवर सिंह का असर हिंदी की विस्तीर्ण पतनोन्मुख दुनिया, एक दयनीय लेखक संघ और हाशिए की राजनीतिक राजनीति पर है तो अशोक वाजपेयी की प्रतिक्रियावादी विचारधारा एक ओर तो हिंदी साहित्य की एक बावली और साकि़त मग़ज़ी (लूनटिक एंड डिकेडेंट फ्रिंज) को साथ लिए और पोषित किए हुए चलती है और दूसरी ओर देश के प्रशासकीय और राजनीतिक गलियारों और चित्रकला की अरबों रुपयों की 'एलीटिस्ट' दुनिया से ताक़त हासिल करती है और उन्हें ताक़त देती है. अशोक के पास हमेशा सत्ता रही है और उन्होंने उसका मिला-जुला इस्तेमाल किया है लेकिन इस समय वे हिंदी में अपने चरम पर हैं.
इस तूमार का लुब्बेलुबाब यह है कि जब ऐसे सत्ताधारियों के अनुगामियों, मातहतों, मुरीदों और प्रशंसकों की संख्या बढ़ती जाती है तो जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे वे अपने भक्तों की उम्मीदों और मांगों के शिकार या क़ैदी भी होने लगते हैं. जो आराध्य अपने पूजकों को वरदान नहीं देता, उसकी मूर्ति शीघ्र ही उपेक्षित हो जाती है. औलिया और मुतवल्ली एक-दूसरे से ताक़त हासिल करते हैं. फिर हिंदी में व्यामोह ('पैरेनोइआ') और षड्यंत्र-सिद्धांत ('कॉन्स्पिरेसी थियरी') लगभग स्थायी-भाव हैं सो अलग. इसलिए अन्य पुरस्कारों सहित भारतभूषण अग्रवाल स्मृति कविता-पुरस्कार पर भी हर वर्ष जाति, प्रदेश, क्षेत्र, बोली, आस्था, विभिन्न कि़स्मों के अंतंरंग सम्बंध, रसूख़, विनिमय आदि के सच्चे-झूठे संदेह किए ही जाते रहे हैं.
समस्या यह है कि जब तक कोई निर्णायक ही अपने कमज़ोर लमहों में क़ुबूल न कर ले - एक अन्य पुरस्कार की निर्णायक-मंडल बैठक में ऐसा हो चुका है - कि उसने किसी दबाव में पुरस्कार दिया है, या कोई और ठोस, क़ानूनी-सरीखा प्रमाण न हो, तब तक सिर्फ़ पुरस्कृत कृति की गुणवत्ता पर बहस की जा सकती है और उसी के आधार पर कहा जा सकता है कि निर्णायक की श्रेष्ठ कविता की समझ स्थायी रूप से या 'इस बार' चली गई है, या कोई असवाधानी या लापरवाही हुई है या, जो कि सबसे भयावह होगा, पुरस्कार के साथ कोई अनैतिक समझौता किया गया है. लेकिन कोई कविता पिछले वर्ष की श्रेष्ठ कविता थी या नहीं, इसका फ़ैसला कोई दूसरा एक व्यक्ति नहीं, हिंदी साहिय जगत में, वह जैसा भी है, उसे लेकर बना बहुमत ही कर पाएगा. वैसे अपनी निजी राय रखने का मौलिक जनतांत्रिक अधिकार प्रत्येक व्यक्ति के पास सुरक्षित रहता ही है.
कथित हिंदी साहित्य में आपकी अपनी 'जगह' और 'शोहरत' क्या है इसका निर्णय दूसरों और काल पर छोड़ देना ही बेहतर है- यही कहा जा सकता है कि पिछले त्रेपन वर्षों से 'सक्रिय' रहने के कारण आपकी अच्छी-ख़राब कोई तस्वीर तो बनी होगी. आप यह दावा कर सकते हैं कि आपने साहित्य सहित शेष सारे जीवन-क्षेत्रों में न्यूनतम बेईमानी करने की कोशिश की है लेकिन उसका फ़ैसला भी दूसरे ही करेंगे. इसलिए बेहतर यही है कि मैं अपने द्वारा निर्णीत पुरस्कारों का ही यथासंभव बचाव करूं और उसके बाद दूसरे निर्णायकों के फ़ैसलों पर कोई टिप्पणी करूं. मैंने अब तक विनोद भारद्वाज की कविता 'हवा' (पुरस्कार-वर्ष 1982) से शुरू कर विमल कुमार की 'सपने में एक औरत से बातचीत', संजय चतुर्वेदी की 'पतंग', नीलेश रघुवंशी की 'हंडा', आर. चेतनक्रांति की 'सीलमपुर की लड़कियां' और गीत चतुर्वेदी की 'मदर इंडिया' कविताओं को चुना है.
हिंदी कविता, जिससे हमारा अर्थ 'निराला' द्वारा स्थापित 'मुक्त-छंद' 'अतुकांत' 'आधुनिक' कविता है, शेष हिंदी कविता नहीं, के पाठक और ज्ञाता यह जानते ही हैं कि समसामयिक कवियों की सूची में विनोद भारद्वाज का नाम अनायास नहीं आ जाता - उसे स्मरण करना पड़ता है. उन्होंने कविताएं कम लिखी हैं और उनके संग्रह भी चर्चित नहीं हो पाए हैं जिसका एक कारण तो यह है कि वह कवियों की क़तार में धक्का-मुक्की करते नहीं पाए जाते. लेकिन जि़दंगी को देखने की उनकी निगाह अधिकांश हिंदी कवियों से अलग है और उसका प्रसार भी व्यापक और दूरगामी है. उनकी कविता 'हवा', जो हिंदी में अनायास पर्यावरण-प्रदूषण पर लिखी गई बहुत कम कविताओं में विशिष्ट स्थान रखती है, कथ्य और शिल्प में बेजोड़ है. पर्यावरण और पत्रकारिता से आगे जाकर वह एक गांव के हालिया अवर-इतिहास से होते हुए देश की वृहत्तर पूंजीवाद-राजनीति दुरभिसंधि तक पहुंचते हैं. हिंदी कवियों में 1982 में यह चेतना कम थी. आज देश और विश्व जिस (पर्यावरण) विनाश के क़गार पर खड़े हैं, उसे इस कविता ने बहुत पहले देख लिया था. विनोद भारद्वाज की अब तक की अधिकांश कविताओं ने मुझे निराश नहीं किया है, बल्कि कुछ ने चौंकाया है.
