सबद
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लूज़ वन्स फेस

2:34 pm

...
उसने लगभग घर से बाहर जाना बंद कर दिया। उसे दुपहरें अच्छी लगती थीं, वह अपने कमरे में बैठा रहता, खिड़की से आकाश को देखता रहता, अवसन्न और सूनी हवा में चीलें मंद गति में उड़ती रहतीं। पीला, अवसाद-भरा सूरज दिखाई देता।

खाने के बाद वह छोटी-सी नींद लेता, उठने पर आँखें धोता, फिर आलमारी से पुस्तकों को निकालने लगता। उसकी प्रिय पुस्तक थी, लाइफ ऑन अर्थ जिसे वह अक्सर पढ़ता था। उसके फोटोग्राफ भी उसे बहुत अच्छे लगते थे, कीड़े, जानवर और पक्षियों को देखता, जिन्हें पहले कभी नहीं देखा था और उसे आश्चर्य होता कि मनुष्य उनके बीच कितना अकेला प्राणी है।

जैसे ही सूरज धीरे-धीरे ढलने लगता और छतों पर रोशनी मंद पड़ने लगती, वह रसोई में जाकर चाय बनाता। यह वही रसोई थी, जहाँ बरसों पहले उसकी माँ खाना बनाया करती थीं। बरामदा भी वही था, जहाँ वह कुर्सी पर बैठी रहा करती थीं। वहीं से उन्होंने उसे आखिरी बार देखा था।

जब सर्दी बढ़ जाती, वह अपना लैंप जला लेता। यह टेबुल लैंप भी उसके भाई ने उसे उपहारस्वरूप दिया था। यह ''दो वक्तों के मिलने'' की घड़ी होती, जब वह अपने मित्रों को पत्र लिखता, जो अब काफी सुदूर देशों में रहते थे। वह थक जाता। वह कमरे से निकलकर अपनी छत पर आ जाता। आकाश पर तारे छितरे होते। गली में खेलते बच्चों की आवाजें सुनाई देतीं। नुक्कड़ की दुकान में एक लूले टेलर-मास्टर, जिनकी टांग नहीं थी, अब भी अपनी सिंगर मशीन पर ध्यानमग्न होकर झुके रहते।

वह गिलास में अपनी ड्रिंक बनाता। क्या संगीत का समय आन पहुँचा ? इस तरह दिन बीत जाता है और वह रात के आने की प्रतीक्षा करता है।

यह भयानक है, जब लेखक लिखना बंद कर देता है। उसके पास दुनिया को दिखाने के लिए कुछ भी नहीं रहता, सिवा अपने चेहरे के !

कहते हैं, पहले ज़माने में जापानी अपना ''चेहरा खो'' देते थे ( लूज़ वन्स फेस ), तो आत्महत्या कर लेते थे। यदि वह लेखक, जो लिख नहीं पाता, अपने जीवन का अंत कर डाले, तो उसका कारण बिलकुल उल्टा होगा -- अपना चेहरा दिखाने के अलावा उसके पास कुछ नहीं होता !
****

( निर्मल जी की डायरी से आप पहले भी एक अंश सबद पर पढ़ चुके हैं। आगामी ३ अप्रैल को उनका जन्मदिन पड़ता है। )

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बही-खाता : ५ : ज्ञानरंजन

11:09 am

‘यात्रा’ विचलित करती रही है

...अपनी कहानियों पर चर्चा करना...एक प्रकार से उनमें लौटना मुझे बहुत उत्साहवर्धक नहीं लगता है। वास्तव में कुछ समय के लिए भी वापस जाने की इच्छा नहीं होती है। ऐसा नहीं हुआ है कि मैंने छपकर आई अपनी किसी कहानी को पढ़ा हो। छपी कहानी दिल को एकाएक रद्द कहानी लगने लगती थी। केवल एक कहानी ‘संबंध’ को छोड़कर, जिसे मैंने कई बार कविता की तरह पढ़ा है, शायद उसे अभी भी पढ़ सकता हूं। यह सब क्यों होता है, या कैसे होता है, इसको खोजा तो जा सकता है पर इसमें कोई बुनियादी बात निकल पाएगी, यह कहना कठिन है।

मैं बचपन से उदास और आलसी रहा हूं। यह मेरी आंतरिक बाधा और समस्या है, इसलिए जब भी मैंने कोई कहानी लिखी, मुझे विस्मय हुआ अपने ऊपर, और बहुत खुशी भी हुई। ‘संबंध’ को मैंने एक सपाटे में लिखा। ‘घंटा’ और ‘बहिर्गमन’ कहानियों ने काफी परिश्रम करवाया, लेकिन उनको लिखते वक्त मैं अपूर्व ‘कॉमिकल’ मनःस्थिति में था। दूसरी कहानियों में आगे या पीछे साथ-साथ यातना थी, ठसपन या क्षोभ लेकिन ‘घंटा’ लिखते वक्त, मुझे विश्वास है कि मेरा दिमाग ‘मार्सिलो मॉस्त्रियानी’ के चेहरे की तरह रहा होगा जिसको देखने से लगता है कि उसने जन्म के साथ ही दुनिया को जान लिया होगा।

अपनी कहानियों के बारे में मेरा अनुभव यह है कि जब भी वे सामने आती थीं, मेरे साथियों ने चुप्पी और लगभग आतंकित हो जाने जैसा सलूक किया। मेरे अभिन्न मुझे घूरते थे और खेद अनुभव करते थे और घर में कहानी को माता-पिता लगभग छिपी जगहों में डाल देते थे। मेरे सभी भाई-बहिन वयस्क थे। आलोचक नेमिचंद्र जैन ने मेरी कहानियों के बारे में लिखा कि उनमें डरावना ‘अनंभव संसार’ है। साथी, संबंधी और आलोचक कहानियों को कहीं-न-कहीं मेरी निजी जिंदगी से जोड़ते थे।

हिंदी साहित्य संसार की यह एक अभूतपूर्व स्थिति रही है। मेरी ‘पिता’ कहानी की तारीफ में उसे पिता-विरोधी दर्शन के साथ जोड़ने की क्रांतिकारी आलोचना भी सामने आई। मैं उस तरीके को कभी पसंद नहीं कर सका, क्योंकि मेरी कहानियों में निजी मामले काफी हद तक झूठ भी थे-हां, वे सार्वजनिक के साथ स्वाभाविक रूप से जोड़े जा सकते थे।

इस प्रकार के व्यवहार से मुझे संदेह होने लगा है कि मेरी कहानियों में शायद अश्लीलता मौजूद है या फिर हमारे साथ सलूक करनेवालों में साहित्य-विरोध पर्याप्त मात्रा में घुसा हुआ है।

