सबद
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कवि कह गया है : ४ : गिरिराज किराड़ू

12:56 pm

जिसका ब्याह काल और अकाल से हो गया हो


''A
plague on both your houses.''
(MERCUTIO in Romeo and Juliet by William Shakespeare)

रोमियो एंड जूलियट शेक्सपीयर का पहला नाटक था जिसमें ट्रेजेडी और कॉमेडी के तत्व एक दूसरे में मिल गए थे. उस से पहले उनके नाटक भी या ट्रेजेडी होते थे या कॉमेडी और सबको, खासकर उस ज़माने के 'यूनिवर्सिटी विट्स' को आसानी रहती थी चीज़ों को समझने में. मर्क्युशियो नामक जिस पात्र के मुँह से यह वाक्य शेक्सपीयर ने कहलवाया है वह रोमियो और जूलियट के परिवारों की खूनी लडाई में एक पक्ष होते हुए भी कोई पक्ष नहीं है. उसे 'वफादारी' के किसी विवरण में गर्क नहीं किया जा सकता. वह मरते हुए कहेगा ही कि 'कहर टूट पड़े तुम्हारे दोनों खानदानों पर'. क्योंकि हिंसा की इस अर्थ-व्यवस्था में किसी एक के मंगल की कामना करना हिंसा के मंगल की कामना है.

कवि मर्क्युशियो की तरह जीते भी शायद हों, मरते तो निश्चय ही उसी की तरह हैं - दोनों घरों को शाप देते हुए.
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जिन लोगों ने शेक्सपीयर इन लव (१९९८) नामक फिल्म देखी है वे और कुछ नहीं तो इस बात के लिए फिर से समकालीन पश्चिम के मुरीद हो सकते हैं कि अब एक कल्चरल आइकन, एक राष्ट्रीय गर्व आदि भी हो चुके शेक्सपीयर के जीवन के बारे में जितनी छूट इस फिल्म में ली गयी (उसे जिस तरह एक ही नाटक के लिए दो लोगों से एडवांस रकम खा जाने वाले, अपने समकालीन नाटककार क्रिस्टोफर मार्लो से नाटकों के प्लाट चुराने वाले आवारागर्द की तरह चित्रित किया गया) उसे लेकर पश्चिम में वैसा कुछ नहीं हुआ जैसा मिसाल के तौर पर कालिदास या गालिब के बारे में कल्पनापूर्ण खेल करने वाले किसी फिल्मकार/लेखक के साथ हमारे यहाँ हो सकता था.

इस फिल्म का शेक्सपीयर एक थियेटर कंपनी से लिए एडवांस से दूसरी कंपनी के अभिनेताओं को 'तोड़' लेता है; उस अभिनेता मंडली का नाम 'एडमिरल'स मैन' है और उनका मुखिया उस ज़माने का सबसे काबिल अभिनेता एडवर्ड एलेन है जो प्रतिद्वन्द्वी क्रिस्टोफर मार्लो के नाटकों में लीड भूमिकायें निभा कर बहुत मकबूल हो गया है. फिल्म में शेक्सपीयर ने सबको झांसा दे रखा है कि वह एक नाटक लिख रहा है जिसका नाम, प्लाट आदि रोज़ रोज़ बदलते रहते हैं सामने खड़े शख्स के हिसाब से. एडवर्ड एलेन को यह झांसा दिया जाता है कि वही लीड रोल, हीरो का रोल करेगा. यह झांसा जरूरी भी है वर्ना एडवर्ड आयेगा ही नहीं. यह वादा किये जाने तक यह बन रही स्क्रिप्ट वैसी ही कॉमेडी है जो शेक्सपीयर के ज़माने में 'फार्मूला' हो गयी थी. बाद में सब बदल जायेगा, पात्रों के नाम, प्लाट, अभिनेताओं की भूमिकाएं. एलेन जो हीरो का रोल करने आया था मर्क्यूशियो का रोल करता है अंततः. जबकि हीरो - रोमियो- की भूमिका खुद शेक्सपीयर करता है.

मर्क्यूशियो मरता है और कॉमेडी ट्रेजेडी के रास्ते चल पड़ती है.

मर्क्यूशियो
, मरता हुआ मर्क्यूशियो जानता है उसका कोई पक्ष नहीं; उसकी भूमिका करता हुआ एडवर्ड जानता है उसका भी कोई पक्ष नहीं, अब वह एक “गौण” अभिनेता (=पात्र) है जिसे एक शाम या एक प्रेम के हैंगओवर में लिखने वाला एक अनचाही भूमिका में, अनचाही वीरगति के, मौत के हवाले कर सकता है, कर देता है. एक कवि (मेरे लिये शेक्सपीयर नाटक लिखते हुए भी कवि ही हैं पारंपरिकों की तरह) के कवित्व की शिनाख्त सिर्फ रोमियो या जूलियट के प्रेम से नहीं, उनकी ट्रेजेडी से नहीं मर्क्यूशियो के साथ हुए अन्याय, एडवर्ड के साथ हुए छल से भी होती है, होनी चाहिये.
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कवि एक बड़ा सा तोता है
जिसे उसके संरक्षक पालते हैं
कई होते हैं वे
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कविता और कवियों से जो प्रत्याशा है - यद्यपि वह एक आत्म-प्रत्याशा, आत्म-छवि ही है हिंदी जैसे पाठक पर्यावरण में - वह चकित करती है. इस समय हिंदी कवि होना एक असंभव ढंग से नैतिक, अस्वाभाविक ढंग से प्रशिक्षित और इसके मुआवजे में खूब आत्म-मुग्ध लेकिन फिर भी अवांछित व्यक्ति होना है. (इतनी तो कविता लिखी जा रही है! कितने कवि हैं !!!)

कवि से कुछ ऐसा होने की प्रत्याशा है कि वह संसार को बाईनरीज और बाईनोक्यूलर से ही देखे, जीवन में कुछ भी करे कविता में 'सही' राजनीति करे और मनुष्य होने मात्र के संताप को बिलकुल अनुभव न करें इसे सामाजिक अपराध माना जा सकता है, कि वह इतना जीवन के पक्ष में हो कि मृत्यु जैसी आस्तित्विक अलामतें तब तक उसके लिए 'अपठनीय' ही बनी रहे जब तक वे हत्या/आत्महत्या की शक्ल में न आय. कि वह अपने समय के अलावा बाकी समयों के बारे में, अपनी विधा, अपनी भाषा, अपनी अकादमी, अपने आलोचक, अपने पुरस्कर्ता, अपने संगठन के बाहर किसी चीज़ के बारे में, ज्यादा चिंतित न हों, कि वह बहुत बहुत नैतिक जान पड़े, कि बहुत बहुत पीड़ित जान पड़े, कि बहुत बहुत कमिटेड जान पड़े, कि बहुत बहुत राजनैतिक जान पड़े, कि वह फालतू इधर उधर का ज्यादा पढ़े देखे नहीं. और उसमें कोई अंतर्द्वंद्व, एम्बीवैलेंस कतई नहीं हो इस तरह के कन्फ्यूजन से, संदेह से परिवर्तन और प्रतिरोध के कथ्य और शिल्प दोनों को क्षति हो सकती है. पार्टनर की पोलिटिक्स साफ़ होना हर हाल में ज़रूरी है लेकिन सिर्फ लेखन में ही.