मैं इस या दूसरे पुरस्कारों के निर्णायकों के बारे में कुछ नहीं कह सकता, किंतु यदि कोई पुरस्कार के लिए सिर्फ़ मैं उत्तरदायी हूं तो मैं सोचता हूं कि मेरी जवाबदेही सिर्फ़ मेरे निर्णय का औचित्य बतलाने तक ही सीमित नहीं रह जाती. यह सही है कि कोई भी पुरस्कार इसकी कोई गारंटी नहीं दे सकता कि उसका प्राप्तकर्ता यदि गुणवत्ता में उस कृति से आगे नहीं जाएगा, तो कम-से-कम वह स्तर तो क़ायम रखेगा : कोई भी निर्णायक आजीवन इसके लिए जि़म्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि उसके फ़ैसले ने जो उम्मीद जगाई थी, उसे इनामयाफ़्ता निभा या आगे ले जा न सका. फिर भी निर्णायक एक नैतिक उत्तरदायित्व के बोझ से मुक्त नहीं हो सकता. यह कोई संरक्षक-अभिभावक ग्रंथि नहीं, बल्कि साहित्य की अपनी समझ, वस्तुपरकता और अख़्लाक़ की चिंता है. इसलिए हिंदी का सब-कुछ पढ़ने-जानने की कोशिश के साथ मैं अपने द्वारा चुने गए कवियों की रचनाएं, संग्रह और उनका अन्य लेखन भी लगातार खोजकर पढ़ता रहता हूं ताकि आश्वस्त हो सकूं कि वे मुझे या स्वयं को शर्मिंदा तो नहीं कर रहे. तमाम परस्पर जि़म्मेदारियों के साथ ये आपके साहित्यिक परिवार के निकट सदस्य हो जाते हैं, उन पुरस्कारों के स्थापक-नियामक तथा अन्य निर्णायकों के साथ, भले ही वे चाहें या न चाहें.
इसीलिए मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि विमल कुमार ने जो उम्मीदें 'सपने में एक औरत से बातचीत' से जगाई थीं, वे उन्हें, मेरे विचार से, अपनी बाद की अधिकांश कविताओं में निभा नहीं पा रहे हैं. बेशक, दस वर्ष पहले, जब भारतभूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार का पहला मुकम्मिल संकलन 'उर्वर प्रदेश' शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, तब उसमें उनकी तत्कालीन ताज़ा रचना 'उस सौंदर्य को देखना दर्पण के लिए एक नया अनुभव था', जो अपनी गुणवत्ता में 'सपने में...'से कमतर न थी,भी दी गई थी. यहां किसी कवि की विस्तृत समीक्षा संभव नहीं है और न ही अभीष्ट, इसलिए झाड़ूबुहारी और फ़तवेबाज़ी के आरोपों का जोखिम उठाते हुए भी यही कहना होगा कि विमल कुमार अभी-भी कभी-कभी स्तरीय कविता लिख डालते हैं, लेकिन कुल मिलाकर आपको जब आज के महत्वपूर्ण कवियों के नाम याद आते हैं तो स्वत:स्फूर्त ढंग से विमल कुमार उनमें नहीं होते. उनकी कविता में उच्चावचन और झोल औसत से ज़्यादा हैं.
1992 के बाद भी संजय चतुर्वेदी की ‘पतंग’ मैं कई बार पढ़ चुका हूं और उसमें अब भी इतना आकर्षण है कि भविष्य में भी पढ़ता रहूंगा. कथ्य, भाषा, शिल्प, लय और संगीत में उसे मैं हिंदी की उत्कृष्ट कविताओं में शुमार करता हूं- प्रतिबद्ध विवेकशील विश्वचेतना का यह विरला उदाहरण है. सात वर्ष बाद 'उर्वर प्रदेश' में सहप्रकाशित उनकी कविता 'संकेत' भी 'पतंग' की परंपरा में ही रखी जाएगी. संजय चतुर्वेदी ने इन वर्षों में पर्याप्त लिखा है, लेकिन वे एक अमर्ष, एक 'हुब्रिस' में अपना काव्य-संग्रह प्रकाशित करने से इन्कार कर रहे हैं. दरअसल वे हिंदी की साहित्य-संस्कृति के पतन और मार्क्सवादी-रूपवादी खेमों के नैतिक ह्रास से असामान्य रूप से क्रुद्ध हैं - जिसके लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता - और अपनी भयावह हास्य-व्यंग्य भरी कविताओं में दोनों पर अपनी लानत भेजते रहे हैं - उससे भी एतराज़ नहीं हो सकता - लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा प्रतीत होने लगा है कि वे अपने क्रोध और घृणा को ही एक स्थायी या दीर्घावधि काव्य-प्रेरणा बना बैठे हैं और इस तरह अपनी असंदिग्ध काव्य-प्रतिभा को अब अकारण नकारात्मक ढंग से सीमित कर रहे हैं. उनसे कोई यह नहीं कह रहा है कि वे अपना क्रोध भूल जाएं लेकिन 'पतंग', 'संकेत' और इस तरह की अन्य कविताओं के सार्थकतर संसार में अवश्य लौटें.
नीलेश रघुवंशी की ही कविता 'संतान सातें' को यदि मैं 1997 के पुरस्कार के लिए चुन पाता तो मुझे और ख़ुशी होती क्योंकि संजय चतुर्वेदी की 'पतंग' की तरह जब भी मैं उसे पढ़ता हूं तो विचलित हुए बिना नहीं रहता. लेकिन 'संतान सातें' 1995 में प्रकाशित हुई थी और मैं 1996 में निर्णायक नहीं था. फिर भी 1996 में प्रकाशित अन्य पात्र कवियों की रचनाओं के साथ नीलेश रघुवंशी की कविता 'हंडा' को पढ़कर मुझे कोई संदेह न रहा कि इस युवा प्रतिभावान कवयित्री की वह रचना वर्ष की श्रेष्ठ कविता थी. उसकी मार्मिक सादगी प्राण है. नीलेश रघुवंशी भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार के कुछ पहले ही अपनी पहचान बना चुकी थीं और अगर मैं ग़लत नहीं हूं, तो उनकी पहली पांडुलिपि पुरस्कार से पहले ही स्वीकृत हो चुकी थी. बहरहाल, अब उन्होंने मात्र कवयित्रियों के बीच नहीं, समसामयिक हिंदी कविता में अपनी जगह हासिल कर ली है. उनका विकास देखकर आश्वस्ति और ख़ुशी होती है और उसमें कोई अवरोध भी नज़र नहीं आ रहा.