सच्चाई यह थी कि मेरा निजी जीवन काफी सुखद, प्रफुल्ल और मित्रवादी रहा है। किसी वास्तविक कहानी की रचना के पीछे कभी-कभी यह भी हुआ है कि एक कविता ने उसका निर्माण कर दिया। ‘दिवास्वपनी’ मेरी पहली प्रकाशित कहानी है। पहली लिखी कहानी ‘मनहूस बंगला’ थी। बाद में कहानी अचानक फिल्मी लगने लगी थी। ‘दिवास्वप्नी’ को भैरवप्रसाद गुप्त ने ‘कहानी’ में छापा था। इसकी पृष्ठभूमि में ‘लोर्का’ की एक मेरी प्रिय कविता की ताकत काम करती रही। यह कविता ‘दिवास्वप्नी’ के रूप में बदल गई।

यह विचित्र बात है कि जब मैं कमरे में बैठकर जोर-जोर से कविताएं पढ़ता हूं तो कहानी कहानी लिखने की उमंग उठती है अन्यथा जैसा पहले कहा है, मैं बहुत आलसी हूं।

लेखन के किशोरपन और उसके गुरूर से मुक्त होने के बाद जो नया दौर शुरू होता है, उसमें ‘यात्रा’, ‘घंटा’, ‘बहिर्गमन’ और ‘अनुभव’ कहानियां आईं हैं। ‘फेंस के इधर-उधर’ की जर्जर प्रति को भी संभालकर रखनेवाले मेरे बहुत से पाठकों को दूसरे कहानी-संग्रह ‘यात्रा’ की कहानियों से किंचित निराशा हुई। दृश्य-पटल इतना ज्यादा बदला कि काफी लोग उतना नहीं बदल सके।

‘यात्रा’ में वह व्यक्ति, ‘जो मृत्यु को आमने-सामने खड़ा होकर देखता है, एक संपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में प्रकाशित हुआ है।’ मेरी यह कहानी उतना ध्यान आकर्षित नहीं कर पाई जितना होता तो अच्छा था। इसमें झटका नहीं है, जलवा नहीं हैं, लेकिन यह कहानी मुझे काफी विचलित करती रही है।

...मैं लगातार इस छटपटाहट में हूं कि इसके बाद की कहानी लिखी जा सके।
****
( ज्ञानरंजन साठोत्तरी पीढ़ी के अग्रणी कथाकार और पहल के यशस्वी संपादक हैं। ज्ञानजी ने अपनी कहानियो पर यह टीप सन ८४ में राजकामल से प्रकाशित प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका स्वरुप लिखी थी। इसे यहाँ किंचित संपादन के साथ दिया जा रहा है। यह जितना इस स्तम्भ के लिए अपरिहार्य है उतना ही अपनी भाषा के एक जेठे कथाकार को उसकी कहे की '' ...मैं लगातार इस छटपटाहट में हूं कि इसके बाद की कहानी लिखी जा सके।...'' याद दिलाने का निमित्त भी ... खासकर तब जब उन्होंने पहल का प्रकाशन बंद कर दिया है। )
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पंकज चतुर्वेदी की नई कविता

2:48 pm
आखिरी बात

अल्लाह रक्खा रहमान को
संगीत-रचना के लिए ऑस्कर मिला
तो देश के दो बड़े हिन्दी अख़बारों के
स्थानीय संवाददाताओं ने
फ़ोन पर मुझसे सवाल किया :
क्या आपको लगता है
कि "स्लमडॉग मिलियनेयर" के
निर्माता-निर्देशक ब्रिटिश थे
इसलिए यह ऑस्कर मिल गया ?

मैंने कहा :
मुझे ऐसा नहीं लगता
क्योंकि पहले सत्यजीत राय को
सिनेमा की दुनिया में
उनके जीवन-भर के अवदान के लिए
ऑस्कर मिल चुका है

दूसरे, आप इस पर विचार कीजिए
कि गाँधी पर सबसे अच्छी फ़िल्म
रिचर्ड एटनबरो बनाते हैं
शंकर-पार्वती पर सबसे अच्छी कविता
आक्तोवियो पाज़ लिखते हैं
तो क्या हम अपने इतिहास
संस्कृति और मिथकों के प्रति
उतने संजीदा, समर्पित और निष्ठावान हैं
जितने कि जिन्हें आप
विदेशी कह रहे हैं ?

आखिरी बात यह कि
रहमान की यह महान उपलब्धि है
देश के लिए गौरव की बात है
वे गैर-हिंदू हैं
इसलिए यह भी एक मौका है
जब हिंदुत्ववादियों को
भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति का
सम्मान करना
उस पर नाज़ करना सीखना चाहिए

अलग-अलग बातचीत में
दोनों ही पत्रकारों ने कहा :
ठीक है, ठीक है,
आपने हमारे मतलब का
काफी कुछ कह दिया

अगले दिन दोनों अख़बारों में छपा
कि मैं भी इस बात से सहमत हूँ
कि फिल्मकार विदेशी थे
इसलिए ऑस्कर मिल गया
क्योंकि एटनबरो और पाज़ भी विदेशी थे
अगर्चे सत्यजीत राय का नाम भी छपा
लेकिन आखिरी बात नहीं छपी
जैसे मैंने वह कही ही नहीं थी
****
( पंकज चतुर्वेदी कविता और आलोचना में सामान रूप से सक्रिय हैं। इनके आलोचनात्मक लेखन के बाद सबद पर प्रकाशित होने वाली यह पहली कविता। )
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कोठार से बीज : ७ : साही

6:52 am




( विजयदेवनारायण
साही को प्रमुखतः उनके आलोचनात्मक अवदान के लिए ही याद किया जाता है। इसकी एक वजह यह रही कि जिस छठवें दशक और उसके आसपास की आलोचना के वे अनिवार्य सन्दर्भ बन गए और उसकी ओट में जितना सार्थक कवि-कर्म किया, उसे प्रकाशित करने में वे जीवनांत उतने ही संकोची रहे। उनकी बहुत सी कवितायें मरणोपरांत पुस्तकाकार आ सकीं। हालाँकि तीसरा सप्तक से एक कवि के रूप में नई कविता के सृजन परिदृश्य में वे सामने आ चुके थे, पर कवि, आलोचक और समाजवादी कार्यकर्ता की तिहरी जिम्मेदारी निभा रहे साही की कवि-छवि इसमें कहीं दब गई। साही ने अत्यन्त मूल्यवान कवितायें लिखी हैं। उसमें एक सत्याग्रही साहस और नम्रता है। इन मायनों में जिस दौर में ये कवितायें लिखी गईं थीं, उस दौर की काव्य-भाषा और भंगिमा की ये सहज विलोम भी हैं। कोठार से बीज में इस बार साही की कवितायों से ही एक चयन। )
****

दे दे इस साहसी अकेले को

दे दे रे
दे दे इस साहसी अकेले को
एक बूँद।

सन्ध्या
ओ फ़कीर चिड़िया
ओ रुकी हुई हवा
ओ क्रमशः तर होती हुई जाड़े की नर्मी
ओ आस पास झाड़ों झंखाड़ों पर बैठ रही आत्मीयता

कैसे ? इस धूसर परिक्षण में पंख खोल
कैसे जिया जाता है ?
कैसे सब हार त्याग
बार-बार जीवन से स्वत्व
लिया जाता है ?
कैसे, किस अमृत से
सूखते कपाटों को चीर चीर
मन को निर्बन्ध किया जाता है ?