मुझे लगता है यह एक ऐसे परिदृश्य की विडम्बनाएं हैं जो विडंबनात्मक ढंग से ही बहुत साहित्यवादी है - यहाँ साहित्य पर संदेह सदैव हैं, उस पर अधिक भरोसा न करने की हिदायतें सदैव हैं उसे अपर्याप्त मानने के प्रमाण सदैव हैं, एक नंगे-भूखे जनपद में कला करने को लेकर अपराधबोध है, कम कला करने को लेकर अपराधबोध है, अधिक कला करने वालों पर लांछन है पर यह सब साहित्य में, और साहित्य के रूप में ही है.

वास्तविक
समाज में कितना परिवर्तन/प्रतिरोध हिंदी कवि या उसकी कविता करती है और हिंदी के लेखक परिवर्तन और प्रतिरोध के लिए साहित्य के अलावा क्या कर रहे हैं यह हम नहीं जानते, यह जानने की कोई विश्वसनीय पद्धति, दुर्भाग्य से, अभी तक है नहीं. जो लेखन या लेखकों का ऐसा करना जरूरी नहीं मानते उनके विषय में इससे बहुत फर्क नहीं पडेगा लेकिन जो मानते हैं उनके किये में लेखन की क्या भूमिका है, अगर है, और इससे उनके साहित्य के मूल्यांकन पर क्या फर्क पडेगा?

एक तरफ प्रभुत्वशाली, विडंबनात्मक साहित्यवादिता है और दूसरी तरफ यह देशज/‘भारतीय' विचार कि साहित्य से यह सब प्रत्याशा ही अवाँछनीय है क्योंकि वह एक 'काम्य' कर्म है, 'नैमैतिक' कर्म नहीं.

मर्क्युशियो अगर हिन्दी में जारी लडाईयों में एक सिपहसालार होता तो मरते हुए यही कहता 'कहर टूट पड़े तुम्हारे दोनों खानदानों पर’.
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वह जो जानता है अच्छी कविता क्या है अच्छा कवि नहीं है
और वह जो जानता है बुरी कविता क्या है बुरा कवि नहीं है

(एन्तोज़ियो पोर्चिया को अशोक वाजपेयी के अनुवाद में पढ़कर, उनकी शैली में एक कविता, 2005)
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मैं किसे कवि मानता हूँ ? इसका जवाब मैंने जब अपनी कविताओं में ढूंढना चाहा तो मुझे एक जगह यह लिखा मिला – कवि वह है जिसका ब्याह काल और अकाल से हो गया हो. यह कविता वर्धा यूनिवर्सिटी की पत्रिका बहुवचन के छठे अंक में छपी थी, 7-8 साल हो गये. मुझे नहीं लगता इस वाक्य को आज लिखता तो कुछ बदल कर लिखता.
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कुछ मित्रों को याद आ गया होगा कि कवि को ‘बड़ा-सा’ ही सही पर तोता किसी और ने नहीं शमशेर बहादुर सिंह ने कहा था.
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( गिरिराज एक फर्क संवेदनात्मक धरातल से कविता संभव करते हैं और यह फर्क होना उनकी वैचारिकी में भी लक्षित किया जा सकता है। उनसे सहमति-असहमति हो सकती है, उन्हें अनसुना नहीं किया जा सकता। हमें खुशी है कि उन्होंने हमारे आग्रह पर इस स्तम्भ के लिए लिखना स्वीकार किया। इससे पूर्व आप अनुवाद में बोर्हेस तथा मूलतः इसी स्तम्भ के लिए लिखे गए चंद्रभूषण और संजय कुंदन के विचार पढ़ चुके हैं। )
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पोथी पढि-पढि : २ : मारीना त्स्वेतायेवा

9:37 am


जीवन जैसा है, वह मुझे पसंद नहीं

हर पुस्तक अपने ही जीवन से एक चोरी की घटना है। जितना अधिक पढ़ोगे, उतनी ही कम होगी स्वयं जीने की इच्छा और सामर्थ्य। यह बात भयानक है ! पुस्तकें एक तरह की मृत्यु होती हैं। जो बहुत पढ़ चुका है वह सुखी नहीं रह सकता, क्योंकि सुख हमेशा चेतना से बाहर रहता है, सुख काल अज्ञानता है।

लिखो, और लिखो ! हर क्षण, हर इशारे, हर आह को अंकित करो ! सिर्फ इशारों को ही नहीं, उन्हें देते हुए हाथों को भी, आहों को ही नहीं बल्कि होठों के आकार को भी, जिनके बीच से वे इतनी आसानी से निकली हैं।

सपने में देखना और लिखना तब संभव नहीं होता जब ऐसा करने की इच्छा न हो बल्कि तब संभव होता है जब (कुछ) लिखा जाना चाहता हो, और सपना देखा जाना... लेखक के जीवन में मुख्य चीज़ है लिखना...लिखने में सफल होना नहीं बल्कि कुछ लिख सकना...तुम्हारे भीतर जो चीज़ छिपी और दबी हुई है और कविताओं में खुली और प्रकट हुई है, वही तुम्हारी कविता का 'मैं' है, सपने का 'मैं' है। दूसरे शब्दों में, कविता का 'मैं' उन शक्तियों के प्रति कवि-मन का समर्पण है...

समकालीनता
का मतलब पूरे का पूरा अपना समय नहीं होता, और इसी तरह पूरे की पूरी समकालीनता उसके अनेक रूपों में से केवल एक रूप नहीं होती। गोएठे का युग साथ-साथ नेपोलियन का भी युग है और बेथोविन का भी। श्रेष्ठ की समग्रता ही समकालीनता है।

मेरे
लिए जीवित या मृत, हर कवि --मेरे जीवन का सक्रिय पात्र है। मैं जीवन और पुस्तक, सूर्यास्त और उसके चित्र में कोई फर्क नहीं करती। जो कुछ मुझे पसंद है, पूरे मन से है।

जीवन
जैसा है, वह मुझे पसंद नहीं। मेरे लिए वह कुछ अर्थ रखना तभी शुरू होता है जब वह रूपांतरित होकर कला में व्यक्त होता है। यदि मुझे कोई समुद्र तट पर ले जाये --स्वर्ग में ले जाये --और लिखने की मनाही करे तो मैं समुद्र और स्वर्ग --दोनों को अस्वीकार कर दूँगी।

दूसरी
औरतें नृत्य में जाने की खातिर, प्रेम, उत्सव या पहरावे की खातिर अपने बच्चों को भूल जाती हैं। मेरे जीवन का उत्सव --कविताएं हैं। पर मैंने कविताओं के कारण इरीना को नहीं भुलाया था...

