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Showing posts from February, 2009

मारियो और मासिमो

पहले कविता पढ़ने में आई। गीत चतुर्वेदी की। उन्हीं की भेजी गई कविताओं की फाइल में, पोस्टमैन शीर्षक से। नेरुदा अजाने नहीं थे। पर पोस्टमैन न सिर्फ़ अजाना था, बल्कि कविता और उसके फ़ुटनोट को पढ़कर उसकी ट्रैजिक लाइफ के बारे में जो जानकारी मिली उससे मन गहरे भिद गया।

अपने निर्वासित दिनों में नेरुदा स्पेन के एक छोटे से द्वीप में कुछ समय व्यतीत करते हैं। वहां भी उनके नाम दुनिया भर से डाक आती है। इतनी कि डाक विभाग को एक विशेष डाकिया नेरुदा तक उनकी चिट्ठियां पहुंचाने के लिए अलग से नियुक्त करना पड़ता है। डाकिये का नाम मारियो है। मारियो बहुत साधारण सा दिखनेवाला नौजवान है, जिसे एक खूबसूरत सी लड़की से प्यार हो जाता है। पर वह अपने प्रेम में इतना विश्वत नहीं कि उससे जाकर यह कह सके। इसमें स्वयं मातील्दा के प्रेम में डूबे कवि नेरुदा उसकी मदद करते हैं और वह न सिर्फ़ उस लड़की को इम्प्रेस कर उससे विवाह करता है, बल्कि नेरुदा की संगति कर कविताएं भी करने लगता है।

नेरुदा के उस द्वीप से जाने के बाद मारियो के पास उनकी बेशुमार यादें और वह सरोसामान रह जाता है जिसे वे अपने पीछे छोड़ गए थे। मारियो नेरुदा को हरचंद ख़त लिखकर…

कोठार से बीज : ६ : मलयज

कि वह बीज सुरक्षित रह जाए,उसे कीड़े न खा जाएं...

चाहता हूँ मैं खूब डटकर काम करूँ, खूब जमकर काम करूँ ( मैं कर सकता हूँ ), काम में सब कुछ भूल जाऊँ...अपनी शिकस्त और कुंठाएं ...मैं चाहता हूँ मुझे काम करने दें, वे सब जो चाहते तो हैं कि मैं काम करूँ ( क्योंकि उस काम के फल में वे शरीक होंगे) पर जो मुझे करने नहीं देते, मैं चाहता हूँ, मुझे काम करने दिया जाए, मुझे ठेला जाए, धक्का दिया जाए, मुझे तोड़ा-फोड़ा जाए, मुझे चोट पहुंचाई जाए...वहीं तक जहाँ कि मेरे हाथ से कलम न छूट जाए...मैं चाहता हूँ, मेरे हाथ में वह मेरी कलम मुझे दे दी जाए जो कभी तो कहीं और कभी तो कहीं नहीं छुपा दी जाती है, मेरे होशोहवास में, मेरी आंखों के सामने...और मैं अनकिये कामों के बोझ के नीचे दबा यह सब होने देता हूँ, क्योंकि नहीं चाहता कि वह ज़रा-सी हार्मनी, वह ज़रा-सा नाज़ुक संतुलन टूट जाए जिसके तहत मेरी ज़िन्दगी एक कामचलाऊ दहब से चलती जाती है। मैं चाहता यह ढब टूट जाए...मैं जो आधी अरक्षा में जीता हुआ सुरक्षा के आधे टुकड़े की तलाश में अपनी उम्र पर व्यर्थ के दिनों की मैली परतें चढ़ाता जाता हूँ...पूरी तरह अरक्षित हो जाऊँ...मेरे खून-पसीने म…

पहली किताब

गोरखपुर में कोई फ़िल्म फेस्टिवल होता है, यह बात तो सुनने में आई थी, पर उस फ़िल्म फेस्टिवल से निकलकर कुछ अनूठा मेरे हाथ भी लग जाएगा, यह सोचा न था। डाक से जब अपने जैसी दुबली-पतली काया की विश्व के महानतम दस फिल्मकारों पर एकाग्र पुस्तक, 'पहली किताब'हाथ लगी, तो इन दिनों इनमें से ज्यादातर की फिल्में जुनूनी ढंग से देखने के अपने निजी शगल को परे कर इसे फौरन घोखने बैठा, कुछ-कुछ इस भाव और उत्तेजना से भी कि यारा जो देखते हो, वह कितना पल्ले पड़ता है, जानो तो सही!
हालाँकि हिन्दी में इससे पहले विनोद भारद्वाज की फिल्मों पर भीमकाय पुस्तक (जो कल आज और कल नाम से छपी है) को पढ़ने के सदमे से मैं अभी भी नहीं उबर पाया हूँ। फिल्मों का कथासार बतानेवाली पुनरुक्तियों से भरी इस पुस्तक को पढ़ने के पहले मेरे लिए कुंवर नारायणजी के सिनेमा पर छिटपुट लेखन से गुजरना जितना प्रीतिकर अनुभव था, उतना ही विष्णु खरे की लगभग अचर्चित पुस्तक, 'सिनेमा पढ़ने के तरीके' को गुनना शिक्षाप्रद। बहुत सी फिल्मों के बारे में फिल्मकार और लेखक के. बिक्रम सिंह की संगत और लेखन से जानकारी मिली। कहना चाहिए कि पहली किताब को पढ़ना भी …