दे दे इस साहसी अकेले को।
****
प्रार्थना : गुरु कबीरदास के लिए

परम गुरु
दो तो ऐसी विनम्रता दो
कि अंतहीन सहानुभूति की वाणी बोल सकूँ
और यह अंतहीन सहानुभूति
पाखंड न लगे।

दो तो ऐसा कलेजा दो
कि अपमान, महत्वाकांक्षा और भूख
की गांठों में मरोड़े हुए
उन लोगों का माथा सहला सकूँ
और इसका डर न लगे
कि कोई हाथ ही काट खायेगा।

दो तो ऐसी निरीहता दो
कि इस दहाड़ते आतंक के बीच
फटकार कर सच बोल सकूँ
और इसकी चिन्ता न हो
कि इस बहुमुखी युद्ध में
मेरे सच का इस्तेमाल
कौन अपने पक्ष में करेगा।

यह भी न दो
तो इतना ही दो
कि बिना मरे चुप रह सकूँ।
****
सूरज

साधो तुमको विश्वास नहीं होगा
रोज सबेरे अभी भी सूरज निकलता है
गोल गोल लाल लाल
उसकी बड़ी-बड़ी आँखें हैं
फूले-फूले गाल
और भोला-सा मुँह
मेरे जी में आता है
उसे गोद में ले लूँ
और स्याही से उसकी मूंछे बनाऊं।

सारी दुनिया तो उसके ताप से
जल रही है
साधो भाई
मैं अपना यह वत्सल भाव
किसको सुनाऊं ?
****
चमत्कार की प्रतीक्षा

क्या अब भी कोई चमत्कार घटित होगा ?
जैसे कि ऊपर से गुजरती हुई हवा
तुम्हारे सामने साकार खड़ी हो जाय
और तुम्हारा हाथ पकड़कर कहे
तुम्हारे वास्ते ही यहाँ तक आई थी
अब कहीं नहीं जाउंगी।

या यह दोपहर ही
जो, हर पत्ती, हर डाल, हर फूल पर लिपटी हुई
धीरे-धीरे कपूर की तरह
बीत रही है
सहसा कुंडली से फन उठाकर कहे --
मुझे नचाओ
मैं तुम्हारी बीन पर
नाचने आई हूँ।

यह यह उदास नदी
जो न जाने कितने इतिहासों को बटोरती
समुद्र की ओर बढ़ती जा रही है
अचानक मुड कर कहे--
मुझे अपनी अँजली में उठा लो
मैं तुम्हारी अस्थियों को
मुक्त करने आई हूँ।

या इन सबसे बड़ा चमत्कार
हवा जैसे गुजरती है गुजर जाय
दोपहर जैसे बीतती है बीत जाय
नदी जैसे बहती है बह जाय
सिर्फ तुम
जैसे गुजर रहे हो गुजरना बंद कर दो
जैसे बीत रहे हो बीतना बंद कर दो
जैसे बह रहे हो बहना बंद कर दो।
****

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कला का आलोक : ३ : धीरेन्द्र मोहन तिवारी

11:39 pm
( धीरेन्द्र के ये कविता चित्र कलाओं की आपसदारी के सुंदर नमूने हैं। यों तो कला जीवन से गहरे प्रतिकृत होती है पर वह अपनी भगिनी विधाओं से भी उतना ही सीखने-जानने की अभिलाषा और स्वप्न संजोती है जितना जीवन से। धीरेन्द्र के यहाँ यह स्वप्न कविता की चमकदार पंक्तियाँ ढूंढकर उसे चित्र में घटाने से कुछ आगे का है। इसमें उनकी वैचारिकता और कला-पक्ष, दोनों उभरकर सामने आते हैं। बनारस में पले-बढ़े इस कलाकार का मन इन दिनों मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय के काव्य-चित्र बनाने में रमा हुआ है। सबद के लिए उन्होंने अपनी कला-निधि से कुछ चित्र भिजवाए इसके लिए उनका अत्यन्त आभार। ये चित्र क्रमशः मारीना स्वेतायोवा, ज्ञानेन्द्रपति, त्रिलोचन और गोरख पाण्डेय के काव्यांशों से प्रेरित हैं। इस स्तंभ में इससे पहले आप चित्रकार हकु शाह के सृजन लोक से परिचित हो चुके हैं। )








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मंगलेश डबराल पर पंकज चतुर्वेदी

9:31 pm

संगतकार
नहीं

'शायद' मंगलेश डबराल का प्रिय शब्द है। इससे जुड़ा एक दिलचस्प वाकि़आ याद आता है। हम लोगों के अग्रज मित्र वी.के.सौनकिया ने कुछ साल पहले एक नयी साहित्यिक पत्रिका निकाली थी--आशय। हालाँकि यह अनियतकालिक है, मगर पत्रिकाओं की भीड़ में आज अपनी विशिष्ट जगह और पहचान बना चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में मंगलेश जी के घर जब भी गया, अक्सर उन्होंने पत्रिकाओं के बड़े-से ढेर की ओर इशारा करके बहुत परेशान होकर पूछा--''इतनी ज्य़ादा पत्रिकाएँ आ रही हैं, बताओ, मैं इन्हें कैसे पढूँ?'' मैं कोई जवाब नहीं दे पाता। फिर उनका सवाल--''कोई इन्हें कैसे पढ़ सकता है?'' मैं सिर्फ़ एक उद्विग्न सहमति में सिर हिलाता हूँ।