मुझे
ईश्वर और मृत्यु के बाद के जीवन पर विश्वास नहीं। यही कारण है निराशा, बुढ़ापे और मृत्यु के भय का। मैं पूजा-पाठ करने में बिल्कुल असमर्थ हूँ। जीवन के प्रति पागलपन की हद तक प्रेम है और साथ में है जीने की उत्कट इच्छा।

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( मारीना त्स्वेतायेवा रूस के महान कवियों में अग्रगण्य हैं। उन तक पहले कविताओं के जरिये ही पहुंचना हुआ। फिर निर्मल वर्मा की डायरी पढ़ते हुए मैं उनके पारदर्शी, कवित्वपूर्ण और तलस्पर्शी गद्य के बारे में जान सका। बाद में मेरी मुलाकात बीसेक बरस पहले छपी उस छोटी-सी किताब से हुई जिसमें कविताओं के अलावा मारीना के पत्र और गद्यांश भी थे। अनुवाद वरयाम सिंह ने किया था। यहाँ उसी पोथी से कुछ वाक्य इधर-उधर से उठाकर जमा किया है। जीवन और कविता से गहरी आसक्ति रखनेवाली मरीना को ताउम्र अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बेटी और बाद में पति की मृत्यु, प्रेम में हताशा और निर्वासन से जूझती मारीना ने ४९ की उम्र में आत्महत्या कर ली थी। उनकी कवितायें फ़िर कभी। इससे पहले आप इसी स्तंभ में फरनांदो पैसोआ को पढ़ चुके हैं। )
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बही - खाता : ७ : कुंवर नारायण

10:26 pm

( यह एक ज्ञात किंतु कम चर्चित तथ्य है कि कुंवरजी का 'आकारों के आसपास' नाम से एक कहानी-संग्रह भी है, जिसकी कहानियों के बारे ऐसा कह कर छुट्टी नहीं पाई जा सकती कि वे एक कवि की कहानियां हैं। उसके पीछे कवि-दृष्टि ज़रूर थी, पर उसे विशिष्टता फैशन, आन्दोलन और प्रतिमानों में बंधकर न लिखने की रचनेवाली मनीषा ने प्रदान की थी। बही-खाता में इस बार उसी जाग्रत मनीषा से संवाद कीजिए। कुंवरजी ने इस संग्रह की भूमिका स्वरुप जो विचार पैंतीस बरस पहले व्यक्त किए थे, उसकी मूल्यवत्ता अब भी जान पड़ती है। भूमिका को किंचित संपादन के साथ यहाँ दिया जा रहा है, इस बात को नोट करते हुए कि कथा-पट इधर फिर से गुलज़ार है और पिछले पाँच वर्षों में पचास के करीब तो कहानी-संग्रह आए हैं ! )


यथार्थ से रोमांस

इन कहानियों में वैसे रोमांचकारी और सनसनीखेज़ तत्व नहीं मिलेंगे जैसे कि आम तौर पर कहानियों में होना लाजिम समझा जाता है। न इनमें कड़वे यथार्थ की झांकी है, न मीठे प्रेम की कल्पना, न पहेली बुझानेवाली चारित्रिक दाँवपेंच, न मनोवैज्ञानिक तिकड़मों में उलझाया हुआ सेक्स और क्राइम...सच पूछिए तो इन सबको ठंडे दिल-दिमाग से सोचते हुए बातचीत का एक अंदाज़ है...यथार्थ से रोमांस। कुछ इस तरह से मानो रोमांस यथार्थ से पलायन न होकर उसी की एक खास पहचान या अतिरिक्त माप हो। ( यहाँ मैं रोमांस शब्द का ठीक उन्हीं अर्थों में इस्तेमाल कर रहा हूँ जिन अर्थों में सरवान्ते का 'डॉन क्विग्जोट' एक रोमांस है।)

कहानी कहते समय मैं पाठक को यह यकीन दिलाने की कोशिश नहीं करता कि कहानी नहीं कह रहा हूँ, बल्कि जगह-जगह पाठक को अपनी तरफ़ करके कहता चलता हूँ कि यह यथार्थ नहीं, सिर्फ़ कहानी है ...कुछ इस तरह कि पाठक को मेरे कहने पर शक होने लगे और वह अपने-आपसे सवाल करे कि क्या सचमुच यह कहानी ही है या उससे भिन्न कुछ भी ? यथार्थ के नाम पर कहानी नहीं, कहानी के नाम पर यथार्थ की बात करता हूँ...उस यथार्थ की बात जिसे केवल व्यावहारिक स्तर पर नहीं, मुख्यतः मानसिक स्तर पर जिया जाता है।

अक्सर इन कहानियों में पात्रों और घटनाओं को केवल गवाही की तरह लाकर मनुष्य की नियति का मुकद्दमा पेश किया गया है।...कहीं-कहीं पूरी कहानी को बिल्कुल एब्सट्रैक्शन के स्तर पर रखकर कुछ ठोस निष्कर्षों से नत्थी कर दिया है मानो सारा अनुभव वस्तुओं और घटनाओं के नहीं, एक खास तरह के मानसिक सन्दर्भ में जिया जा रहा है।

...मैंने कई कहानियों को एक खास तरह से इस्तेमाल किया है, कहानी की किसी परिचित जाति को ठेस पहुंचाकर। इस ठेस पहुँचाने के दौरान मैंने पाठक से एक नए दृष्टिकोण की मांग की है जिसमें वह कहानी के जादू से मुग्ध होकर नहीं, कहानीकार के साथ पूरी तरह जागा रहकर अपने-आपसे तर्क-वितर्क करता चलता है। इस कोशिश में कहानियां कभी-कभी कविता और निबंध की विधा के काफी निकट आ गईं हैं, लेकिन शायद इस तरह नहीं कि उनकी बुनियादी पहचान ही गुम हो गई हो।

कई बार किसी साहित्यिक विधा को उसकी ठस जातीयता के बेलोचपन से उबारने के लिए भी ज़रूरी होता है कि उसमें एक विस्फोट पैदा किया जाये...बहरी तत्वों की घुसपैठ कराके।

ज्यादातर कहानीकारों का ध्यान विषय पर ही केन्द्रित रहा और यथार्थ क नाम पर सेक्स, हिंसा, पारिवारिक और सामाजिक मुश्किलों आदि को ही कहानियो का विषय बनाया गया, लेकिन कहानी के आतंरिक स्ट्रकचर को लेकर बहुत सतर्क प्रयोग काम ही देखने में आये। इन कहानियों में जहाँ कथा-तत्व को गौण रखा गया है, उसकी एक वजह यह भी रही कि मैं कहानी की शुद्ध प्रयोगात्मक संभावनाओं की छानबीन करना चाहता था। उपलब्धि जो भी हो, कोशिश मुझे बेकार नहीं लगी...

सभी कहानियों में प्रयोग का एक-सा आग्रह नहीं रहा। कुछ में कथ्य को ही प्रमुखता देकर कहानी के सहज रूप को अपने-आप बनने दिया गया है। लेकिन इनमें भी मैंने कथाकार की उपस्थिति को पात्रों के काफी नजदीक रखा है...कुछ इस तरह मानो वह किस्से को केवल बयान ही नहीं कर रहा, उसे सोच भी रहा है, नाटकों क कोरस की तरह। इसीलिए भाषा भी जान-बूझकर कई स्तरों पर रखी गई है ताकि अर्थों के रंग विभिन्न बौद्धिक और भावनात्मक ज़मीनों पर महसूस किये जा सकें।
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सबद निरंतर

3:58 am

कुंवरजी
जितनी रुचि से पुस्तकें पढ़ते हैं, उतनी ही रुचि से फिल्में भी देखते हैं। यही वजह है कि अस्सी पार, घुटनों और आंखों में तकलीफ के बावजूद, वे फिल्में देखने अब भी निकल लेते हैं। मुझे कल सुबह-सुबह बताया, ''आज चलना है, राजुला की फ़िल्म है'', तो इस संगत का लाभ लेने से भला कैसे चूकता। राजुला की एक और फ़िल्म, बियोंड द व्हील, दो साल पहले आईआईसी में ही देखने की याद भी ताज़ा हो आई। तब अकेले गया था, पर कुंवरजी के साथ फ़िल्म देखने और उसके पहले और बाद, उस पर बात करने का अनुभव बिल्कुल अलहदा होता है। फिल्में देखने-समझने में उनके फिल्मों पर लेखन ( यह जल्द ही पुस्तकाकार आ रहा है ) और ऐसी आत्मीय मुलाकातों के दौरान फिल्मकारों और फिल्मों पर हुई चर्चा से मुझे रोशनी मिलती रही है। ऐसे कई फिल्मकार हैं जिनके बारे में मैं कुंवरजी से जान सका।