युवा प्रतिभाओं को दिए जाने वाले पुरस्कारों से वे साहित्य में स्थापित होती हैं या नहीं- यानी क्या ऐसे पुरस्कार ही उनके कैरियर में एक प्रारंभिक केंद्रीय भूमिका निभाते हैं - इस पर बहस हो सकती है. यदि पुरस्कार ही लेखकों को बनाते-मिटाते तो फिर ऐसा क्यों होता कि जिन श्रेष्ठ रचनाकारों को ऐसे कोई भी पुरस्कार नहीं मिले, या एकाध ही मिला, उनकी संख्या पुरस्कृत रचनाकारों से हमेशा ज़्यादा रही? कई कवि तो भारतभूषण पुरस्कार की स्थापना से पहले ही स्थापित हो चुके थे. आलोकधन्वा, असद ज़ैदी, मंगलेश डबराल, गिरधर राठी, राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल, अजीत चौधरी, सत्यपाल सहगल, नरेंद्र जैन, कात्यायनी, अनिता वर्मा, सविता सिंह आदि अनेक कवि-कवयित्रियों को अनेक कारणों से यह पुरस्कार नहीं मिला. 'निराला' को उनके जीवन-काल में और मुक्तिबोध को मरणोपरांत साहित्य अकादेमी पुरस्कार नहीं दिया गया, तो क्या वे उसके मोहताज हैं? दरअसल पुरस्कार तभी प्रतिष्ठा पाते हैं जब वे सुपात्रों को दिए जाते हैं और तभी वे उस प्रकाश को अगले पुरस्कृत व्यक्तियों पर परावर्तित करते हैं. पुरस्कारदाताओं को अपने महत्व के बारे में अत्यधिक भ्रम नहीं पालने चाहिए. यदि निर्णायक निर्लज्ज नहीं हुए हैं और उन्हें अपनी इज़्ज़त, यदि वह है तो, का ज़रा भी ख़याल है, तो अच्छा पुरस्कार देकर स्वयं उन्हें प्रतिष्ठा-सुख और गर्व होता है.
जहां तक मेरी जानकारी है, आर. चेतनक्रांति ने 2002 के पुरस्कार के बहुत पहले कविताएं लिखना शुरू नहीं किया था लेकिन जो भी उनकी रचनाएं पत्रिकाओं में प्रकाश्ति हुई थी, उन्होंने मुझ-सरीखे पाठकों का ध्यान आकर्षित किया था. चेतनक्रांति की सिर्फ़ 'सीलमपुर की लड़कियां' पुरस्कार-योग्य नहीं थी - उनकी कुछ दूसरी कविताएं भी उसकी पात्र हो सकती थीं लेकिन यह कविता हिंदी में दिल्ली की ऐसी भौगोलिकी और संस्कृति लेकर आई, और कवि की अपनी भाषा और शिल्प, कि उसे ही श्रेष्ठ मानना पड़ा. उसके बाद भी मैं चेतनक्रांति के कृतित्व और विकास से आकर्षित होता रहा हूं और मुझे उन्होंने किसी आशंका या पछतावे में नहीं डाला है, बल्कि मैं यह भी कहना चाहूंगा कि उनकी कविताओं की एक निजी पहचान बन चुकी है. वे एक ठेठ भाषा-शैली की ठोस, निर्भीक रचनाएं हैं.
गीत चतुर्वेदी भी उन युवा कवियों में हैं जिनकी रचनाएं मुझ सरीखे निर्णायक के सामने चुनाव का संकट खड़ा करती हैं. उन्होंने जबसे प्रकाशित होना शुरू किया है, तब से अपने स्तर को शर्मिंदा करने वाली बहुत कम कविताएं लिखी होंगी. उनकी पुरस्कृत रचना 'मदर इंडिया' (प्र.व. 2006) का शीर्षक पाठक को एक शोर-शराबे और राजनीतिक व्यंग्य आदि से लबरेज़ कविता की आशंका से भर देता है लेकिन वह एक अलग मार्मिकता और नश्तर को लेकर आती है. आज का युवा कवि दीन-दुनिया के एक या कुछ ही पक्षों को नहीं देख रहा, बल्कि मानव-अस्तित्व और अस्तित्व-मात्र के लगभग सभी पहलुओं को छूने की कोशिश कर रहा है और इस वजह से उसकी प्रतिबद्धता व्यापकतर, जटिलतर होती जाती है. गीत जैसे कवियों को कीलित करना कठिन है.
निर्णायकों को अपने चुनाव पर टिप्पणी देनी होती है और विनोद भारद्वाज की कविता को मैंने ''गहरी सामाजिक टिप्पणी, असंदिग्ध प्रतिबद्धता, बहुआयामी दृष्टि तथा भाषा एवं शिल्प पर विलक्षण नियंत्रण'' के लिए श्रेष्ठ माना था. उसके बाद मेरी प्रशस्तियां कुछ और सविस्तार होती गईं और सभी अपने अविकल रूप में पाठकों के लिए उपलब्ध हैं. इनमें निर्णायक की संस्तुति और तर्क तथा कैफि़यत शामिल हैं.
किसी पुरस्कार का निर्णायक-मंडल यदि सामूहिक फ़ैसला नहीं देता और उसका प्रत्येक सदस्य स्वायत्त होता है तो एक अघोषित, अलिखित शिष्टाचार यह रहता है कि वह दूसरों के फ़ैसलों पर कोई ज़ाहिरा प्रतिकूल टिप्पणी न करे. वैसा मैंने अब तक नहीं किया है. लेकिन एक कवि, समीक्षक और पाठक के नाते, जैसा भी मैं होने के लिए अभिशप्त हूं, यह मेरा अधिकार है कि दूसरे निर्णायकों के चुनाव पर अपनी राय रखूं. यदि मैं उसे स्याह-सुफ़ैद में दर्ज करने जा रहा हूं तो शायद इसे विश्वासघात, अमानत में ख़यानत, 'वनअपमैनशिप', अतिरिक्त होशियारी और चतुराई, शेष निर्णायकों की अवमानना आदि कहकर उसकी सही या ग़लत भर्त्सना की जा सकती है. निर्णायक-मंडल के शेष सदस्य और पुरस्कार के नियामक कोई सख़्त कार्रवाई भी कर सकते हैं. लेकिन जिस पुरस्कार को चलते हुए तीस वर्ष हो चुके, जो हिंदी में प्रतिष्ठित हो चुका, उसके बारे में एक निर्णायक की निजी राय आखि़र उसे कितनी क्षति पहुंचा सकती है? आशंका तो अधिक यही है कि उस निर्णायक की कुख्याति में ही कुछ इज़ाफ़ा हो जाए. यदि शेष निर्णायक में से कोई भी एक 'अभद्र', 'गरिमाहीन' बहस में न पड़ना चाहे तो अलग बात है वर्ना तीस वर्ष एक मुक्त चर्चा के लिए पर्याप्त माने जाने चाहिए- मुझसे असहमत होने का अधिकार उनसे कौन छीन सकता है?