बहरहाल, 'आशय' का प्रवेशांक उन्हें भिजवाया था, तो एक दिन मैंने फ़ोन पर पूछा--''पत्रिका मिली?'' उन्होंने तुरन्त कहा--''हाँ, मिली, पर तुम लोगों ने उसका नाम 'शायद' क्यों रखा है?'' दरअसल पत्रिका के मुखपृष्ठ पर सुन्दर डिज़ाइन में छपा था--'आ श य', मंगलेश जी को याद रहा--'शायद'। इससे पता चलता है कि दिल्ली जैसे महानगर में--जिसे उनके प्रिय कवि-मित्र असद ज़ैदी ने 'एक हृदयविदारक नगर' कहा है--मंगलेश कितने असमंजस, अनिश्चय, दुविधा, हिचक और अफ़सोस के साथ रहते हैं। हालचाल पूछने पर एक बार उन्होंने किसी विदेशी कवि की यह अमूल्य बात मुझे बतायी थी--''इन दिनों मैं अवसाद में हूँ, पंकज, पर उसके बारे में किसी ने कहा है कि अगर आप अवसाद में हैं, तो इसका मतलब है कि आप सही हैं।''

यही वह बात है, जो मंगलेश और उनके दौर के कवियों को बड़ा बनाती है--मसलन् आलोकधन्वा, गोरख पाण्डेय, वीरेन डंगवाल, असद ज़ैदी या ऐसा ही कोई नाम। यानी एक यातना, जिससे कवि गुजऱ रहा है और उसकी वजह है--मूल्यों और विचारों के लिए उसकी प्रतिबद्धता। एक ऐसे समय में, जब प्रतिबद्ध होना किसी 'आत्मघात' से कम नहीं है। १९९२ में मंगलेश ने ही अपनी मशहूर कविता 'ऐसा समय' में लिखा था--''यह ऐसा समय है/जब कोई हो जा सकता है अंधा लँगड़ा/बहरा बेघर पागल।''

१९९२ से ९५ के दरमियान मैं जेएनयू में पढ़ता था और पटना से आये मेरे मित्र इरफ़ान ने बताया था कि आलोकधन्वा कहते हैं, ''मंगलेश डबराल फूल की तरह नाज़ुक और पवित्र हैं।'' यह इतनी बड़ी बात थी कि इसे दिमाग़ से समझने की बजाए दिल से, बल्कि अपने समूचे वजूद से सत्यापित करने की ज़रूरत थी। उस समय मंगलेश जी से परिचय नहीं था, पर बाद के वर्षों में उनका जो भी थोड़ा-बहुत सान्निध्य नसीब हो पाया, उसमें मुझे यह कहते हुए एक दुर्लभ कि़स्म की खुशी है कि उनकी साहित्यिक शख्शियत के भीतर मैंने हमेशा एक बहुत सच्चे, पवित्र, संजीदा, निश्छल और संवेदनशील इंसान को महसूस किया।

विचार और संवेदना का जो तरल पारदर्शी आलोक उनकी कविता में है, वह उनके होने में भी है। महज़ इत्तिफ़ाक़ नहीं कि मलयज ने लिखा था--''बौने जीवन से बड़ी कविता पैदा नहीं हो सकती'' और गद्य की अपनी ताज़ा किताब ''कवि का अकेलापन'' में मंगलेश डबराल लिखते हैं--''कवि को कविता के भीतर और बाहर एक साथ रहना होता है।...दो दुनियाओं में एक साथ उसके पैर हैं। उसका समूचा अस्तित्व। एक का चूकना दूसरे का ओझल होना है।''

प्रसंगवश, मित्रों के बीच बहस-मुबाहसे में मंगलेश अपनी पीढ़ी के कवियों के संदर्भ में कभी-कभी एक कि़स्म के आत्म-स्वीकार के लहज़े में कहते हैं--''हममें-से कोई बड़ा कवि नहीं हो पाया!'' लेकिन यह सच नहीं है। अभाग्यवश, हिन्दी में कुछ ऐसे लोग हैं, जो उनके इस बयान को अभिधा में ग्रहण करके अपने 'मत' के समर्थन में बाक़ायदा इसकी व्याख्या, प्रचार या 'इस्तेमाल' कर सकते हैं। इसकी वजह, जैसा कि रवीन्द्र त्रिपाठी ने 'कथादेश' में हाल में छपे अपने एक लेख में हिन्दी आलोचना की बुनियादी समस्या को बिलकुल सही रेखांकित किया है, यह है कि अब इस दुनिया में ऐसे लोग सक्रिय हैं, जो शब्दों का ठीक-ठीक अर्थ करना भी नहीं जानते।

मुझे लगता है कि सवाल सिर्फ़ जानने का नहीं, चाहने का भी है और इस मामले में 'ज्ञान' की प्रकृति 'चाहत' के मिज़ाज पर निर्भर है। मसलन् राजेन्द्र यादव ने लिखा है कि तुलसीदास में छद्म-विनम्रता थी। जैसे तुलसी का यह कहना--''कवि न होउँ नहिं बचन प्रवीनू । सकल कला सब विद्या हीनू।।'' अब इस कथन को ही आप यथार्थ मान लें, तो इसमें आपका ही फऱेब और चालाकी नजऱ आती है, तुलसी की नहीं। आख़िर अभिमान और विनयशीलता जबरदस्त द्वन्द्व भी कोई चीज़ है, जो सबसे सशक्त और खूबसूरत अंदाज़ में ग़ालिब के यहाँ व्यक्त हुई है--''हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे / बेसबब हुआ ग़ालिब दुश्मन, आस्माँ अपना।''

अब इसे सराहने की संवेदना उसी में हो सकती है, जिसमें भाषा के अंत:सलिल संगीत की कोई समझ हो। जो लोग सिर्फ़ शोर मचाना जानते हों और शोर को ही साहित्य का पर्याय मानते हों; उन्हें क्या मंगलेश की कविता पसंद आ सकती है, जिसकी मूल प्रतिज्ञा ही है--''जो कुछ भी था जहाँ-तहाँ हर तरफ़/शोर की तरह लिखा हुआ/उसे ही लिखता मैं/संगीत की तरह।'' किसी ज़माने में दिल्ली 'साहित्यिक राजधानी' हुआ करती थी, जफ़ऱ के शब्दों में आज वह साहित्य का 'उजड़ा दयार' है। यहाँ रहनेवाले मीडिया मैनेजमेण्ट में कुशल हिन्दी के तथाकथित शीर्षस्थ एवं स्वनामधन्य साहित्यकार सत्ता से अपनी नापाक दुरभिसन्धियों, प्रतिगामी हरकतों और वक्तव्यों के चलते आम हिन्दी जन-समाज की नजऱों में अपनी प्रासंगिकता और विश्वसनीयता गँवा चुके हैं।