उनके लिखे या बोले हुए में विकिपीडियानुमा जानकारी नहीं है, और न उसमें आप्त वचन बोलने का कोई दर्प ही झलकता है। वे कल जब कह रहे थे कि साहित्य और सिनेमा को बहुत अलगा कर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि बहुत अच्छे फ़िल्ममेकर दरअसल बहुत अच्छे लेखक ही हैं, तो अपनी कमअक्ल में यह बात कुछ और वसी हुई कि आख़िर फिल्मकार 'विजुअल पोएट्री' कैसे संभव कर पाता है। उनके द्वारा सुझाई गई तारकोवस्की की फिल्में मुझे अपने अनुभव में किसी परतदार कविता सरीखी ही लगती हैं। यही वजह है कि तारकोवस्की या बर्गमान जैसे फिल्मकारों की तरफ़ मन बार-बार लौटता है। सिनेमा की इस बहुप्रभावक्षमता से वाकिफ होना अपने आप में एक पूरी शिक्षा, एक पाठ है।

यह पाठ कल राजुला शाह की नई फिल्म ''सबद निरंतर'' (वर्ड विदिन वर्ड ) देखते हुए मैं आईआईसी थिएटर में भी मन ही मन दुहराता रहा था। वजह थी फिल्म की थीम। राजुला ने मालवा को इस बार अपनी सृजन भूमि बनाया है। जरिया भक्त कवियों --कबीर, गोरखनाथ, मछेन्द्रनाथ आदि की कविताएं हैं। राजुला इन कविओं की लोक-व्याप्ति को ७४ मिनट की अपनी फिल्म में बहुत धैर्य और लगाव से सेल्युलाइड पर उकेरती हैं।

यहाँ मुझे कुंवरजी की ही कविता और लोक-रुची के बारे में कही हुई बात जोड़नी है। एक बार उनसे दूरदर्शन की तरफ से आई किसी मूर्ख प्रतिनिधि ने कहा कि आपकी कविता तो बहुत कठिन है, लोग टीवी पर कैसे समझेंगे। कुंवरजी ने इस पर बड़ी विनम्रता से कहा था कि आप ऐसा कहकर उस विशाल पाठक-समूह का ही अपमान कर रही हैं, जिसने आज तक न जाने कितने बड़े-बड़े कवियों को अपनी स्मृति में ज़ज्ब कर रखा है। राजुला की फिल्म देखने के बाद मैंने सबसे पहले कुंवरजी को उनकी कही हुई इस बात की ही याद दिलाई।

मालवा का लोक ऊपर से देखने में बहुत भिन्न नहीं है। वहां भी खेती-किसानी करनेवाले लोग हैं, पारचून की दुकान लगानेवाले साहूजी हैं, मोहल्ले में अपने घर के एक हिस्से में जलेबी छाननेवाला वृद्ध दम्पति है और है सत्संग करनेवालों की जमात। और सबसे ज्यादा वह बूढी स्त्री जिसमें यह बोध जीवन में गहरे खुब कर ही जन्मा है कि उसके राधेश्याम किसी काशी-मथुरा में नहीं निवास करते, उनका बसाव तो खुद उसके भीतर है। मालवा के लोक-चित्त में यह दुर्लभ कबीर-गुण न होता, तो यह मिट्टी कुमार गंधर्व कैसे उपजाती ?

ये साधारण लोग ही उस समृद्ध लोक का सृजन करते हैं, जिनके यहाँ सबद एक निरंतर यात्रा पर है। कबीर सरीखे कवियों की इन अन्यथा निरक्षर लोगों की समझ, उनके बीजक की स्मृति, गायन और व्याख्या से जब आप रूबरू होते हैं, तो आपके सामने कविता के कुछ अलग अर्थ खुलते हैं और उसकी उत्तरजीविता का भी कुछ पता मिलता है। राजुला ने इस लोक को उसके अनेक राग-रंग में पकड़ने की कोशिश की है और ऐसा करते हुए खुद को उस सयाने बचपने से भरसक बचाए रखा है, जिसमें निर्देशक आपको हर दूसरे फ्रेम में दीक्षित करते दिख पड़ता है।

बातचीत में राजुला ने बहुचर्चित ईरानी कवयित्री फरोखजाद की बनाई एक मात्र फिल्म का जिक्र किया जिसे वहीं के कियारोस्तमी, पनाही वगैरह अपने फ़िल्म-निर्माण की प्रेरणा मानते हैं। वादे के मुताबिक अगर राजुला के फिल्मकार पति अर्घ्य बसु मई में म्यूनिख फिल्म फेस्टिवल में अपनी फिल्म के लिए जाते हुए दिल्ली में फरोखजाद की फिल्म भेंट गए, तो शायद अगली चर्चा उसी पर...
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रंगायन : ४ : ए. जी. चिदम्बर राव जाम्बे

11:42 am
( रंगकर्म के जरिये भारत की विविधता कई स्तरों पर उद्घाटित हुई है, यह और बात है कि हम उसका ठीक ढंग से नोटिस लिए बिना उसकी अखिल भारतीय व्याप्ति की व्याख्या करते हैं। भारत के विभिन्न प्रदेशों की अनेक भाषाओं और शैलियों में अपने को व्यक्त करती इस समृद्ध रंग-परंपरा को शिखर रंग-व्यक्तित्वों के बहाने जानने-समझने के आग्रह को वरिष्ठ कथाकार, नाटककार और रंग-समीक्षक हृषीकेश सुलभ के सामने रखने का ही सुफल रंगायन है। इस स्तम्भ में आप अब तक हबीब तनवीर, नेमिचंद्र जैन और ब.व. कारंथ के रंग- योगदान पर एकाग्र सुलभजी का गद्य पढ़ चुके हैं। इसी कड़ी में अब ए. जी. चिदम्बर राव जाम्बे। )


खुले मन का सर्जक

हृषीकेश सुलभ
ब. व. कारंथ द्वारा स्थापित रंगायन के निदेशक ए. जी. चिदम्बर राव जाम्बे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जाने से पूर्व उन्होंने यक्षगान केन्द्र, उडुपी में पारम्परिक यक्षगान के लिए प्रशिक्षण प्राप्त किया था। रंगायन का निर्देशक बनने से पूर्व लगभग बाईस वर्षौं तक जाम्बे निनासम थियेटर इन्स्टीट्युट, हेग्गोडु के प्राचार्य रहे। रंगशिक्षण के इस दीर्घ अनुभव ने उनके रंगकर्म को नयी समझ दी और संस्कृतिकर्म के प्रति एक व्यापक दृष्टिकोण दिया।