ज़बां उर्दू : ३ : ग़ालिब : पूरा ख़त और आधी ग़ज़ल

ख़त

रखियो ग़ालिब मुझे इस तल्ख़ नवाई में मुआफ़
आज कुछ दर्द मेरे दिल में सिवा होता है
बंदा परवर,
पहले तुमको यह लिखा जाता है कि मेरे दोस्त क़दीम मीर मुकर्रम हुसैन साहिब की खिदमत में मेरा सलाम कहना और यह कहना कि अब तक जीता हूँ और इससे ज़्यादा मेरा हाल मुझको भी मालूम नहीं। मिर्ज़ा हातिम अली साहिब मेहर की जानिब में मेरा सलाम कहना...तुम्हारे पहले ख़त का जवाब भेज चुका था, कि उसके दो दिन या तीन दिन के बाद दूसरा ख़त पहुँचा। सोनो साहिब, जिस शख्स को जिस शग्ल का ज़ौक हो और वह इसमें बेतकल्लुफ़ उम्र बसर करे, इसका नाम ऐश है। और भाई, यह जो तुम्हारी सुख़न-गुस्तरी है, इसकी शोहरत में मेरी भी तो नामवरी है। मेरा हाल इस फन में अब यह है कि शेर कहने की रविश और अगले कहे हुए अशआर सब भूल गया। मगर हाँ, अपने हिन्दी कलाम में से डेढ़ शेर, यानी एक मक्ता और एक मिसरा याद रह गया है। सो गाह-गाह जब, दिल उलटने लगता है, तब दस-पाँच बार यह मक्ता ज़बान पर आ जाता है - ज़िन्दगी अपनी इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब'
हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे
फिर जब सख्त घबराता हूँ और तंग आता हूँ, तो यह मिसरा पढ़कर चुप हो जाता हूँ -ऐ मर्गेनागहाँ …

क्या वे उन्हें भूल सकती हैं ?

मुझे सहसा लगा, यह लड़का अपनी अनिश्चितता में, अपनी नर्वसनेस में -- इस लड़की को खो रहा है। मुझे तब अपने बहुत-से मित्र याद हो आए जो महज़ अपनी ज़िद, अपनी अकड़, अपनी हिंस्र आक्रामकता में, अपने उन्मत्त पैशन में कितनी आसानी से लड़कियों को पा लेते हैं और उन्हें एक क्षण भी संकोच नहीं होता कि वे उन लड़कियों को अपने उन मित्रों से छीन ले रहे हैं, जो पराजित हो जाते हैं, पीछे हट जाते हैं, इसलिए नहीं कि वे कम 'पोटेंट'हैं, कम मर्द हैं, कम प्रेम करना जानते हैं, बल्कि इसलिए कि वे 'नर्वस' हैं, अनिश्चित हैं, शंकाकुल हैं, इस बात में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं, कि उनमें इतना सामर्थ्य है कि किसी लड़की को सुखी बना सकें ( 'मैं तुमसे प्रेम करती हूँ, लेकिन सुनो, मैं तुम्हारे संग सेक्योर महसूस नहीं करती )इसलिए जब दूसरे आदमी आते हैं, मज़बूत और मुखर, और अपनी धुन के पक्के -- तो अनायास वे लड़कियां उनके साथ चली जाती हैं, उनसे विवाह करके अपनी गृहस्थी बसा लेती हैं, बच्चे जनती हैं, सबकुछ पा लेती हैं, जो कभी चाहती थीं...लेकिनकभी-कभी मैं सोचता हूँ, कि किसी सूनी दुपहर में जब उनका पति अपने कोर्ट, फ़र्म य…