ऐसे में, मंगलेश डबराल अपनी उत्कृष्ट कविता और वैचारिक तथा संवेदनशील गद्य के ज़रिए प्रगतिशील चेतना से सम्पन्न साहित्यिकों की बिरादरी में एक प्रमुख और अग्रगामी भूमिका में आ गये हैं। उन्हीं की चर्चित कविता 'संगतकार' का सहारा लेकर कहें, तो यह 'संगतकार' की नहीं, बल्कि 'मुख्य गायक' की भूमिका है। वैसे भी कविता में व्यक्त विचार को कवि-व्यक्तित्व पर घटित कर लेने की आसान, मगर धोखादेह सुविधा से आलोचकों को अपनी रक्षा करनी चाहिए। यह सही है कि कविता में मंगलेश अपनी बात एक ''सुन्दर कमज़ोर काँपती हुई आवाज़'' में कहना पसंद करते हैं; क्योंकि उसकी शक्ति, सुंदरता, गहनता और मार्मिकता उनके इसी लहज़े पर मुन्हसिर है। इसे आप उनके यहाँ मौजूद रूप और अन्तर्वस्तु की 'डायलेक्टिक्स' भी कह सकते हैं और लोकतन्त्र का तक़ाज़ा भी, जिससे कि उनकी कविता की संस्कृति निर्मित होती है। उनके शब्दों में कहें, तो वह ''ज़ोरों से या ठंडी डपटती आवाज़ में'' बोलना नहीं चाहते, क्योंकि इस तरह कही गयी ''बातें याद रहती हैं दिमाग़ में बजती हुईं/हम ढोते रहते हैं उनका बोझ।''

सच पूछिये, तो मंगलेश रघुवीर सहाय की परम्परा को आगे बढ़ाते हैं, जिन्होंने कहा था-- ''...मैं कभी ताक़त से नहीं बोला/उम्मीद से बोला कि शायद मैं सही हूँ/ताक़त से नहीं कि चाहे सही हूँ या नहीं हूँ/बोल मैं ही सकता हूँ।'' यों हम समझ सकते हैं कि मंगलेश डबराल के अंदाज़ेबयाँ में जो संकोच, विनयशीलता और कोमलता है; वह सिर्फ़ उनकी मज़बूत, सुंदर और उदात्त विचारशीलता का दूसरा पहलू है। दिलचस्प है कि उनकी कविता इस द्वन्द्वात्मक संहति का रूपक भी मुहैया करती है--''एक स्त्री के कारण एक स्त्री/बची रही तुम्हारे भीतर।''

महाकवि भवभूति ने राम सरीखे लोकश्रेष्ठ जनों के चित्त के संदर्भ में जो बात कही थी; वह--मैंने तो यह पाया ही है और लोग अपने निजी अध्यवसाय और अनुभव से जानते होंगे--कवि और मनुष्य मंगलेश डबराल दोनों (जो दरअसल एक हैं) के सम्बन्ध में भी सच है--''वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि'', यानी वह वज्र से भी कठोर और फूल से भी कोमल हैं, बल्कि इन दोनों में अन्योन्याश्रित नाता है।

उनकी जो सादगी, शालीनता और संवेदनशीलता है; वह सिर्फ़ एक बड़े कवि की निशानी है। उनके यहाँ जिस दुख, विवशता और अकेलेपन का बार-बार इज़हार मिलता है; वह एक मूल्यहीन होते जाते समय में उनके मूल्यनिष्ठ होने का ही नतीजा है। एक ऐसे भीषण समय में, जब कवि भी अप्रत्याशित रूप से कॅरियरिस्ट जमात में शामिल हैं, यह कहनेवाले मंगलेश डबराल शायद हिन्दी के अकेले कवि हैं--''मैं चाहता हूँ कि ...कवियों में बची रहे थोड़ी लज्जा।''
****

( मंगलेशजी की षष्टिपूर्ति पर उनके व्यक्तित्व -कृतित्व को ध्यान में रखकर लिखे गए इस महत्वपूर्ण लेख की ओर ध्यानाकर्षण के लिए सबद कवि व्योमेश शुक्ल का आभारी है। एक आभार पाखी पत्रिका के प्रति भी जहाँ यह लेख हाल ही में दोषपूर्ण ढंग से छपा और इस वजह से सबद को इसे पुनर्प्रकाशित करने के लिए लेखक को भेजने की प्रेरणा हुई। इसके लेखक पंकज चतुर्वेदी की ख्याति प्रमुख युवा कवि-आलोचक की है। सबद के जरिये ब्लॉग के लिए पहली बार उन्होंने कुछ लिखने की सदाशयता दिखलाई थी। अब उनका महत्वपूर्ण लेखन इस माध्यम से भी लगातार सामने आ रहा है, जो सुखद है। )

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एक थीं सोनाली दास गुप्ता और एक थे...

10:54 pm

वह साल १९५६ था। प्रधानमंत्री नेहरू के बुलावे पर प्रसिद्द इटालियन फ़िल्मकार रोबर्टो रोज़ीलिनी भारत आए थे। तब एक नए प्रजातंत्र के रूप में उभरते भारत पर फ़िल्म बनाने। इस आगमन के पीछे जितनी रोज़ीलिनी की भारत में दिलचस्पी थी, उतनी ही इटालियन नियो रियलिस्म के इस पुरोधा की तत्कालीन असफलता और निजी तौर पर अपनी दूसरी पत्नी और हॉलीवुड सुपरस्टार इंग्रिड बर्गमैन से रिश्तों में आई खटास भी थी। जिन्होंने उनकी रोम ओपन सिटी या इअर जीरो सरीखी फिल्में देखी थी और जो उनके नाजीवाद की नाक के नीचे साहसिक फिल्में बनाने के कारण मुरीद बने थे वे रोज़ीलिनी की इस नियति की कल्पना तक नहीं कर सकते थे। स्वयं रोज़ीलिनी के लिए यह स्थिति अकल्पनीय और अंततः दुखद और त्रासद बन गई थी। ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री से हुई एक मुलाकात के बाद मिले न्योते को उन्होंने तुंरत स्वीकार कर लिया और कुछ अलग करने की मंशा लिए भारत आए। इससे पहले अपने फ़िल्ममेकर मित्र जॉन रेनुआ की कोलकाता की पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्म रिवर से भी रोज़ीलिनी गहरे मुत्तासिर थे।

लेकिन
रोज़ीलिनी के लिए भारत में कुछ ऐसा घटित होनेवाला था, जिससे उनकी ही नहीं कम से कम तीन लोगों की ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल जानेवाली थी। आपको मैं यह सब अगर रोज़ीलिनी की भारत यात्रा पर दिलीप पडगांवकर की हालिया लिखी पुस्तक ( अंडर हर स्पेल ) के हवाले से सुनाऊंगा तो उसमें जो कबीलेलुत्फ़ है वह शर्तिया मेरे लेखन की रुखाई में गुम जाएगा। इसलिए फिलहाल दिलीप पडगांवकर के अपने मित्र और प्रिय फिल्मकार पर लिखी विद्वतापूर्ण पुस्तक के हवाले और अपनी सूत कताई बंद कर मैं आपको उस मकबूल फनकार के साथ छोड़ता हूँ जिसके हाथ में कूची और कलम एक जैसी असरदार है। आप उन्हें हुसेन के नाम से जानते हैं। इससे ज़्यादा उनका परिचय देने की काबिलियत मुझमें नहीं। आप तो बस उनकी ज़बानी आगे की कहानी सुनिए, क्योंकि ये हजरत भी पूरे फसाने में एक अहम् किरदार निभा रहे हैं।