जाम्बे ने आषाढ़ का एक दिन, आधे-अधूरे ( मोहन राकेश), लोअर डेप्थ ( मैक्सिम गोर्की), चेरी का बाग़ीचा, अंकल वान्या, थ्री सिस्टर्स ( चेख़व), जनशत्रु ( इब्सन), किंग लियर, मर्चेन्ट ऑफ़ वेनिस, टिमान ऑफ़ एथेन्स ( शेक्सपीयर), शू मेकर्स वन्डरफुल वाइफ ( लोर्का ), ताम्रपत्र ( देवाशीश मजुमदार), रक्त करबी ( रवीन्द्रनाथ टैगोर), अभिज्ञानषाकुंतलम् ( कालिदास), मुद्राराक्षस (विशाखदत्त), दि पावर ऑफ़ डार्कनेस ( टाल्सटाय), चरनदास चोर ( हबीब तनवीर) आदि नाटकों को कन्नड़ में निर्देशित किया है। गिरीश कारनाड, चन्द्रशेखर कम्बार, एस. बालुराव, जी.बी.जोशी, यू. आर. अनंतमूर्ति, पी. लंकेश, के. वी. सुब्बन्ना आदि के कन्नड़ नाटकों के साथ-साथ विजय तेन्दुलकर और महेश एलकुंचवार के नाटकों के कन्नड़ अनुवाद को निर्देशित करने का विपुल अनुभव भी जाम्बे की रंगपूँजी है।

जाम्बे
के रंगकर्म की विविधता और उनके रंगकर्म के सामाजिक सरोकारों का अंदाज़ा उनके द्वारा संचालित रंगशिविरों से लगाया जा सकता है। उन्होंने दक्षिण कर्नाटक के गंगोली के मछुआरों और उत्तरी कर्नाटक के मंचिकेरी के सिद्दी आदिवासियों के लिए कई रंगशिविरों का आयोजन किया है और उन्हें प्रशिक्षण दिया है। कर्नाटक में दावणगेरे और कन्नड़ विश्वविद्यालय, हम्पी के अलावा सतारा ( महाराष्ट्र) और इम्फाल ( मणिपुर) में भी जाम्बे ने रंगषिविरों का संचालन किया है। एक दर्जन से ज़्यादा बच्चों के नाटकों को निर्देशित करनेवाले जाम्बे ने कर्नाटक के सिमोगा, मंचिकेरी, सुल्लिया तालुक, हेग्गोडु, दावणगेरे, भारतानहल्ली जैसे छोटे नगरों-कस्बों के बच्चों को प्रशिक्षित कर उन्हें रंग संस्कार दिया है। श्रीराम सेन्टर रंगमंडल (नयी दिल्ली) और भारतेन्दु नाटक अकादमी (लखनऊ) ही नहीं, कर्नाटक के छोटे नगरों-कस्बों, सिमोगा के अभिनय थियेटर ग्रुप, मंचिकेरी के रंगविभागा, रंगसमूहा और सिद्दी आदिवासी ग्रुप सिद्दी रंगा, चित्रदुर्गा ज़िले के शमानुर गाँव के निवासियों, हम्पी के निवासियों के लिए भी नाटकों को निर्देशित किया है।

समकालीन रंगमंच को लेकर अपनी चिंताओं को जाम्बे समय-समय पर प्रकट करते रहे हैं। रंगमंच की समस्याओं को वह भारतीय समाज और वर्तमान समय के साथ जोड़कर विश्लेषित करते हैं - ‘‘हर राज्य की भूमि...जल..वन...भाषा-संस्कृति...ये सब मिलकर राष्ट्र बनता है। राष्ट्र को देश के नक्शे में कहीं एक स्थान पर आप चिह्नत नहीं कर सकते। आप देश के किसी एक भू-भाग को...समाज के किसी एक हिस्से को, दूसरों की अपेक्षा कमज़ोर मानकर उपेक्षित नहीं कर सकते। भाषा के कारण...भूमि के कारण एक राष्ट्र की अवधारणा पर संकट आते रहे हैं। ऐसे संकट ग़ैरबराबरी से पैदा होते हैं। आप किसी दूसरी भाषा का अपमान नहीं कर सकते। यह असंवैधानिक है।’’

‘‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय आज हिन्दी स्कूल बनकर रह गया है। आज तक यह बात लोग समझ नहीं सके। राष्टीय नाट्य विद्यालय की संरचना का यह एक बड़ा दोहै। वे लोग इसे समस्या मानने को ही तैयार नहीं जबकि यह एक बड़ी समस्या है। यह बहुभाषी देश है। यहाँ का समाज कई संस्कृतियों को अपने साथ लेकर चलता रहा है।’’

रंगप्रयोगों को लेकर जाम्बे के पास एक सुलझा हुआ वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जाम्बे कहते हैं -‘‘ रंगभाषा कई भाषाओं से मिलकर बनती है। गाना, नृत्य, संगीत, अभिनय, साहित्य आदि सब भाषाएँ ही हैं। इनका काम अभिव्यक्ति करना है और थियेटर इन सब को मिलाकर बनता है। इनके मिलने से ही बनती है एक रंगकृति। इस रंगकृति के निर्माण के लिए रंगभाषा का निर्माण ज़रूरी है। हम अगर अभिव्यक्ति के इन तमाम रूपों के बाहरी रूप को लेकर काम करते हैं, तो गड़बड़ी होती है। लिखित भाषा को दृष्यभाषा में रूपांतरित करने के लिए यह ज़रूरी है कि हम थियेटर के इन सभी तत्त्वों के भीतरी संसार के बीच उतरें...और वहाँ से अपनी प्रस्तुति के लिए रूप और संवेदना - दोनों को चुनें। मैं अगर एक नाटक कर रहा हूँ, तो मैं सम्प्रेषण के लिए किसी भी नाट्यरूप का उपयोग कर सकता हूँ...पर इस उपयोग को रचनात्मक प्रयोग में बदलने के लिए मुझे थियेटर के उस रूप के भीतर छिपी संवेदना को पकड़ना होगा।’’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘‘यहाँ शुद्धता की कोई गारंटी नहीं होती। यहाँ सम्प्रेषण की गारंटी महत्त्वपूर्ण है। हम जब बोलते हैं, तो कई बार कई भाषाएँ उसमें मिल जाती हैं और तब जाकर हमारा सम्प्रेषण पूरा होता है। थियेटर में भी यही होता है। दृष्यभाषा की यह आवश्यकता है।...हमारे महाकाव्य...हमारे मिथक, भाषा का यानी सम्प्रेषण की कला का सबसे सशक्त उदाहरण हैं।...आज एटम बम या एके ४७ जैसे महाविनाशकारी हथियार हमारे सामने खड़े हैं और सारी मानवता को डरा रहे हैं। कल भी ये थे। भस्मासुर क्या था ? इन्हीं हथियारों का मानवीकरण है भस्मासुर।...तो यह है हमारी पारम्परिक अभिव्यक्ति का...सम्प्रेषण कौशल। हमें अपनी परम्परा में गहरे उतर कर अपने लिए रूप को खोजना होगा। हमारे पास समृद्ध वाचिक परम्परा भी रही है। वाचिक परम्परा एक तरह से मूविंग यूनिवर्सिटी की तरह रही है। हमें नयी दृष्टि से इन अवधारणाओं पर काम करना होगा।’’

अपनी रचनात्मकता को विश्लेशित करते हुए जाम्बे कहते हैं - ‘‘रचनात्मकता के अनेक रास्ते हैं। आप चीज़ों को कहीं से ले सकते हैं...कहीं से भी पा सकते हैं। मैं खुला हुआ हूँ। मेरी रंगरचना की कोई निश्चित पद्धति नहीं।’’ जाम्बे के रंगसरोकार उन्हें ब.व. कारंथ, प्रसन्ना और वसवलिंगैया की रंगपरम्परा से जोड़ते हैं।
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बूथ पर लड़ना