बहरहाल, मैं पहले (अशोक वाजपेयी/अरुण कमल/1980) पुरस्कार से ही असहमत था. आज 1979 में प्रकाशित 35 वर्ष से कम आयु के कवियों की रचनाओं को याद कर पाना असंभव-सा है लेकिन 'उर्वर प्रदेश' उस वर्ष की सामान्य अच्छी कविता ही लगी थी, विशिष्ट नहीं. आज भी वह शायद इस पुरस्कार के कारण ही उल्लेख्य है. उनके संग्रह 'नए इलाक़े में' की कविताओं में मुझे एक मार्मिक, नए अरुण कमल दिखाई दिए थे लेकिन उसके पहले और बाद के संग्रहों में उनकी कविताएं 'उर्वर प्रदेश' की सामान्य अच्छी ज़मीन की ही लगती हैं. यह मालूम करना मुश्किल है कि आज कवि के रूप में उनकी वास्तविक प्रतिष्ठा क्या है. अशोक वाजपेयी ने अगले चार पुरस्कार गगन गिल, तेजी ग्रोवर, शिरीष ढोबले और गिरिराज किराडू की कविताओं को दिए. गगन गिल की पुरस्कृत कविता 'एक दिन लौटेगी लड़की' निस्संदेह तब तक महिला कवियों में एक नया निर्मम तेवर, अमर्ष, विद्रोह और बेबाकी लेकर आई थी. यह कहे जाने पर कि महादेवी के बाद ऐसी अलग, सशक्त अभिव्यक्ति पहली बार देखी गई, बहुत शोर भी मचा था. लेकिन उसके बाद शायद 'आधुनिकता', 'आंतरिकता', बौद्ध और सूफ़ी प्रभावों के कारण उनकी कविता बदल गई और अब वह इतनी निजी, अंतर्मुख और 'मिस्टिक' हो चुकी है कि कविता से वृहत्तर उम्मीद रखने वाले मुझ जैसे पाठकों के लिए वह एक ऐसी पहेली बन गई है जिसे हल करने की लालसा ही नहीं होती. तेजी ग्रोवर और गिरिराज किराडू की पुरस्कृत कविताओं में गगन गिल की प्रवृत्तियों की ही आधुनिकतर प्रयोगधर्मिता है और गहन शब्दों, बिंबों, शैलीगत नवाचारों से काव्यरव पैदा करने की दुहरावग्रस्त कोशिश है किंतु अंतत: वे कविताएं न कुछ कह पाती हैं और न कोई प्रभाव छोड़ती हैं, यद्यपि दोनों ने इनसे अलग, और मुझे लगता है कि बेहतर, कविताएं भी लिखी हैं. यह समझ में नहीं आता कि जिस तरह की अर्थहीन कविताएं अब यूरोप, और विशेषत: फ्रांस, तक में भी नहीं लिखी जा रही हैं उनमें हमारे ऐसे कवि अपनी प्रतिभा क्यों नष्ट कर रहे हैं. शिरीष ढोबले की कविता 'प्रदक्षिणा है यह' अपने भक्तिवाद-रहस्यवाद से स्वयं ही रोमांचित है और आत्माभिनंदन कर रही है तो पाठक भी उन्हें उनके स्तोत्रों की प्रयोजनहीनता पर छोड़ रहा है. अशोक वाजपेयी की ऐसी कविताओं की प्रशस्तियां इन्हीं का एक हास्यास्पद उपोत्पाद लगती हैं और अपने निरर्थक वाग्जाल में उस असंभव ऑक्टोपस की तरह हैं जिसने स्वयं किसी तरह अपनी भुजाओं में गांठ बांध लेने में सफलता प्राप्त कर ली है. यतीन्द्र मिश्र की 'बारामासा' 2004 की श्रेष्ठ कविता थी या नहीं इस पर मतभेद की गुंजाइश है फिर भी वह इतनी सार्थक तो है कि अपने निर्णायक का उद्धार कर सकी. दरअसल यतीन्द्र मिश्र पहले साधारण कवि ही थे लेकिन समय रहते संभल गए और अब उनमें हिंदी कविता की सकारात्मक मुख्यधारा में शामिल होने के कुछ लक्षण दिखाई दे रहे हैं.
यतीन्द्र मिश्र सरीखा आत्मोद्धार उदय प्रकाश (केदारनाथ सिंह/1981) ने अपने संग्रह 'रात में हारमोनियम' की कविताओं में और उसके बाद करने की कोशिश की लेकिन तब तक इतनी देर हो चुकी थी कि वे रघुवीर सहाय, उनकी समवर्ती तथा परवर्ती पीढि़यों की मुख्यधारा कविता का अनुकरण करके ही कवि होने का कुछ आभास दे पा रहे हैं वर्ना उनकी 'तिब्बत' को श्रेष्ठ तो क्या, कविता भी मान पाना कठिन है. यही हाल उनकी 'सुनो कारीगर' और 'अबूतर कबूतर' की कथित कविताओं का है. कहानी-लेखन में असाधारण ख्याति और सफलता कमाने के बावजूद कवि के रूप में भी स्वीकृत होने की उनकी त्रासद महत्वाकांक्षा उनसे कविता में अतिलेखन करवा रही है. स्वप्निल श्रीवास्तव की 'ईश्वर बाबू' (1986) किसी भी तरह से 'रामदास' से आगे नहीं जाती और उनकी बाद की कविताएं भी उन्हें प्रमुख कवि माने जाने के विपक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं. बद्री नारायण की कविता 'प्रेमपत्र' (1991) में केवल एक पंक्ति 'बंदिशें प्रेमपत्र पर ही लगाई जाएंगी' को छोड़कर कुछ भी तार्किक नहीं है और वह एक कृत्रिम काव्यात्मकता रचने की कोशिश ही रह जाती है. यह समस्या उनकी बाद की कविताओं में भी मौजूद है - कभी वे भाषा, कभी कथ्य और कभी शिल्प को पूर्णरूपेण निबाह नहीं पाते और कभी भवानीप्रसाद मिश्र-केदारनाथ सिंह की पाठक को शामिल-संबोधित करने वाली 'पेटेंट' शैली में बचकाना हो जाते हैं. भाषा की कुछ भूलें भी उनसे होती हैं लेकिन यह मर्ज़ इधर के हुड़ुकलुल्लू-मार्का युवा लेखन में वबा का दर्जा हासिल कर चुका है. आप किसी भी प्रदेश, क्षेत्र या बोली से आते हों, यदि हिंदी में लिखने की महत्वाकांक्षा है तो पहले सही ज़ुबान आनी चाहिए. हिंदी में आंचलिक बोलियों और उनके व्याकरणों का अनावश्यक, दिग्भ्रमित, छौंक-बघार भी भर्त्सना और विरोध का विषय है. अनामिका की कविता 'अनुवाद' एक युक्ति ('डिवाइस') या 'कंसीट' से प्रेरित है - लोगों के बीच की दूरी उन्हें अंग्रेज़ी शब्द 'स्पेस' का स्मरण दिलाती है ('डिस्टैंस' का नहीं, जबकि 'स्पेस' चाहना पाश्चात्य जगत में एक सकारात्मक मांग है) और उसका हिंदी अनुवाद वे 'विस्तार' के बजाय 'अंतरिक्ष' करना चाहती हैं. विडंबना यह है कि 'स्पेस' का अर्थ 'विस्त’र' होता ही नहीं. अब 'अंतरिक्ष' शब्द कविता में एक ऐसी उड़नतश्तरी ले आता है जो