:: इंडिया ५६ की फिल्मिंग शुरू। उनके ( रोज़ीलिनी के ) कैमरामैन मशहूर फ़िल्म वार एंड पीस के टोंटी। उनकी स्क्रिप्ट गर्ल कलकत्ता की सोनाली जो हरीदास गुप्ता फ़िल्ममेकर की बीवी थी। रोज़ीलिनी हिन्दुस्तान आते ही यह दावा कर बैठे कि उन्हें दो इंसानों से इश्क हो गया। औरत सोनाली दास गुप्ता और मर्द एम.एफ़.हुसेन। पहली बार हुसेन की पेंटिंग भोलाभाई देसाई स्टूडियो में देखी और पन्द्रह कैनवस का रोल रोम रवाना किया। फिर हुसेन को साथ ले गए मैसूर के जंगल, हाथी पर सवार फ़िल्म की शूटिंग करते रहे। 

सोनाली से इश्क का बुखार भी तेज़ हो चला। पहले 'बाम्बे फ़िल्म इंडस्ट्री' में हलचल मची, फिर अंतरराष्ट्रीय स्कैंडल बना। सोनाली ने बम्बई ताज होटल में अपने पाँच साल के बच्चे को लेकर रोज़ीलिनी के कमरे में पनाह ली। हुसेन की दोस्ती के लंबे हाथ बावजूद 'धमाकाखेज़ हालत' के छोटे नहीं हो पाए।

रोज़ीलिनी
के प्लान के मुताबिक सोनाली को बुरका पहनाकर रात के अंधेरे में ताज होटल से हुसेन बम्बई सेंट्रल रेलवे स्टेशन ले गए। दो टिकट मिस्टर और मिसेज़ हुसेन के नाम से कूपे बुक किया गया, लेकिन कूपे के साथ ही लगे डिब्बे में नामालूम कैसे
'टाइम' और 'लाइफ' के लंबे-लंबे 'ज़ूम लैंस' पहुँच गए। पर मीडिया की क्या मजाल, जबकि सोनाली का बुरका उठाने की जुर्रत हवा का झोंका भी नहीं कर सका। सियाह बुर्के की बगल में सफ़ेद दाढी जो रोशन थी। 'टाइम' और 'लाइफ' ने लाख कोशिश की, कि सोनाली और रोज़ीलिनी का साथ फोटो हाथ आ जाए, इसके लिए पाँच हज़ार का चेक भी दूर से दिखाया। 

फ्रंटियर मेल तूफ़ान की तरह चली मगर बजाए दिल्ली रेलवे स्टेशन के निज़ामुद्दीन प्लैटफॉर्म पर चुपके से दोनों उतर पड़े। स्टेशन के बाहर प्लान के मुताबिक एक इमली के पेड़ तले काली अम्बेसडर गाड़ी इगनेशन ऑन किए खड़ी थी। लोगों की नज़रें सिर्फ़ दाढ़ी और बुर्के पर रही, कार की नंबर प्लेट पर नहीं। कार वहां से यह जा वह जा और पालम एयरपोर्ट पर 'अलितालिया' का हवाई जहाज ऐसे खड़ा दिखाई दिया जैसे उस पर बंगाली हुस्न का जादू चल गया है और वह सोनाली को अगवा करने पर तुला है। ::


तो ये थे हुसेन। यारों के यार। आगे का किस्सा यह है कि इंग्रिड बर्गमैन से तलाक़ के बाद सोनाली से रोज़ीलिनी ने विवाह कर लिया और सोनाली को इस तरह बाकायदा इटालियन नागरिकता भी प्राप्त हो गई। रोज़ीलिनी ने अपने ढलान के वर्षों में जिस तरह इंग्रिड बर्गमैन के साथ अपने ढंग की फिल्में बनाई और फ्लॉप रहे उसी तरह की फेलियर सोनाली के साथ भी जारी रही। पर सोनाली ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति पाने की अपनी महत्वाकांक्षा पर काबू पा लिया था, जिसमें ग्लैमरस बर्गमैन नाकाम रही थीं। बर्गमैन ने इसी कारण रोज़ीलिनी से अलग होकर हॉलीवुड का फिर से रुख कर लिया, जबकि सोनाली उनके साथ अंत तक रहीं।

यह विडंबना ही है कि इटली से बहू बन कर आईं सोनिया गाँधी को भारत की जनता ने प्यार और सम्मान दिया, उन्हें प्रधानमंत्री के पद के योग्य भी माना, जबकि रोज़ीलिनी के निधन के बाद जब सोनाली ने इटली में स्थानीय स्तर के चुनाव लड़ने की इच्छा व्यक्त की तो उन्हें बाय बर्थ इटालियन न होने के कारण इसकी इजाज़त नहीं दी गई। रोज़ीलिनी के बीस वर्षों के साथ के अलावा वहां सोनाली के लिए कुछ भी न था।
****


( हुसेन का अंश वाणी प्रकाशन से छपी उनकी आत्मकथा से साभार।)
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कवि कह गया है : ३ : चंद्रभूषण

3:07 pm

कविता कहने से ज़्यादा जानने की विधा है

अपना खाना कच्चा-पक्का जैसा भी बना लेने का हक हर किसी को है, हालाँकि ज्यादातर लोग इस हक को छोडऩे में ही अपनी इज्जत समझते हैं। मुझे अपना खाना पकाना हमेशा अच्छा लगता है, और कोई तैयार हो तो उसे चखाना भी। ऐसा ही रिश्ता मेरा कविता के साथ भी है। यह क्या होती है, कैसी होती है, कब अच्छी और कब बुरी होती है, इससे मुझे कुछ खास मतलब नहीं है। मेरे ख्याल से तैरने, साइकल चलाने या खाना पकाने की तरह अगर अगर कविता का कौशल भी किसी के पास हो तो इससे जिंदा रहने में उसे काफी सहूलियत हो सकती है।