2:16 am

( आगे व्योमेश शुक्ल की दो कविताएं दी जा रही हैं। दूसरी कविता कहीं भी पहली बार छप रही है, जबकि पहली कविता को लोकतंत्र के पर्व, चुनाव, में कवि और उसकी कविता के माध्यम से हम अपने मोर्चे से एक ज़रूरी कार्रवाई मान रहे हैं। एक ऐसे समय में जब यह मान लिया गया हो कि कविता या या सरल-मति में साहित्य ही, हमारे समय के संघर्षों में हमारा बहुत साथ देने लायक नहीं रहा है, हालाँकि उससे कमतर-बदतर चीजों और लोगों से हम आस लगाये बैठे हैं, ''बूथ पर लड़ना'' सरीखी कविताएं बोध,विचार, विवेक और अनिर्णय की हमारी दुविधाजनक स्थिति को बदलती है। वह अपने भीतर जिस अन्यथा विवादस्पद तथ्य को अपना आत्म-सत्य स्वीकार कर आगे बढ़ती है, और उसके जितने आयामों को उद्घाटित करने में सफल हुई है, उसकी अपेक्षा हम हर अच्छी कविता से करते हैं, जो असल में बहुत कम मौकों पर पूरी होती दिखती है। इस लिहाज़ से वह इधर लिखी जा रही कविताओं में अपने तरह की अकेली है। हालाँकि बूथ जैसी सबसे छोटी इकाई पर भी प्रतिबद्ध होकर लड़नेवाले इस कवि में इस बात का भी बहुत तीखा एहसास है कि ''बहुत सारे संघर्ष स्थानीय रह जाते हैं''। )


बूथ पर लड़ना

पोलिंग बूथ पर कई चीज़ों का मतलब बिल्कुल साफ़
जैसे साम्प्रदायिकता माने कमल का फूल
और साम्प्रदायिकता-विरोध यानी संघी कैडेटों को फर्जी वोट डालने से रोकना
भाजपा का प्रत्याशी
सभी चुनाव कर्मचारियों
और दूसरी पार्टी के पोलिंग एजेंटों को भी, मान लीजिये कि आर्थिक विकास के तौर पर एक समृद्ध
नाश्ता कराता है
इस तरह बूथ का पूरा परिवेश आगामी अन्याय के प्रति भी कृतज्ञ
ऐसे में, प्रतिबद्धता के मायने हैं नाश्ता लेने से मना करना

हालाँकि कुछ खब्ती प्रतिबद्ध चुनाव पहले की सरगर्मी में
घर-घर पर्चियां बांटते हुए हाथ में वोटर लिस्ट लिए
संभावित फर्जी वोट तोड़ते हुए भी देखे जाते हैं
एक परफेक्ट होमवर्क करके आए हुए पहरुए
संदिग्ध नामों पर वोट डालने आए हुओं पर शक करते हैं

संसार के हर कोने में इन निर्भीकों की जान को खतरा है
इनसे चिढ़ते हैं दूसरी पार्टियों के लोग
अंततः अपनी पार्टी वाले भी इनसे चिढ़ने लगते हैं
ये पिछले कई चुनावों से यही काम कर रहे होते हैं
और आगामी चुनावों तक करते रहते हैं
ऐसे सभी प्रतिबद्ध बूढ़े होते हुए हैं
और इनका आने वाला वक्त खासा मुश्किल है

अब साम्प्रदायिक बीस-बीस के जत्थों में बूथ पर पहुँचने लगे हैं
और खुलेआम सैफुनिया सईदा फुन्नन मियाँ जुम्मन शेख अमीना और हामिद के नाम पर वोट डालते हैं
इन्हें मना करना कठिन समझाना असंभव रोकने पर पिटना तय

इनके चलने पर हमेशा धूल उड़ती है
ये हमेशा जवान होते हैं कुचलते हुए आते हैं
गालियाँ वाक्य विन्यास तय करती हैं चेहरे पर विजय की विकृति
सृष्टि में कहीं भी इनके होने के एहसास से प्रत्येक को डर लगता है

एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच के अंतराल में
आजकल
फिर भी कुछ लोग इनसे लड़ने की तरकीबें सोच रहे हैं
****

बहुत सारे संघर्ष स्थानीय रह जाते हैं
( प्रणय कृष्ण के लिए )

जगह का बयान उसी जगह तक पहुँचता है। वहीं रहने वाले समझ पाते हैं बयान उस जगह का जो उनकी अपनी जगह है।

अपनी जगह का बयान अपनी जगह तक पहुँचता है।

एक आदमी सुंदर आधुनिक विन्यास में एक खाली जगह में चकवड़ के पौधे उगा देता है तो रंगबिरंगी तितलियाँ उस जगह आने लगती हैं और उस आदमी को पहचान कर उसके कन्धों और सर पर इस तरह छा जाती हैं जैसे ऐसा हो ही न सकता हो। ऐसा नहीं हो सकता यह जगह के बाहर के लिए है और ऐसा हो सकता है यह जगह के लिए।

तितलियों के लिए तो ऐसा हो ही रहा है।

किस्सों-कहानियों में ख़तरनाक जानवर की तरह आने वाले एक जानवर के बारे में जगह के लोगों की राय है कि वह उतना ख़तरनाक नहीं है जितना बताया जाता है। जबकि जगह के बाहर वह उतना ही ख़तरनाक है जितना बताया जाता है।

जगह के भीतर का यह अतिपरिचित दृश्य है कि गर्मियों की शाम एक बंधी पर सौ साँप पानी पीने आते हैं। जगह में जब साँप पानी पी रहे होते हैं तो जगह के बाहर से देखने पर लगता है कि बंधी से सटाकर सौ डंडे रखे हुए हैं। जगह एक ऐसी जगह है जहाँ साँप को प्यास लगती है। जगह के बाहर न जाने क्या है कि साँप को प्यास नहीं लगती और वह डंडा हो जाता है। जगह के बाहर लोग डंडे जैसी दूसरी-तीसरी चीज़ों को सांप समझ कर डरते रहते हैं।

जगह के बाहर एक आदमी के कई हिजड़े दोस्त हैं। वे उससे पैसा नहीं मांगते, उसे तंग नहीं करते, उसे हिजड़ा भी नहीं मानते, फिर भी उसके दोस्त हैं। वे उससे कभी-कभी मिलते हैं लेकिन जब मिलते हैं दोस्त की तरह। जगह में लोग एक-दूसरे से बात करते हैं, मुलाकात न हो पाने पर एक-दूसरे को याद करते हैं और एक-दूसरे के दोस्त होते हैं। जगह के बाहर मुलाकातें नहीं हो सकतीं। न दोस्त होते हैं, न लोग होते हैं, न होना होता है, न न होना होता है।
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बही - खाता : ६ : प्रभात रंजन

12:13 pm

ऐसा
लिख सकूं जो पढ़नेवालों को अपना-अपना सा लगे


लफ़्जों
में बोलता है रगे-अस्र का लहू
लिखता है दस्ते-गैब कोई इस किताब में


लिखने के बाद जब अपनी रचना को पढ़ता हूं तो कई बार नासिर काज़मी के इस शेर की तरह मुझे खुद ऐसा लगता है जैसे मैं किसी और की कहानी पढ़ रहा हूं। बार-बार अपनी कहानियों के माध्यम से मैं वास्तव में अपने आपको, अपनी पहचान को कोई रूपाकार देने की कोशिश करता हूं, मगर पाता हूं कि हर बार वह कुछ और, कुछ और ही हो जाती है। हमारे दौर का शायद यही यथार्थ है... सब कुछ गड्डमड्ड...