तुम दरअसल कहीं नहीं थीं : मंगलेश डबराल

1 तुम्हें कहीं खोजना असंभव था
तुम्हारा कहीं मिलना असंभव था
तुम दरअसल कहीं नहीं थीं
न घर के अंधेरे में
न किसी रास्ते पर जाती हुईं
तुम न गीत में थीं
न उस आवाज़ में जो उसे गाती है
न उन आंखों में
जो सिर्फ़ किन्हीं दूसरी आंखों का प्रतिबिंब हैं
तुम उन देहों में नहीं थीं
जो कपड़ों से लदी होती हैं
और निर्वस्त्र होकर डरावनी दिखती हैं
तुम उस बारिश में भी नहीं थीं
जो खिड़की के बहार दिखाई देती है
निरंतर गिरती हुई। 2
मैंने देखे दो या तीन रंग
मैंने देखी हल्की-सी रोशनी
जो लगातार
पैदा होती थी
मैंने देखी एक आत्मा
जो कांपती सांस लेती थी
मैंने देखा तुम आती थीं
मेरे ही स्पर्शों में से निकलकर इस तरह मैंने तुम्हारी कल्पना की
ताकि दुःख से उबरने के लिए
प्रार्थनाएं न करनी पड़ें
मैंने तुम्हारी कल्पना की
ताकि नींद के लिए
अँधेरे की कामना न करनी पड़े मैंने तुम्हारी कल्पना की
ताकि तुम्हें देखने के लिए
फिर से कल्पना न करनी पड़े। 3
रात में खुलता है पहाड़ का दरवाज़ा
रात में खुलती है पहाड़ की खिड़की
वहां से प्रवेश करता है प्रेम
दिखते हैं कुछ और दरवाज़े
दरवाज़ों के आगे
दिखती हैं कुछ और खिड़कियाँ
खिड़कियों के आगे।4
तुम्हारे लिए आता हूँ मैं
मेरे रास्ते में हैं तुम्हा…

निधन : सुदीप बैनर्जी

सुंदर (चंद ठाकुर) जब आज का काम ख़त्म करने के ठीक पहले यह बताने आए कि सुदीपजी का निधन हो गया है, तो सहसा यकीन नहीं हुआ। यह अप्रत्याशित था। ख़बर बनाते हुए भी बड़ा अजीब लग रहा था। हिन्दी के एक कवि होने के अलावा उनके बारे में एक अल्पज्ञात तथ्य यह भी है कि वे एक उच्चपदस्थ सरकारी मुलाजिम थे और ऐसा होने के बावजूद समाज की परिवर्तनकामी शक्तियों के साथ थे। कविता में ऐसी संगत बहुत से कवियों ने की है। पर कविता के बाहर भी ऐसा करने का माद्दा और अपने द्वारा ऐसा किए जाने को परोक्ष रखने का संयम बहुत कम लोगों में है। इस लिहाज से वे बहुत अच्छे कवि होने के साथ-साथ बहुत उम्दा इंसान भी थे। उनकी काव्य-भाषा में उर्दू-हिन्दी की मेलजोल शमशेर जितनी ही पक्की है, और अपने समय को दर्ज करने का उनका अलहदा तरीका उन्हें आठवें दशक के कवियों में महत्वपूर्ण बनाता है। सबद सुदीपजी और उनके परिवार के प्रति अपनी शोक-संवेदना प्रकट करता है।

कुछ कविताएं

इतना औसत समय

इतना औसत समय
इतनी गहरी व्यथा
इतना विचलित मन
गाफ़िल अपने ही शोर में

कोई रह-रहकर पुकार उठता
जगाता खौफनाक हसरतों को
पीछे मुड़कर देखने पर
कोई कहीं भी तो नहीं

सधती नहीं यह भाषा
इतना…

व्योमेश शुक्ल की नई कविता

तुम हो कि मुकद्दमा लिखा देती हो

तुम शब्बर चाचा के घर की बग़ल में भी रह सकती थी
तुम गुलिस्ताँ प्राइमरी स्कूल में पढ़ भी सकती थी
तुम्हारे अब्बू शहनाई भी बजा सकते थे

लेकिन बासठ की उमर में तुम उठती हो और वर्सोवा पुलिस थाने जाकर अपने इकहत्तर
साल के पति नेताजी सालंके के खिलाफ उत्पीड़न का मुकद्दमा लिखा देती हो

तुम्हारे साथ बदसलूकी हुई है
तुम्हें थोड़ा आराम कर लेना चाहिए
तुम जो कर सकती थी कर आई हो
और ये दुबली-पतली खबर देश में फैल भी गई है
फ्लैट का दरवाजा भीतर से बंद कर लो