इस बात के बाहरी मायने जगजाहिर हैं। इसे साध कर कई लोगों ने काफ़ी इज्ज़त और रुपया-पैसा भी कमाया है। लेकिन मेरे लिए बाहरी से ज्यादा काम के इसके भीतरी मायने रहे हैं। पहले जब अकेलापन उधराई हुई मधुमक्खियों कीतरह मुझे छोंप लेता था तब मैं कोई कविता चिट्ठी में लिख कर अपनी दोस्त के पास भेज दिया करता था। अब जब मैं दुनियादारी से बिलकुल ही घिर जाता हूं और अकेलापन किसी गुम चोट की तरह भीतर ही भीतर उमड़ रहा होता है तो कविता उसे पहचानने में मेरी मदद करती है। काश, मेरे लिए यह काम आटा मांडऩे या भुर्ता पकाने जितना सहज होता। एक पंक्ति या दो शब्द भी लिख लेता तो मन बहुत हल्का हो जाता। लेकिन यह तो महीनों-महीनों, सालोंसाल नहीं हो पाता।

पुराना दुख दूर नहीं होता और एक नया दुख और जुड़ जाता है- मैं शायद कुछ लिख सकता था, उसे न लिख पाने का दुख। दुनिया को देखने, समझने के लिए इतनी मेहनत करता हूं। इतना सारा रोज पढ़ता हूं, नौकरी के लिए हर दिन कम से कम हजार शब्द लिखता भी हूं, लेकिन कविता की नजर से दुनिया जितनी पल्ले पड़ती है, उसका हजारवां हिस्सा भी और तरीकों से समझ में नहीं आती।

मेरे लिए कविता कुछ कहने से ज्यादा कुछ जानने की विधा है। यह छूने से ज्यादा छूना, सूंघने से ज्यादा सूंघना, चखने से ज्यादा चखना और याद करने से ज्यादा याद करना है। मेरे लिए मेरा कविता न लिखते हुए जीना कुछ कम समझदार, कुछ कम संवेदनशील होकर जीना है। जब भी कुछ लिख लेता हूं तो यह सपने में खुद को उड़ते हुए देखने जैसा होता है। जहाज की तरह नहीं, चिडिय़ा की तरह भी नहीं, इंसान की तरह अपने हाथ-पैरों से जमीन से बस जरा सा ऊपर बेहद मुलायमियत के साथ उड़ते हुए खुद को देखना। बाहर उतना ही हल्का, भीतर उतना ही भारी। भीतर उतना ही भरा, बाहर उतना ही खाली।

कविता लिखते हुए कुछ देर को चीजों और लोगों के साथ, अतीत और भविष्य साथ अपना रिश्ता बदल जाता है। लेकिन किसी अच्छे सपने की तरह ही यह अनुभूति भी ज्यादा समय तक साथ नहीं रहती। मेरे ख्याल से हर लिखने वाले के लिए कविता के मानी अलग होते होंगे। खुशकिस्मत हैं वे, जो आंख बंद करते हैं और नींद उन तक पहुंच जाती है, और वे भी, जो जब जी करता है, लिख लेते हैं।

मैं भी कभी उनकी कतार में खड़ा होऊं, यह मेरी महत्वाकांक्षा है। जैसे यह कि कभी विधिवत गणित की पढ़ाई शुरू करूँ, या दुबारा होलटाइमर बन कर भोजपुर चला जाऊं।
यह सब अब कभी नहीं होना, फिर भी इच्छा तो है...
****

( न तो चंद्रभूषण और न ही उनका कवि-विचारक आपके लिए अपरिचित हैं। उनके ब्लॉग पहलू में शाया कविताओं के अलावा इतनी रात गए शीर्षक से संकलित बेसंभाल शिल्प में लिखी गई उनकी कई उम्दा कविताओं के पीछे रमा कवि-मन भले यहाँ कुछ हद तक अलग स्वर में बोल रहा है। इसमें कविता के होने की प्रसन्नता और उसके न हो पाने की पीड़ा एक साथ व्यक्त हुई है। अपने तइं कविता के बारे में यह टिप्पणी उपलब्ध कराने के लिए सबद उनका आभारी है। इस स्तंभ में इससे पूर्व आप बोर्हेस और संजय कुंदन को पढ़ चुके हैं। )

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द रेड बलून

6:30 pm

एक हैं छोटे। पास्कल नाम है इनका। पेरिस में रहते हैं। अपनी दादी के साथ। प्यारे और भले-भले से। कद-काठी से ऐसे कि गोद में भर लेने का जी करे। छोटे हैं, हालाँकि इतने नहीं कि ख़ुद से स्कूल भी न जा सकें। तो छोटे रोज़ की तरह उस दिन भी स्कूल चले। घर की बगलवाली गली में दाखिल होते ही देखते क्या हैं कि एक लाल गुब्बारा लैंप-पोस्ट से अटका पड़ा है। छोटे को लगा मानो वह उन्हीं की राह देख रहा है। वे बिना एक पल गँवाए लैंप-पोस्ट नाप कर गुब्बारे को उसके साथ लगे फुदने से पकड़ लेते हैं। लाल गुब्बारा भी छोटे के साथ कुछ ही देर में हिल-मिल जाता है और छोटे उसे लिए स्कूल की राह पकड़ते हैं।

पर छोटे को गुब्बारे सहित बस में सफर करने की इजाज़त नहीं मिली। उदास छोटे गुब्बारा छोड़ने की बजाय बस छोड़ देते हैं और पेरिस की गलियों में अपने नए दोस्त के साथ फुदकते हुए स्कूल पहुँचते हैं। वहां गुब्बारे को सफाई करनेवाले के जिम्मे सौंप कर अपनी क्लास जाते हैं। इधर गुब्बारे को छोटे से बड़े लोग कैम्पस से बहार करने में लग जाते हैं। घबराया गुब्बारा जब छोटे के पास पहुँचता है तो गुस्सैल मास्टरजी छोटे को इसकी सजा के तौर पर एक अलग कमरे में बंद कर देते हैं। अपने दोस्त के साथ हुई ज्यादती को गुब्बारा बर्दाश्त नहीं कर पाता और मास्टरजी को शहर भर तंग करता है। मास्टरजी चाह कर भी गुब्बारे का रंग नहीं बिगाड़ पाते।

अब छोटे घर में हैं। दादी गुब्बारे को बाहर की चीज़ समझकर बालकनी से बाहर का ही रास्ता दिखा देती हैं। छोटे फिर से उदास। दादी की नज़र बचाकर बालकनी में आते हैं, जहाँ लाल गुब्बारा उनकी बेसब्र प्रतीक्षा कर रहा होता है। उससे मीठी अरज करते हैं : बलून, यू मस्ट ओबे मी एंड बी गुड। गुब्बारा छोटे का कहा मान बाहर रहता है। घर में भी और स्कूल में भी। छोटे कभी-कभी उसे आँख बचाकर अपने पास ले आते हैं। बस में भी छोटे को अब गुब्बारे का फुदना नहीं पकड़े रहना पड़ता। बस के साथ-साथ छोटे की निगाह में गुब्बारा भी सफर करता है। शहर में जहाँ-जहाँ छोटे जाते हैं, गुब्बारा परछाई बना फिरता है। कभी-कभी दोनों एक-दूसरे से छुपम-छुपाई भी खेलते हैं। छोटे उसे आंधी-पानी से बचाए रखते हैं, गुब्बारा छोटे को दिन भर हंसाते-खेलाते रहता है।