मेरी कहानियों में कस्बे का जीवन विस्तृत रूप में आया है, मगर वास्तविकता यह है कि मैं ज्यादातर उस कस्बे ( सीतामढ़ी) से दूर ही रहता आया हूं जहां का लोकेल अक्सर मेरी कहानियों में आ जाता है। पहले पढ़ाई और बाद में नौकरी के कारण अपनी जन्मभूमि में मैं रह नहीं पाया। मैं यह जानता हूं कि इसके अलावा मेरी और कोई पहचान नहीं हो सकती कि मैं सीतामढ़ी का रहनेवाला हूँ, मैं उसकी पहचान से अपने आपको ठीक से जोड़ नहीं पाता। लेकिन मेरे कथा-पात्रों की पहचान अक्सर उस कस्बे से जुड़ जाती है। मुझे भले अपने कस्बे के जीवन का विस्तृत अनुभव न हो, मेरे पात्रों में उस कस्बे के जीवनानुभव भरपूर हैं।

अपनी स्मृतियों में बसी (जन्म) भूमि को मैं अपने लेखन में साकार करने की कोशिश करता हूं।

बाद में रोजी-रोटी के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग स्तरों पर काम करने के अवसर मिले। संपादन, पत्रकारिता, अनुवाद, पटकथा-लेखन से लेकर प्रूफ-पठन तक अनेक स्तरों पर, अनेक रूपों में काम किया। इसका और कोई लाभ हुआ हो या न हुआ हो कथाकार के तौर पर लाभ जरूर हुआ। इससे मेरा अपना अनुभव-संसार समृद्ध हुआ, जटिल होते जाते समाज के अलग-अलग स्तरों की समझ विकसित हुई। मेरे जीवन के यही अनुभव मेरी कथाभूमि हैं। कभी कोई बात याद आ जाती है, कभी कोई सूत्र ध्यान आ जाता है और मेरी कहानी शुरू हो जाती है। जब भी किसी कहानी की शुरुआत करता हूं तो अक्सर मुझे खुद नहीं पता होता कि आगे यह कहानी किस रूप में सामने आएगी। सब कुछ धुंधला-धुंधला सा होता है।

जिन दिनों हवाओं में इंडिया शाइनिंग के नारे की गूंज थी, मुझे एक दिन ध्यान आया कि करीब 20 साल पहले मेरे गांव में एक पुल का शिलान्यास हुआ था-कहानी की शुरुआत यहीं से हुई, जो बाद में जानकीपुल के रूप में सामने आई।

कभी लेखक बनने के बारे में सोचा नहीं था, लेकिन कहानियों के जादुई आकर्षण का अनुभव मुझे बचपन में ही हुआ था। बचपन की यादों में एक गांव में अपने दादाजी के किस्से सुनाने की है। सर्दियों की रात बाहर दरवाजे पर घूरे(अलाव) के ढेर के आगे वे कुर्सी पर बैठ जाते थे। चारों ओर खेत-खलिहानों में काम करने वाले जन-मजदूर... और उनकी लंबी-लंबी कहानियों का दौर चलता। आग तापने के बहाने मैं भी अक्सर वहां बैठता था। आजादी के पहले के दौर की अनेक ऐसी कहानियां मुझे आज भी याद हैं जो स्थानीय परंपरा के उन नायकों की होती थीं जिनका इतिहास में कहीं उल्लेख नहीं आता, लेकिन अंग्रेजों से मोर्चा लेने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी।

सेठ हरसुखलाल, जिन्होंने अंग्रेजी राज के खिलाफ छंद लिखने वालों के लिए ईनाम मुकर्रर कर रखा था। बखरी मठ के महंथ की रखैल सोना कहारिन, जिसने पांच हजार के इनामी क्रांतिकारी भोगेन्द्र पाठक को महीनों अपने घर में पनाह दी थी। ऐसे न जाने कितने किस्से वे सुनाते थे जिनके आकर्षण में रात होते ही घूरे के पास लोग आ जुटते थे। उनके मरने के बाद गांव के बड़े-बूढ़े कहते, उनकी कहानियों में नशा होता था। कुछ तो भांग की पिनक होती थी कुछ बयान की रवानी। जब कहानी लिखना शुरू किया तो मैंने पाया कि उसी तरह रोचक शैली में मैं लिखने की कोशिश करता हूं जिस अंदाज में मेरे दादा कहानियां सुनाया करते थे।

दिल्ली आने के बाद लेखक मनोहर श्याम जोशीजी के संपर्क में आया। उन दिनों टेलिविजन धारावाहिकों के लेखक के रूप में उनकी धूम थी। मैं भी फिल्मी लेखन के गुर सीखने की आस में उनके यहां जाने लगा, लेकिन आज अगर इल्मी लेखक के रूप में मेरी थोड़ी बहुत पहचान बनी है तो इसमें उनका बहुत बड़ा योगदान है। उनसे मैंने सीखा कि बहुत रोचक और पठनीय अंदाज में भी ज़बर्दस्त साहित्यिक रचनाएं लिखी जा सकती हैं।

अपने दादाजी की कहानियों से अगर मुझे कथा-लेखन की आरंभिक प्रेरणा मिली तो जोशीजी के प्रोत्साहन ने मुझे लेखक बनाया। वे परफेक्षनिस्ट थे। अपनी कोई रचना तभी प्रकाशन के लिए देते थे जब वे उसके बेहतर होने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हो जाते थे। आरंभ में मैं कोई कहानी लिखकर उनको दिखाता तो वे उसे पढ़ते और अगर अच्छी नहीं लगती तो वहीं फाड़कर डस्टबिन में फेंक देते थे। उनसे मैंने सीखा कि अपने लेखन को लेकर निर्मम होना चाहिए, लेखक के रूप में ग्रो करने के लिए यह बहुत आवश्यक होता है।

प्रसिद्ध लेखक मार्खेज ने लिखा है कि वे इसलिए लिखते है कि उनको पढ़कर अधिक से अधिक लोग उनको प्यार करें। हिन्दी के लेखक को और कुछ तो मिलता नहीं है, मेरी रचनाओं को कुछ पाठकों का प्यार मिल सके यही मेरी कोशिश होती है। मैं बार-बार कोशिश करता हूं कि कुछ ऐसा लिख सकूं जो पढ़नेवालों को अपना-अपना सा लगे। अपने लेखन की सार्थकता मैं इसी में मानता हूं। आखिर में कतील शिफाई का यह शेर--

यूँ ही नहीं मैं कहता रहता ग़ज़लें, गीतें, नज़्म कतील,
यह तो उनकी महफिल तक जाने का एक वसीला है।

****
( प्रभात से सबद के पाठक उनके स्तम्भ 'अनकहा-कुछ' से पूर्व-परिचित हैं। वे हिन्दी के महत्वपूर्ण युवा कहानीकार हैं। 'जानकीपुल' नाम से उनका कहानी-संग्रह ज्ञानपीठ से आया है। इस स्तम्भ के लिए उन्होंने विशेष आग्रह पर लिखा है। उनका आभार। वे शीघ्र ही सबद पर अपना स्तम्भ भी नियमित लिखेंगे। )
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जो दृश्य में नहीं...