थोड़ी देर में आएगा दिनेश ठाकुर हाथ में रजनीगंधा के फूल लिए
या अमोल पालेकर भी आ सकता है या मैं भी आ सकता हूँ
कोई न कोई आएगा
उसके दरवाजा खटखटाते ही फिल्म शुरू होती है
साठ के अंत की फिल्म सत्तर के शुरू की फिल्म
शहर आने की फिल्म
जेल जाने की फिल्म
बहुत ज्यादा लोगों से कम लोगों की फिल्म
पब्लिक ट्रांसपोर्ट की फिल्म
या पब्लिक सेक्टर की फिल्म शुरू होती है एक फ्लैट का दरवाजा खटखटाने से

लेकिन मेरे और तुम्हारे बीच
सिर्फ दरवाजे भर की दूरी नहीं है

बहुत से जमाने हैं बहुत से लोग
विद्याचरण शुक्ल हैं और बी आर चोपड़ा हैं और प्रकाश मेहरा हैं और मनमोहन…

पोथी पढ़ि पढ़ि : १ : फरनांदो पैसोआ

एक बेचैन के रोजनामचे से कुछ वाक्य...

किसी चीज़ को अभिव्यक्त करने का मतलब है उसके गुण को संरक्षित रखना, उसके आतंक को निकाल देना।

मैंनेज़िन्दगी में बहुत कम चाहा, पर उस रंचमात्र से भी मुझे वंचित रखा गया। ...इस ज्ञान से कि मेरा अस्तित्व है, बहुत ज़्यादा न सताया जाऊँ, दूसरों से किसी चीज़ को चाहूँ नहीं, और न दूसरे मुझसे कोई चीज़ मांगे ...यह सब मुझे इनकार किया गया, वैसे ही जैसे कोई सद्भावना के अभाव के कारण आश्रय देने से इनकार नहीं करता, बल्कि इसलिए इनकार करता है कि उसे अपने कोट के बटन न खोलने पड़ें।

दुखी मन से मैं अपने शांत कमरे में लिखता हूँ, अकेला, जैसा कि मैं सदा से रहा, अकेला, जैसा मैं सदा रहूँगा। और मैं अचरज करता हूँ कि क्या मेरी साफ़-साफ़ कामजोर आवाज़ हजारों आवाजों के सार को साकार नहीं कर सकती, हजारों जिंदगियों की आत्माभिव्यक्ति की लालसा, हजारों आत्माओं का धैर्य, जो मेरी तरह निरर्थक सपने देखने और रोजाना की इस किस्मत में बेपता आशा के हवाले हो गई हैं...

मुझमें कुछ ऐसा है जो सदा करुणा की याचना करता है और जो अपने आप पर ऐसे रोता है जैसे किसी मृत देवता पर, जिसने उस समय अपने सारे पूजन-स्थल खो दिए…

आलोचना का पक्ष : १ : वागीश शुक्ल

साहित्य मृत्यु का सामना करने की विधि है

पढ़ना एक ऋण का स्वीकार है, लिखना उस ऋण की अदायगी।
लिखने के बाद मरने का हक मिलता है।
साहित्य मृत्यु का सामना करने की विधि है।
इसमें साहित्य पढ़ना और रचना दोनों शामिल है।
जैसे रेशम का कीड़ा अपने चारों ओर एक कीमती चीज़ बुनता है और मौत को बुलावा देता है (वैसे ही) मौत अपने चारों ओर कहानी बुनती है, जिसका नाम ज़िन्दगी है।
साहित्य शब्द और अर्थ के शराब हो जाने का भाव है। यदि यह पढ़ने में बुरा लगता हो तो 'शराब' की जगह 'मधु' पढ़ लें, इससे वाक्य का तात्पर्य नहीं बदलेगा। जिन चीजों से शराब बनती है, वे अलग-अलग शराब नहीं हैं, नशा उनमें नहीं, (उनके) संधान में है। शब्द और अर्थ में अलग-अलग साहित्य नहीं है, उनके मिलाप में है। (इस तरह) शब्द और अर्थ को चुआ कर बनाई गई शराब ही साहित्य है।
कवि एक भट्ठी लगाता है, शब्द और अर्थ की आग में, अर्थ को शब्द की आग में चुआते हुए कविता की मदिरा तैयार करने के लिए। शब्द और अर्थ दोनों को भाड़ में झोंकते हुए वह दोनों लुकाठियों से घर फूंकता हुआ उनके धुएँ में बदलने का तमाशा देखता है।
आलोचना का काम है कि यदि कविता का सिंगार कव…