फिर उसमें नहीं लौटती - कवयित्री को याद नहीं आता कि वह 'फ़्लाइंग सॉसर' का अनुवाद है. तीसरा चरण कविता की 'थीम' से नितांत असंबद्ध है, उसे वहां होना ही नहीं चाहिए था. अब चूंकि कवयित्री को गिरस्ती की चीज़ों का 'अनुवाद' करना है, तो बिना किन्हीं तार्किक सोपानों के कविता 'ख़ाली घर' में प्रवेश करती है, हालांकि 'स्पेस' का एक अनुवाद 'ख़ला' भी हो सकता है यह कवयित्री को नहीं सूझा. फिर वह 'उतरनों' का अनुवाद जल की भाषा में, प्लेटों का पंखुडि़यों में, सिंक का राग में, घर का किसी और भाषा में, शाम का पर्दे खोलने में और 'स्पेस' का 'विस्तार' में करना चाहती हैं. अनामिका जिसे 'अनुवाद' कहती हैं, वह दरअसल 'रूपांतरण' ('ट्रांस्फॉर्मेशन'), 'पुनर्सृजन' ('ट्रांस्क्रिएशन') या 'कायांतरण' ('मेटामॉर्फा़सिस') है, 'तर्जुमा' ('ट्रांस्लेशन') नहीं. उनकी अधिकांश कविताओं में समस्या यह है कि उनकी काव्य-अवधारणा एक रूमानी किशोरसुलभ नाज़-ओ-अंदाज़ से आगे नहीं जा सकी है और उनकी भाषा और शैली को वात्सल्य-कामना में क़ैद किए हुए है जिसमें वयस्कता का चेतन-अवचेतन नकार है. हेमंत कुकरेती की 'सिलबट्टा' (2001) अपने विषय की तरह ही ग़ैर-रूमानी, मूर्त और ठोस है. उसकी कई पीढि़यां, परंपराएं, कहानियां और संस्करण हैं, उसका एक अंश हमारे शरीर के रक्त-लवण में बहता है. हेमंत कुकरेती ने लगातार अच्छी कविताएं ही लिखी हैं और यदि वे अपने से कुछ वरिष्ठ या अपने समवयस्कों से बेहतर नहीं तो निस्संदेह उनके समकक्ष हैं, लेकिन हिंदी में उन्हें वह तवज्जो और स्वीकृति नहीं दी जा रही है जिसके वे पात्र हैं. केदारनाथ सिंह द्वारा उन्हें पुरस्कृत किया जाना न केवल उचित था, बल्कि आवश्यक भी था और समयोचित. दुर्भाग्यवश, जितेंद्र श्रीवास्तव की कविता 'ज़रूर जाऊंगा कलकत्ता' (2006) और उनके कवि को लेकर ऐसा कह पाना मेरे लिए संभव नहीं है. कलकत्ते की गाड़ी में बैठे हुए कवि का यह संकल्प ही पुनरुक्तिदोषग्रस्त है, जब तक कि विदाउट टिकट होने के कारण कोई टीटी उन्हें उतारने की धमकी न दे रहा हो. बहरहाल, हिंदी के 'अदना-सा कवि' को 'अपने मिर्जा़ ग़ालिब' की कलकत्ता-यात्रा याद आती है जिससे वे 'ज़ेहन में आधुनिकता लेकर' लौटे थे. यहीं से कवि का ग़ालिब, उनकी दिल्ली और तत्कालीन कलकत्ता का अज्ञान उरियां होने लगता है. ग़ालिब को कलकत्ता गए अभी दो सौ वर्ष भी नहीं हुए हैं - 'सैकड़ों साल' का प्रश्न ही नहीं उठता. 'आधुनिकता' के लिए ग़ालिब कलकत्ता के मुहताज न थे, 'नयी रोशनी' उनमें पहले ही बहुत थी. यदि कलकत्ता उस वक़्त महानगर था तो दिल्ली भी मुग़लिया दारुलसल्तनत थी. जितेंद्र श्रीवास्तव उस ज़माने के कलकत्ता के अख़बारों को देखें जिनमें 'जादुई विज्ञापन' छपने लगे थे. उन्हें यह भी मालूम नहीं है कि उनके मिर्जा़ ग़ालिब कलकत्ते को दिल दे बैठे थे - कलकत्ते का जि़क्र ही उनके सीने पर एक तीर-सा मार देता था और वे हाय-हाय कर उठते थे. इस तरह की कोई भी कविता काव्य-नायक की जीवनी पढ़े बग़ैर लिखी ही नहीं जानी चाहिए. यह कल्पना करना कठिन है (या शायद नहीं भी है) कि केदारनाथ सिंह ने, जो हिंदी में ग़ालिब के सबसे आधिकारिक मुरीद हैं, क्योंकर इस बोगस रूमानियत से भरी कविता को पुरस्कृत किया. जितेंद्र श्रीवास्तव के नये संग्रह में भी बमुश्किलतमाम दो छोटी कविताएं कुछ सलीक़े की हैं.
नामवर सिंह द्वारा अपने पहले पुरस्कार को दिवंगत शरद बिल्लौरे की कविता 'तय तो यही हुआ था' (1983) को दिया जाना एक तरह की अपराध-बोध-जन्य क्षतिपूर्ति थी लेकिन राजा शिबि की पुराकथा से प्रेरित यह छोटी कविता वाक़ई मिथक के बेहतरीन इस्तेमाल, उसे समसामयिकता देने की सिफ़अत, त्रासद मर्मांतक नैतिकता तथा मितकथन का एक सबक़ है. उसकी प्रासंगिकता, जो अब तक बनी हुई है और बनी रहेगी, इसमें भी है कि आज के युवा कवियों में से बहुत कम अपने या विश्व के अन्य मिथकों को जानते हैं जो किसी भी कविता का एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व है. पश्चदृष्टि से इस संयोग पर सुखद आश्चर्य होता है कि नामवर सिंह का दूसरा निर्णय भी एक मिथक-प्रेरित कविता, देवीप्रसाद मिश्र (1988) की 'प्रार्थना के शिल्प में नहीं', के पक्ष में गया था जो मिथक की पुष्टि या अनुमोदन नहीं करती बल्कि अपने निहितार्थ में मात्र वैदिक देवमाला को ही नहीं, बल्कि सारी सत्ताओं पर आरूढ़ समस्त आराध्यों, देवदूतों, पैग़म्बरों, धर्माधिकारियों, महंतों और मठाचार्यों को हट जाने की चुनौती देती है. हिंदी में शायद अपनी तरह की यह पहली कविता थी, यद्यपि उसके पहले भी देवीप्रसाद मिश्र विलक्षण कविताएं लिख चुके थे और अब तक कुछ सार्थक और जटिल प्रयोग कर रहे हैं जिन्हें सराहने और विश्लेषित करने की क़ूवत अधिकांश हिंदी काव्यालोचन में नहीं है. इन दो अनिंद्य निर्णयों के बाद नामवर सिंह ने जिन चार कवियों : अनिल कुमार सिंह /'अयोध्या 1991'/ 1993, संजय कुंदन/'अजनबी शहर में'/1998, सुंदरचंद ठाकुर/'कविता के मुक्तिबोधों का समय नहीं यह'/2003 तथा निशांत/'अट्ठाइस साल की उम्र में'/2008 : को सम्मानित किया उनमें अनिल कुमार सिंह और निशांत की कविताएं निराश ही करती हैं. अयोध्या की 'मानवता' की थीम बुरी न थी, लेकिन वहां जो 1992 में होने दिया