10:56 pm

( एक अच्छे कवि की तरह व्योमेश शुक्ल भी अपनी कविता की बनाई हुई लीक पर चलने, उसे पीटने और उससे ''अभी कुछ और'' वसूलने का मोह छोड़, उसे बहुत सार्थक ढंग से तोड़ रहे हैं। यह प्रौढ़ता उनकी कविता में बहुत कुछ अप्रत्याशित की समाई के लिए जगह बनाती है। बल्कि यह ज़्यादा सही कहना होगा कि ''अप्रत्याशित'' ( उसके महज चौंकानेवाले अर्थों में नहीं, हालाँकि वह भी ) उनके यहाँ एक काव्य-मूल्य की तरह उपस्थित है। दृश्य, जो पहले इस तरह नहीं दिखे थे, को उनकी कविता की केंद्रीय शक्ति कहा जा सकता है। दिलचस्प यह है कि कविता और वैचारिक गद्य के लिए वह लगभग एक जैसी भाषा का इस्तेमाल करते दिखते हैं और उसके प्रति कैसी बहुमुखी सजगता बरतते हैं, उसका जीता-जागता प्रमाण है यह कविता। सबद के लिए यह गौरव की बात है कि उसे इस युवा कवि की एक और महत्वपूर्ण कविता को पहलेपहल प्रकाशित करने का अवसर मिला, वह भी बतौर १०० वां पोस्ट सबद अपने तमाम लेखकों-पाठकों और प्रेरणाओं के आगे नतशिर है। )


वक़्त का कि साइकिल का पहिया

कविता की भाषा क्या हो ? क्या यह तय करने की ज़रूरत है ? क्या यह तय करना उचित या नैतिक है ? या क्या इस तरह, कविता के बाहर उसे तय किया जा सकता है ? कविता की भाषा और दूसरी भाषाओं में क्या फ़र्क़ होते हैं ? फ़र्क़ होते भी हैं या नहीं ? अगर होते ही हैं तो इन दो फ़र्क़ भाषाओं के आपसी रिश्ते क्या होते हैं ? ऐसे सवालों के जवाब जानने के लिए ज़रूरी है कि हम जानें कि फ़िलहाल कविता की भाषा क्या है ? क्या वह कोई एक ही भाषा है ? या अनेक भाषाएँ हैं जिन्हें हम एक ही मानते रहते हैं ? क्या कविता की भाषा का वर्गीकरण संभव नहीं रह गया है ? और ऐसे वर्गीकरणों से साबित क्या होता है ? हिंदी साहित्य संसार का हाल यह है कि यहाँ कुछ कवियों को अभिधा, कुछ को लक्षणा और कुछ को व्यंजना का कवि माना जाता है, ख़ैर।

यही सब सोच-सोच कर ज़िन्दगी बीत रही थी कि एक दिन उसकी बेटी की साइकिल का पहिया बीच रास्ते में टेढा़ हो गया। धीमी सड़क पर औसत गति से चलती हुई दसवीं कक्षा में पढ़ रही बेटी की साइकिल पर पीछे से रिक्शे ने धक्का मार दिया था। शुक्र है कि बेटी को ज़्यादा चोट नहीं लगी। लेकिन दिक़्क़त यहीं से शुरू होती है। बेटी की साइकिल का पहिया पिता की कविता की भाषा में वक़्त के पहिये की तरह आता था और कवि-पिता की कविता में वह पहिया बेटी की साइकिल का पहिया टेढा़ होने के बहुत पहले से ही असाध्य रूप से टेढा़, विकृत और बेडौल वगैरह हो चुका था। आज जब भीड़ भरी सड़क पर हुई दुर्घटना में वाकई उसकी बेटी की साइकिल का पहिया टेढा़ हुआ है तो कवि-पिता को यह बात पता ही नहीं है और वह अपने थके हुए शरीर और टेढे पहिये वाली चेतना के साथ नौकरी कर रहा है। इधर लड़की के पास फ़ोन करने के पैसे भी नहीं हैं। वह अपनी टेढे पहिये वाली साइकिल को घसीटती हुई टेली़फो़न बूथ पहुँची। टेलीफो़न बूथ के मालिक ने उससे कहा कि तुम अपनी साइकिल में ताला लगाकर चाबी मुझे दे दो और साइकिल को घसीटती हुई या रिक्शे पर लादकर घर लेती जाओ। जब दो रुपये लेकर आओगी तो चाबी वापस कर दूंगा। बेटी अपनी बंद साइकिल के पिछले टेढे और तालाबंद पहिये को हाथों के ज़ोर से उठाये हुए और अगले पहिये को ज़मीन पर चलाती हुई दूर अपने घर की ओर जा रही है। यह एक अजीब दृश्य है। एक किशोरी का तालाबंद और टेढे पहिये वाली साइकिल को घसीटते हुए जाना। कवि जी ! आपकी बेटी की साइकिल का पहिया, यानी आपकी कविता में आने वाला वक़्त का पहिया टेढा़ हो गया है और आपको यह सब मालूम ही नहीं, हद है, दूर दफ़्तर में बैठे फाइलों में सर खपा रहे हैं। अगर आपको जल्द-से-जल्द यह सब न पता चला तो इस घटना के प्रतीकार्थों का क्या होगा ?

इतने में ही टेढे पहिये वाली तालाबंद साइकिल को घसीटती हुई घर की ओर जा रही बेटी के सामने एक बलिष्ठ आदमी आकर खडा हो जाता है। कवि जी ! अपनी टेढे पहिये वाली चेतना में इस आदमी को दाखिल कीजिये। वहाँ इसकी बहुत ज़रूरत है। यहाँ तो वह आपकी बेटी से पूछ रहा है कि ''क्या हुआ ? साइकिल लेकर कहाँ जा रही हो ?'' बेटी संक्षेप में सारी घटना बताती है। बलिष्ठ आदमी उसे दो रुपये देकर टेलीफो़न बूथ वाले से चाबी ले आने को कहता है। पहले तो बेटी रुपये लेने से इनकार कर देती है, फिर अत्यंत झिझक के साथ ले लेती है और साइकिल बलिष्ठ आदमी को पकड़ाकर टेलीफो़न बूथ वाले आदमी को दो रुपये चुकाने चली जाती है। कवि जी ! ध्यान दीजिये ! आपकी कविता को इस दृश्य की ज़रूरत है। लेकिन इतनी देर में बलिष्ठ आदमी साइकिल को ज़मीन पर लिटा देता है और टेढे पहिये को एक पैर और एक हाथ से दम लगाकर सीधा कर देता है। बेटी भी तब तक चाबी लेकर आ गयी है।

अब सीधे पहियों वाली साइकिल पर बेटी लहराती हुई घर जा रही है।

आप जानते हैं कवि जी ने अगले दिन क्या किया ? कवि जी अगले दिन बेटी को स्कूटर पर बिठाकर दुर्घटनास्थल पहुँचे और बलिष्ठ आदमी को ढूँढकर उसे साइकिल का पहिया, जो उनकी चेतना में वक़्त का पहिया था, सीधा करने के बदले मुस्कराकर कुछ रुपये देने की कोशिश करने लगे। बलिष्ठ आदमी ने बिना मुस्कराए रुपये नहीं लिए।

फ़िलहाल कवि जी ने वक़्त पर कविताएँ लिखना बंद करके साइकिल पर कविताएँ लिखना शुरू कर दिया है और बलिष्ठ आदमी अपने रोज़मर्रा के काम तो कर ही रहा है, ज़रूरत पड़ने पर सड़क पर लोगों की साइकिल का टेढा पहिया भी सीधा कर दे रहा है।
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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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सम्‍मुख - 1

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अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

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