लेकिन छोटे के कुछ हमजोलियों को उनका लाल गुब्बारा चुभता है। वे एक दिन गुब्बारे को छोटे के साथ छुपम-छुपाई के खेल के दरम्यान ही घेरते हैं। छोटे को दहशत होती है। लड़कों में जो बड़ी उमर के हैं उनके हाथों में गुलेल है। वे गुब्बारे पर निशाना साधते हैं। गुब्बारा कलाबाजियां खाते हुए ख़ुद को बचाता है। बाद में छोटे उसकी हिफाज़त में लगते हैं। उसे लिये लिये तमाम गलियों में हिरन की चाल से घुसते जाते हैं। पर गुब्बारे की जान के पीछे पड़े बच्चों का हुजूम अंततः छोटे और गुब्बारे को इस दौड़ में परास्त कर देता है। छोटे गुब्बारे का अंत निकट देख रुंधे गले से गुब्बारे से कहते हैं : बलून, फ्लाई अवे फ्रॉम हियर।

पर इस दफा गुब्बारा छोटे का कहा नहीं मानता। छोटे को बच्चे गुब्बारे के लिए नोचते हैं। उनमें से एक सयाना उनसे पार नहीं पाता तो गुलेल से गुब्बारे में सुराख़ कर देता है। गुब्बारा ज़मीन पर गिरता है तो अपनी विजय की मुहर लगाने के लिए वही सयाना उस पर एक जोरदार लात जमा देता है। गुब्बारा फट जाता है। इसी के साथ छोटे के भीतर भी कुछ फटता है, जो उनकी नन्हीं आखों की राह पकड़ उनके चेहरे पर फैल जाता है !

छोटे जिस मद्धिम स्वर में अपने लाल गुब्बारे के लिए बिलखते हैं, उससे कहीं तेज़ी से उस दिन पेरिस शहर के मार-तमाम गुब्बारे अपनी जगह से उड़कर छोटे तक आते हैं और उन्हें अपनी गोद में भर गुब्बारों के देश ले जाते हैं, जहाँ कोई मानवी क्रूरता नहीं पहुँचती।

तो ये थी छोटे पास्कल की कहानी। १९५६ में इस कहानी को फ्रेंच फ़िल्ममेकर अलबर्ट लैमोरिसे ने कही थी। महज ३४ मिनट की अवधि में। रेड बलून शीर्षक से। गिनती की ७-८ सतरें हैं इस फ़िल्म में डायलॉग के नाम पर। कैमरे से जैसा सघन दृश्य-विधान रचा गया है, और अपनी नन्हीं काया में जितना कुछ छोटे और अन्यथा गुम्मा गुब्बारा संप्रेषित कर जाता है, वहां फ़िल्म में इतने कम संवाद खटकते नहीं। आपको जान कर अचरज होगा कि बेस्ट स्क्रीनप्ले के लिए लैमोरिसे को उसी वर्ष ऑस्कर मिला था। साथ ही, कान के अलावा अन्य कई फ़िल्म समारोहों में भी फ़िल्म को कई पुरस्कार मिले। बच्चों की मासूम दुनिया को सेल्युलाइड पर इतनी मार्मिकता से फिल्माने के कारण द रेड बलून आज भी मील का पत्थर मानी जाती है।
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कवि का अकेलापन

3:57 am
मंगलेश जी का गद्य आप जल्दी-जल्दी नहीं पढ़ सकते। अगर आप ऐसा करते हैं तो अपने लिए उस खतरे को भी सिरजते चलते हैं जिसकी ओट में इस विशिष्ट गद्य की अनेक अर्थ-छवियां छिपी रह जाती हैं। कहना न होगा कि उनका गद्य पठन का धीरज मांगता है। हालाँकि वह महज इसीलिए विशिष्ट गद्य नहीं है। इसलिए तो और भी नहीं कि वह कविता की खूबियां लिए एक कवि का गद्य है। एक संवेदनशील कवि के लिए कविता के बाहर इस नैसर्गिक गद्य-गुण को पाना कठिन नहीं है। कठिन है उसके भीतर सोच की उस विलंबित लय को बिलआखिर अटूट बनाए रखना जो अपने साथ आपको न सिर्फ़ सोचने पर बाध्य करती है, बल्कि आपके सोचे-जाने में कुछ इजाफा भी करती जाती है। पढ़नेवालों के मन में ऐसी खुशफैल जगह बहुत कम लेखक बना पाते हैं। उनकी नई गद्य पुस्तक कवि का अकेलापन में भी पिछली पुस्तकों ( एक बार आयोवा और लेखक की रोटी) की तरह ही उनका सुगठित और सोचता हुआ गद्य अपने समय, कविता और कला के बारे में कुछ भिन्न नुक्ते से कहने की दोहरी ज़िम्मेदारी का निर्वाह करता है। समकालीन हिन्दी कविताओं और कविओं के बारे में एक वरिष्ठ कवि के इतने प्रसन्न, चौकन्ना और बहुलार्थी लेखन से गुजरते हुए कविता और कवि से विपन्न समय का रोना रोनेवाले धंधई आलोचकों की याद आना स्वाभाविक है। ऐसे लोगों के बौद्धिक आलस्य और अनर्गल प्रलाप से ही हिन्दी में गंभीर वैचारिक अंतर्क्रिया से अलग एक गप्पी माहौल बना है जिसमें सच्चे कवि को अनिवार्यतः अपने अकेलेपन की शरण लेनी पड़ती है। पर इस अकेलेपन में भी वह अपने रामझरोखे से हमारे समय के विद्रूप को कविता के बाहर-भीतर हिसाब में लेना नहीं भूलता। कवि के लिए ऐसा करना निराशा के कर्तव्यों में से प्राथमिक ठहरता है। पुस्तक में मंगलेश जी ने कविता और कलाओं के बारे में जितने लगाव से लिखा है, उतने ही क्षोभ से वैचारिक निबंधों और डायरियों के अंश में उन विडंबनापूर्ण स्थितियों पर भी लिखा है जिससे हिन्दी पट्टी में सत्ता-राजनीति फलती-फूलती है।
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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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