गया, उसकी भयावहता को वह न तो कम कर पाई है और न समझा सकी है. राक्षसों और नरभक्षियों के हवाले अयोध्या हुई कैसे? एक भोली भावुकता के पीछे राजनीतिक जागरूकता के अभाव को छिपाया नहीं जा सकता. अपनी बाद की कविताओं में भी अनिल कुमार सिंह अपनी कोई पहचान नहीं बना पाए हैं. उधर निशांत का आत्ममुग्ध कवि अट्ठाइस साल की उम्र के कवि को 'लड़का' कह रहा है जिसके सपने में एक पवित्र सुर्ख़ लाल गुलाब लहलहा रहा है, इस बहुत ही महत्वपूर्ण उम्र में उसके दिल से सच्ची प्रार्थना निकल रही है, उसका मन हल्का पारदर्शी और पवित्र है, लेकिन वह धूमिल, धर्मवीर भारती और अकविता के बीच दिग्भ्रमित हो रहा है. उनकी दूसरी कविताएं भी अपनी अतिसामान्यता के कारण ही उल्लेखनीय हैं. संजय कुंदन की समस्या यह है कि वह अच्छी या बेहतर कविताएं लिखने में सक्षम हैं लेकिन अक्सर शिल्प को लेकर सावधानी बरतने में कोताही कर जाते हैं. सिरहाने एक लोटा जल पड़ा कैसे रहता है? यह जल, नदी का सपना तथा स्मृति का सोता न तो कविता में अर्थ पाते हैं और न लौटते हैं तथा बाज़ार में बौने होते रुपये से उनका न तो कोई सामंजस्य है और न तनाव. पहली चार पंक्तियां शेष कविता से नितांत असंबद्ध हैं और उन्हें हटाकर पढि़ए, तो कविता कुछ निखर भी आती है. सुंदरचंद ठाकुर की कविता अभिव्यक्ति के ख़तरों की ही नहीं, अभिव्यक्तिमात्र की समस्याओं को अभिव्यक्ति देती है. एक ओर कवि का समष्टिबोध है, दूसरी ओर उसकी निजी जि़दंगी और भाषा हैं, अभिव्यक्ति का संकट, उसकी चुनौतियां जटिलतर होते जाते हैं लेकिन न्यस्त स्वार्थों वाले आलोचक कहते हैं यह मुक्तिबोधों का समय नहीं, मुक्तिबोध अब संभव नहीं, सरल कविता लाओ, जटिल को निष्कासित करो. आश्चर्य यही है कि स्वयं ऐसे आलोचक ने इस कविता को श्रेष्ठ कैसे माना? जो हो, सुंदरचंद ठाकुर ने अब तक अपने पाठकों की उम्मीद की हिफ़ाज़त की है और अपने व्यक्तित्व को अपने कवित्व में विकसित किया है.
दिवंगत नेमिजी ने अपना पहला निर्णय राजेंद्र धोड़पकर की कविता 'अंतिम आदमी' (1984) के पक्ष में दिया था. हाशिये पर धकेल दिए गए एकाकी आदमी पर यह पहली कविता नहीं थी और न अंतिम. आखि़री पंक्ति का नैराश्यपूर्ण अंत कुछ आकस्मिक लगता है जिसका औचित्य पूर्वगामी पंक्तियों में दिखाई नहीं देता. राजेंद्र धोड़पकर ने कविताएं लिखना बंद क्यों कर दिया यह एक रहस्य है, लेकिन वह एक आदर-भाव जगाता है. हिंदी में बीसियों ऐसे कवि हैं जिन्हें कविता लिखने से पहले ही लिखना बंद कर देना चाहिए था. नेमिजी का कुमार अंबुज की कविता 'किवाड़' (1989) को पुरस्कृत करने का भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार के इतिहास में वही स्थान है जो उससे एक वर्ष पहले नामवर सिंह द्वारा देवीप्रसाद मिश्र की कविता को चुने जाने का है. अपनी धोखादेह सादगी, मितभाषिता, वसाहीनता और अर्थबाहुल्य में वह बेजोड़ है. पिछले बीस वर्षों में कुमार अंबुज ने हिंदी कविता में अपना स्थान अर्जित कर लिया है और उनका कवि होना विवादातीत है. जब 1994 में पंकज चतुर्वेदी की कविता 'एक संपूर्णता के लिए' पुरस्कृत हुई, तब से अब तक शायद वे ऐसे सबसे कमउम्र सम्मानित कवि का कीर्तिमान धारण किए हुए हैं. 1999 के 'उर्वर प्रदेश' में प्रकाशित यह और दूसरी कविता 'उसने कहा था' कवि-कर्म की त्रासदी और जोखिमों के बारे में है. पुरस्कृत कविता के पहले तीन चरणों में पर्याप्त काव्योचित परोक्षता है लेकिन अंतिम चरण उसे अचानक सामान्य बना देता है क्योंकि उसमें एक विचित्र दैन्य और पलायन है. अपने कवि होने का अहसास बार-बार पंकज चतुर्वेदी की कविताओं में आता है और शायद वही कवि के रूप में उनके तत्काल पहचाने जाने के मार्ग में एक बाधा है. बोधिसत्व की कविता 'पागलदास' (1999) एक सहज प्रश्न के उत्तर की तलाश में एक आरोपित उत्कंठा तथा असमंजस की जासूसी कहानी बन जाती है जिसमें आधी पंक्तियां सिर्फ़ एक तूमार बांधने के लिए हैं. पागलदास की मृत्यु/हत्या का आख्यान निस्संदेह भयावह और मार्मिक हो सकता था लेकिन दो पागलदासों का निर्माण कर और यह दो-टूक न बताकर कि कौन-से अन्याय और असत्य के विरुद्ध वे सक्रिय थे और उनके हत्यारे कौन थे - पागलदास 'रामदास' या 'ईश्वर बाबू' की तरह एक प्रतीक-पात्र न थे - बोधिसत्व अपनी कविता को कुंद और भावनिक ('सेन्टिमेंटल') बनाते हैं. यह भावविह्वलता उनकी अन्य कविताओं में भी देखी जा सकती है और 'स्त्री को देखना' कविता की पंक्तियां ''उसको चिता में जलाकर देखो/ दिखेगी तब भी नहीं'' अपनी विकृति ('मॉर्बिडिटी') में भयावह है. प्रेमरंजन अनिमेष की पुरस्कृत कविता 'इक्कीसवीं सदी की सुबह झाड़ू देती एक स्त्री' के शीर्षक में एक मार्मिक व्यंग्य है. अंग्रेज़ी में बुहारने की क्रिया से 'स्वीपिंग' और 'स्वीप' संज्ञाएं बनती हैं और अनिमेष की कविता में 'स्वीप' तो अच्छा है, यदि वह कम 'स्वीपिंग' होती तो बेहतर होती. उनकी 'पचीस साल के नौजवान का बयान' कविता को निशांत की कविता 'अट्ठाइस साल की उम्र में' के बरक्स रखिए - यह जानने में देर न लगेगी कि अनिमेष की कविता सार्थकतर क्यों है. लेकिन यदि वे 'पायदान पर बचपन' सरीखी बेहतरीन कविता और अधिक लिखें तो स्वयं उनके और हिंदी के लिए बहुत श्रेयस्कर होगा.
भारतभूषण अग्रवाल स्मृति कविता पुरस्कार के प्रथम आदाता और पिछले तीस वर्षों में ख्यातिलब्ध कवि तथा अब निर्णायक-मंडल के नये सदस्य अरुण कमल के पहले निर्णय को लेकर हिंदी में एक आशंकापूर्ण औत्सुक्य था क्योंकि कविता पर जैसा लेखन उन्होंने अधिकांशत: किया है और जिस दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से वे त्रैमासिक 'आलोचना' का संपादन और सामग्री-चयन कर रहे हैं, उससे बहुत आश्वस्ति नहीं होती है. लेकिन मनोज कुमार झा की रचना 'स्थगन' (2009) का चयन कर उन्होंने मुझ-जैसे शंकालुओं को सुखदता से ग़लत सिद्ध किया है. 'स्थगन' पहली बार मां बनने जा रही एक ग्रामीण युवती के बारे में है जो अपने घर-आंगन, क्षेत्र, ऋतु, प्रकृति और वृहत्तर संसार से घिरी हुई है, वायुयान की घरघराहट उसके ऊपर है, उसके गर्भ में एक शिशु विकस रहा है और इन सबकी उपस्थिति के बीच कामना, जीवन और आशा में स्थगित वह कच्चा आम खा रही है. मनोज कुमार झा की कविताओं के बारे में अरुण कमल ने सही लिखा है कि उनकी सामग्री प्राय: गांवों के जीवन से आती है लेकिन अपनी अंतिम निर्मिति में वह विचारप्रवण तथा वैश्विक होती है. इसी क्षमता को मैं प्रतिबद्ध विवेकशील विश्वचेतना कहना चाहता हूं.
सही निर्णय हुए हों या ग़लत, सायास हुए हों या अनायास, यह साफ़ है कि भारतभूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार प्राप्त अधिकांश कवि समसामयिक हिंदी कविता पर किसी भी गंभीर बहस में उल्लिखित होंगे, भले इनमें से कुछ ने ही साहित्य में असंदिग्ध स्थान बनाया हो, कुछ में अब भी विकास की न्यूनाधिक संभावनाएं हों और कुछ से, दुर्भाग्यवश, उम्मीद बहुत कम रह गई हो, हालांकि सृजन-शक्ति कभी भी कोई चमत्कार दिखा सकती है. हम चाहें तो कह सकते हैं कि इनमें से कुछ को इस पुरस्कार ने अपने कवि-अध्यवसाय में ठोस मदद दी होगी और कुछ के लिए यह खद्योत-सम साबित हुआ होगा. दृष्टव्य यह है कि अपने वक्तव्यों में लगभग प्रत्येक कवि ने पुरस्कार का ऋण स्वीकार किया है, भले ही वह औपचारिक भलमनसाहत में ही क्यों न हो. एक अच्छा कवि अपने विरोधाभासों और विडंबनाओं के बावजूद एक नैतिक इंसान होना और दिखना चाहता है. एक सार्थक पुरस्कार तीन कोटियों के व्यक्तियों पर एक नैतिक उत्तरदायित्व और बोझ बनता है - उसके नियामकों पर, निर्णायकों पर और प्राप्तकर्ताओं पर. भारत में आज लाखों और हज़ारों रुपये के सरकारी-ग़ैरसरकारी साहित्यिक पुरस्कारों की संख्या सौ से ऊपर होगी, लेकिन उन्हें देनेवालों, तय करनेवालों और लेनेवालों में से अधिकांश की ईमानदारी और पात्रता में गहरा संदेह है, इसलिए कौन-सा लेखक इनामों से लखपति हो चुका है इसके अलावा चर्चा का कोई मसला ही नहीं है. मुझे लगता है कि भारतभूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार का प्राप्तकर्ता प्रत्येक कवि-कवयित्री उसे एक नैतिक-सर्जनात्मक उत्तरदायित्व की तरह लेता है - पहले तो वह चाहता है कि वह उसे मात्र गुणवत्ता के आधार पर निष्पक्ष निर्वैयक्तिकता से मिले, फिर यह कि यदि वह गुणवत्ता असली है तो वह अपने आगामी कृतित्व और शायद अपने व्यक्तित्व में भी उसी गुणवत्ता को यदि विकसित न कर पाए तो भी उस स्तर पर बनाए रखे. साहित्यिक बिरादरी भी हर ऐसे पुरस्कार पर नज़र रखती है - उसे रखनी चाहिए. मुझे लगता है कि अपने तीस वर्षों के अस्तित्व में भारतभूषण अग्रवाल स्मृति कविता पुरस्कार और उसके प्राप्तकर्ता इन कठिन शर्तों को अधिकांशत: निभा पाए हैं. इसके अलावा किसी पुरस्कार की सार्थकता व महत्ता और क्या हो सकती है?
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शहरनामा : १ : लखनऊ
3:12 pm
( बहुत तकलीफ के साथ आलोकधन्वा ने अपनी कविता सफ़ेद रात में यह दर्ज किया था : लखनऊ में बहुत कम बच रहा है लखनऊ/इलाहाबाद में बहुत कम इलाहाबाद/ कानपुर और बनारस और पटना और अलीगढ़/अब इन्हीं शहरों में/कई तरह की हिंसा कई तरह के बाज़ार/कई तरह के सौदाई/इनके भीतर इनके आसपास/इनसे बहुत दूर बम्बई हैदराबाद अमृतसर/और श्रीनगर तक/हिंसा/और हिंसा की तैयारी...यह हानि-बोध हमारे शहरी जीवन के अनुभव के अत्यन्त निकट है। कुछ ठहरकर सोचने पर लगता है कि इन तमाम शहरों का अपना अतीत और वैभव उनसे छूट रहा है। यह आदमी की तरफ से शहर के ख़िलाफ़ की गई सबसे क्रूरतम कार्रवाई की वजह से हुआ है। इसलिए कुंवर नारायण जब यह कहते हैं कि अब आदमी ही नहीं शहर की तरफ से भी सोचना होगा, तो वह शहर को उसकी गरिमा और वैभव सौंपने जैसी बात लगती है। शहर को यह गरिमा कवि-लेखक ही सौंप सकते हैं। सबद पर शहरनामा नामक इस स्तम्भ को शुरू करने के पीछे की मंशा यही है। हम शहरों को उनके अतीत और आज में याद और ज़ज्ब करके उनके प्रति कुछ हद तक सहिष्णु बन सके, तो हमारे आदमीनामे में भी इससे कुछ गरिमा ज़रूर लौट आएगी। शहरनामा की पहली पेशकश में हम कुंवरजी की ही उनके अपने शहर लखनऊ पर लिखी कविता दे रहे हैं। लखनऊ को नवाबी शानो-शौकत का बखान करती इतिहास की पोथियों से कहीं ज़्यादा संजीदगी से सरशार और शरर, मजाज़ और मिर्ज़ा रुस्वा, सरदार जाफ़री, कुंवर नारायण और मनोहरश्याम जोशी के ज़रिये जाना जा सकता है। हम हर बार किसी एक कवि-लेखक का शहर विशेष के बारे में गद्य-पद्य देंगे। कुंवरजी ने नेह के नाते इस कविता का इस्तेमाल करने की हमें अनुमति दी, हम इसके लिए उनके आभारी हैं। शहर केंद्रित एक अन्य आयोजन भी इससे पूर्व सबद पर संभव हुआ है। पर विधिवत शुरुआत इसे ही माना जाए। नीचे लखनऊ का एक विहंगम दृश्य और इसी शीर्षक से कुंवर नारायण की कविता। )

लखनऊ
किसी नौजवान के जवान तरीकों पर त्योरियां चढ़ाये
एक टूटी आरामकुर्सी पर
अधलेटे
अधमरे बूढे-सा खांसता हुआ लखनऊ।
काफ़ी-हाउस, हज़रतगंज, अमीनाबाद और चौक तक
चार तहजीबों में बँटा हुआ लखनऊ।
बिना बात बात-बात पर बहस करते हुए-
एक-दूसरे से ऊबे हुए मगर एक-दूसरे को सहते हुए-
एक-दूसरे से बचते हुए मगर एक-दूसरे से टकराते हुए-
ग़म पीते हुए और ग़म खाते हुए-
ज़िन्दगी के लिए तरसते कुछ मरे हुए नौजवानोंवाला लखनऊ।
नई शामे-अवध--
दस सेकंड में समझाने-समझनेवाली किसी बात को
करीब दो घंटे की बहस के बाद समझा-समझाया,
अपनी सरपट दौड़ती अक्ल को
किसी बे-अक्ल की समझ के छकड़े में जोतकर
हज़रतगंज की सड़क पर दौड़ा-दौड़ाकर थकाया,
ख्वाहिशों की जगह बहसों से काम चलाया,
और शामे-अवध को शामते-अवध की तरह बिताया।
बाज़ार-
जहाँ ज़रूरतों का दम घुटता है,
बाज़ार-
जहाँ भीड़ का एक युग चलता है,
सड़कें-
जिन पर जगह नहीं,
भागाभाग-
जिसकी वजह नहीं,
महज एक बे-रौनक आना-जाना,
यह है- शहर का बिसातखाना।
किसी मुर्दा शानोशौकत की कब्र-सा,
किसी बेवा के सब्र-सा,
जर्जर गुम्बदों के ऊपर
अवध की उदास शामों का शामियाना थामे,
किसी तवाइफ की ग़ज़ल-सा
हर आनेवाला दिन किसी बीते हुए कल-सा,
कमान-कमर नवाब के झुके हुए
शरीफ़ आदाब-सा लखनऊ,
खण्डहरों में सिसकते किसी बेगम के शबाब-सा लखनऊ,
बारीक़ मलमल पर कढ़ी हुई बारीकियों की तरह
इस शहर की कमज़ोर नफासत,
नवाबी ज़माने की ज़नानी अदाओं में
किसी मनचले को रिझाने के लिए
कव्वालियाँ गाती हुई नज़ाकत :
किसी मरीज़ की तरह नई ज़िन्दगी के लिए तरसता,
सरशार और मजाज़ का लखनऊ,
किसी शौकीन और हाय किसी बेनियाज़ का लखनऊ :
यही है किब्ला
हमारा और आपका लखनऊ।
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लखनऊ
किसी नौजवान के जवान तरीकों पर त्योरियां चढ़ाये
एक टूटी आरामकुर्सी पर
अधलेटे
अधमरे बूढे-सा खांसता हुआ लखनऊ।
काफ़ी-हाउस, हज़रतगंज, अमीनाबाद और चौक तक
चार तहजीबों में बँटा हुआ लखनऊ।
बिना बात बात-बात पर बहस करते हुए-
एक-दूसरे से ऊबे हुए मगर एक-दूसरे को सहते हुए-
एक-दूसरे से बचते हुए मगर एक-दूसरे से टकराते हुए-
ग़म पीते हुए और ग़म खाते हुए-
ज़िन्दगी के लिए तरसते कुछ मरे हुए नौजवानोंवाला लखनऊ।
नई शामे-अवध--
दस सेकंड में समझाने-समझनेवाली किसी बात को
करीब दो घंटे की बहस के बाद समझा-समझाया,
अपनी सरपट दौड़ती अक्ल को
किसी बे-अक्ल की समझ के छकड़े में जोतकर
हज़रतगंज की सड़क पर दौड़ा-दौड़ाकर थकाया,
ख्वाहिशों की जगह बहसों से काम चलाया,
और शामे-अवध को शामते-अवध की तरह बिताया।
बाज़ार-
जहाँ ज़रूरतों का दम घुटता है,
बाज़ार-
जहाँ भीड़ का एक युग चलता है,
सड़कें-
जिन पर जगह नहीं,
भागाभाग-
जिसकी वजह नहीं,
महज एक बे-रौनक आना-जाना,
यह है- शहर का बिसातखाना।
किसी मुर्दा शानोशौकत की कब्र-सा,
किसी बेवा के सब्र-सा,
जर्जर गुम्बदों के ऊपर
अवध की उदास शामों का शामियाना थामे,
किसी तवाइफ की ग़ज़ल-सा
हर आनेवाला दिन किसी बीते हुए कल-सा,
कमान-कमर नवाब के झुके हुए
शरीफ़ आदाब-सा लखनऊ,
खण्डहरों में सिसकते किसी बेगम के शबाब-सा लखनऊ,
बारीक़ मलमल पर कढ़ी हुई बारीकियों की तरह
इस शहर की कमज़ोर नफासत,
नवाबी ज़माने की ज़नानी अदाओं में
किसी मनचले को रिझाने के लिए
कव्वालियाँ गाती हुई नज़ाकत :
किसी मरीज़ की तरह नई ज़िन्दगी के लिए तरसता,
सरशार और मजाज़ का लखनऊ,
किसी शौकीन और हाय किसी बेनियाज़ का लखनऊ :
यही है किब्ला
हमारा और आपका लखनऊ।
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